Wednesday, 18 March 2026

मोहनदास करमचंद गाँधी की पुण्यतिथि ---

 मोहनदास करमचंद गाँधी की पुण्यतिथि पर मैं गांधी को और पुणे व पुणे के आसपास के उन छः हज़ार से अधिक निर्दोष ब्राह्मणों को श्रद्धांजलि देता हूँ, जिनकी हत्या गाँधीवध की प्रतिक्रया स्वरुप अगले तीन दिनों में कर दी गयी थीं। पुणे की गलियों में चारपाई डालकर सो रहे निर्दोष ब्राह्मणों पर किरोसिन तेल डालकर उन्हें जीवित जला दिया गया। पुणे में ब्राह्मणों को घरों से निकाल निकाल कर सड़कों पर घसीट घसीट कर उनकी सामूहिक हत्याएँ की गईं। उस घटना की कोई जाँच नहीं हुई और घटना को दबा दिया गया। उन ब्राह्मणों का दोष इतना ही था कि नाथूराम गोड़से एक ब्राह्मण थे, और वह भी पुणे के।

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मोहनदास गांधी पर गोली चली तो उनकी कुछ प्राथमिक चिकित्सा तो अवश्य ही हुई होगी। उनके शव का पोस्ट-मार्टम भी हुआ ही होगा। वे रिपोर्ट्स सार्वजनिक क्यों नहीं की जातीं? मोहनदास गाँधी कांग्रेस को भंग करना चाहते थे जिसके लिए जवाहरलाल नेहरु सहमत नहीं थे। गाँधी जी की आर्थिक नीतियाँ भी नेहरू की नीतियों के विरुद्ध थीं। गाँधी की सुरक्षा व्यवस्था क्यों हटा ली गयी थी? क्या इसीलिए कि वे उस समय किसी के लिए किसी काम के नहीं रह गए थे? नाथूराम गोडसे को पिस्तौल और गोलियाँ किसने दीं? किसने उन्हें हत्या करने के लिए उकसाया? गांधी की ह्त्या के बाद उनके शरीर के पोस्ट-मार्टम की क्या रिपोर्ट थी? ऐसे कई अनुत्तरित प्रश्न हैं|
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क्या किसी ने एक तीर से कई शिकार तो नहीं किये? गांधी जी को भी मार्ग से हटवा दिया, और आरएसएस पर भी प्रतिबन्ध लगवा दिया, पुणे के राजनीति में सक्रीय ब्राह्मणों को भी मरवा दिया, और हिन्दुओं को भी बदनाम करवा दिया? क्या इसके पीछे कोई बहुत बड़ा षडयंत्र तो नहीं था?
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गाँधी की नीतियों व विचारों से महर्षि श्रीअरविन्द बिलकुल भी सहमत नहीं थे| उन्होंने गाँधी के बारे में लिखा था कि गाँधी की नीतियाँ एक बहुत बड़े भ्रम और विनाश को जन्म देंगी, जो सत्य सिद्ध हुआ| महर्षि श्रीअरविद के वे लेख नेट पर उपलब्ध हैं| कृपया उन्हें पढ़ें|
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गाँधी द्वारा आरम्भ खिलाफत आन्दोलन जो तुर्की के खलीफा को बापस गद्दीनशीन करने के लिए था, का क्या औचित्य था? क्या यह तुष्टिकरण की पराकाष्ठा नहीं थी? क्या इससे पकिस्तान की नींव नहीं पड़ी? राजनितिक व सामाजिक रूप से गांधीजी का पुनर्मूल्यांकन क्या आवश्यक नहीं है? गांधीजी भारत के तो नहीं पर पाकिस्तान के राष्ट्रपिता अवश्य थे। पाकिस्तान की नींव ही उनके खिलाफत आन्दोलन से पड़ी।
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गांधीजी द्वारा किया गया सबसे महान कार्य था -- नेतृत्वहीन भारत का नेतृत्व करना और बिहार में चंपारण का सत्याग्रह। गांधीजी एक राजनेता थे, कोई महात्मा नहीं। उनमें अत्यधिक असामान्य कामुकता जैसी सभी मानवी दुर्बलताएँ थीं। वे हमारे आदर्श नहीं हो सकते। उनको राष्ट्रपिता कहना गलत है, क्या गाँधी से पूर्व भारत एक राष्ट्र नहीं था? आजकल पढ़ाया जाता है कि अंग्रेजों से पूर्व भारत नहीं था, छोटे छोटे राज्य थे। यह गलत है। सम्राट अशोक व समुद्रगुप्त जैसे राजाओं के राज्य में भारत की सीमाएँ अंग्रेजों द्वारा शासित भारत से भी अधिक विशाल थीं।
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मोहनदास गांधी के पिता करमचंद गांधी ने चार विवाह किये थे। उनकी चौथी पत्नी पुतलीबाई की वे चौथी संतान थे। उनके बचपन का नाम मोनु था। कहते हैं कि उनके पिता करमचंद गांधी पोरबंदर के दरबार के दीवान थे। पहली बात तो यह है कि पोरबंदर कोई रियासत नहीं, बल्कि एक छोटा सा ठिकाना था। दीवान उस बाबू को कहते थे जो हिसाब-किताब लिखने वाला मामूली क्लर्क होता था। वहाँ के सारे बड़े व्यापारी मुसलमान थे। अब प्रश्न यह पैदा होता है कि उन्हें पढ़ने के लिए इंग्लैंड किसने व क्यों भेजा? उन्हे दक्षिण अफ्रीका में किसने काम दिलाया?
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अंग्रेजों ने उन्हें हजारों एकड़ जमीन (दक्षिण अफ्रीका व भारत में) क्यों भेंट की?
अपने से विरुद्ध जाने वाले सभी भारतियों की ज़मीनें अंग्रेज़ लोग छीन लेते थे। फिर गांधी को दक्षिण अफ्रीका और भारत में हजारों एकड़ भूमि क्यों प्रदान की?
क्या वे अंग्रेजों के एक वेतनभोगी एजेंट थे? क्या उनकी अहिंसा भारत के क्रांतिकारियों से अंग्रेजों की रक्षा के लिए थी? उन्हें महात्मा की उपाधि किसने दी? वे इतने अधिक कामुक और परस्त्रीगामी लंपट क्यों थे? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिन के उत्तर अभी आने बाकी हैं।
श्रद्धांजली | वन्दे मातरं | भारत माता की जय |
कृपा शंकर
३० जनवरी २०२६

