इधर-उधर की मन बहलाने वाली मीठी मीठी बातों से काम नहीं चलेगा। उन में भटकाव ही भटकाव है। सीधी सी बात है ---
(१) जब तक हम अपने अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) पर विजय नहीं पाते, तब तक कोई आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती।
(२) इन पर विजय के पश्चात -- जीव-भाव से ऊपर उठ कर स्वयं को परमात्मा में दृढ़ता से स्थित करना पड़ेगा।
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इन के लिए किसी सिद्ध, ब्रहमनिष्ठ, श्रौत्रीय (जिन्हें वेदों का ज्ञान हो) आचार्य से मार्गदर्शन प्राप्त कर उनके सान्निध्य में साधना करनी पड़ेगी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, अन्य कोई मार्ग नहीं है। भटकाव में कुछ नहीं रखा है। आप सब को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ अप्रेल २०२१
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