Wednesday, 13 May 2026

सीता नवमी की शुभ कामनाएँ ---

 सीता नवमी की शुभ कामनाएँ ---

"उद्भव स्थिति संहार कारिणीं क्लेश हारिणीम्| सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं राम वल्लभाम्||"
आज वैशाख शुक्ल नवमी को सीतानवमी है जिसे "जानकी नवमी" भी कहते हैं| आज ही के दिन माँ सीता का प्राकट्य हुआ था| आज ही के दिन पुष्य नक्षत्र में राजा जनक ने संतान प्राप्ति की कामना से यज्ञ की भूमि तैयार करने के लिए भूमि जोती थी और उसी समय उन्हें पृथ्वी में दबी हुई एक बालिका मिली थी| जोती हुई भूमि को तथा हल की नोक को सीता कहते हैं| यही वजह थी कि उनका नाम सीता रखा गया| यह स्थान बिहार के सीतामढी जिले में पुनौरा धाम कहलाता है|
"जनकसुता जगजननी जानकी| अतिसय प्रिय करुणानिधान की||
ताके जुग पदकमल मनावउं| जासु कृपा निर्मल मति पावउँ||" १३ मई २०१९

Monday, 11 May 2026

जिसने मुझे मेरे होने का बोध कराया, वे ही मेरे परमात्मा हैं, और वे ही यह "मैं" हूँ ---

 जिसने मुझे मेरे होने का बोध कराया, वे ही मेरे परमात्मा हैं, और वे ही यह "मैं" हूँ। मैं यह देह नहीं, मेरे प्रियतम, सर्वव्यापी मेरे प्रभु के साथ एक हूँ।

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कभी एकांत में ब्रह्ममुहूर्त के समय बिलकुल अकेले में ध्यान करें। सहस्त्रारचक्र पर ओंकार का मानसिक जप करते हुए इस भौतिक देह से बाहर आ जाएँ। शरीर की ओर न देखें। शरीर से बाहर रहते हुए ही खूब देर तक ध्यान करें, तभी परमशिव की अनुभूति होगी। जब आनंद आ जाये, जब तृप्ति हो जाये, तब बापस इस शरीर में लौट आओ। .
यह भाव हर समय बना रहे कि भगवान निरंतर हमारे साथ हैं| वे एक पल के लिए भी हमारे से दूर नहीं हो सकते| यह अपने आप में ही एक बहुत बड़ी साधना है| भगवान हैं, यहीं पर है, सर्वत्र हैं, इसी समय हैं, सर्वदा हैं, वे ही सब कुछ हैं, और सब कुछ वे ही हैं| वे ही हमारे हृदय में धडक रहे हैं, वे ही इन नासिकाओं से सांसें ले रहे हैं, इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, इन हाथों से वे ही हर कार्य कर रहे हैं, इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, इस मन और बुद्धि से वे ही सोच रहे हैं, हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व वे ही हैं| सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि वे ही हैं| वे परम विराट और अनंत हैं| हम तो निमित्त मात्र, उन के एक उपकरण मात्र हैं| भगवान स्वयं ही हमें माध्यम बना कर सारा कार्य कर रहे हैं| कर्ता हम नहीं, स्वयं भगवान हैं|
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सारी महिमा भगवान की है| भगवान ने जहाँ भी रखा है और जो भी दायित्व दिया है उसे हम नहीं, स्वयं भगवान ही कर रहे हैं| वे ही जगन्माता हैं, वे ही परमपुरुष हैं| हम उन के साथ एक हैं| कहीं कोई भेद नहीं है| ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ मई २०२०

सनातन-धर्म ही भारत राष्ट्र का सत्व, मर्म, मूलाधार और प्राण है।

 सनातन-धर्म ही भारत राष्ट्र का सत्व, मर्म, मूलाधार और प्राण है। सनातन-धर्म के बिना भारत का कोई अस्तित्व नहीं है। सनातन-धर्म ही इस सम्पूर्ण सृष्टि का भविष्य है। सनातन-धर्म की निश्चित रूप से पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा।

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हम सब जो भी आध्यात्मिक साधना करते हैं, उस से सनातन-धर्म की रक्षा होती है। जीवन की सत्य, सनातन और सर्वोत्कृष्ट अभिव्यक्ति धर्म है, और यह सनातन-धर्म ही हमारी रक्षा करेगा। हमें भी उसकी रक्षा करनी होगी।
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हम सनातन काल से ही सदा वीर, तेजस्वी और पराक्रमी रहे हैं। हमारा लक्ष्य - परमात्मा है। सनातन-धर्म की रक्षा हेतु भारत को एक हिन्दू-राष्ट्र बनाना अपरिहार्य है।
ॐ तत्सत् !! जय हिन्दू राष्ट्र !! 🙏🌹🕉🕉🕉🌹🙏
कृपा शंकर
११ मई २०२२

Sunday, 10 May 2026

हम अपने जीवन में सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं ?

 हम अपने जीवन में सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं ?