राष्ट्र की वर्तमान दशा में हम अपना सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं? हमारी जाति और धर्म क्या है?

राष्ट्र की वर्तमान दशा में हम अपना सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं? हमारी जाति और धर्म क्या है?

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इस विषय पर मेरी सोच स्पष्ट है। मेरा एकमात्र उत्तर है कि हमें अपने स्वधर्म का सदैव पालन करते रहना चाहिए। धर्म का अर्थ Religion नहीं है। वास्तव में धर्म शब्द का अनुवाद नहीं हो सकता। धर्म धर्म ही रहेगा। वैशेषिक-सूत्रों, महाभारत, मनु-स्मृति, और अन्य अनेक आगम ग्रंथों में में धर्म शब्द की सर्वोच्च व्याख्या की गई है। इस विषय पर मैं अनेक बार लिख चुका हूँ। बार बार लिखना पुनरोक्ति दोष होगा, फिर भी लिख रहा हूँ। हम शाश्वत् आत्मा हैं, आत्मा का स्वधर्म परमात्मा की अभीप्सा, उपासना और पूर्ण समर्पण है। यही हमारा स्वधर्म है।
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कुछ लोग मुझे जातिवादी कह कर अपने मन की कुंठा को ही व्यक्त करते हैं जो सबसे बड़ा झूठ है। उनको मेरा एक ही उत्तर है -- जब मैं यह शरीर ही नहीं हूँ तो मेरी जाति क्या हो सकती है? ---
"जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम।
गृह हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम॥"
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और मुझे कुछ भी नहीं कहना है। गुरु महाराज ने तो योग और वेदान्त की शिक्षा दी, व उपासना का मर्म समझाया। गुरुकृपा से ही यह समझ पाया हूँ कि इस समय तो परमात्मा को पूर्ण आत्म-समर्पण ही मेरा स्वधर्म है॥ इस जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो। गुरु महाराज ने परमात्मा का बोध भी अनेक बार बड़े स्पष्ट रूप से कराया है। अतः कोई संशय नहीं है।
ॐ ऐं गुरुभ्यो नमः॥ शिवोहम् शिवोहम् शिवोहम् !! अहं ब्रह्मास्मि !!
ॐ तत् ॐ सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ फरवरी २०२६

(१) समाज में "वर्ग-संघर्ष" नहीं, "वर्ग-सहयोग", "सामाजिक-समरसता" और "देशभक्ति" की भावना प्रबलतम होनी चाहिये। (२) भारत में जनतंत्र के स्थान पर राजतन्त्र की स्थापना हो सकती है।

 (१) समाज में "वर्ग-संघर्ष" नहीं, "वर्ग-सहयोग", "सामाजिक-समरसता" और "देशभक्ति" की भावना प्रबलतम होनी चाहिये।

(२) भारत में जनतंत्र के स्थान पर राजतन्त्र की स्थापना हो सकती है।
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दुर्भाग्य से भारत में सामाजिक-न्याय के नाम पर सामाजिक एकता को तोड़कर नये वर्ग बना कर उनमें संघर्ष कराया जा रहा है। यह राजनीति बड़ी घातक सिद्ध होगी। मैं इसका विरोध करता हूँ। लोकतन्त्र को भी अपनी समाप्ती के लिए कोई तो बहाना चाहिये। हम अंग्रेजों द्वारा लिखाये गये झूठे इतिहास का शिकार बनते जा रहे हैं।
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मुझे तो भविष्य में राजतंत्र की बापसी दिखायी दे रही है। अपने राज्याभिषेक के समय हिन्दू राजा --- धर्म-रक्षा की प्रतिज्ञा और संकल्प लेते थे। यह कोई गोपनीयता की शपथ मात्र नहीं थी। हिन्दू क्षत्रिय राजाओं का घोषित लक्ष्य ही धर्म-रक्षा करते हुए प्रजा का कल्याण और पालन करना, न्याय स्थापित करना और राज्य में धर्म का संरक्षण करना था। वे स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर प्रजा का कल्याण, सुख, सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध थे। प्रजा की भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि सुनिश्चित करना राजा का सर्वोच्च धर्म माना जाता था।
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मुझे तो यही लगा रहा है कि भविष्य का राजधर्म राजतंत्र ही होगा। बाकी जैसी ईश्वर की इच्छा। हम केवल प्रार्थना ही कर सकते हैं।
"ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्॥" ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
४ फरवरी २०२६

