Thursday, 30 April 2026

साकार और निराकार परमात्मा की साधना में क्या भेद है ?

 साकार और निराकार परमात्मा की साधना में क्या भेद हैं? मुझे तो आज तक कोई भेद कहीं नहीं दिखाई दिया। वास्तव में निराकार कुछ है ही नहीं। जिस की भी सृष्टि हुई है, उसका कुछ न कुछ आकार है ही, चाहे वह शब्द रूप में हो या प्रकाश रूप में। कुछ लोग अपने गुरु को सच्चा गुरु बताते हैं और दूसरों के गुरु को झूठा गुरु। बड़ी विचित्र बात है! उनके लिए गुरु मनुष्य है या तत्व? स्वयं को वे लोग यह शरीर मानते हैं। उन सब को दूर से ही प्रणाम !! निराकार का अर्थ होता है -- "सारे आकार जिसके हों, वह निराकार है।" मैं मूर्ति-पूजा का भी समर्थक हूँ, और साकार साधना का भी। इस सृष्टि में कुछ भी निराकार नहीं है। सारे आकार परमात्मा के हैं, वे इन आकारों में भी, और इन से परे भी हैं।

ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !! "ॐ तत्सत् !! कृपा शंकर ३० अप्रेल २०२३

Wednesday, 29 April 2026

शिवो भूत्वा शिवं यजेत् --- यह जीवन अब मुक्तावस्था में निरंतर ब्राह्मी-स्थिति में ही रहे।

 शिवो भूत्वा शिवं यजेत् ---

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यह जीवन अब मुक्तावस्था में निरंतर ब्राह्मी-स्थिति में ही रहे। मैं नित्यमुक्त, बड़ी सत्यनिष्ठा से, अपने हृदय की बात कह रहा हूँ। जिन की समझ में आये उन का मंगल हो, और जिन की समझ में न आये उन का भी मंगल हो।
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बाल्यकाल से ही मैं एक गहन जिज्ञासु रहा हूँ जो अति उत्सुकता से अपने आसपास के घटनाक्रम का बहुत गहराई से अवलोकन करता है। जीवन में ऊँच-नीच, न्याय-अन्याय, और अच्छा-बुरा सब कुछ बहुत अधिक देखा है, और उससे बहुत कुछ सीखा भी है। मेरे भी अपने आदर्श हैं, और अपनी स्वयं की विचारधारा भी है। लेकिन मैं अपने चारों ओर छाई हुई असत्य और अंधकार की शक्तियों से बहुत ही अधिक पीड़ित रहा हूँ। उन्होंने मुझे बहुत अधिक दुःख दिया है। इनके पीछे क्या रहस्य है? मुझे नहीं पता। पिछले जन्मों के कर्मफल रहे होंगे। जीवन के इस संध्याकाल में अब कोई कामना या आकांक्षा नहीं रही है। अवशिष्ट जीवन में जो भी सर्वश्रेष्ठ हो सकता है, उसी की उपासना में यह जीवन व्यतीत हो जाये, ताकि जो भी हो वह मंगलमय हो।
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एक अभीप्सा है -- अव्यक्त को व्यक्त करने की। किसी भी तरह का कोई संशय या शंका नहीं है। प्रकृति की प्रत्येक शक्ति मेरा साथ देगी ऐसी मेरी दृढ़ आस्था, श्रद्धा और विश्वास है। परमात्मा मेरे साथ हैं जिनके समक्ष कोई असत्य का अंधकार नहीं टिक सकता। मैं सदा कूटस्थ चैतन्य में, यानि ब्राह्मी स्थिति में रहूँ, और मेरी चेतना परम प्रेममय होकर समष्टि के साथ एक होकर रहे।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् - हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
यह अवस्था ब्राह्मी यानी ब्रह्म में होनेवाली स्थिति है, जहाँ सर्व कर्मों का संन्यास कर के केवल ब्रह्मरूप से स्थित हो जाना है। परमात्मा सब गुरुओं के गुरु हैं। उनसे प्रेम करो, सारे रहस्य अनावृत हो जाएँगे। हम भिक्षुक नहीं, परमात्मा के अमृत पुत्र हैं। मुझे सब में परमात्मा के ही दर्शन होते हैं। अतः सभी को मैं नमन करता हूँ।
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भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं --
"प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैतिदिव्यं॥८:१०॥"
अर्थात - भक्तियुक्त पुरुष अंतकाल में योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित कर के, फिर निश्छल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष को ही प्राप्त होता है|
आगे भगवान कहते हैं --
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥८:१२॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
अर्थात सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृदय में स्थिर कर के फिर उस जीते हुए मन के द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित कर के, योग धारणा में स्थित होकर जो पुरुष 'ॐ' एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है|
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निश्छल मन से स्मरण करते हुए भृकुटी के मध्य में प्राण को स्थापित करना और ॐकार का निरंतर जाप करना -- यह एक दिन का काम नहीं है। इसके लिए हमें आज से इसी समय से अभ्यास करना होगा। उपरोक्त तथ्य के समर्थन में किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, भगवान का वचन तो है ही, और सारे उपनिषद्, शैवागम और तंत्रागम इसी के समर्थन में भरे पड़े हैं।
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ध्यान का अभ्यास करते करते चेतना सहस्त्रार पर या ब्रह्मरंध्र के मार्ग से इस शरीर से बाहर भी चली जाए तो चिंता न करें। जब तक प्रारब्ध में जीवन लिखा है, मृत्यु नहीं आने वाली। सहस्त्रार में तो गुरु महाराज के चरण कमल हैं। कूटस्थ केंद्र भी वहीं चला जाता है। वहाँ स्थिति मिल गयी तो गुरु चरणों में आश्रय मिल गया।
चेतना ब्रह्मरंध्र से बाहर निकल कर अनंत में या उस से भी परे रहने लगे तब तो और भी प्रसन्नता की बात है। वह विराटता ही तो "विराट पुरुष" है।
उस अनंतता से भी परे परमशिव की अनुभूति "पञ्चमुखी महादेव" के रूप में होती है। इस देह से बाहर दिखाई देने वाली ज्योति भी अवर्णनीय और दिव्यतम है। परमात्मा के प्रेम में मग्न रहें, फिर तो परमात्मा ही परमात्मा होंगे, न कि हम।
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खोपड़ी के पीछे का भाग मेरुशीर्ष (Medulla Oblongata) हमारी देह का सर्वाधिक संवेदनशील स्थान है जहाँ मेरुदंड की सभी नाड़ियाँ मष्तिष्क से मिलती हैं। इस भाग की कोई शल्यक्रिया नहीं हो सकती। हमारी सूक्ष्म देह में आज्ञाचक्र यहीं पर स्थित है। यह स्थान भ्रूमध्य के एकदम विपरीत दिशा में है। योगियों के लिए यह उनका आध्यात्मिक हृदय है। यहीं पर जीवात्मा का निवास है। इसके थोड़ा सा ऊपर ही शिखा बिंदु है, जहाँ शिखा रखते हैं। उस से ऊपर सहस्त्रार और ब्रह्मरंध्र है।
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गुरु की आज्ञा से शिवनेत्र होकर यानि बिना किसी तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासिकामूल के समीपतम लाकर, भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, खेचरी मुद्रा में या जीभ को बिना किसी तनाव के ऊपर पीछे की ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखते हुए, प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि को अपने अंतर में सुनते हुए उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का ध्यान-चिंतन नित्य नियमित करें। गुरु की कृपा से कुछ महिनों या वर्षों की साधना के पश्चात् विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है। यह ब्रह्मज्योति और प्रणव की ध्वनि दोनों ही आज्ञाचक्र में प्रकट होती हैं, पर इस ज्योति के दर्शन भ्रूमध्य में प्रतिबिंबित होते हैं, इसलिए गुरु महाराज सदा भ्रूमध्य में ध्यान करने की आज्ञा देते हैं। ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के पश्चात् उसी की चेतना में सदा रहें। यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता। लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है, पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है। यह योगमार्ग की उच्चतम साधनाओं/उपलब्धियों में से एक है।
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दो बातें और कहना चाहता हूँ, जिन्हें बताने की भगवान से मुझे पूरी अनुमति है। आज अन्तःचेतना में स्वयं भगवान शिव ने दो बातें कहीं ---
एक तो उन्होंने कहा कि मुक्ति या मोक्ष की कामना ही मुक्ति और मोक्ष के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। जब तक मुक्ति और मोक्ष की कामना है तब तक हम बंधन में हैं, तब न तो मुक्ति मिल सकती है और न ही मोक्ष।
दूसरी बात उन्होंने कही -- "शिवो भूत्वा शिवं यजेत्।" अर्थात स्वयं शिव बनकर शिव की उपासना करो॥
ॐ नमः शिवाय। ॐ तत्सत्। ॐ स्वस्ति। ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
३० अप्रेल २०२३