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देश, धर्म, समाज, राष्ट्र, मानवता और पूरी सृष्टि की सेवा में विषम से विषम परिस्थितियों में हम अपने जीवन में सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं ? यह प्रश्न सदा मेरे चैतन्य में रहा है| इसके समाधान हेतु अध्ययन भी खूब किया, अनेक ऐसी संस्थाओं से भी जुडा रहा जो समाज-सेवा का कार्य करती हैं| अनेक धार्मिक संस्थाओं से भी जुड़ा पर कहीं भी संतुष्टि नहीं मिली| कई तरह की साधनाएँ भी कीं, अनेक तथाकथित धार्मिक लोगों से भी मिला पर निराशा ही हाथ लगी| धर्म और राष्ट्र से स्वाभाविक रूप से खूब प्रेम रहा है| धर्म के ह्रास और राष्ट्र के पतन से भी बहुत व्यथा हुई है| सदा यही जानने का प्रयास किया कि जो हो गया सो तो हो गया उसे तों बदल नहीं सकते पर इसी क्षण से क्या किया जा सकता है जो जीवन मे सर्वश्रेष्ठ हो और सबके हित में हो|
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ध्यान-साधना में विस्तार की अनुभूतियों ने यह तो स्पष्ट कर दिया कि मैं यह शरीर नहीं हूँ| ईश्वर के दिव्य प्रेम, आनंद और उसकी झलक अनेक बार मिली| यह अनुभूति भी होती रहती है कि स्वयं के अस्तित्व की एक उच्चतर प्रकृति तो एक विराट ज्योतिर्मय चैतन्य को पाने के लिए अभीप्सित है पर एक निम्न प्रकृति बापस नीचे कि भौतिक, प्राणिक और मानसिक चेतना की ओर खींच रही है| आत्मा की अभीप्सा तो इतनी तीब्र है वह परमात्मा के बिना नहीं रह सकती पर निम्न प्रकृति उस ओर एक कदम भी नहीं बढ़ने देती|
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यह भी जीवन मे स्पष्ट हो गया कि उस परम तत्व को पाना ही सबसे बड़ी सेवा हो सकती है जो की जा सकती है| गहन ध्यान में मैं यह शरीर नहीं रहता बल्कि मेरी चेतना समस्त अस्तित्व से जुड़ जाती है| यह स्पष्ट अनुभूत होता रहता है कि हर श्वाश के साथ मैं उस चेतना से एकाकार हो रहा हूँ और हर निःश्वाश के साथ वह चेतना अवतरित होकर समस्त सृष्टि को ज्योतिर्मय बना रही है| उसी स्थिति मे बना रहना चाहता हूँ पर निम्न प्रकृति फिर नीचे खींच लाती है| ईश्वर से प्रार्थनाओं के उत्तर मे जो अनुभूतियाँ मुझे हुई उन्हें व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ|
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सबसे पहिले तों यह स्पष्ट किया गया गया है कि जो भी साधना हम करते हैं वह स्वयं के लिए नहीं बल्कि भगवान के लिए है| उसका उद्देश्य सिर्फ उनकी इच्छा को कार्यान्वित करना है| मोक्ष की कामना सबसे बड़ा बंधन है| उसकी कोई आवश्यकता नहीं है| आत्मा तों नित्य मुक्त है| बंधन केवल भ्रम हैं| ईश्वर को पूर्ण समर्पण करणा होगा| सारी कामना, वासना, माँगें, राय और विचार सब उसे समर्पित करने होंगे तभी वह स्वयं सारी जिम्मेदारी ले लेगा| कर्म-फल ही नहीं कर्म भी उसे समर्पित करने होंगे| समूचे ह्रदय और शक्ति के साथ स्वयं को उसके हाथों मे सौंप देना होगा| कर्ता ही नहीं दृष्टा भी उसे ही बनाना होगा, तभी वह सारी कठिनाइयों और संकटों से पार करेगा| सारे कर्म तो स्वयं उनकी शक्ति ही करती है और उन्हें ही अर्पित करती हैं| किसी भी तरह का सात्विक अहंकार नहीं रखना है| इससे अधिक व्यक्त करने की मेरी क्षमता नहीं है|
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सार की बात जिससे अधिक व्यक्त करना मेरी क्षमता से परे है वह यह कि स्वयं को ईश्वर का एक उपकरण मात्र बनाकर उसके हाथ मे सौंप देना है| फिर वो जो भी करेगा वही सर्वश्रेष्ठ होगा| यही सबसे बड़ा कर्तव्य और सबसे बड़ी सेवा है|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० मई २०१२

भगवान एक छोटे और भोले-भाले बालक की तरह ही लगते हैं। पता नहीं वे इतनी बड़ी सृष्टि कैसे चला लेते हैं ?

 भगवान एक छोटे और भोले-भाले बालक की तरह ही लगते हैं| पता नहीं, वे इतनी बड़ी सृष्टि कैसे चला लेते हैं? उनको डांट भी दो तो वे बुरा नहीं मानते, और लौट कर फिर बापस हँसते हुए आ जाते हैं| उन पर तरस भी आता है और उन से पूरा प्रेम भी बना रहता है| भाव जगत में वे हर बात का उत्तर भी देते हैं| कम से कम मुझे तो उनसे पूरी संतुष्टि है| एक बड़े काम की रहस्यमय बात भी उन्होने आज बताई है| उनके सर्वव्यापी ब्रह्मरूप से तो मुझे भाव जगत में उनका बालरूप ही अधिक अच्छा लगता है| भगवान उसी रूप में अच्छे लगते हैं जिनसे मित्रतावश लड़ाई-झगड़ा भी कर सकें, और जिन के साथ खेल भी सकें| उनके साथ एकत्व नहीं, उनका मित्र रूप चाहिए| ब्रह्मभाव में तो कभी भी स्थित हो सकते हैं पर उन का मित्रभाव बड़ा दुर्लभ है| आगे अब जैसी उनकी इच्छा॥ ११ मई २०२१