परमात्मा में निरंतर रमण करते हुए हम परमात्मा में ही स्थित हों ---

 परमात्मा में निरंतर रमण करते हुए हम परमात्मा में ही स्थित हों ---

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पहले मुझे लगता था कि इस तापत्रय-सन्तप्त संसार में मैं अनुपयुक्त हूँ जो किसी गलत स्थान पर आ गया है। लेकिन मेरी सोच गलत थी। भगवान ने अपनी सृष्टि में हमें कहीं भी रखा हो, वे गलत नहीं हो सकते। इस सृष्टि में किसी भी तरह की किसी कामना का होना एक धोखा है, जो हमें सीधे एक भयंकर कष्ट यानि दुःख में डालता है। यहाँ केवल एक गहन अभीप्सा हो परमात्मा के लिये, और उन्हीं में हम निरंतर रमण करें। यही सीखने के लिए हम इस संसार में आते हैं।
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मैं ही सब की आत्मा हूँ, -- इस भाव का अनंत विस्तार ही -- "अहं ब्रह्मास्मि" है। संसार में हम अपनी प्रशंसा से प्रसन्न न हों, क्योंकि मान-सम्मान पाने की कामना, माया का एक बहुत बड़ा भयंकर जाल है, जिसमें धोखा ही धोखा है। समत्व की उपलब्धि ही ज्ञान है, और समत्व में स्थित व्यक्ति ही ज्ञानी है। गीता के अनुसार समत्व का अर्थ (समत्वं योग उच्यते - २:४८) जीवन की सभी विपरीत परिस्थितियों, में मन को स्थिर और समान बनाये रखना है।
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अहंकार से प्रेरित इच्छाओं और ममत्व के कारण हमारा व्यक्तित्व विखंडित भी हो सकता है। हमारे समस्त दुःखों का कारण -- राग-द्वेष, अहंकार और कामनायें हैं। वीतराग होकर यानि इन सब को त्याग कर अपनी प्रज्ञा की परमात्मा में निरंतर स्थिति -- स्थितप्रज्ञता है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति ही ब्राह्मी स्थिति यानि ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।
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मान-सम्मान पाने की कामना एक स्पृहा है जो हमारे मन को अशांत करती है। गीता में भगवान हमें निःस्पृह होने का उपदेश देते हैं --
"विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति ॥२:७१॥"
अर्थात् जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहारहित, ममभाव रहित, और निरहंकार हुआ विचरण करता है, वह शान्ति प्राप्त करता है॥
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आत्मा में निरंतर रमण करते करते हम आत्मा में ही स्थित होकर आत्माराम
बनें। यही ब्रह्म में विचरण और ब्रह्मचर्य है जो सारे अंधकार को दूर कर आगे के सारे द्वार खोलता है।
ॐ ऐं गुरुभ्यो नमः॥ ॐ शिव !! ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ फरवरी २०२६

"निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन्" ---

 उपासना में हम कर्ताभाव से मुक्त होकर एक साक्षीमात्र बनें। साधना तो जगन्माता स्वयं करती हैं और सारे कर्मफल परमशिव को अर्पित करती हैं। एकमात्र कर्ता वे स्वयं हैं। हम तो एक निमित्त मात्र हैं। दूसरे शब्दों में महाकाली सारी साधना स्वयं करते हुए सारे कर्मफल श्रीकृष्ण को अर्पित करती हैं।

गीता के ११वें अध्याय के ३३वें मंत्र में भगवान हमें निमित्त मात्र होने का उपदेश देते हैं जो अति विचारणीय है --
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३॥"
अर्थात् - " इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥"
गीता के शंकर भाष्य के अनुसार बायें हाथ से भी बाण चलाने का अभ्यास होने के कारण अर्जुन सव्यसाची कहलाता है (सव्येन वामेनापि हस्तेन शराणां क्षेप्ता सव्यसाची इति उच्यते अर्जुनः)॥ भगवान का यह उपदेश कर्मयोग का सार है जो हमें फल की चिंता और अहंकार से मुक्त कर एक निमित्त मात्र होने का आदेश देता है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ फरवरी २०२६
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पुनश्च: -- शक्ति के बिना शिव भी शव हैं। यह चित्र भगवती "श्री" का है जिनके बिना शिव भी शव हैं। भगवती को मैं नमन करता हूँ। शिव और शक्ति -- दोनों एक हैं, जिन्हें मैं अपना पूर्ण समर्पण करता हूँ।

आजकल ब्राह्मणों पर हो रहे प्रहार वास्तव में सनातन धर्म पर प्रहार हैं ---

आजकल ब्राह्मणों पर हो रहे प्रहार वास्तव में सनातन धर्म पर प्रहार हैं। ब्राह्मणों की संस्था यदि नष्ट हो गयी तो सनातन धर्म भी नष्ट हो जाएगा। सनातन धर्म यानि हिन्दुत्व को जो नष्ट करना चाहते हैं, वे हैं -- ईसाईयत, इस्लाम, मार्क्सवाद, पूरी पश्चिमी सभ्यता, नास्तिकतावाद और आधुनिकतावाद।

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पेरियार के अनुयायियों द्वारा तमिलनाडु से सारे ब्राह्मण भगा दिये गये थे, आज बंगाल से भगाये जा रहे हैं। तमिलनाडु की सरकार हिन्दुत्व को ही एक छूत की बीमारी बता रही है। कांग्रेस तो ब्राह्मणद्रोही थी ही, वर्तमान भाजपा सरकार भी ब्राह्मणद्रोही हो गयी है। भाजपा के सबसे अधिक समर्थक ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ग हैं।
लेकिन सनातन धर्म को भगवान नष्ट नहीं होने देंगे। सनातन धर्म भारत की अस्मिता है। जितने प्रहार उस पर हो रहे हैं, उसका दस लाखवां भाग जितना आक्रमण भी किसी अन्य सभ्यता पर होता तो वह सभ्यता अब तक नष्ट हो गयी होती।
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भारत के हिन्दू समाज में ब्राह्मण सबसे अधिक कमजोर, दरिद्र और अति पिछड़ा वर्ग है। सबसे अधिक गरीबी ब्राह्मणों में है। उन्हें नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्हें नष्ट करना भी सबसे आसान है, क्योंकि धर्मशिक्षा के अभाव में वे दिशाहीन हो गये हैं।
कृपा शंकर
८ फरवरी २०२६

आध्यात्म में साधक कौन है? साध्य क्या है? और साधना क्या होती है? ---

 आध्यात्म में साधक कौन है? साध्य क्या है? और साधना क्या होती है?

