Sunday, 23 August 2026

श्री अरविन्द के शब्दों में कितना बड़ा सत्य छिपा पड़ा है|

 श्री अरविन्द के शब्दों में कितना बड़ा सत्य छिपा पड़ा है| भारत की वर्तमान समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए अरविन्द के इन शब्दों को समझना आवश्यक है|

" Spirituality is India's only politics, the fulfillment of the Sanatan Dharma its only Swaraj. I have no doubt we shall have to go through our parliamentary period in order to get rid of the notion of western democracy by seeing in practice how helpless it is to make nations blessed."
------ Sri Aurobindo ------
"If Thou art, then Thou knowest my heart. Thou knowest that I do not ask for Mukti, I do not ask for anything which others ask for. I ask only for strength to uplift this nation, I ask only to be allowed to live and work for this people whom I love and to whom I pray that I may devote my life."
---------- Sri Aurobindo ------
"When therefore it is said that India shall rise, it is the Sanatan Dharma that shall rise. When it is said that India shall be great, it is the Sanatan Dharma that shall be great. When it is said that India shall expand and extend herself, it is the Sanatan Dharma that shall expand and extend itself over the world. It is for the Dharma and by the Dharma that India exists."
--------- Sri Aurobindo ---------

भवसागर को गोते लगाए बिना पार करें :----

 भवसागर को गोते लगाए बिना पार करें :----

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श्रुति भगवती कहती हैं .....
"प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते | अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ||
–मुण्डकोपनिषद्,२/२/४.
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प्रणव रूपी धनुष पर आत्मा रूपी बाण चढ़ाकर ब्रह्म रूपी लक्ष्य को बेधना है | बाण सीधा अपने लक्ष्य को बेधता है, इधर उधर कहीं भी नहीं जाता | वैसे ही अपने लक्ष्य परमात्मा की ओर ही पूर्ण तन्मयता से अग्रसर होना है, इधर-उधर कहीं भी नहीं देखना है |
See nothing, look at nothing but your goal ever shining before you.
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कठोपनिषद में भी लिखा है कि आत्मा को अधर अरणि और ओंकार को उत्तर अरणि बनाकर मंथन रूप अभ्यास करने से दिव्य ज्ञानरूप ज्योति का आविर्भाव होता है, जिसके आलोक से निगूढ़ आत्मतत्व का साक्षात्कार होता है|
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श्रीमद्भगवद्गीता में भी ओंकार को एकाक्षर ब्रह्म कहा है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
२३ अगस्त २०१७

अपनी प्रज्ञा को निरंतर हर समय -- अव्यय, अनंत, ज्योतिर्मय परमब्रह्म परमात्मा में ही स्थित रखें।

अपनी प्रज्ञा को निरंतर हर समय -- अव्यय, अनंत, ज्योतिर्मय परमब्रह्म परमात्मा में ही स्थित रखें। वे ही नारायण हैं, वे ही पुरुषोत्तम हैं, और वे ही परमशिव हैं। इसके लिए हमें वीतराग यानि राग-द्वेष और अहंकार से तो मुक्त तो होना ही होगा। यह आरंभिक लक्ष्य है।

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ध्यान साधना करते करते गुरु-कृपा से एक दिन, एक चक्राकार ब्रह्मज्योति: का वलय मेरे भ्रूमध्य में प्रकट हुआ। कालांतर में वह ब्रह्मज्योति सहस्त्रारचक्र में दिखायी देने लगी। एक दिन सहस्त्रार से ऊपर का आवरण हट गया और वह ब्रह्मज्योति: अनंताकाश में खूब विचरण करती हुई क्रमशः उस स्थान पर पहुँच गयी, गीता में जिसके बारे में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं
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"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम् यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
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अब वह ऊर्ध्वमूल ही मेरी प्रज्ञा का केंद्र है। वही जानने योग्य है। बाकी कुछ बचा ही नहीं हैं। गुरुकृपा से ही उस अखंडमंडलाकार चिदज्योति: का दर्शन अब नित्य निरंतर होता है। गुरु-प्रणाम मंत्र कहता है --
"अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः॥"
इस अखंडमंडलाकार ज्योति का दर्शन गुरु महाराज ही करा सकते हैं। इस ब्रह्मज्योति के दर्शन के उपरांत ही ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा होती है। ब्रह्म में विचरण ही ब्रह्मचर्य है। ईश्वर प्रदत्त विवेक का प्रकाश ही इस बात को ठीक से समझा सकता है।
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जितनी भगवान ने मुझे बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षमता दी है, उतना ही लिख पाया हूँ। इससे अधिक लिखना मेरी क्षमता से परे है। अब दीर्घकाल तक और कुछ भी लिखने की इच्छा नहीं है। इस समय मैं ब्राह्मी-स्थिति/कूटस्थ-चैतन्य/और कैवल्य में स्थित हूँ। अब शब्दों का निर्माण असंभव होता जा रहा है। केवल परमात्मा की चेतना ही बनी रहेगी।
ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ अगस्त २०२५