भगवती छिन्नमस्ता ---

 भगवती छिन्नमस्ता ---

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आज पता नहीं क्यों भगवती छिन्नमस्ता अपनी परम कृपा करते हुए मुझे बार-बार याद आ रही हैं। मेरी चेतना में वे ही छाई हुई हैं। लगता है इसके पीछे कोई न कोई रहस्य है। मैं तो उनका बालक हूँ, वे जो भी काम मुझ अकिंचन से लेना चाहें वह लें, मैं तो एक निमित्त मात्र हूँ। उन का विग्रह बड़ा ही आकर्षक और प्रिय है, जिसे समझने वाले ही समझते हैं। वे स्वयं ही अपने आप आकर मुझ अकिंचन पर अपनी कृपा वर्षा कर रही हैं। उन की महिमा अपार है, जिसका वर्णन करने की सामर्थ्य मुझ अकिंचन में नहीं है। फिर भी अपनी अति अल्प और अति सीमित बुद्धि से प्रयास करता हूँ। कोई त्रुटि हो तो भगवती मुझे क्षमा करें। हे भगवती, तुम्हारी जय हो!!
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भगवती छिन्नमस्ता ने कामदेव और उनकी कामासक्ता धर्मपत्नी रति को एक बड़े पद्म (कमल के फूल) में लिटा रखा है, और दंडायमान होकर उन पर वीर-मुद्रा में खड़ी हैं। भगवती के देह की प्रभा करोड़ों सूर्यों के समान है, लेकिन वे परम मंगलमयी हैं। जो वीर साधक वासनाओं पर विजय पा सकता है, वह ही भगवती की साधना कर सकता है। भगवती के साधक के आसपास किसी तरह की कोई सांसारिक वासना आ भी नहीं सकती, क्योंकि वे परम वैराग्य प्रदान करती हैं।
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वे दिगंबरा हैं, दशों-दिशाएँ उनके वस्त्र हैं। वे सर्वव्यापी हैं। उनके मस्तक में सर्पाबद्ध मणि है, तीन नेत्र हैं और वक्ष स्थल पर कमल की माला है। उनके देह की कान्ति जावा पुष्प की तरह रक्तवर्णा है। उनके दाहिने हाथ में खड़ग है, जिस से उन्होने अपना स्वयं का सिर काट कर बाएँ हाथ में ले रखा है, जिस का मुंह ऊपर की ओर है। अपने साधक का सारा अहंकार भी वे इसी तरह नष्ट कर के उसकी चेतना को ऊर्ध्वमुखी कर देती हैं। वे वेदान्त की मूर्ति हैं।
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उनके धड़ से शोणित की तीन धाराएँ निकल रही हैं। बीच की रुधिर धारा ज्ञान की धारा है, जो सुषुम्ना नाड़ी में जागृत कुंडलिनी महाशक्ति की प्रतीक है। अहंभाव से मुक्त होने पर ही कुंडलिनी, आज्ञाचक्र का भेदन कर सहस्त्रार में प्रवेश करती है। इस ज्ञानधारा का पान वे स्वयं कर रही हैं। यह बताता है कि अपने साधक को वे परमशिव भाव में स्थित कर ही देती हैं।
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बाईं ओर से निकलती हुई रुधिर की धारा, बल की धारा है, जो खंग-खप्पर धारिणी, मायारूपी, कृष्णवर्णा, अति बलशाली, अज्ञसेविका सखी डाकिनी महाशक्ति के मुँह में गिर रही है जो प्रलय काल के समान सम्पूर्ण जगत् का भक्षण करने में समर्थ है, लेकिन ज्ञानशून्य है। इसके तीनों नेत्र बिजली के समान चंचल हैं, हृदय में सर्प विराजमान है, और अत्यधिक भयानक स्वरूप है।
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दाहिनी ओर से निकलती रक्त की धारा क्रिया रूपी है, जो देवी के दाहिने भाग में खड़ी श्वेतवर्णा, खुले केश, कैंची और खप्पर धारण किये, विद्या-साधिका वर्णिनी महाशक्ति के मुँह में गिरती है। यह सखी बड़े उच्च स्तर की साधिका है, जिनके मस्तक में नागमणि सुशोभित है।
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काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी व कमला --- इन देवियों को दस महाविद्या कहा जाता हैं। इनका संबंध भगवान विष्णु के दस अवतारों से हैं। जैसे भगवान श्रीराम की शक्ति तारा है, भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति काली है, वैसे ही भगवान नृसिंह की शक्ति छिन्नमस्ता है। भगवती छिन्नमस्ता और भगवान नृसिंह के बीजमंत्र भी एक हैं।
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जहाँ तक मुझे पता है, भगवती छिन्नमस्ता के मुख्यतः दो ही मंदिर भारत में हैं -- एक तो झारखंड में रामगढ़ के पास राजरप्पा में है, दूसरा हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले का प्रसिद्ध चिंत्यपूर्णी मंदिर है।
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दसों महाविद्याओं की उत्पत्ति पंचप्राणों (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान) से होती है। पंचप्राणों के पाँच सौम्य और पाँच उग्र रूप ही दस महाविद्याएँ हैं| ये पंचप्राण ही गणपति गणेश जी के गण हैं, जिनके अधिपती ओंकार रूप में गणपति गणेश जी स्वयं हैं।
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तिब्बत का वज्रयान बौद्धमत -- भगवती छिन्नमस्ता की ही साधना है| वज्रयान का साधना मंत्र है --- "ॐ मणिपद्मे हुं"। "ॐ" -- तो परमात्मा का वाचक है। "हुं" -- भगवती छिन्नमस्ता का बीज मंत्र है। "मणिपद्मे" का अर्थ है --- जो देवी, मणिपुर चक्र के पद्म में निवास करती हैं। अतः "ॐ मणिपद्मे हुं" का अर्थ हुआ -- मैं मणिपुर चक्र के पद्म में स्थित छिन्नमस्ता देवी को नमन करता हूँ। मणिपुर पद्म में ही उनका निवास है। भगवती छिन्नमस्ता सुषुम्ना नाड़ी की उपनाड़ी "वज्रा" में विचरण करती हैं, इसलिए उनके अनुयायी तिब्बत के लामाओं का मत "वज्रयान" कहलाता है। वज्रयान मत के लामा चिंत्यपूर्णि मंदिर में आराधना के लिए खूब आते हैं।
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सुषुम्ना नाड़ी में चित्रा, वज्रा, और ब्राह्मी उपनाड़ियों का रहस्य यह है कि कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होकर यदि सुषुम्ना की उपनाड़ी ब्राह्मी में प्रवेश करती हैं तो ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है, वज्रा में सारी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, और चित्रा में ब्रह्मज्ञान और सिद्धियों के अतिरिक्त अन्य सब कुछ प्राप्त हो जाता है। यह एक गोपनीय विद्या है जिसकी चर्चा सार्वजनिक रूप से करने का निषेध है।
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गुरु गोरखनाथ ने सारी सिद्धियाँ भगवती छिन्नमस्ता से प्राप्त की थीं। अपने एक ग्रंथ (गोरक्ष-पद्धति या गोरक्ष संहिता) )के द्वितीय अध्याय के आरंभ में गुरु गोरखनाथ ने माँ छिन्नमस्ता की बड़ी सुंदर स्तुति लिखी है। छिन्नमस्ता की साधना वैदिक काल से ही है। वैदिक काल में इस साधना का नाम दूसरा था। कभी विस्तार से लिखने कि आज्ञा मिली तब ही और लिख पाऊँगा, अभी तो इतना ही लिखने का आदेश है। ॐ तत्सत् !!
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मैं भगवती छिन्नमस्ता को बारंबार प्रणाम करता हूँ, जिनकी परम कृपा मुझे परमशिव भाव में स्थित कर रही है। भगवती की परम कृपा बनी रहे, और अन्य कुछ भी नहीं चाहिए।
"ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवैरोचनीये हुं हुं फट् स्वाहा॥"
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कृपा शंकर
१० मई २०२१
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संलग्न चित्र इंटरनेट की एक वेबसाइट से साभार लिया है, जिन्हें धन्यवाद।

भारत में हम द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ती का उत्सव क्यों नहीं मनाते?