Monday, 27 April 2026

हे प्रभु, सभी को उचित मार्गदर्शन प्राप्त हो।

 हे प्रभु, सभी को उचित मार्गदर्शन प्राप्त हो। तमोगुण के प्रभाव से जो मूढ़ योनियों में हैं, उनका उद्धार करो। रजोगुण के प्रभाव से जो कर्मठ तो हैं, लेकिन धर्म-विमुख हो गए हैं, उनका भी उद्धार करो। यह समय बहुत अधिक खराब चल रहा है। आपके प्रत्यक्ष अनुग्रह की आवश्यकता सभी को है। इस समय आपकी प्रत्यक्ष आवश्यकता है। अपनी आरोग्यकारी उपस्थिति सभी प्राणियों के अंतःकरण में प्रकट करो। लाखों महान जीवनमुक्त पुण्यात्माओं का भारत में जन्म हो। वे इस धरा पर आपका कार्य संपन्न करें। जन्म-जन्मांतरों के सारे कर्मफल और सारे अवगुण-गुण, व सम्पूर्ण अस्तित्व -- वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित हैं।

सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश, और धर्म के अभ्युत्थान के लिए भगवान वचनबद्ध हैं। सत्य-सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण शीघ्रतापूर्वक हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !

ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२८ अप्रेल २०२२

इधर-उधर की मन बहलाने वाली मीठी मीठी बातों से काम नहीं चलेगा ---

 इधर-उधर की मन बहलाने वाली मीठी मीठी बातों से काम नहीं चलेगा। उन में भटकाव ही भटकाव है। सीधी सी बात है ---

(१) जब तक हम अपने अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) पर विजय नहीं पाते, तब तक कोई आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती।
(२) इन पर विजय के पश्चात -- जीव-भाव से ऊपर उठ कर स्वयं को परमात्मा में दृढ़ता से स्थित करना पड़ेगा।
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इन के लिए किसी सिद्ध, ब्रहमनिष्ठ, श्रौत्रीय (जिन्हें वेदों का ज्ञान हो) आचार्य से मार्गदर्शन प्राप्त कर उनके सान्निध्य में साधना करनी पड़ेगी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, अन्य कोई मार्ग नहीं है। भटकाव में कुछ नहीं रखा है। आप सब को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ अप्रेल २०२१

हनुमान जी की अनुभूति ---

 हनुमान जी की अनुभूति ---

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मुझे हनुमान जी की अनुभूति कभी-कभी ध्यान में अपने मेरुदंड में होती है। परमात्मा की अनंतता से अवतरित होकर हनुमान जी अपने परम ज्योतिर्मय रूप में पता नहीं कब और कैसे मेरी सूक्ष्म देह के मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी में व्यक्त होने लगते हैं। नासिका से जब साँस अंदर जाती है, तब हनुमान जी मूलाधारचक्र से बड़े प्रेम और आनंद से सब चक्रों को भेदते हुए सहस्त्रारचक्र में आ जाते हैं। कभी तो वे वहीं स्थिर हो जाते हैं, कभी सुषुम्ना में बड़े प्रेम और आनंद से विचरण कर, बापस अपनी अनंतता में विलीन हो जाते हैं। उनकी उपस्थिती बड़े प्रेम और आनंद को प्रदान करती है।
मैं उनके समक्ष नतमस्तक हूँ।
"मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं|
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये||"
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हनुमान जी ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जो सदा सफल रहे हैं, उन्होने कभी विफलता नहीं देखी। वे सेवा और भक्ति के परम आदर्श हैं।
"अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥"
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ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२७ अप्रेल २०२१

Saturday, 25 April 2026

अहंकार यानि ईश्वर से पृथकता ही मनुष्य की समस्त पीड़ाओं का कारण है ---

 अहंकार यानि ईश्वर से पृथकता ही मनुष्य की समस्त पीड़ाओं का कारण है ..

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सब दू:खों, कष्टों और पीडाओं का स्थाई समाधान है --- शरणागति, यानि पूर्ण समर्पण| प्रभु को इतना प्रेम करो, इतना प्रेम करो कि निरंतर उनका ही चिंतन रहे| फिर आपकी समस्त चिंताओं का भार वे स्वयं अपने ऊपर ले लेंगे|
जो भगवान का सदैव ध्यान करता है उसका काम स्वयं भगवान ही करते हैं|
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संसार में सबसे बड़ी और सबसे अच्छी सेवा जो आप किसी के लिए कर सकते हो वह है -- परमात्मा की प्राप्ति| तब आपका अस्तित्व ही दूसरों के लिए वरदान बन जाता है| तब आप इस धरा को पवित्र करते हैं, पृथ्वी पर चलते फिरते भगवान बन जाते हैं, आपके पितृगण आनंदित होते हैं, देवता नृत्य करते हैं और यह पृथ्वी सनाथ हो जाती है|
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परमात्मा एक प्रवाह की तरह हैं जिसे शांत होकर अपने भीतर बहने दो| कोई अवरोध मत खड़ा करो| उनकी उपस्थिति के सूर्य को अपने भीतर चमकने दो|
जब उनकी उपस्थिति के प्रकाश से ह्रदय पुष्प की भक्ति रूपी पंखुड़ियाँ खिलेंगी तो उसकी महक अपने ह्रदय से सर्वत्र फ़ैल जायेगी|
हे प्रभु, यह मेरापन, सारी वासनाएँ, और सम्पूर्ण अस्तित्व तुम्हें समर्पित है|
जल की यह बूँद तेरे महासागर में समर्पित है जो तेरे साथ एक है, अब कोई भेद ना रहे|
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ॐ नमः शिवाय ! ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ ||
२५ अप्रेल २०१६