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आध्यात्म मेरा प्राण है। निरंतर मेरे अस्तित्व से परमात्मा स्वयं व्यक्त हो रहे हैं। मेरे बारे में कोई कुछ भी सोचे यह उसकी अपनी समस्या है। मेरी प्रथम, अंतिम, और एकमात्र समस्या -- निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है। यह मेरा व्यक्तिगत मामला है। इसमें न तो मुझे किसी की कोई सलाह चाहिए और न किसी का कोई सहयोग या स्वीकारोक्ति। मैं किसी से कुछ नहीं मांगने वाला अतः यह शंका न करें कि मैं आपसे कुछ मांग लूँगा।
मैं भगवान से भी कुछ मांगने नहीं, उन्हें उनका सारा सामान बापस देने आया हूँ। भगवान को बापस देने के लिए मेरे पास बहुत कुछ है। सबसे बड़ी चीज तो उनका दिया हुआ "अन्तःकरण" (मन बुद्धि चित्त अहंकार) है, फिर ये भौतिक, सूक्ष्म व कारण शरीर, सारी ज्ञानेंद्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ और उनकी तन्मात्राएँ हैं।
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मैं योगमार्ग के अपने अनुभवों की बात करता हूँ। साधनाकाल के आरंभ में साधक होने का भ्रम था कि इतना जप, इतना तप, इतना ध्यान, और इतनी क्रियाएँ आदि करनी है। यह सब मेरा भ्रम था।
सारी साधनायें तो जगन्माता/भगवती स्वयं घनीभूत प्राण तत्व कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में करती हैं, और साध्य ऊर्ध्वमूल में सच्चिदानंद पुरुषोत्तम/परमशिव हैं। ध्यान और साक्षात्कार उन्हीं का होता है। कैसे होता है? यह विषय गोपनीय है जिसकी चर्चा गुरु-परंपरा के बाहर नहीं होती।
सार की बात यह है कि सारी साधना तो जगन्माता स्वयं करती हैं, और साध्य भगवान परमशिव हैं। हम एक निमित्त साक्षी मात्र हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ फरवरी २०२६

भारत को एक ब्रह्मतेज (ब्रह्मशक्ति) की आवश्यकता है ---

मैंने अनेक वर्षों पूर्व एक बात कही थी कि भारत को एक ब्रह्मतेज (ब्रह्मशक्ति) की आवश्यकता है। वह आवश्यकता अभी तो तुरंत है और भविष्य में भी सदा ही रहेगी। अनेक साधकों की एक गहन और समर्पित आध्यात्मिक साधना और पराविद्याओं के ज्ञान से ब्रह्मतेज जागृत होगा, केवल बातों से नहीं। ब्रह्मतेज जागृत होगा तो क्षात्रतेज भी जागृत होगा। भारत को ब्रह्मतेज़ और क्षात्रतेज दोनों की ही तुरंत आवश्यकता है। पराविद्या ही मनुष्य को भौतिक बंधनों से मुक्त कर सकती है।

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वर्ण-व्यवस्था और क्षत्रिय राजाओं का राज्य भारत में पुनः स्थापित होगा। पूरे विश्व में धर्म की पुनः प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा। धर्म केवल एक सनातन ही है जिसके दस लक्षण मनुस्मृति में बताये गये हैं। वैशेषिक सूत्रों में धर्म को परिभाषित किया गया है। महाभारत में इसे विस्तार से समझाया गया है।
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ध्यान-साधना, गीतापाठ, शिवपूजा आदि तो नित्य करनी ही चाहिये। गीता के सांख्य-योग (अध्याय २) को समझना बहुत आवश्यक है। उसको समझे बिना आगे कुछ भी समझ में नहीं आयेगा। इसी अध्याय में भगवान हमें निर्द्वंद्व, नित्यसत्वस्थ, निर्योगक्षेम, आत्मवान और निस्त्रैगुण्य होने का उपदेश देते हैं। इसी अध्याय में भगवान हमें वीतराग व स्थितप्रज्ञ होकर ब्राह्मी-स्थिति में स्थित होने को कहते हैं।
तंत्र, योग और भक्ति तीनों की ही आवश्यकता आध्यात्मिक साधना के लिए है। केवल आध्यात्मिक साधक ही ब्रह्मतेज को व्यक्त कर सकते हैं।
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ॐ तत् सत् ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१० फरवरी २०२६

महाशिवरात्रि के त्योहार की तैयारी अभी से करें। महाशिवरात्रि की अग्रिम मंगलमय शुभ कामनाएँ ---

 महाशिवरात्रि के त्योहार की तैयारी अभी से करें। महाशिवरात्रि की अग्रिम मंगलमय शुभ कामनाएँ ---