 एक प्रश्न --- भारत में हम द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ती का उत्सव क्यों नहीं मनाते?

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प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध में सबसे अधिक सैनिक भारत के मरे थे, व सबसे अधिक संख्या में भी भारतीय सैनिकों ने ही भाग लिया था। युद्ध में लगाया गया सबसे अधिक धन भी भारत से ही अंग्रेजों द्वारा लूटा हुआ था। द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों ने भारत का सारा अनाज यूरोप भेज दिया था, जिसके कारण भारत में लगभग दो से तीन करोड़ लोग भूख से मर गए थे।
द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत उत्पन्न हुई परिस्थितियों के कारण ही पूरे विश्व से अंग्रेजों का राज समाप्त हुआ था।
फिर भारत में हम द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ती का उत्सव क्यों नहीं मनाते??
इसे एक रूसी परंपरा ही क्यों कहते हैं? 10 may 2022

हृदय में परमात्मा के प्रति परमप्रेम में निरंतर वृद्धि होगी तो आगे के सारे द्वार अपने आप ही खुल जायेंगे, सारे दीप अपने आप ही जल उठेंगे; और कहीं पर भी कोई अंधकार नहीं रहेगा

 हृदय में परमात्मा के प्रति परमप्रेम में निरंतर वृद्धि होगी तो आगे के सारे द्वार अपने आप ही खुल जायेंगे, सारे दीप अपने आप ही जल उठेंगे; और कहीं पर भी कोई अंधकार नहीं रहेगा

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मेरी बात को वे ही समझ सकते हैं जो पूर्ण भक्ति से नित्य-नियमित कम से कम दो-तीन घंटे भगवान का गहरा ध्यान करते हैं। अन्य कोई इसे नहीं समझ पायेगा, क्योंकि यह बुद्धि का नहीं, अनुभूति का विषय है। जहाँ तक आध्यात्म की बात है, मैं अपने स्वयं पर ही टिप्पणी कर सकता हूँ। किसी अन्य के बारे में बोलने का मुझे कोई अधिकार नहीं है।
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सच्चिदानंद वासुदेव पुरुषोत्तम अपना ध्यान स्वयं अपने ही कूटस्थ सूर्यमंडल में करते हैं, जिनका मैं एक निमित्त साक्षी मात्र हूँ। उनकी अनुभूति मुझे आकाश-तत्व, आनंद और परमशिव के रूप में होती है। जगन्माता के रूप में उनकी अनुभूति प्राण-तत्व के रूप में होती है। वह प्राण-तत्व ही आजकल सारी साधना कर रहा है। परमशिव की अनुभूतियाँ भी स्वयं जगन्माता ही करवाती हैं। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। और कुछ भी कहने को नहीं है।
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जो कुछ भी मैनें लिखा है पूरी जिम्मेदारी से लिखा है। मैं इसका साक्षी हूँ। कहीं पर भी कोई संशय नहीं है। आप सब में परमात्मा को नमन!!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० मई २०२३

भारत जिस दिन अमेरिकी डॉलर में लेनदेन बंद कर देगा उस दिन से एक आर्थिक महाशक्ति बनना आरंभ हो जाएगा ---

 भारत जिस दिन अमेरिकी डॉलर में लेनदेन बंद कर देगा उस दिन से एक आर्थिक महाशक्ति बनना आरंभ हो जाएगा ---

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डॉलर की नकली विनिमय दर द्वारा अमेरिका भारत को लूट रहा है। भारत की मुद्रा की वास्तविक क्रयशक्ति विनिमय दर से सवा चार गुणी अधिक है। हमें निर्यात पर सवा चार गुणा कम मिलता है, और आयात पर सवा चार गुणा अधिक देना पड़ता है। अमेरिका द्वारा हर वर्ष भारत को जितना लूटा जाता है, उतना तो अंग्रेजों ने सौ वर्षों में भी नहीं लूटा था। सबसे अधिक क्षति भारत की ही हो रही है।
अमेरिका मूलतः एक डाकू देश है वह इंग्लैंड का ही विस्तार है। उसका लक्ष्य ही निकट भविष्य में रूस, चीन और भारत को लूटना है।
ॐ तत्सत् !!
१० मई २०२३

Tuesday, 5 May 2026

वर्तमान में जैसा वातावरण है उसमें घर पर रहकर साधना करना असम्भव तो नहीं है पर अत्यंत कष्टप्रद है ---

 "सुख सम्पति परिवार बड़ाई | सब परिहरि करिहऊँ सेवकाई ||

ये सब रामभक्ति के बाधक | कहहिं संत तव पद अवराधक ||"