अपनी प्रज्ञा अब परमात्मा को सौंप रहा हूँ। मेरी प्रज्ञा अब से परमात्मा में ही स्थित रहेगी।

 अपनी प्रज्ञा अब परमात्मा को सौंप रहा हूँ। मेरी प्रज्ञा अब से परमात्मा में ही स्थित रहेगी।

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जहाँ तक मेरा दिमाग चलता था और बुद्धि काम करती थी, वहाँ तक मैंने सब कुछ लिख दिया है। लिखने को अब कुछ बचा ही नहीं है। इससे अधिक दिमाग और बुद्धि मुझ में नहीं है। अब तक पाँच हजार के लगभग पोस्ट/लेख लिख चुका हूँ। मन भर गया है इसलिये अब परमात्मा को अपना अन्तःकरण और प्रज्ञा बापस लौटा रहा हूँ।
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किसी भी तरह की कोई भी कामना/आकांक्षा अब मुझमें अवशिष्ट नहीं है। अवशिष्ट जीवन परमात्मा को पूर्णतः समर्पित है। आप सब मेरी मंगलमय शुभ कामनाएँ स्वीकार कीजिये। परमात्मा में मैं आपके साथ एक हूँ।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर २३ अगस्त २०२५

२३ अगस्त २०२५

मेरा शत्रु कहीं बाहर नहीं, मेरे भीतर ही बैठा है - --

मेरा शत्रु कहीं बाहर नहीं, मेरे भीतर ही बैठा है। मुझे मेरी सब कमियों का पता है, लेकिन उनके समक्ष मैं असहाय हूँ। भगवान से मैंने प्रार्थना की तो भगवान ने कहा कि अपने सब शत्रु मुझे सौंप दो, लेकिन उनसे पहले स्वयं को (यानि अपने को) मुझे (यानि भगवान को) अर्पित करना होगा। स्वयं को अर्पित करने में बाधक है मेरा लोभ और अहंकार, यानि कुछ होने का और खोने का भाव।

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मेरी चेतना और प्रज्ञा दोनों ही परमात्मा को समर्पित ही नहीं, परमात्मा में स्थित है। इस जीवन का बहुत थोड़ा सा भाग बाकी बचा है, यानि इस दीपक में बहुत कम ईंधन बाकी बचा है। अब उसकी चिंता नहीं है। सारी चेतना, प्रज्ञा और सारा अस्तित्व, परमात्मा को समर्पित है। मेरी कोई मृत्यु नहीं है, मैं शाश्वत हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ अगस्त २०२५
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पुनश्च: --- जैसे एक सुपात्र शिष्य की रक्षा गुरु-परंपरा करती है, वैसे ही भगवान को अपना अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) सौंप देने वाले भक्त की रक्षा का दायित्व भगवान स्वयं लेते हैं --
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
अर्थात् - यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है॥
हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है| तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता ||

Saturday, 22 August 2026

भगवान की भक्ति का मौसम सदा चलता ही रहता है ---

 भगवान की भक्ति का मौसम सदा चलता ही रहता है। राजस्थान की भूमि तो भक्ति और आस्था का संगम है। यहाँ के लोगों के स्वभाव में भगवान की बहुत गहरी भक्ति है, बस कोई जगाने वाला चाहिये।