आध्यात्मिक साधना और मंत्र सिद्धि के लिए चार रात्रियों का बड़ा महत्त्व है --
(१) कालरात्रि (दीपावली), (२) महारात्रि (महाशिवरात्रि), (३) मोहरात्रि (जन्माष्टमी). और (४) दारुण रात्रि (होली)। इन रात्रियों को किया गया ध्यान, जप-तप, भजन -- कई गुणा अधिक फलदायी होता है।
भौतिक देह की चेतना से ऊपर उठने की साधना तो नित्य ही करनी चाहिये। आत्म-विस्मृति सब दुःखों का कारण है। इन रात्रियों को अपने आत्म-स्वरुप यानि सर्वव्यापी परमशिव का ध्यान यथासंभव अधिकाधिक करें। इन रात्रियों में सुषुम्ना नाड़ी में प्राण-प्रवाह अति प्रबल रहता है अतः निष्ठा और भक्ति से की गई साधना निश्चित रूप से सफल होती है।
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समय इधर उधर नष्ट करने की बजाय आत्मज्ञान ही नहीं बल्कि धर्म और राष्ट्र के अभ्युदय के लिए भी साधना करें। धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए एक विराट आध्यात्मिक ब्रह्मशक्ति के जागरण की हमें आवश्यकता है, जो हमारी साधना के बल से ही जागृत होगी। भगवान परमशिव को ही कर्ता बनाकर समर्पण भाव से हम सब उनकी आराधना के निमित्त बनेंगे, और गीता आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय भी करेंगे। गीता में भगवान कहते हैं --
"शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌ ||६:२५||"
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये क्रमश: चलकर बुद्धि द्वारा विश्वास-पूर्वक अभ्यास करता हुआ मन को आत्मा में स्थित करके, परमात्मा के चिन्तन के अलावा अन्य किसी वस्तु का चिन्तन न करे।
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌ ||६:२६||"
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये स्वभाव से स्थिर न रहने वाला और सदा चंचल रहने वाला यह मन जहाँ-जहाँ भी प्रकृति में जाये, वहाँ-वहाँ से खींचकर अपनी आत्मा में ही स्थिर करे।
"सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः||६:२९||"
भावार्थ : योग में स्थित मनुष्य सभी प्राणीयों मे एक ही आत्मा का प्रसार देखता है और सभी प्राणीयों को उस एक ही परमात्मा में स्थित देखता है, ऎसा योगी सभी को एक समान भाव से देखने वाला होता है।
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति||६:३०||"
भावार्थ : जो मनुष्य सभी प्राणीयों में मुझ परमात्मा को ही देखता है और सभी प्राणीयों को मुझ परमात्मा में ही देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता है।
"सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः|
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ||६:३१||"
भावार्थ : योग में स्थित जो मनुष्य सभी प्राणीयों के हृदय में मुझको स्थित देखता है और भक्ति-भाव में स्थित होकर मेरा ही स्मरण करता है, वह योगी सभी प्रकार से सदैव मुझमें ही स्थित रहता है।
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कूटस्थ सूर्यमण्डल में व उससे भी परे परमशिव का गहनतम ध्यान करें। मैं आप सब के साथ एक हूँ। महाशिवरात्रि की अग्रिम हार्दिक शुभ कामनाएँ !!
"ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिव च शिवतराय च।" "ॐ नमः शिवाय॥"
कृपा शंकर
११ फरवरी २०२६

मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि "आत्म-साक्षात्कार" है ---

 मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि "आत्म-साक्षात्कार" है ---

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संक्षेप में यानि कम से कम शब्दों में आज मैं उस विषय पर बात कर रहा हूँ जो मेरे अब तक के समस्त अनुभवों और अर्जित ज्ञान का सार है। उसी में तल्लीन और तन्मय होकर अवशिष्ट जीवन परमात्मा को समर्पित है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् - " हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥"
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मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि "आत्म-साक्षात्कार" (Self-Realization) यानि "ब्रह्म" (Ultimate Reality) के साथ एकत्व की अनुभूति है। यह उच्चतम स्थिति है जिसे "तुरीय चेतना" भी कहते हैं। यह विशुद्ध जागरूकता की स्थिति है जिसमें हम इस सत्य को अनुभूत करते हैं कि हम यह अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) नहीं, बल्कि एक साक्षी आत्मा हैं। अंततः यह साक्षी भाव भी तिरोहित हो जाता है। हम स्वयं ब्रह्ममय हो जाते हैं।
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ध्यान, मौन, भक्ति और समर्पण -- ये मार्ग हैं, जो हमें वीतरागता, स्थितप्रज्ञता, और समत्व में स्थित करते हैं। इस अवस्था यानि स्थिति में व्यक्ति को किसी भी तरह का कोई मोह या भ्रम नहीं रहता। सुख-दुःख, लाभ-हानि जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी साधक विचलित नहीं होता।
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इस आलेख का उद्देश्य कम से कम शब्दों में परम सत्य को व्यक्त करना है। इस का विस्तार श्रीमद्भगवद्गीता और सारे उपनिषद हैं।
ॐ ऐं गुरुभ्यो नमः॥ ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ फरवरी २०२६