>>> वर्तमान में जैसा वातावरण है उसमें घर पर रहकर साधना करना असम्भव तो नहीं है पर अत्यंत कष्टप्रद है| मेरा तो यह मानना है कि जब एक बार युवावस्था में ईश्वर की एक झलक भी मिल जाये तब उसी समय व्यक्ति को गृहत्याग कर देना चाहिए| बहुत कम ऐसे भाग्यशाली हैं, लाखों में कोई एक ऐसा परिवार होगा जहाँ पति-पत्नी दोनों साधक हों| ऐसा परिवार धन्य हैं| वे घर में रहकर भी विरक्त हैं| ऐसे ही परिवारों में ही महान आत्माएं जन्म लेती हैं|
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आज के समाज का वातावरण अत्यंत प्रदूषित और विषाक्त है जहाँ भक्ति करना असम्भव है| कोई कर सकता है तो वह धन्य है|
फिर भी जो घर-परिवार में रहना चाहें उनके लिए कुछ बातें कहना चाहूंगा ....
(1) इस योग्य बनें कि अपना जीवन निर्वाह स्वयं कर सकें, किसी के आगे हाथ फैलाना नहीं पड़े|
(2) जब तक माता-पिता जीवित हैं उनकी सेवा-सुश्रुषा करें| उन्हें कोई कष्ट ना हो| पर उनकी कोई गलत बात नहीं मानें|
(3) कोई अपने ही विचारों की आध्यात्मिक प्रकृति की लडकी मिले तो विवाह करो अन्यथा नहीं| पत्नी हमारे जीवन में सहायक हो, बाधक नहीं|
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आगे का मार्गदर्शन भगवान स्वयं करेंगे|
ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
May 5, 2016.

एक अपूरणीय क्षति ---

 एक अपूरणीय क्षति ---

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रामानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के संस्कृत व्याकरण विभाग के पीठाध्यक्ष 95+ वर्षीय परम श्रद्धेय ब्राह्मण शिरोमणि पं.बद्री प्रसाद जी पपूरना के निधन पर मैं अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ| वे मेरे स्वर्गीय पिताजी के व्यक्तिगत मित्रों में से जीवित अंतिम व्यक्ति थे|
उन को हमारे यहाँ के संत समाज ने छ: महीनों पूर्व ही झुंझुनू में ब्रह्म शिरोमणि पद से सम्मानित किया था| कार्यक्रम में शेखावाटी क्षेत्र के सभी संतगण और समाज के सभी प्रबुद्ध गण उपस्थित थे|
वे राजस्थान ब्राह्मण महासभा झुंझुनूं जिले के मुख्य संरक्षक थे| राजस्थान के झुंझुनू जिले की खेतड़ी तहसील के गाँव पपूरना के रहने वाले थे और 95+ वर्ष की आयु में भी विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते हुए जयपुर में रामानंद संस्कृत विश्व विद्यालय में पीठाध्यक्ष थे|
उनकी स्मृति स्पष्ट थी और उनका व्यक्तित्व भी प्रेरणादायक था| ऐसे महान तपस्वी साधक और परम विद्वान के गौ लोक गमन से हमारे समाज के सभी लोग दू:खी हैं|
ये एक सफल साधक और सदाचारी विद्वान थे |त्रिकाल संध्या २१ माला गायत्री मन्त्र का तथा ६० माला गोपालमंत्र का जप करते थे |
आपने लगभग ३ मास से भोजन करना बंद कर दिया था| कहते थे की अब शरीर छूटने का समय आ चूका है |
इनका परिवार हमेशा संत महापुरुषों के साथ जुडा रहा |आपके लिखे अनेक ग्रन्थ हैं|आप राष्ट्रपति से भी पुरुष्कृत हुए थे| ये उस राष्ट्रपति का सौभाग्य है|
मैं उन्हें निम्न संस्थाओं के अध्यक्षों की और से भी अधिकृत रूप से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ ---
(१) अन्नक्षेत्र संस्थान झुंझुनू के संस्थापक और संरक्षक श्री श्री १०८ बाबा आनंद गिरी महाराज (फलाहारी), मुक्तेश्वर महादेव मंदिर, झुंझुनू| (इनके आयोजकत्व में ही संत समाज ने पंडित जी को सम्मानित किया था)
(२) राजस्थान ब्राह्मण महासभा झुंझुनू जिले के अध्यक्ष और प्रसिद्द नेत्र चिकित्सक मेरे अग्रज डा.दया शंकर बावलिया|
राजस्थान ब्राह्मण महासभा झुंझुनू जनपद अगले कुछ दिनों में एक शोक सभा का भी आयोजन करेगी|
कृपा शंकर
५ मई २०१३

Monday, 4 May 2026

परमात्मा ही हमारा अस्तित्व है। हम परमात्मा को कैसे प्राप्त हों?

 परमात्मा ही हमारा अस्तित्व है। हम परमात्मा को कैसे प्राप्त हों?