वर्तमान भारत में नक्सलवाद ---

 वर्तमान भारत में नक्सलवाद ---

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वर्तमान भारत में नक्सलवाद तो कभी का पूरी तरह समाप्त हो चुका है, जिनको अब हम नक्सलवादी कहते हैं वे और उनके समर्थक सिर्फ "ठग" "बौद्धिक आतंकवादी", "डाकू" और "तस्कर" हैं, इस के अलावा वे कुछ भी अन्य नहीं हैं| उनका एक ही इलाज है, और वह है ...... "बन्दूक की गोली"| इसी की भाषा को वे समझते हैं| वे कोई भटके हुए नौजवान नहीं है, वे कुटिल राष्ट्रद्रोही तस्कर हैं, जिनको बिकी हुई प्रेस, वामपंथियों और राष्ट्र्विरोधियों का समर्थन प्राप्त है| जिस समय नक्सलबाड़ी में चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने नक्सलवादी आन्दोलन का आरम्भ किया था, उस समय चाहे मैं किशोरावस्था में ही था, पर तब से अब तक का सारा घटनाक्रम मुझे याद है|
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नक्सलवादी आन्दोलन का विचार कानू सान्याल के दिमाग की उपज थी| यह एक रहस्य है कि कानू सान्याल इतना खुराफाती कैसे हुआ| वह एक साधू आदमी था जिसका जीवन बड़ा सात्विक था| उसका जन्म एक सात्विक ब्राह्मण परिवार में हुआ था| उसकी दिनचर्या बड़ी सुव्यवस्थित थी और भगवान ने उसे बहुत अच्छा स्वास्थ्य दिया था| कहते हैं कि उसकी निजी संपत्ति में खाना पकाने के कुछ बर्तन, कुछ पुस्तकों का पोटली में बंधा हुआ एक ढेर, एक चटाई और एक कुर्सी थी| और कुछ भी उसके पास नहीं था| वह एक झोंपड़ी में रहता था| सन १९६२ में वह बंगाल के तत्कालीन मुख्य मंत्री श्री वी.सी.रॉय को काला झंडा दिखा रहा था कि पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जहाँ उसकी भेट चारु मजुमदार से हुई|
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चारु मजूमदार एक कायस्थ परिवार से था और हृदय रोगी था, जो तेलंगाना के किसान आन्दोलन से जुड़ा हुआ था और जेल में बंदी था| दोनों की भेंट सन १९६२ में जेल में हुई और दोनों मित्र बन गए|
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सन १९६७ में दोनों ने बंगाल के नक्सलबाड़ी नामक गाँव से तत्कालीन व्यवस्था के विरुद्ध एक घोर मार्क्सवादी हिंसक आन्दोलन आरम्भ किया जो नक्सलवाद कहलाया| इस आन्दोलन में छोटे-मोटे तो अनेक नेता थे पर इनको दो और प्रभावशाली कर्मठ नेता मिल गए ........ एक तो था नागभूषण पटनायक, और दूसरा था टी.रणदिवे| इन्होनें आँध्रप्रदेश के श्रीकाकुलम के जंगलों से इस आन्दोलन का विस्तार किया|
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कालांतर में यह आन्दोलन पथभ्रष्ट हो गया जिससे कानु सान्याल और चारु मजूमदार में मतभेद हो गए और दोनों अलग अलग हो गए| चारु मजुमदार की मृत्यु सन १९७२ में हृदय रोग से हो गयी, और कानु सान्याल को इस आन्दोलन का सूत्रपात करने की इतनी अधिक मानसिक ग्लानि और पश्चाताप हुआ कि २३ मार्च २०१० को उसने आत्महत्या कर ली|
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जो मूल नक्सलवादी थे उनकी तीन गतियाँ हुईं .......
उनमें से आधे तो पुलिस की गोली का शिकार हो गए| वे अस्तित्वहीन ही हो गए| जो जीवित बचे थे उन में से आधों ने तत्कालीन सरकार से समझौता कर लिया और नक्सलवादी विचारधारा छोड़कर राष्ट्र की मुख्य धारा में बापस आ कर सरकारी नौकरियाँ ग्रहण कर लीं| बाकी बचे हुओं ने इस विचारधारा से तौबा कर ली और इस विचारधारा के घोर विरोधी हो गए| उनमें से कई तो साधु बन गए| अब कोई असली नक्सलवादी नहीं है| जिनको हम नक्सलवादी बताते हैं वे चोर बदमाश हैं जिन्हें उचित दंड मिलना चाहिए|
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वन्दे मातरं | भारत माता की जय ||
२५ अप्रेल २०२०

मैमूना बेगम की दास्तान ---

 मैमूना बेगम की दास्तान ---

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किसी ज़माने में इलाहाबाद में एक बहुत मशहूर गुजराती व्यापारी हुआ करते थे -- ज़नाब नवाब अली ख़ान साहब। वे इलाहाबाद और प्रतापगढ़ जिलों के शराब के सबसे बड़े व्यापारी और ठेकेदार भी थे। इलाहाबाद के बड़े बड़े घरों में शराब की बड़ी-बड़ी पार्टियाँ हुआ करती थीं, जिनमें मंहगी से मंहगी शराब की सप्लाई का काम वे ही करते थे। शराब के अलावा घर-गृहस्थी के काम का सारा सामान भी सप्लाई करते थे। उनकी बेगम साहिबा अपने निक़ाह से पहिले एक पारसी परिवार की बेटी थीं जिनका पारिवारिक उपनाम गंधी (Gandhi) था, गांधी नहीं। उनके परिवार का खानदानी पेशा गंध यानि इत्र बेचना था। शादी के समय इस्लाम कबूल कर के वे मुसलमान हो गई थीं।
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वहाँ के कब्रिस्तान में उन दोनों की और उनके बेटे की कब्रें भी हैं, पता नहीं वहाँ अक़ीदत के फूल चढ़ाने भी कोई जाता है या नहीं? उनके खानदान में बड़े बड़े मशहूर लोग हुए हैं, जिन्हें सारी दुनिया जानती है। उन ज़नाब नवाब अली खान साहब के साहबज़ादे का नाम फिरोज़ ख़ान था, जिन से मेमूना बेगम का निकाह हुआ। बाद में दोनों की बनी नहीं, और मेमूना बेगम ने धक्के मारकर उनको घर से बाहर कर दिया और युनूस खान नाम के एक दूसरे शख़्स से निक़ाह कर लिया।
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अब तो यह बात बहुत पुरानी हो गई है जिसे भूल जाना चाहिए। पर भूल कर भी भूल नहीं पा रहे हैं। उन ज़नाब नवाब अली साहब से बड़ा अभागा शायद ही कोई हुआ हो। उनके समधी, उनकी बहु, उनके नाती, और नाती की बहु -- दुनियाँ के सबसे मशहूर और रईस लोगों में हुए हैं, जिनकी याद में हर वर्ष बड़े बड़े जलसे होते हैं, उनके नाम पर हिंदुस्तान की आधी संस्थाओं के नाम हैं। लेकिन बेचारे फिरोज खान और उनके माँ-बाप को कोई याद नहीं करता। पता नहीं इनकी कब्र पर किसी ने कोई श्रद्धा-सुमन कभी चढ़ाया भी है या नहीं। सच का दामन जब छूट जाता है, तब झूठ का आईना टूट जाता है।
कृपा शंकर
२५ अप्रेल २०२०

Friday, 24 April 2026

= खेचरी मुद्रा =(भाग 1)