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झुंझुनूं जिले की अरावली पर्वतमाला के लोहार्गल तीर्थ में ढाई हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित मालकेत पर्वत की आराधना भगवान विष्णु के रूप में होती है। इस पर्वत की परिक्रमा सात दिन में पूरी होती है। मार्ग में सात कुंड है जिनमें सात झरने हैं। यह २४ कौसीय परिक्रमा पूरे राजस्थान में होने वाली सबसे बड़ी परिक्रमा है जो लोहार्गल तीर्थ से संत महात्माओं के नेतृत्व में ठाकुर जी की पालकी के साथ गोगानवमी (भाद्रपद कृष्ण नवमी) के दिन आरम्भ होकर भाद्रपद अमावस्या के दिन लोहार्गल तीर्थ में ही बापस आकर समाप्त हो जाती है। इस सात दिवसीय चौबीस कौसीय परिक्रमा में हर वर्ष सात से नौ लाख श्रद्धालु पूरे भारत से आकर भाग लेते हैं। अरावली पर्वत माला की घाटियों में यह यात्रा अति मनोरम होती है। अनेक स्वयंसेवी संस्थाएँ पदयात्रियों की हर सुविधा का ध्यान रखती हैं।
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कल भाद्रपद अमावस्या के दिन ही हमारे यहाँ के सभी सती मंदिरों में मुख्य आराधना होगी। झुंझुनूं के विश्व प्रसिद्ध श्रीराणीसती दादीजी के मंदिर में भी मुख्य आराधना कल होगी। ये सभी सतियाँ महान वीरांगणाएँ थीं जिन्होंने धर्मारक्षार्थ युद्धभूमि में स्वयं युद्ध किया और स्वतः प्रकट हुए अपने तेज से सती हुईं। इस दिन का वातावरण कुछ अलग ही होता है।
आप सब को नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ अगस्त २०२५

Tuesday, 18 August 2026

मनुष्य का स्वभाविक स्वधर्म है ..... "परम तत्व की खोज और उससे एकात्मता" ---

 मनुष्य का स्वभाविक स्वधर्म है ..... "परम तत्व की खोज और उससे एकात्मता"| इस स्वधर्म की रक्षा का अनवरत प्रयास ही मेरी दृष्टि में आध्यात्म है, अन्य कुछ भी नहीं| आध्यात्म कोई व्यक्तिगत मोक्ष, सांसारिक वैभव, इन्द्रीय सुख या अपने अहंकार की तृप्ति की कामना का प्रयास नहीं है| यह कोई दार्शनिक वाद विवाद या बौद्धिक उपलब्धी भी नहीं है| साथ साथ सज्जनों की रक्षा और दुर्जनों का विनाश भी हमारा लौकिक धर्म है|

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भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का जीवन हमारे लिए आदर्श है| उन जैसे महापुरुषों के गुणों को स्वयं के जीवन में धारण करना, उन की शिक्षा और आचरण का पालन करना भी एक सच्ची आराधना है| भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने जन्म से ही धर्मरक्षार्थ, धर्मसंस्थापनार्थ, व धर्मसंवर्धन हेतु शौर्य संघर्ष व संगठन साधना का आदर्श रखा|
भगवान श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान अर्जुन को कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में दिया, इस प्रसंग के आध्यात्मिक सन्देश को समझें कि रणभूमि में उतरे बिना यानि साधना भूमि में उतरे बिना हम आध्यात्म को, स्वयं के ईश्वर तत्व को उसके यथार्थ स्वरुप में अनुभूत नहीं कर सकते|
भगवान श्रीराम ने भी धर्मरक्षार्थ अपने राज्य के वैभव का त्याग किया, और भारत में पैदल भ्रमण कर अत्यंन्त पिछड़ी और उपेक्षित जातियों को जिन्हें लोग तिरस्कार पूर्वक वानर और रीछ तक कह कर पुकारते थे, संगठित कर धर्मविरोधियों का संहार किया| लंका का राज्य स्वयं ना लेकर विभीषण को ही दिया| ऋषि मुनियों की रक्षार्थ ताड़का का वध भी किया|
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उपरोक्त दोनों ही महापुरुष हजारों वर्षों से हमारे प्रातःस्मरणीय आराध्य हैं|
स्वयं के भीतर के राम और कृष्ण तत्व से एकात्म ही आध्यात्म है, यही सच्ची साधना है, यही शिवत्व की प्राप्ति है| ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ अगस्त २०१४

जाने कहाँ गये वो दिन

 जीवन में आमूलचूल परिवर्तन भी पीड़ा देता है। जो कुछ भी जीवन में मैंने देखा, वह सारा परिदृश्य ही बदल गया है। पुराने लोग ऊपर चले गए। बड़े बड़े शानदार भवन सूने होकर खंडहर होने लगे हैं। सारे शत्रु-मित्र पता नहीं कहाँ चले गए। बड़े-बड़े राजसी महल, बड़ी-बड़ी हवेलियाँ, अब सुनसान और खंडहर हो रही हैं। कभी ये भी बहुत शानदार थीं, और बड़े-बड़े शानदार लोग इनमें भी रहते थे। हमारी दो सौ वर्ष पुरानी पारिवारिक हवेली जो कभी बहुत शानदार थी, अब देखभाल के अभाव में खंडहर हो रही है, जिसे देखकर पीड़ा होती है। इतने विभाजन हो गए हैं कि मरम्मत करवाए तो भी कौन? हमारे पूर्वजों की छह-सात पीढ़ियाँ उसमें रही हैं। मेरा भी बचपन, किशोरावस्था और यौवन का कुछ भाग उसी में बीता है।