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इस सृष्टि का नियम है कि हम अपनी भौतिक मृत्यु के समय जिस भी भाव का चिंतन करते हैं, अगले जन्म में हम उसी भाव को प्राप्त होते हैं। इसलिए हमें हर समय अनन्य भाव से परमात्मा का चिंतन करते रहना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण हमें मूर्धा में ओंकार के जप को कहते हैं। इस की विधि बड़ी सरल है। मेरुदण्ड को उन्नत और ठुड्डी को भूमि के समानांतर रखते हुए, सुख से अर्ध या पूर्ण खेचरीमुद्रा लगाकर बैठ जायें। ध्यान आज्ञाचक्र पर रखें। यदि सीधे बैठने में कोई असुविधा हो तो नितंबों के नीचे एक पतली सी गद्दी रख लें। मानसिक रूप से ओंकार का जप आरंभ कर दें। भगवान श्रीकृष्ण की परम कृपा से ध्यान स्वतः ही होने लगेगा। ध्यान में जो साधक "रां" बीज का जप करते हैं, उन्हें भी वही लाभ प्राप्त होता है, जो ॐ के जप से होता है।
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सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च |
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ||८:१२||
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् |
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ||८:१३|| (श्रीमद्भगवद्गीता)
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ध्यान — तेलधारा की भांति अखंड हो, यानी उसमें निरंतरता हो। ओंकार के ध्यान से देह के अभ्यंतर की अधोमुखी क्रियाएँ सुषुम्नापथ द्वारा ऊर्ध्वगामी हो जाती हैं। इसीलिए इसे "ओंकार" कहते हैं। यह ओंकार ही जब प्राण-तत्व को परमात्मा के चरणों में प्रणत करता है, तब इसे "प्रणव" कहते हैं। ओंकार का ध्यान ही चिदाकाश, दहराकाश, महाकाश, पराकाश और सूर्याकाश आदि से पार करा कर मह:, जन:, तप: और सत्यलोक से भी परे ले जाकर हमें ब्रह्ममय बना देता है। इसका कभी क्षय नहीं होता, अतः यह अक्षर या अक्षय है। यह साक्षात ब्रह्म साधना है जिसकी घोषणा सभी उपनिषद् और भगवद्गीता करती हैं। इसकी विधि बड़ी सरल है।
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सार की बात यह है कि अंत समय में जिसकी जैसी मति होती है वैसी ही उसकी गति होती है। महात्माओं ने बताया है कि इस देह में ग्यारह छिद्र हैं जिनसे जीवात्मा का मृत्यु के समय निकास होता है -- दो आँख, दो कान, दो नाक, एक पायु, एक उपस्थ, एक नाभि, एक मुख और एक मूर्धा।
(१). यह मूर्धा वाला मार्ग अति सूक्ष्म है और पुण्यात्माओं के लिए ही है।
(२). नरकगामी जीव पायु यानि गुदामार्ग से बाहर निकलता है।
(३). कामुक व्यक्ति मुत्रेंद्रियों से निकलता है और निकृष्ट योनियों में जाता है|
(४). नाभि से निकलने वाला प्रेत बनता है|
(५). भोजन लोलूप व्यक्ति मुँह से निकलता है।
(६). गंध प्रेमी नाक से।
(७). संगीत प्रेमी कान से, और
(८). तपस्वी व्यक्ति आँख से निकलता है|
अंत समय में जहाँ जिसकी चेतना है वह उसी मार्ग से निकलता है और सब की अपनी अपनी गतियाँ हैं। अनेक बातें यहाँ नहीं लिख रहा, क्योंकि ये ज्ञान की बातें ऋषि याज्ञवल्क्य और राजा जनक के संवादों में मिल जायेंगी|
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जो ब्राह्मण संकल्प कर के और दक्षिणा लेकर भी यज्ञादि अनुष्ठान विधिपूर्वक नहीं करते/कराते वे ब्रह्मराक्षस बनते हैं| मद्य, मांस और परस्त्री का भोग करने वाला ब्राह्मण ब्रह्मपिशाच बनता है| इस तरह की कर्मों के अनुसार अनेक गतियाँ हैं| कर्मों का फल सभी को मिलता है, कोई इससे बच नहीं सकता|
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सबसे बुद्धिमानी का कार्य है परमात्मा से परम प्रेम, निरंतर स्मरण का अभ्यास और ध्यान। यह लेख कहीं लंबा न हो जाये इसलिए इसका यहीं समापन करता हूँ। आप सब पर परमात्मा की कृपा हो। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
झुंझुनूं (राजस्थान)
३० अप्रेल २०२६

इस लौकिक जीवन में अब मैं किसी भी तरह की वचनबद्धता का निर्वाह करने में असमर्थ हूँ ---

इस लौकिक जीवन में अब मैं किसी भी तरह की वचनबद्धता का निर्वाह करने में असमर्थ हूँ। इस जीवन में जो भी थोड़ी-बहुत ऊर्जा बची है, वह पूरी तरह से परमब्रह्म परमात्मा को समर्पित है। एकमात्र उद्देश्य है -- परमात्मा को "पूर्ण समर्पण"। घनीभूत प्राण-तत्व के रूप में जगन्माता स्वयं परमशिव की उपासना कर रही हैं। जो परमशिव हैं वे ही श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम हैं, और वे ही वेदान्त के ब्रह्म हैं। उनसे अन्य कोई भी या कुछ भी नहीं है। समस्त जीवन उन्हें समर्पित है। वे कुछ भी करें। यदि कहीं कोई कमी है तो वह मेरी समझ में ही है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। .

मुक्ति या मोक्ष की कामना ही मुक्ति और मोक्ष के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। जब तक मुक्ति और मोक्ष की कामना है, तब तक हम बंधन में हैं। तब न तो मुक्ति मिल सकती है और न ही मोक्ष। "शिवो भूत्वा शिवं यजेत्।" स्वयं शिव बनकर शिव की उपासना करो॥ ॐ नमः शिवाय। ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर १ मई २०२६

वैशाख पूर्णिमा ----

आज १ मई २०२६ को वैशाख पूर्णिमा है। अङ्ग्रेज़ी तिथि से १ मई का भी बहुत अधिक अंतर्राष्ट्रीय महत्व है, और हिन्दी तिथि से वैशाख-पूर्णिमा का भी बहुत अधिक अंतर्राष्ट्रीय महत्व है। एक मई को तो अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस है। इस दिन का बहुत बड़ा ऐतिहासिक महत्व है जिसके ऊपर कई लेख विस्तार से लिखे जा चुके हैं। सभी पूर्व साम्यवादी देशों में तो आज के दिन छुट्टी होती थी और उत्सव मनाए जाते थे। दिन में एक श्रमिक केवल ८ घंटे काम करता है, और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी होती है, यह श्रेय जाता है अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस पर हुए अनेक आंदोलनों की सफलता को।

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वैशाख पूर्णिमा को सभी बौद्ध मतानुयायी देशों में सबसे बड़ा त्योहार होता है। इसे बुद्ध-पूर्णिमा भी कहते हैं और वैशाख भी कहते हैं। इस दिन महात्मा बुद्ध का जन्म, ज्ञान और निर्वाण दिवस मनाया जाता है। पूरे विश्व में बौद्धों का यह सबसे बड़ा त्योहार है।
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भारत में इस दिन अनेक लोग सत्यनारायण व्रत कथा का आयोजन करवाते हैं। हर महीने की पूर्णिमा को भगवान विष्णु के सत्यनारायण रूप की पूजा विशेष फलदायी होती है। वास्तव में भगवान का सत्य-नारायण रूप ही सर्वश्रेष्ठ है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ मई २०२६