 == खेचरी मुद्रा ==

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(भाग 1)
ओ३म नमः शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे| शिवस्य हृदयं विष्णु: विष्णोश्च हृदयं शिव:||
ओ३म मुनीन्द्रगुह्यं परिपूर्णकामं कलानिधिं कल्मषनाश हेतुं |
परात्परं यत्परं पवित्रं नमामि शिवम् महतो महान्तम्||
नमामि शिवं महतो महान्तं| नमामि रामं महतो महान्तम्||
मैं पूर्व में अनेक आध्यात्मिक चर्चाएँ कर चुका हूँ| गुरु तत्व पर चर्चा के पश्चात अन्य किसी भी आध्यात्मिक विषय पर और चर्चा नहीं करूंगा| मेरे लिए उससे बड़ा कोई अन्य विषय नहीं है|
अब बापस साधनों की ओर लौटता हूँ|
हमारे महान पूर्वज भौतिक सूर्य की नहीं बल्कि स्थूल सूर्य की ओट में जो सूक्ष्म भर्गज्योति: है उसकी उपासना करते थे| उसी ज्योति के दर्शन ध्यान में कूटस्थ (आज्ञाचक्र और सहस्रार) में भी सर्वदा होते हैं|
इस लिए भी ध्यान साधना की जाती है|
ध्यान में सफलता के लिए हमें इन का होना आवश्यक है:-----
(1) भक्ति यानि परम प्रेम|
(2) परमात्मा को उपलब्ध होने की अभीप्सा|
(3) दुष्वृत्तियों का त्याग|
(4) शरणागति और समर्पण|
(5) आसन, मुद्रा और यौगिक क्रियाओं का ज्ञान|
(6) दृढ़ मनोबल और बलशाली स्वस्थ शरीर रुपी साधन|
खेचरी मुद्रा बहुत महत्वपूर्ण है जिसकी चर्चा हम क्रमशः करेंगे|
वेदों में 'खेचरी शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है|
वेदिक ऋषियों ने इस प्रक्रिया का नाम दिया -- 'विश्वमित्'|
'खेचरी' का अर्थ है --- ख = आकाश, चर = विचरण| अर्थात आकाश यानि प्रकाशवान या ज्योतिर्मय ब्रह्म तत्व में विचरण| जो बह्म तत्व में विचरण करता है वही साधक खेचरी सिद्ध है| परमात्मा के प्रति परम प्रेम और शरणागति हो तो साधक परमात्मा को स्वतः उपलब्ध हो जाता है पर प्रगाढ़ ध्यानावस्था में देखा गया है की साधक की जीभ स्वतः उलट जाती है और खेचरी व शाम्भवी मुद्रा अनायास ही लग जाती है| ध्यान साधना में तीब्र प्रगति के लिए खेचरी मुद्रा का ज्ञान अति आवश्यक है|
दत्तात्रेय संहिता और शिव संहिता में खेचरी मुद्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है|
तीन-चार दिनों में हम नित्य इसकी चर्चा और पूरी सरल विधि और महिमा का वर्णन करेंगे|
२४ अप्रेल २०१३
===== क्रमशः ======

परमात्मा एक प्रवाह है, उसे स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दो, कोई अवरोध मत खड़ा करो ---

"परमात्मा एक प्रवाह है, उसे स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दो| कोई अवरोध मत खड़ा करो| फिर पाएँगे कि वह प्रवाह हम स्वयं हैं|"

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प्रिय निजात्मगण, आप सब में हृदयस्थ प्रभु को नमन !
आप सब से एक प्रश्न है ..... क्या इस संसार में कुछ पाने योग्य है ?
आध्यात्मिक दृष्टी से सर्वप्रथम तो कुछ पाने की अवधारणा ही गलत है|
कुछ पाने की कामना ही माया का सबसे बड़ा अस्त्र है|
>>> या तो सब कुछ मिलता है या कुछ भी नहीं मिलता, यह एक आध्यात्मिक नियम है| यह कुछ पाने की अभिलाषा एक मृगतृष्णा है| किसी को कुछ नहीं मिलता| <<<
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सब कुछ परमात्मा का है और सब कुछ "वह" ही है| हमें स्वयं को ही समर्पित होना पड़ता है| जो परमात्मा को समर्पित हो गया उसको सब कुछ मिल गया| बाकि अन्य सब को निराशा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिलता|
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सब कुछ तो मिला हुआ ही है| पाने योग्य कुछ है तो "वह" ही है जिसे पाने के बाद कुछ भी प्राप्य नहीं है| "वह" मिलता नहीं है, उसमें स्वयं को समर्पित होना पड़ता है| कुछ करने से "वह" नहीं मिलता, कुछ होना पड़ता है| वह होने पर "वह" स्वयं ही कर्ता भी बन जाता है|
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हमें चाहिए बस सिर्फ एक प्रबल सतत अभीप्सा और परम प्रेम, अन्य कुछ भी नहीं|
>>> "परमात्मा एक प्रवाह है, उसे स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दो| कोई अवरोध मत खड़ा करो| फिर पाएँगे कि वह प्रवाह हम स्वयं हैं|" <<<
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ॐ तत्सत् | शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं | ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
24 April 2016

नाभी क्रिया

 श्री श्री लाहिड़ी महाशय नाभी क्रिया को अत्यंत महत्व देते थे।मनु संहिता में है; "धर्म के चार चरण हैं और,इसीलिए,सत्य के भी चार चरण हैं।"

लाहिड़ी महाशय ने इसे इस प्रकार समझाया;
धर्म चार चरणों में विभाजित है:
1 खेचरी मुद्रा
2 अनाहत ग्रन्थि का भेदन
3 मणिपुर ग्रन्थि का भेदन
4 मूलाधार ग्रन्थि का भेदन ।
ललिता सहस्त्रनाम में भी है;
मुलाधारैकनीलया ब्रम्हग्रन्थिविभेदिनी ।
मणिपुरान्तरूदिता विष्णुग्रन्थिविभेदिनी ।।
आज्ञाचक्रान्तरलस्था रुद्रग्रंथिविभेदिनी ।
आदि शंकराचार्य जी ने भी सौंदर्य लहरी में उपरोक्त का दृष्टान्त दिया है।
स्पष्ट है कि ग्रन्थिविभेदन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ग्रंथि सुषुम्ना में प्राण प्रवाह को बाधित करती है।ये ग्रन्थियां इड़ा एवम् पिंगला के संगम बिंदु पर बनती हैं।
तीन प्रमुख नाड़ियों(इडा,पिंगला,सुषुम्ना) तथा चक्रों का वृहद वर्णन कालांतर में करेंगे। यहाँ हम नाभी क्रिया को समझेंगे जो हमारी क्रिया साधना का महत्वपूर्ण अंग है।मणिपुर चक्र पर प्राण और अपान वायु एक दूसरे को पार करते हैं,परिणाम स्वरूप ऊर्जा का उलझाव,गुत्थी या ग्रन्थि बन जाती है।मणिपुर ग्रन्थि को नाभी क्रिया से भेदना आवश्यक है जिससे कुण्डलिनी जागरण निर्बाध हो सके।
नाभी क्रिया की विधि-
1-अपने ध्यान आसन पर बैठें।बन्द आखों से भ्रूमध्य पर एकाग्र हों।श्वास-प्रश्वास को भूल जाएं।
2- अब प्रत्येक चक्र पर ॐ का जप करें,क्रमशः ऊपर जाना है;
मूलाधार,स्वाधिष्ठान,मणिपुर,अनाहत,विशुद्ध,बिंदु तथा अंत में भ्रूमध्य।
4-जब बिंदु से भ्रूमध्य की ओर जाएं तब धीरे धीरे सिर को नीचे झुकाएं;ठुड्डी को कण्ठ से स्पर्श करवाएं(सहज तथा बिना दबाव के)।
4-अब हांथों को जोड़ें;अंगुलियां एक दूसरे को जकड़े हुए तथा अंगूठे परस्पर मिले हुए।हथेलियाँ नीचे की ओर स्वतः हो जायेंगीं।
5-अब अंगूठों से नाभि पर हल्की हल्की ठोकर लगाएं।ठोकर देते समय अंगूठों को 1 या 1.5 इंच से अधिक दूर न ले जाएं।आपकी ठोकर भी मृदु हो तथा गति भी 1 सेकंड में 2 हो।गति सुविधानुसार कम या अधिक कर सकते हैं।ठोकरों की संख्या 50-100 हो।प्रत्येक ठोकर के साथ ॐ का मानसिक जप करें।ऐसा करने से समान वायु उदर के मध्य भाग में संग्रहित होती है।इस समय नाभि एवम् भ्रूमध्य आपस में जुड़े हैं,ऐसा भाव हो।
6-अब सर को धीरे धीरे ऊपर उठाते हुए सामान्य स्थिति में ले आएं।ऐसा करते समय एकाग्रता भ्रूमध्य से बिंदु होते हुए सीधे मणिपुर चक्र पर लाना है।
7-अब हाथों को खोल कर पीठ की ओर ले जाएं।पुनः हाथों को पूर्ववत बांध लें।
8-अब मणिपुर चक्र पर ॐ जप के साथहल्की हल्की ठोकर लगाएं।संख्या 25 से 75 हो।
9-जब यह पूर्ण हो तब हाथों को सामान्य करते हुए ध्यान मुद्रा में ले आएं।
10-अब भ्रूमध्य पर एक बार ॐ का जप करें फिर मेडुला पर तथा उतरते हुए 5,4,3,2,1,प्रत्येक चक्र पर एक बार ॐ का जप करें।
इस पूरी प्रक्रिया को 4 बार दोहराएं।
नावी क्रिया में ॐ की हल्की ठोकर तथा श्वास का कोई सम्बन्ध नही है।
साथ ही ठोकरों की संख्या तथा आगे-पीछे संख्या का अनुपात भी निश्चित नही है।आप इस अनुपात को बराबर भी रख सकते हैं।ठोकर की गति भी आप अपनी सुविधानुसार तेज या धीमी कर सकते हैं।
कुछ उन्नत साधक हाथों का प्रयोग ही नही करते तथा पूरी नाभी क्रिया मानसिक रूप से ही करते हैं।धीरे धीरे साधक को ज्ञात हो जाता है कि उसके लिए क्या उचित होगा।
बिंदु 6 पर जब आप सर को सामान्य स्थिति में लाएं तो कुछ और पीछे जाएं जैसे की छत की ओर देखने का प्रयास है।ऐसा करने से नाभी चक्र की स्पष्ट अनुभूति होगी। 18 अक्तूबर 2015