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का हरिःहर रूप ---

 श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का हरिःहर रूप ---

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भगवान हरिःहर हैं। हरिः और हर में कोई भेद नहीं है। हरिः — भगवान विष्णु को कहते हैं, और हर — भगवान शिव को। इनमें भेद करना महापाप है। भगवान शिव और भगवान विष्णु एक ही निराकार ब्रह्म (परम सत्य) की दो अभिव्यक्तियाँ हैं। वे एक-दूसरे के पूरक हैं, न कि पृथक-पृथक।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो अपना विराट, सर्वव्यापी, अनंत दिव्य विश्वरूप दिखाया है, भगवान का वह महाकाल रूप है, जिसमें हम पूर्ण भक्तिभाव से अपनी पृथकता के सम्पूर्ण बोध का समर्पण करते हैं। महाकाल ही शिव हैं। उसी रूप का हम उपासना में ध्यान करते हैं। भगवान विष्णु की पूजा तो उनके सौम्य चतुर्भुज रूप की होती है, लेकिन ध्यान उनके विश्वरूप का ही होता है। इस विश्व रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड, देवता, ऋषि, ग्रह-नक्षत्र, और काल (समय) समाहित होता है।
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गीता में श्रीभगवान ने स्वयं को (महा) काल बताया है --
"कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वेयेऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥११:३२॥"
अर्थात् - श्रीभगवान् ने कहा -- "मैं लोकों का नाश करने वाला प्रवृद्ध काल हूँ। इस समय, मैं इन लोकों का संहार करने में प्रवृत्त हूँ। जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा हैं, वे सब तुम्हारे बिना भी नहीं रहेंगे॥ (११:३२)"
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इससे अगले मंत्र में भगवान हमें निमित्त मात्र होने का उपदेश देते हैं --
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३)"
अर्थात् - "इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥ (११:३३)"
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गीता में इससे पहिले भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को रुद्र और शंकर भी बता चुके हैं --
"रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥१०:२३॥"
अर्थात् - " मैं (ग्यारह) रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धनपति कुबेर (वित्तेश) हूँ; (आठ) वसुओं में अग्नि हूँ तथा शिखर वाले पर्वतों में मेरु हूँ॥ (१०:२३)"
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हरिः (विष्णु) और हर (शिव) सनातन धर्म में एक ही ब्रह्म (सर्वोच्च चेतना) के दो अभिन्न रूप हैं, जिनमें कोई भेद नहीं है। हरि पालनकर्ता हैं तो हर संहारक, जो मिलकर सृष्टि का संतुलन बनाते हैं। दोनों ही भक्तों के पापों का हरण करते हैं। शिव, विष्णु का ध्यान करते हैं और विष्णु, शिव की पूजा करते हैं। हरिः और हर मिलकर एक ही "हरिःहर" रूप बनते हैं, जो समानता का प्रतीक है। भगवान विष्णु के बिना शिव प्रसन्न नहीं होते और शिव के बिना विष्णु की कृपा नहीं मिलती। "हरिः" का अर्थ है दुखों को हरने वाला (विष्णु), और "हर" का अर्थ है बुराइयों का नाश करने वाला (शिव)।
स्कन्द पुराण तो यहाँ तक कहता है -- "ॐ नमः शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे। शिवस्य हृदयं विष्णुं विष्णोश्च हृदयं शिवः॥"
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कहीं पढ़ा था कि बिहार के सोनपुर में हरिःहर का एक प्रसिद्ध मंदिर भी है, जहां दोनों की एक साथ पूजा की जाती है। भगवान हरिःहर को नमन।
गीता में अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति ---
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥"
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥११:३९॥"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥"
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ॐ तत् ॐ सत्॥ ॐ स्वस्ति॥ ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ "ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिव च शिवतराय च।"
कृपा शंकर
१४ फरवरी २०२६

शिवरात्रि की मंगलमय अनंत शुभ कामनाएं ---

 शिवरात्रि की मंगलमय अनंत शुभ कामनाएं ---

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शिवरात्रि तो एक बहाना है, अन्यथा निरंतर सर्वव्यापक सर्वस्व परमशिव की चेतना ही मेरा अस्तित्व है। शिवलिंग उनका प्रतीक चिह्न है। पूरा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि, सारा अस्तित्व एक शिवलिंग है। वह परम मंगल और कल्याणकारी परम-चैतन्य जिसमें सब का विलय हो जाता है -- स्थूल जगत का सूक्ष्म जगत में, सूक्ष्म जगत का कारण जगत में, और कारण जगत का सभी आयामों से परे तुरीय चेतना में, -- उस का प्रतीक है शिवलिंग। उसकी अनुभूति कूटस्थ में होती है। उस पर ध्यान से चेतना ऊर्ध्वमुखी होने लगती है। लिंग का शाब्दिक शास्त्रीय अर्थ है -- विलीन होना। शिवत्व में विलीन होने का प्रतीक है शिवलिंग।
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पहले जब मैं अपनी साधना स्वयं करता था, तो तत्व की अनेक बातें लिखता था। लेकिन अब भगवान परमशिव अपनी साधना स्वयं करते हैं, मैं एक निमित्त साक्षी मात्र हूँ, अतः अब कुछ भी नहीं लिखा जाता। एक ही बात लिख सकता हूँ कि -- "शिवो भूत्वा शिवं यजेत्", यानि "शिव बनकर शिव का ध्यान करो"। शिव-तत्व को जीवन में उतार लेना ही शिवत्व को प्राप्त करना है और यही शिव होना है।
(१) शिव का अर्थ है -- कल्याणकारी।
(२) शंभू का अर्थ है — मंगलदायक।
(३) शंकर का अर्थ है — शमनकारी और आनंददायक।
(४) भूतनाथ का अर्थ है -- पञ्च भूतों यानि पञ्च तत्व के अधिपति।
(५) महाकाल का अर्थ है — काल के प्रवर्तक और नियंत्रक। तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण -- ये पाँचों मिल कर काल कहलाते हैं। ये काल के पाँच अंग हैं।
(६) शिव परिवार -- शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदीश्वर -- ये पाँचों मिलकर शिव-परिवार कहलाते हैं। नन्दीश्वर साक्षात धर्म हैं।
(७) पंचाक्षरी मंत्र -- 'नम: शिवाय' है। इसके साथ ॐ का संपुट लगता है।
(८) पंचमुखी रुद्राक्ष की माला -- शिव साधना में प्रयुक्त होती है। यह भी अनिवार्य है।
(९) भस्म -- बड़ी पवित्रता से देसी नस्ल की गाय के गोबर से ही तैयार होती है। इसमें और कुछ भी प्रयोग नहीं होता। शिव साधना के किए यह अनिवार्य है।
(१०) परमशिव -- एक अनुभूति है। ब्रह्मरंध्र से परे परमात्मा की विराट अनंतता व उससे परे का सचेतन बोध परमशिव की अनुभूति है। तब साधक स्वयं ही परमशिव हो जाता है। परमशिव की अनुभूति निरंतर होती रहती है।
(११) त्रिपुरारी -- भगवान शिव जीवात्मा को संसारजाल, कर्मजाल और मायाजाल से मुक्त कराते हैं। जीवों के स्थूल, सूक्ष्म और कारण देह के तीन पुरों को ध्वंश कर महाचैतन्य में प्रतिष्ठित कराते है अतः वे त्रिपुरारी हैं।
(१२) दुःखतस्कर -- तस्कर का अर्थ चोर होता है जो दूसरों की वस्तु का हरण कर लेता है। भगवान परमशिव अपने भक्तों के सारे दुःख और कष्ट चुपचाप हर लेते हैं। भक्त को पता ही नहीं चलता। अतः वे दुःखतस्कर हैं।
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परमात्मा के लिए ब्रह्म शब्द का प्रयोग किया जाता है। ब्रह्म शब्द का अर्थ है -- जिनका निरंतर विस्तार हो रहा है, जो सर्वत्र व्याप्त हैं, वे ब्रह्म हैं।
सूक्ष्म देह में सुषुम्ना नाड़ी के भीतर एक शिवलिंग तो मूलाधार चक्र के बिलकुल ऊपर है। उसका रहस्य हर किसी को नहीं बताया जा सकता। कूटस्थ ज्योति भी एक शिवलिंग है, जिसका ध्यान किया जाता है। कूटस्थ-चैतन्य में मानसिक रूप से रहते हुए परमशिव अर्थात ईश्वर की कल्याणकारी ज्योतिर्मय सर्वव्यापकता का ध्यान किया जाता है। सम्पूर्ण अनंतता से परे मेरे उपास्य देव भगवान परमशिव हैं, जिनकी चेतना ही मेरा अस्तित्व है। मेरा समर्पण उन्हीं के प्रति है। जो वे हैं, वो ही मैं हूँ।
पुनश्च शुभ कामनाएँ॥ ॐ ॐ ॐ॥ ॐ नमः शंभवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ ॐ तत् सत् ॥ ॐ नमः शिवाय॥
कृपा शंकर
१५ फरवरी २०२६