गुरु रूप में दक्षिणामूर्ति शिव ---

 गुरु रूप में दक्षिणामूर्ति शिव ---

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विद्या, बुद्धि और विवेक की प्राप्ति के लिए गुरु रूप में भगवान शिव को ही "दक्षिणामूर्ति" कहा जाता है। प्रतीकात्मक रूप से वे एक वटवृक्ष के नीचे एक चबूतरे पर बैठे हुए ध्यानस्थ हैं। उनका मुख दक्षिण दिशा की ओर है। अपने दाहिने पैर से उन्होंने एक अज्ञानरूपी जीव को दबा रखा है। वे पूर्णतः मौन हैं। उनके समक्ष जो भी मुनि ध्यानस्थ होते हैं, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति स्वतः ही हो जाती है। सारा कार्य मौन में होता है। उनका ध्यान करने से "ॐ तत्त्वमसि" (तत् त्वं असि) जैसा महावाक्य स्वतः ही ध्यान में प्रकट होता है। ऐसे ही किसी महावाक्य द्वारा वे शिष्य में आत्मबोध जागृत करते हैं। वे स्वयं ही मोक्षदायक चैतन्यस्वरूप गुरुतत्त्व हैं। उनके समक्ष “सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म” की अनुभूति होती है। वे अद्वैत-ब्रह्मतत्त्व का बोध कराते हैं। वे ही सद्गुरु हैं। वे “श्रवण, मनन, निदिध्यासन, और ध्यान” के माध्यम से अपने समक्ष उपस्थित मुनि को आत्मस्वरूप में स्थापित करते हैं।
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मोक्ष -- कोई क्रिया, कर्म या यज्ञ नहीं, केवल तत्त्वज्ञान है जो भवबन्धन का क्षय करता है।
वे सदा वंदनीय हैं। उनका उपदेश किसी पार्थिव विद्या के लिए नहीं होता, बल्कि उस चिदात्मा के लिए है, जिसकी प्रकाशमयी सत्ता ही विश्व का आधार है। उन गुरुरूप मौनव्रती आत्मस्वरूप दिग्दर्शक भगवान शिव को मेरा नमन॥
ॐ ह्रीं दक्षिणामूर्तये तुभ्यं वटमूलनिवासिने। ध्यानैकनिरतांगाय नमो रुद्राय शंभवे ह्रीं ॐ।
ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा।
ॐ ह्रीं दक्षिणामूर्तये नमः।
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मेरा व्यक्तिगत निजी अनुभव जिसे बताने की मुझे पूर्ण अनुमति है :---
इस शरीर में सहस्त्रारचक्र उत्तर दिशा है, मूलाधार दक्षिण दिशा, भ्रूमध्य पूर्व दिशा, और मेरुशीर्ष पश्चिम दिशा है। भगवान शिव की अनुभूति हमें उत्तर दिशा यानि सहस्त्रारचक्र में या इससे ऊपर होती है, अतः उनका ध्यान हमें या तो सहस्त्रारचक्र में करना चाहिए, या उससे भी ऊपर जिसकी अनुभूति इस भौतिक देह से बाहर होती है। एक दिन साधक पाता है कि सहस्त्रार से ऊपर का आवरण हट गया है, और वह इस शरीर से बाहर है। यह अनुभूति सूक्ष्म देह की है, भौतिक शरीर की नहीं। उनके दर्शन और अनुभूति सूक्ष्म देह में ही होती है। उनके दर्शन एक श्वेत पञ्चकोणीय नक्षत्र के रूप में होते हैं। इससे अधिक की अनुभूति स्वयं करें।
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श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय के २३वें मंत्र में भगवान के तीन नाम बताए गए हैं -- "ॐ तत् सत्" । सृष्टि के आरंभ में परमात्मा ने स्वयं वेदों, यज्ञों, और ब्राह्मण की रचना की है।
"ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥१७:२३॥"
अर्थात् -- 'ऊँ, तत् सत्' ऐसा यह ब्रह्म का त्रिविध निर्देश (नाम) कहा गया है; उसी से आदिकाल में (पुरा) ब्राहम्ण, वेद और यज्ञ निर्मित हुए हैं॥ अर्थात् ऊँ, तत् और सत् -- इन तीनों नामोंसे जिस परमात्माका निर्देश किया गया है, उसी परमात्माने सृष्टिके आदिमें वेदों, ब्राह्मणों और यज्ञोंकी रचना की है।
"तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥१७:२४॥"
अर्थात् -- इसलिए, ब्रह्मवादियों की शास्त्र प्रतिपादित यज्ञ, दान और तप की क्रियायें सदैव ओंकार के उच्चारण के साथ प्रारम्भ होती हैं॥
किसी भी प्रकार के यज्ञ, दान और तप का आरंभ हमें ॐ के उच्चारण के साथ करना चाहिए। भगवान शिव का ध्यान भी हमें ॐ मंत्र से ही करना चाहिए। यह मेरा अनुभव है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ मई २०२६

ग्रेट निकोबार द्वीप की गैलाथिया खाड़ी प्रोजेक्ट का पूर्ण समर्थन ---

ग्रेट निकोबार द्वीप की गैलाथिया खाड़ी प्रोजेक्ट का पूर्ण समर्थन --
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भारत के ग्रेट निकोबार द्वीप का सुनामी आने से पहिले मैंने दो बार भ्रमण किया है, और वहाँ खूब घूमा हूँ। दो बार वहाँ पर भारत के दक्षिणतम बिन्दु "इंदिरा पॉइंट" प्रकाश-स्तम्भ पर भी चढ़ा हूँ। बड़े ही शानदार और सुंदर अविकसित समुद्री तट हैं। मैं भारत सरकार के ग्रेट निकोबार द्वीप की गैलाथिया खाड़ी प्रोजेक्ट का पूर्ण समर्थन करता हूँ। इससे नुकसान केवल चीन को है, शायद इसीलिए एक भारतीय राजनेता इसका खूब विरोध कर रहे हैं।
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वहाँ एक प्रमुख रणनीतिक और बुनियादी ढांचा विकास कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य हिंद महासागर में चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति का मुकाबला करना और भारत को समुद्री व्यापार का केंद्र बनाना है। मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) के पास स्थित होने के कारण, यह पोर्ट भारतीय नौसेना की क्षमता बढ़ाएगा और क्षेत्र में चीन के जहाजों की गतिविधियों पर भी नजर रखेगा। इतना ही नहीं इससे भारत एक वैश्विक कंटेनर ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में स्थापित हो जाएगा, क्योंकि भारत में इतना गहरा बन्दरगाह अन्यत्र कहीं है ही नहीं।
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चिंता का विषय यह है कि चीन -- थाइलैंड के साथ मिलकर थाइलैंड-की-खाड़ी से बंगाल-की-खाड़ी के मध्य एक समुद्री नहर बनाने की योजना पर काम शुरू करने वाला है जिससे मलक्का जलडमरूमध्य का महत्व बहुत कम रह जाएगा। बंगाल की खाड़ी में यह नहर निकोबार द्वीप समूह के बिल्कुल ऊपर खुलेगी। भारत को होने वाले हानि-लाभ की थाह लेना तो विशेषज्ञों का काम है। संबंधित नक्शे देखें, फिर विचार करें।
कृपा शंकर
२ मई २०२६