Thursday, 23 April 2026

जातिवाद वेद विरुद्ध है ---

 जातिवाद वेद विरुद्ध है

जातिगत एकता की बात ही वेदविरुद्ध है| जो वेदविरुद्ध है वह हमें कभी भी स्वीकार नहीं होना चाहिए| श्रुति भगवती ब्रह्म से एकत्व सिखाती है, वहाँ कोई जाति की बात नहीं है| एकस्तथा सर्व भूतान्तरात्मा, अर्थात सब प्राणियों में एक ही आत्मा छिपा हुआ है| प्रत्यगात्मा यानि ब्रह्म में एकत्व है| जातिगत एकता की बात करने वाले अज्ञान और माया के वशीभूत हैं|
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जो लोग जातिगत एकता की बातें करते हैं, मैं आध्यात्मिक रूप से उनका समर्थन नहीं करता हूँ| पर सामाजिक रूप से कभी कभी जातिगत एकता की बातें करना मेरी विवशता यानि मज़बूरी है क्योंकि भारत की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में अनारक्षित जातियों के विरुद्ध राजनीतिक अन्याय बहुत अधिक है|
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"जाति हमारी ब्रह्म है, माता पिता हैं राम|
गृह हमारा शुन्य है, अनहद में विश्राम||"
हमारी जाति "अच्युत" है| अर्थात् जो भगवान की जाति है, वह ही हमारी जाति है| ब्रह्म ही सत्य है और संसार मिथ्या है| अतः ब्रह्म से एकत्व ही सच्चा एकत्व है, इन सांसारिक जातियों से नहीं|
कृपा शंकर
२३ अप्रेल २०१९

२४ अप्रेल को सभी श्री अरविन्द आश्रमों में एक उत्सव मनाया जाता है ---

 24अप्रेल को सभी श्री अरविन्द आश्रमों में एक उत्सव मनाया जाता है| वह है श्री माँ का अंतिम रूप से श्रीअरविन्द आश्रम पोंडिचेरी में स्थायी आगमन का दिन| सर्वप्रथम श्री माँ 1914 में आई थीं पर अंतिम व स्थाई रूप से 24 अप्रेल 1920 को आ कर पोंडिचेरी में बस गईं|

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24 नवम्बर 1926 को श्रीअरविन्द ने भगवान श्रीकृष्ण का पूर्ण साक्षात्कार किया और उसके पश्चात् श्री माँ को आश्रम का भार सौंप कर एकांत साधना में लीन हो गए| वर्ष में सिर्फ चार बार ही वे अपने शिष्यों को दर्शन देते थे| इन चार दिनों को श्री अरविन्द और श्री माँ एक कमरे में कुर्सी पर बैठ जाते और उनके शिष्य क्रमबद्ध होकर शांति से उनके सामने से पुष्प अर्पित करते हुए प्रणाम कर के निकल जाते|
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(1) 15 अगस्त 1872 को श्री अरविन्द का कोलकाता में जन्म हुआ और सात वर्ष की आयु में ही उनके माँ-बाप ने उन्हें लन्दन भेज दिया ताकि कोई भी भारतीय हिन्दू संस्कार उनमें न पड़े| उनके माँ-बाप ने उनको न तो अपनी मातृभाषा सिखाई और न कोई हिन्दू संस्कार दिए| वे चाहते थे कि उनका बालक पक्का अँगरेज़ बने|
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(2) 21 फरवरी 1878 को श्री माँ का पेरिस फ़्रांस में जन्म हुआ| उनके पिता तुर्क (Turk) मूल के थे और माँ मिश्र (Egypt) मूल कीं| उनका नाम रखा गया #मीरा अल्फासा| यह एक मुस्लिम नाम है|
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(3) 24 अप्रेल1920 को श्री माँ का पोंडिचेरी में अंतिम आगमन|
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(4) 24 नवम्बर 1926 सिद्धि दिवस|
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(* 'मीरा' मूल रूप से मध्य एशिया का एक सामान्य मुस्लिम नाम है| पूर्व सोवियत संघ के युक्रेन गणराज्य में मेरा घनिष्ठ परिचय मीरा नाम की एक अति विदूषी तातार मुस्लिम महिला से था| वह दस वर्ष तक चीन में राजनीतिक बन्दी भी रह चुकी थी| उसकी एक सम्बन्धी लडकी का नाम भी 'मीरा' था जिसे हिंदी भाषा और भारतीय नृत्य भी आते थे| कई वर्षों तक उसका मेरे साथ पत्राचार था|)
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इस लेख को लिखने का उद्देश्य 24 अप्रेल को श्री माँ को प्रणाम निवेदित करना है जिसने भारत और सनातन धर्म की महान सेवा की|
ॐ ॐ ॐ || २३ अप्रेल २०१६

सारा देश इस समय खनन माफियाओं के चंगुल में है ---

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सारा देश इस समय खनन माफियाओं के चंगुल में है