जो इसी जीवन में भगवत्-प्राप्ति करना चाहते हैं, ऐसे सत्यनिष्ठ मुमुक्षु ही मेरे मित्र-संकुल में रहें ---

 जो इसी जीवन में भगवत्-प्राप्ति करना चाहते हैं, ऐसे सत्यनिष्ठ मुमुक्षु ही मेरे मित्र-संकुल में रहें। भगवान मिलें या न मिलें, यह उनकी समस्या है। हमारा कार्य तो उनका उपकरण बनकर उनके प्रकाश का निरंतर विस्तार करना है। इसके लिए भक्ति, योग व तंत्र आदि सभी साधन उपलब्ध हैं।

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मुझे किसी भी तरह का कोई संशय या कोई आकांक्षा नहीं है। मैं धर्म-अधर्म और पाप-पुण्य से परे हूँ। मेरे लिए कोई कर्तव्य, लक्ष्य या उपलब्धि नहीं है। मैं स्वयं ही हर कर्तव्य, हर लक्ष्य, व हर उपलब्धि हूँ। मैं यह देह नहीं बल्कि असीम सम्पूर्ण अनंतता व उससे भी परे का सम्पूर्ण अस्तित्व हूँ। मेरे सिवाय कोई अन्य नहीं है।
शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ अहं ब्रह्मास्मि॥ ॐ शिव शिव शिव॥
कृपा शंकर
१५ फरवरी २०२६

कर्ता कौन है? हम ईश्वर को कैसे प्राप्त हों? हमारी क्या पात्रता हो?

 गीता में भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार इस सृष्टि में तीनों गुणों से अतिरिक्त अन्य कोई भी कर्ता नहीं है। ईश्वर त्रिगुणातीत है, अतः ईश्वर से जुड़कर ही हम निस्त्रेगुण्य हो सकते हैं। यही अमृतत्व को प्राप्त करने का मार्ग है। पर यह कैसे संभव हो? भगवान इसका मार्ग बताते हैं --

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१४;२६॥"
अर्थात् -- जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों से अतीत होकर ब्रह्म बनने योग्य हो जाता है॥
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ईश्वर से अतिरिक्त अन्य किसी भी कामना के होने को भगवान ने व्यभिचार की संज्ञा दी है, और अनन्य-योग व वैराग्य को साधन बताया है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिर्व्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् -- अनन्ययोग के द्वारा मुझ में अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
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भगवान ने स्वयं को अमृत, अव्यय, ब्रह्म, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक पारमार्थिक सुख की प्रतिष्ठा बताया है। जितनी मात्रा में अहंकार तिरोहित होता है, उतनी ही मात्रा में आत्मा की दिव्यता अभिव्यक्त होती है। प्रतिष्ठा का अर्थ है — जिसमें वस्तु की स्थिति होती है। भगवान ने स्वयं को अमृत और अव्यय ब्रह्म की प्रतिष्ठा बताया है, अतः वे प्रत्यगात्मा यानी परमात्मा हैं।
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अनन्य-योग और अव्यभिचारिणी भक्ति से भजन करते करते भगवान हमारे समक्ष शनैः शनैः स्वयं को अनावृत करते हैं। यदि इससे आगे की कोई और भी विद्या है तो भगवान उसका भी बोध हमें कराते हैं। उनकी विशेष कृपा के हम पात्र बनें। भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के अनुशासन पर्व में महाराजा युधिष्ठिर को भी अव्यभिचारिणी भक्ति का उपदेश दिया है।
ॐ तत् ॐ सत्॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
कृपा शंकर
१६ फरवरी २०२६