हमारे यहाँ महाजनों की तो बहुत बड़ी बड़ी शानदार हवेलियाँ हैं, जो खाली और सुनसान पड़ी हैं। उनके मोहल्ले खाली और वीरान हो गए हैं। कई हवेलियाँ तो बिक भी गई हैं, जिन्हें तोड़कर लोगों ने बाजार बना दिये हैं। पुराने लोग भी अब दिखाई नहीं देते। जो युवा पीढ़ी दिखाई देती है, उनमें वह प्रेम नहीं है।
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मेरे पिताजी ने हमारे नगर में सबसे पहिला रेडियो खरीदा था जो बैटरी से चलता था। प्रति सप्ताह बिनाका गीतमाला सुनने के लिए और वर्ष में एक बार बजट सुनने के लिए हमारी बैठक लोगों से भर जाती थी। सन १९६२ की लड़ाई के समय समाचार सुनने के लिए रात भर लोगों की भीड़ उन सब मकानों के चक्कर लगाती थी जिनके पास रेडियो थे। सबसे पहिले ग्रामोफोन और हर घंटे बज कर समय बताने दीवार घड़ी भी हमारे नगर में सबसे पहिले पिताजी ने ही खरीदी थी।
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हमारे नगर में गिन्नी नाम का एक दर्जी था जो खानदानी लोगों के ही कपड़े सिलता था, हर किसी के नहीं। हमारे पिताजी की शेरवानी, चूड़ीदार पायजामा, और कुर्ता आदि सारे वस्त्र वह ही सिलता था। जब वह दर्जी मर गया उसके बाद हमारे पिताजी ने किसी दूसरे दर्जी से कपड़े सिलवाये ही नहीं। पूरे जीवन भर उन्होने खादी ही पहिनी।
ऐसे ही एक रहमान धोबी था जो सिर्फ खानदानी लोगों के ही कपड़े धोता था, हर किसी के नहीं। हमारे पिताजी ने जीवन भर उसी से कपड़े धुलवाये। जब रहमान धोबी मर गया तो पिताजी ने किसी दूसरे धोबी से कपड़े धुलवाये ही नहीं। घर पर ही कपड़े धो लेते थे।
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हमारे पिताजी के पास दो लाइसेन्सी बारह बोर की बंदूकें और एक लाइसेन्सी रिवॉल्वर और दो तलवारें थीं। ऊंट और घोड़े की बहुत अच्छी सवारी करते थे। ब्राह्मण होकर भी उन्हें हर तरह के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग आता था। हम बच्चे थे तभी उन्होने अपने सारे हथियार आधिकारिक तरीके से बेच दिये थे, हमारे लिए कुछ भी नहीं छोड़ा।
प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर कुएं से अपने हाथ से खींच कर जल भरते, उस से स्नान करते, और दो घंटे शिवपूजा करते। शिवपूजा उनके जीवन का अभिन्न अंग थी।
उस समय लगभग सारे ब्राह्मणों का जीवन बड़ा संघर्ष और कष्टमय था। हँसते हँसते उन्होने सारे कष्ट सहन किए। उन्होने भी समय का परिवर्तन देखा और उसकी पीड़ा सदैव उनके मानस में रही।
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समय का यानि जमाने का पीड़ादायक परिवर्तन मैं भी देख रहा हूँ। एक अदृश्य शक्ति बार बार मुझे कह रही है कि सब कुछ बदल जाएगा, लेकिन परमात्मा शाश्वत और अपरिवर्तनीय है। मुझे सुख-शांति और सुरक्षा भगवान के ध्यान में ही मिलती है। इस भौतिक जीवन का शेष भाग भी भगवान के ध्यान में ही व्यतीत हो जाये तो ठीक है।
हर हर महादेव॥ जय सियाराम॥
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ अगस्त २०२३

अफीम के उत्पादन और उपयोग पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण है जो और भी अधिक कठोर होना चाहिए।

 अफीम के उत्पादन और उपयोग पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण है जो और भी अधिक कठोर होना चाहिए। दर्दनाशक और अवसाद-मुक्ति की दवाइयों के निर्माण के लिए अफीम की आवश्यकता पड़ती है, जिसके उत्पादन के लिए किसानों को सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता है। बिना लाइसेंस के अफीम उगाना एक अपराध है जिसमें जमानत भी नहीं होती।