ॐ श्री गुरवे नमः|

आज मैं साधन क्रमों पर चर्चा करने वाला था पर उसके स्थान पर अपनी ही व्यथा व्यक्त करने जा रहा हूँ| अपने सामने इतना अन्याय देख रहा हूँ कि इस समाज से विरक्ति हो गयी है| इच्छा यही हो रही है कि विरक्त होकर सांसारिक चेतना से ऊपर उठ जाऊं और स्थाई रूप से एकांतवास करूं व इस समाज और इसकी चेतना से पृथक ही रहूँ|
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सारा देश इस समय खनन माफियाओं के चंगुल में है| हर जिले में पटवारी से जिलाधीश तक, और सिपाही से पुलिस अधीक्षक तक, और सारे मंत्रीगण खनन माफियाओं के बंधुआ मजदूर है| देश की बहुमूल्य खनिज संपदा की लूट हो रही है| और जो भी इन माफियाओं के मार्ग में आता है उसका अंत कर दिया जाता है|
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स्वतन्त्रता संग्राम में हमारे क्षेत्र में स्वतंत्रता सेनानियों के शिरोमणि थे --- पचेरी ग्राम के पं.ताड़केश्वर शर्मा| अंगरेज़ सरकार ने उनके पूरे परिवार को सगे सम्बन्धियों, महिलाओं और बच्चों सहित जेल में डाल रखा था| उनका घर, खेत और सारी सम्पति जब्त कर ली थी| तथाकथित आज़ादी के बाद उनके परिवार के जीवित बचे छ: सदस्यों को राष्ट्रपति ने सम्मानित भी किया था|
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उनके पौत्र पं.प्रदीप शर्मा पर्यावरण प्रेमी होने के कारण और परोपकार हेतु खनिज माफियों के विरुद्ध संघर्षरत थे| दो माह पूर्व उनके परिवार के अनुसार पुलिस की मिलीभगत से चुनौती देकर भोजन करते समय घर से बाहर बुलाकर उनकी ह्त्या कर दी गयी और लाश को एक-डेढ़ फुट गहरे नाले में फेंक दिया गया| उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर आसपास के गाँवों से हजारों लोग एकत्र हो गए व जिले के कई प्रतिष्ठित लोग भी आ गए तब प्रशासन ने पूर्ण आश्वासन दिया था कि मामले की निष्पक्ष जांच होगी| उनके शरीर पर और गले पर चोट के निशान भी थे|
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अब सरकार यह सिद्ध करने पर अड़ी हुई है कि पं.प्रदीप शर्मा ने पानी में डूब कर आत्म-हत्या की है| सरकारी पोस्ट मार्टम रिपोर्ट में भी दम घुटने से मौत दिखाई गई है और शरीर पर चोटों के निशान नहीं होना बताया है| उनके गाँव पचेरी में अभी तक आन्दोलन चल रहा है| सारे गाँव के लोग पाबन्द किए गए हैं| आस पास के गाँवों में पूर्ण बंद रहा है और प्रशासन ने जन आन्दोलन को कुचलने की पूर्ण चेष्टा की है| पं.प्रदीप शर्मा के घर का ताला तोड़कर उनका चलभाष और अन्य साक्ष्य चोरी किये गए| जाँच के नाम पर सारे साक्ष्यों को मिटाया गया है| क्या इतने जीवट का व्यक्ति जो खनन माफियाओं के विरुद्ध संघर्ष कर रहा था एक फुट गहरे पानी में डूब कर आत्म-ह्त्या करेगा?
क्या कोई एक फुट गहरे पानी में डूब कर आत्म-हत्या कर सकता है?
दो महीने बीत जाने पर भी किसी नामजद को गिरफ्तार नहीं किया गया है| CBI से जाँच की मांग नहीं मानी जा रही है| यदि CBI से जाँच हो तो पूरी सरकार बेनकाब हो जायेगी| पर सीबीआई भी तो सरकार से ही आदेश लेगी|
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कल जिला मुख्यालय पर एक बहुत बड़ा धरना दिया गया जिसमे अनेक पूर्व वरिष्ठ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी, प्रसिद्ध डॉक्टर, प्रबुद्धजन, शिक्षाविद और मातृशक्ति थी| सबने इस घटना की निंदा की| ज्ञापन लेने के लिए कोई अधिकारी उपलब्ध नहीं था| अब उस महान स्वतंत्रता सेनानी के परवार के सदस्यों ने निर्णय लिया है की वे अपने सम्मान लौटा देंगे और आमरण अनशन करेंगे|
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जब एक प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी का परिवार इन खनन माफियाओं से सुरक्षित नहीं है तो एक सामान्य जन का क्या हाल होगा?
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और भी अनेक बातें हैं जो पीड़ित करती हैं| इसमें दोष बुरे लोगों का नहीं है| दोष तो हमारा ही है हम निर्बल और संवेदन हीन बन गए हैं|
दुनिया को खतरा बुरे लोगों की ताकत से नहीं है बल्कि अच्छों की दुर्बलता के कारण है|
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वर्त्तमान में Democracy (लोकतंत्र) समाप्त होकर Plutocracy (धनी व कुटिल लोगों का राज्यतंत्र) रह गयी है| वर्त्तमान लोकतंत्रीय व्यवस्था काले विषधर उगल रही है और हम उन्हें दूध पिला रहे हैं| आज की राजनीति आत्मा पर लात मार रही है और हम वफादारी के साथ अपनी दुम हिला रहे हैं|
हम सत्य को कहने से डर रहे हैं|
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अधिक से अधिक 50 या 60 प्रतिशत मतदान होता है फिर ये मत अनेक प्रत्याशियों में बँट जाते हैं| मात्र 20-25 मत प्राप्त करने वाला व्यक्ति जनप्रतिनिधी बन जाता है|
वोट बेंक की राजनीति, जातिवाद, साम्प्रदायिकता की भावना भड़का कर, पैसे शराब आदि बाँट कर 15 से 20 प्रतिशत वोट प्राप्त कर लेने वाले की जीत पक्की है| सारे माफिया इसी तरीके से सत्ता में आते हैं|
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हमारे मन में लाचारी का भाव की मैं अकेला क्या कर सकता हूँ, मेरी कौन सुनेगा आदि के कारण ही यह democracy बदल कर plutocracy हो गई है| मैं सभी पाठकों से निवेदन करता हूँ की हम सब यह संकल्प करें की अगले चुनावों में शत-प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को प्राप्त करें| समाज के जिस पात्र भाई बहिन का नाम मतदाता सूचि में नहीं है वे अपना नाम जुड़ायें| मतदान वाले दिन सूर्य उदय होते ही एक धार्मिक कर्तव्य मानकर मतदान देने पहुँच जाएँ| अन्यथा यही अन्याय और माफिया राज्य सहने के लिए तैयार रहें| सोचें, विचारें और सक्रियता से आगे बढ़ें अन्यथा पांचाली के चीर हरण में जो चुप रहेंगे उन्हें भावी पीढी कभी क्षमा नहीं करेगी|
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शुभ कामनाएँ| जय जननी जय भारत|
२३ अप्रेल २०१३