आध्यात्मिक मार्ग पर बाधाएँ कैसे दूर हों? सत्य-संकल्प की दृढ़ता में कैसे वृद्धि हो?

 आध्यात्मिक मार्ग पर बाधाएँ कैसे दूर हों? सत्य-संकल्प की दृढ़ता में कैसे वृद्धि हो?

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राम अभी तक वन में हैं, रावण सबके मन में है -- यही एकमात्र कारण है हमारे आध्यात्मिक पतन का। जब कि होना यह चाहिए कि -- "रामहि केवल प्रेम पियारा। जान लेहु जो जानन हारा।"
रामचरितमानस में एक स्थान पर लिखा है --
"तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिअ तुला इक अंग।
तुल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सत्संग॥"
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स्वनामधान्य भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर ने अपनी रचना भजगोविन्दम् (मोहमुद्गर) के १३वें श्लोक में लिखा है --
"क्षणमिह सज्जनसंगतिरेका, भवति भवार्णवतरणे नौका॥"
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श्रीरामचरितमानस, भागवत पुराण, और श्रीमद्भगवद्गीता जैसे ग्रन्थों का नित्य नियमित स्वाध्याय और सत्संग ही -- मेरी दृष्टि में एकमात्र उपाय है, आध्यात्मिक बाधाओं को दूर करने, और संकल्प में निरंतर दृढ़ता लाने का। सबसे दुर्लभ चीज सत्संग ही है। कुसंग का तो किसी भी परिस्थिति में त्याग हो।
"एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
‘भीखा’ संगति साधु की, कटें कोटि अपराध॥"
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भगवान विष्णु या उनके अवतारों या परमशिव की अनंतता का ध्यान हमें नित्य नियमित करना चाहिए। इससे अतिरिक्त अन्य कुछ मुझे समझ में नहीं आता। सभी मित्रों को साधुवाद देता हूँ, जिन्होंने अपने सुझाव लिखे हैं। सभी का कल्याण हो। हरिः ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
३ मई २०२६

सन्यासी और योगी कौन हैं? ---

 सन्यासी और योगी कौन हैं? ---

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मैं एक शाश्वत आत्मा हूँ, जिसका एकमात्र स्वधर्म परमब्रह्म परमात्मा को पूर्ण समर्पण और निज जीवन में उन की पूर्ण अभिव्यक्ति है। उनकी परमकृपा से किसी भी तरह का कोई संशय मुझे नहीं है। मेरा स्वधर्म — मेरा कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग ही है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥६:१॥"
अर्थात् - श्रीभगवान् ने कहा -- जो पुरुष कर्मफल पर आश्रित न होकर कर्तव्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, न कि वह जिसने केवल अग्नि का और क्रियायों का त्याग किया है॥
आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में इसकी बड़ी सुंदर व्याख्या की है। हमें अपने कर्म का निर्वाह अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए, न कि कर्मफल की प्राप्ति के लिए। तभी हम सन्यासी व योगी हैं, अन्यथा नहीं।
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भगवान हमें सब संकल्पों के त्याग को भी कहते हैं, क्योंकि संकल्पों को त्यागे बिना कोई न तो कोई सन्यासी हो सकता है और न योगी। इच्छाओं को त्याग कर ही हम आध्यात्मिक हो सकते हैं। हम अपने द्वारा अपना उद्धार स्वयं
करें, अपना पतन न करे; क्योंकि हम स्वयं ही अपने मित्र हैं, और स्वयं ही अपने शत्रु।
"जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥६:७॥"
अर्थात् -- जिसने अपने-आप पर अपनी विजय कर ली है, उस शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) सुख-दुःख तथा मान-अपमानमें निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।
(सार की बात यह है कि जो समभाव में स्थित है, उसे ईश्वर नित्य प्राप्त हैं।)
ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ मई २०२६

प्रशान्त चित्त वाले जितेन्द्रिय के लिए परमात्मा सदा ही आत्मभाव से विद्यमान रहते हैं

 प्रशान्त चित्त वाले जितेन्द्रिय के लिए परमात्मा सदा ही आत्मभाव से विद्यमान रहते हैं

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अनुकूल/प्रतिकूल परिस्थितियों, अच्छे/बुरे वातावरण, व मूर्ख/बुद्धिमान के साथ भी आत्मज्ञानी पुरुष सदा प्रशान्त और समभाव में स्थित रहता है। ऐसे ज्ञानी पुरुष को परमात्मा नित्य-प्राप्त हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं --
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥६:२२॥"
अर्थात् -- "जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके मानने में भी नहीं आता, और जिस में स्थित होने पर वह बड़े भारी दु:ख से भी विचलित नहीं होता है॥
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इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति हो सकती है। इसके लिए हमें भगवान विष्णु के ऊर्ध्वस्थ सर्वव्यापी पुरुषोत्तम रूप या भगवान शिव के परमशिव रूप का कूटस्थ में निरंतर ध्यान करना होगा। इन दोनों की अनुभूतियाँ एक ही हैं, केवल बाहरी अभिव्यक्तियाँ ही पृथक पृथक हैं।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
४ मई २०२६