राष्ट्र हित में वर्तमान केंद्र सरकार से २ मुद्दों पर हमारी असहमति है ---

राष्ट्र हित में वर्तमान केंद्र सरकार से २ मुद्दों पर हमारी असहमति है। यदि इनका समाधान नहीं हुआ तो अगले चुनावों में भाजपा की, और स्वयं प्रधानमंत्री की चुनावी पराजय सुनिश्चित है।

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(१) "समान नागरिक संहिता" के आश्वासन पर वचन भंग कर के भाजपा ने जनता के साथ विश्वासघात किया है। सन २०१४ के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के चुनाव घोषणापत्र (Manifesto) में "समान नागरिक संहिता" (Uniform Civil Code - UCC) लागू करने का आश्वासन दिया गया था। घोषणापत्र में भाजपा ने कहा था कि जब तक भारत "समान नागरिक संहिता" नहीं अपना लेता, तब तक लैंगिक समानता (gender equality) नहीं हो सकती। पार्टी ने सभी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोत्तम परंपराओं को शामिल करते हुए एक "समान नागरिक संहिता" का मसौदा तैयार करने के अपने रुख को दोहराया था।
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उसके बाद दो-दो आम चुनाव हो चुके हैं, लेकिन अभी तक "समान नागरिक संहिता" लागू नहीं की गई है। अनारक्षित वर्ग के विरुद्ध क्रमशः बिलकुल वैसे ही कानून बनाए जा रहे हैं जैसे जर्मनी में हिटलर ने यहूदियों के विरुद्ध बनाये थे। अब अनारक्षित वर्ग (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व कायस्थ आदि) को अपने अधिकारों के लिए संगठित होना पड़ेगा, अन्यथा उनकी वही गति होगी जैसी जर्मनी में यहूदियों की हुई थी। "समान नागरिक संहिता" को लागू न करना भारत से सनातन धर्म को नष्ट करने का आसुरी प्रयास है।
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(२) भारत सरकार और भाजपा के नेता बार बार अपने भाषणों में कहते हैं कि हमारी सरकार दलितों, पिछड़ों, अल्प-संख्यकों, और वंचितों की है। सारा आरक्षण उन्हीं के लिए है। फिर जो अनारक्षित सामान्य वर्ग है, वह कहाँ जायेगा ? अनारक्षित सामान्य वर्ग -- भाजपा को मत (Vote) क्यों दे जब उनके बच्चों का भविष्य ही भाजपा के राज में अंधकारमय है।
पं.दीन दयाल उपाध्याय के स्थान पर बाबा साहब को ही उद्धृत किया जा रहा है। भीमराव रामजी अंबेडकर को बाबा साहब के नाम से कहा जा रहा है, क्योंकि उनके असली नाम में राम नाम है जिसे बोलने में शर्म आती है।
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मैंने जब से होश संभाला है, आज तक जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का ही समर्थन किया है। बचपन से ही संघ का स्वयंसेवक रहा हूँ। मेरा संघ प्रवेश भी ६४ वर्ष का है। भाजपा को सत्ता में लाने के लिए पूरी ऊर्जा लगा दी थी। अब बात इतनी बढ़ गई है कि कोई भी आरक्षित वर्ग का व्यक्ति अनारक्षित के विरुद्ध झूठा आरोप लगाकर उसे जेल भिजवा सकता है। अनारक्षित की न तो कोई जांच होगी, न सुनवाई होगी और न कोई जमानत मिलेगी। वह स्वयं तो जेल में सड़ेगा और उसका परिवार आत्म-हत्या को मजबूर हो जायेगा। अतः आरक्षित वर्ग में थोड़ा सा भी स्वाभिमान है तो क्यों ऐसे दल को वोट देगा ? मैं तो ऐसे दल को तब तक कोई वोट नहीं दूंगा, जब तक समान नागरिक संहिता लागू नहीं हो जाती। वोट यदि NOTA में डालने पड़े तो NOTA में ही डालूँगा। हमने और हमारे पूर्वजों ने किसी के साथ अन्याय नहीं किया, कभी किसी पर अत्याचार नहीं किया, अब हमें अत्याचारी और अन्यायी बताया जा रहा है। क्या हमारी संवेदनाएं नहीं हैं? क्या हमें दुःख और पीड़ा नहीं होती?
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वर्ग-संघर्ष एक दुःखान्तिका है, जो किसी भी परिस्थिति में भारत में न हो। भारत में तुरंत प्रभाव से "समान-नागरिक संहिता" लागू हो, और सब के लिए समान कानून हो।
ॐ तत्सत् ॥ ॐ शिव॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
कृपा शंकर
१७ फरवरी २०२६
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पुनश्च: _--- जीवन में सब कुछ किया लेकिन राम का नाम नहीं लिया, इसीलिए जो लोग सामाजिक-समरसता और हिन्दू-एकता की बातें करते थे, वे ही झूठे वर्ग उत्पन्न कर समाज में वर्ग-संघर्ष और विषमता का रस घोल रहे हैं। यह उनका लोभ और सत्ता की लालसा है। पूरा मार्क्सवाद ही वर्ग-संघर्ष पर आधारित है, जो सनातन-धर्म का शत्रु है। सनातन के सभी शत्रुओं का नाश स्वयं भगवान करेंगे। हमारा तो धर्म ही ईश्वर की साधना है।