सनातन धर्म के अनुसार भोजन ग्रहण करने के कुछ नियम हैं ---

 सनातन धर्म के अनुसार भोजन ग्रहण करने के कुछ नियम हैं ---

सनातन धर्म के अनुसार भोजन ग्रहण करने के कुछ नियम हैं ---
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१ पांच अंगो ( दो हाथ, २ पैर, मुख ) को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करें !
२. गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है !
३. प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है !
४. पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए !
५. दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है !
६ . पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है !
७. शैय्या पर, हाथ पर रख कर, टूटे फूटे वर्तनो में भोजन नहीं करना चाहिए !
८. मल मूत्र का वेग होने पर, कलह के माहौल में, अधिक शोर में, पीपल, वट वृक्ष के नीचे, भोजन नहीं करना चाहिए!
९ परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए !
१०. खाने से पूर्व अन्न देवता, अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के, उनका धन्यवाद देते हुए, तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इस्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए !
११. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से, मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर (गाय, कुत्ता, और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घर वालो को खिलाये !
१२. इर्षा, भय, क्रोध, लोभ, रोग, दीन भाव, द्वेष भाव, के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है !
१३. आधा खाया हुआ फल, मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए !
१४. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए !
१५. भोजन के समय मौन रहे!
१६. भोजन को बहुत चबा चबा कर खाए !
१७. रात्री में भरपेट न खाए !
१८. गृहस्थ को ३२ ग्रास से ज्यादा न खाना चाहिए !
१९. सबसे पहले मीठा, फिर नमकीन, अंत में कडुवा खाना चाहिए !
२०. सबसे पहले रस दार, बीच में गरिस्थ, अंत में द्रव्य पदार्थ ग्रहण करे !
२१. थोडा खाने वाले को --आरोग्य, आयु, बल,सुख, सुन्दर संतान और सौंदर्य प्राप्त होता है !
२२. जिसने ढिंढोरा पीट कर खिलाया हो वहाँ कभी न खायें !
२३. कुत्ते का छुवा, रजस्वला स्त्री का परोसा, श्राद्ध का निकाला, बासी, मुँह से फूँक मरकर ठंडा किया, बाल गिरा हुवा भोजन, अनादर युक्त, अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करें !

कुंडलिनी जागरण, कूटस्थ चैतन्य और ब्राह्मी-स्थिति ---

 कुंडलिनी-जागरण, कूटस्थ-चैतन्य और ब्राह्मी-स्थिति ---

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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने लगभग तीन बार "कूटस्थ" शब्द का प्रयोग किया है। यह बड़ा ही पवित्र शब्द है, मेरे विचार से इसका एकमात्र अर्थ जो सरलतम भाषा में हो सकता है, वह है --"अविनाशी आत्म चैतन्य"। इसका कोई दूसरा अर्थ नहीं है। गीता के दूसरे अध्याय के अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने "ब्राह्मी-स्थिति" की चर्चा की है। इस "ब्राह्मी-स्थिति" और "कूटस्थ-चैतन्य" का अर्थ एक ही है। ये दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं, इनमें कोई भेद नहीं है। बौद्धिक रूप से "अविनाशी आत्म-चैतन्य" को समझना असंभव है। इसे केवल परमात्मा की परम कृपा द्वारा ही समझा जा सकता है। यानि जिस पर परमात्मा की कृपा हो, वही इसे समझ सकता है।
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मैं ईश्वर की प्रेरणा से ही निम्न पंक्तियाँ लिख पा रहा हूँ। बिना उनकी कृपा के एक शब्द भी नहीं लिख सकता। उनकी कृपा से ही श्रीमद्भगवद्गीता के "पुरुषोत्तम-योग" को समझ पाया हूँ, जिसे बिना उनकी कृपा के कोई नहीं समझ सकता। यह गीता का सार है जो गीता के पंद्रहवें अध्याय के आरंभिक चार मंत्रों में समाहित है। श्रीमद्भगवद्गीता मेरा प्राण है, उसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। यहाँ मैं गीता पर चर्चा कर रहा हूँ, यह भगवान के परमप्रेम की ही अभिव्यक्ति है। व्यक्तिगत रूप से मैं इसकी चर्चा भविष्य में किसी से भी कभी भी नहीं करूंगा। यह मेरा व्यक्तिगत विषय है।
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यहाँ मैं कुंडलिनी जागरण के ऊपर लिख रहा हूँ। इस विषय पर बहुत अधिक झूठ परोसा गया है। कुंडलिनी-जागरण कोई जादू-मंत्र नहीं है। यह हमारे सूक्ष्म देह के मेरुदण्ड में होने वाली एक अनुभूति है जो ईश्वर की परमकृपा से सभी भक्तों को होती है। उनके भक्त इसकी चर्चा नहीं करते। कुंडलिनी-जागरण का एकमात्र लाभ यह है कि इससे हमारे सारे बौद्धिक संशय दूर हो जाते हैं। परमात्मा की अवधारणा अधिक अच्छी तरह समझ में आ सकती है। इससे होने वाली हानि यही है कि इस में यदि ब्रह्मचर्य का पालन न किया जाये, यानि आचार-विचार में शुद्धि न हो तो मस्तिष्क की एक स्थायी गंभीर विकृति उत्पन्न हो सकती है जिसे इस जन्म में दूर नहीं किया जा सकता। एक दूसरा ही जन्म उसके लिए लेना पड़ता है। जिनकी आस्था ईश्वर में नहीं है, वे इस विषय से दूर रहें। यह उनका विषय नहीं है। नहीं तो आप पागल हो जाएँगे।
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ॐ नमः शिवाय !! मैं शिव, विष्णु और उनके अवतारों में पूर्ण आस्था रखता हूँ। शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। दोनों ही परमब्रह्म परमात्मा की दो पृथक पृथक अभिव्यक्तियाँ हैं। आप सब का जीवन कृतकृत्य और कृतार्थ हो।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ अप्रेल २०२६

अज़ान के बोल ---

इस लेख का उद्देश्य निष्पक्ष दृष्टि से बिना किसी पूर्वाग्रह के सभी की जानकारी को बढ़ाना ही है| हम नित्य दिन में पाँच बार ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से मस्जिदों से बोली जा रही अज़ान की आवाज़ सुनते हैं| अज़ान की बांग हुई है इसका अर्थ है अब नमाज़ पढ़ी ही जाएगी| यह श्रद्धावानों को नमाज़ का समय होने की व नमाज पढ़ने की याद दिलाने के लिए होती है| इस लेख को मैं जन साधारण की जानकारी के लिए शेयर कर रहा हूँ| इसके अर्थों को मन ही मन अवश्य समझें|
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इस समय मेरी आयु 72 वर्ष की है| जीवन में भगवान ने मुझे विश्व के ग्यारह मुस्लिम देशों .... मोरक्को, सऊदी अरब, मिश्र, तुर्की, मलयेशिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, यमन और ईरान जाने का अवसर दिया है| उपरोक्त ग्यारह देशों में जहाँ तक मुझे याद है, मैनें ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से कहीं पर भी अज़ान की आवाज नहीं सुनी|
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जब मैं 20 वर्ष का था तब तक भारत की किसी भी मस्जिद पर ध्वनि-विस्तारक यंत्र नहीं लगे थे| सन 1970 के दशक के आरंभ में पूरे भारत में हर मस्जिद पर बड़े-बड़े ध्वनि-विस्तारक यंत्र लग गए और full volume से उनका मुंह दूसरों के मोहल्लों की ओर कर के ही बजाया जाता है| क्या यह एक मनोवैज्ञानिक आक्रमण नहीं है? हर हिन्दू को इसके अर्थ का पता होना चाहिए| यदि पता होगा तभी तो वे कोई प्रतिक्रिया करेंगे|
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रमज़ान का मुक़द्दस महिना भी कल या परसों से शुरू हो जाएगा| यह चाँद दिखाई देने पर निर्भर है| सभी श्रद्धालुओं को इस की शुभ कामनाएँ|
ॐ नमः शिवाय !!
23 April 2020

अज़ान इस्लाम में नमाज़(Pray) के लिए बुलाने के लिए ऊँचे स्वर में जो शब्द कहे जाते हैं, उन्हें कहते हैं ।

कुछ इस तरह के बोल हैं अज़ान में: यह अरबी ज़ुबान के बोल हैं:-

1)अल्लाहु अकबर (चार बार) Allahu Akbar Allahu Akbar (twice)
2) अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह (दो बार ) Ashahadu an la ilaha illa Allah (twice)
3)अशहदु अन्ना मुहमदन रसूल्लुल्लाह (दो बार) Ashahadu ana Muhamadan Rasoollullah (twice)
4)हैया ‘अल-सलाह (दो बार) Haya ‘ala asalah (twice)
5)हैया ‘अलल फ़लाह (दो बार) Haya ‘ala al falah (twice)
6)अल्लाहु अकबर (दो बार) Allahu Akbar Allahu Akbar (once)
7)ला इलाहा इल्लल्लाह (एक बार) La ilaha ila Allah (once)
तो ये थे अरबी ज़ुबान के बोल अब मैं इसके मायने(Meaning) बताता हूँ;-

अल्लाहु अकबर” का अर्थ होता है “अल्लाह महान है

अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह” का अर्थ होता है “मैं गवाही देता हूँ; कोई उपास्य नहीं सिवाय अल्लाह के”

“अशहदु अन्ना मुहमदन रसूल्लुल्लाह” का अर्थ होता है “मैं गवाही देता हूँ; मुहम्मद (saw) अल्लाह के रसूल (दूत) हैं“

हैया ‘अल-सलाह” का अर्थ होता है “आओ नमाज़ की तरफ़“

हैया ‘अलल फ़लाह” का अर्थ होता है “आओ सफ़लता की ओर“

“ला इलाहा इल्लल्लाह” का अर्थ होता है “कोई उपास्य नहीं सिवाय अल्लाह के“



उम्मीद करता हूँ आप सबको इसके मायने मालूम चल गए होंगे और अज़ान का सन्देश भी…

Saturday, 11 April 2026

हमें भगवत्-प्राप्ति यानि आत्म-साक्षात्कार क्यों नहीं होता? ---

 हमें भगवत्-प्राप्ति यानि आत्म-साक्षात्कार क्यों नहीं होता? ---

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सरलतम और स्पष्टतम शब्दों में इसका एक ही उत्तर है, और वह यह है कि हमारे में सत्यनिष्ठा (ईमानदारी) की कमी है। अन्य कोई कारण नहीं है। हम स्वयं के प्रति सत्यनिष्ठ (ईमानदार) नहीं हैं। हम स्वयं को ठगना चाहते हैं और स्वयं के द्वारा ही ठगे जा रहे हैं।
किसी भी सांसारिक उपलब्धी के लिए तो हम दिन रात एक कर देते हैं, हाडतोड़ परिश्रम करते हैं, पर जो उच्चतम उपलब्धी है वह हम सिर्फ ऊँची ऊँची बातों के शब्दजाल से ही प्राप्त करना चाहते हैं। वास्तविकता तो यह है कि हम परमात्मा को प्राप्त करना ही नहीं चाहते। हम सिर्फ सांसारिक सुखों को, सांसारिक उपलब्धियों को, और अधिक से अधिक अपने अहंकार की तृप्ति के लिए ही भगवान की विभूतियों को प्राप्त करना चाहते हैं। हमारे लिए भगवान एक माध्यम यानी साधन मात्र है, पर लक्ष्य यानी साध्य तो संसार है। कोई दो लाख में से एक व्यक्ति ही ऐसा होता है जो परमात्मा को पाना चाहता है। प्राचीन भारत एक अपवाद था। यहाँ की सनातन संस्कृति ही विकसित हुई, परमात्मा यानी ब्रह्म को पाने का ही लक्ष्य बनाकर। यहाँ की संस्कृति में सम्मान हुआ तो ब्रह्मज्ञों का ही।
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जीवात्मा का उद्गम जहाँ से हुआ है, वहाँ अपने स्त्रोत में उसे बापस तो जाना ही पड़ेगा चाहे लाखों जन्म और लेने पड़े। तभी जीवन चक्र पूर्ण होगा। इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, बहुत सारा सद्साहित्य इस विषय पर उपलब्ध है| अनेक संत महात्मा हैं जो निष्ठावान मुमुक्षुओं का मार्गदर्शन करते रहते हैं। अतः और लिखने की आवश्यकता नहीं है। जब ह्रदय में अहैतुकी परम प्रेम और निष्ठा होती है तब भगवान मार्गदर्शन स्वयं ही करते हैं। पात्रता होने पर सद्गुरु का आविर्भाव भी स्वतः ही होता है।
जब हम अग्नि के समक्ष बैठते हैं तो ताप की अनुभूति अवश्य होती है। कई बार अनुभूति ना होने पर भी ताप तो मिलता ही है। वैसे ही जब भी हम परमात्मा का स्मरण या ध्यान करते हैं तो उनके अनुग्रह की प्राप्ति अवश्य होती है।
परमात्मा को पाने का मार्ग है अहैतुकी (Unconditional) परम प्रेम। प्रेम में कोई माँग नहीं होती, मात्र शरणागति और समर्पण होता है। प्रेम, गहन अभीप्सा और समर्पण हो तो और कुछ भी नहीं चाहिए। सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है।
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अपने प्रेमास्पद का ध्यान निरंतर तेलधारा के सामान होना चाहिए| प्रेम हो तो आगे का सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है और आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं। जो लोग सेवानिवृत है उन्हें तो अधिक से अधिक समय नामजप और ध्यान में बिताना चाहिए। सांसारिक नौकरी में अपना वेतन प्राप्त करने के लिए दिन में कम से कम आठ घंटे काम करना पड़ता है। व्यापारी की नौकरी तो चौबीस घंटे की होती है। कुछ समय भगवान की नौकरी भी करनी चाहिए। जब जगत मजदूरी देता है तो भगवान क्यों नहीं देंगे? उनसे मजदूरी तो माँगनी ही नहीं चाहिए। माँगना ही है तो सिर्फ उनका प्रेम, प्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं।
प्रेम को ही मजदूरी मान लीजिये| एक बात का ध्यान रखें -- मजदूरी उतनी ही मिलेगी जितनी आप मेहनत करोगे। बिना मेहनत के मजदूरी नहीं मिलेगी। इस सृष्टि में निःशुल्क कुछ भी नहीं है। हर चीज की कीमत चुकानी पडती है।
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सार :--- हमें परमात्मा की प्राप्ति इसलिए नहीं होती क्योंकि हम परमात्मा को प्राप्त करना ही नहीं चाहते। हम स्वयं के प्रति सत्यनिष्ठ (ईमानदार) नहीं हैं। अपने अहंकार की तृप्ति के लिए भक्ति का झूठा दिखावा करते हैं। अपनी मानसिक कल्पना से और झूठे शब्द जाल से स्वयं को ठग रहे हैं। हमने परमात्मा को तो साधन बना रखा है, पर साध्य तो संसार ही है।
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आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को बारंबार प्रणाम। आप सब की जय हो।
आप मेरे हृदय का सर्वश्रेष्ठ प्रेम स्वीकार करें।
ॐ तत् सत् | श्रीगुरवे नमः। ॐ नमः शिवाय। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
कृपाशंकर
११ अप्रेल २०२६