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पंजाब एक अत्यधिक संवेदनशील प्रांत है, जहाँ पाकिस्तान से चोरी-छिपे बहुत बड़ी मात्रा में अफीम की तस्करी होती है। खालिस्तानी आंदोलन के लिए सारा धन अफीम की तस्करी से आता है। पूर्वोत्तर भारत में मणिपुर की सारी समस्याओं का एकमात्र कारण अफीम का अवैध उत्पादन और तस्करी है। वहाँ चर्च के संरक्षण में बाहर से आकर बसी हुई जनजातियाँ अफीम का उत्पादन व तस्करी करती हैं, और स्थानीय लोग जब विरोध करते हैं तब उनकी हत्या होने लगती हैं। सारे समाचार माध्यम यानि प्रेस और स्थानीय प्रशासन बिका हुआ है। वर्तमान भारत सरकार की अत्यधिक सख्ती यानि कठोरता के कारण ही स्थिति नियंत्रण में हैं, अन्यथा वह सारा क्षेत्र ही जल उठे। आतंकवादियों को सारा धन नशीले पदार्थों की तस्करी से आता है।
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दक्षिणपूर्व एशिया के इन तीन देशों -- सिंगापूर, मलयेशिया और इंडोनेशिया में यदि किसी के पास जरा सी भी अफीम पाई जाती है, तो उसकी सजा तुरंत मृत्युदंड है। उसकी कोई सुनवाई नहीं होती। जापान, चीन (होङ्ग्कोंग सहित) अमेरिका और लगभग सारे यूरोप में इसकी सजा उम्रकैद यानि आजीवन-कारावास है।
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इतनी कठोरता के बावजूद भी पूरी दुनियाँ में अफीम की तस्करी होती है, क्योंकि इसमें बहुत अधिक धन लगा हुआ है। सारे नशीले ड्रग अफीम से ही बनते हैं। अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश की सरकार भी अफीम की तस्करी को नहीं रोक सकी है। अमेरिका ने अफगानिस्तान पर आक्रमण और अधिकार किया उसके मुख्य कारणों में से एक था इस क्षेत्र को अफीम के उत्पादन से मुक्त करना। विश्व में सबसे अधिक अफीम अफगानिस्तान में उगाई जाती है। वहाँ की अर्थव्यवस्था ही अफीम की तस्करी से चलती है। लेकिन अमेरिका के सैनिक ही जब नशा करने लगे तब अमेरिका को वहाँ से भागना पड़ा।
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इसका एक ही इलाज है कि स्वयं बच कर रहो, और अपने परिवार के बच्चों को बचाकर रखो। किसी भी तरह का नशा चाहे वह शराब का ही क्यों न हो, छोड़ दें। अपने बच्चों के सामने भूल कर भी नशा न करें। जो लोग नशा करते हैं, उनसे दूर रहें। अपने घर में तो ऐसे किसी नशा करने वाले व्यक्ति को घुसने ही न दें। और हम कुछ भी नहीं कर सकते।
१९ अगस्त २०२५

दान-पुण्य से उत्तम गति तो प्राप्त होती है, पर जन्म-मरण से छुटकारा नहीं मिलता। परमात्मा को पूर्ण समर्पण ही सबसे बड़ी साधना है।

 दान-पुण्य से उत्तम गति तो प्राप्त होती है, पर जन्म-मरण से छुटकारा नहीं मिलता। परमात्मा को पूर्ण समर्पण ही सबसे बड़ी साधना है। गीता में भगवान कहते हैं --

"तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥६:४६॥"
अर्थात् - "क्योंकि योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, और (केवल शास्त्र के) ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है, तथा कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो॥"
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पीछे मुड़कर न देखें, दृष्टि सदा सामने ही रहे, व चलते रहें। रुको मत। मन लगे या न लगे, अपना साधन न छोड़ें। दिन में तीन-चार घंटे तो भजन (नामजप, ध्यान प्राणायाम आदि) करना ही है। कोई बहाने न बनाएँ। मन नहीं लगे तो भी बैठे रहो, पर साधन छूटना नहीं चाहिए। बाधाएँ तो बहुत आयेंगी। असुर और देवता भी नहीं चाहते कि किसी साधक की साधना सफल हो। वे भी मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न करते रहते हैं। इस मार्ग में सिर्फ सद्गुरु की कृपा ही काम आती है। गुरु चूंकि परमात्मा के साथ एक है, और उनसे बड़ा हितकारी अन्य कोई नहीं है, अतः उन्हीं की कृपा साधक की रक्षा करती है।
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सूक्ष्म प्राणायाम द्वारा पाप नष्ट होते हैं, जिनकी विधि सिद्ध गुरु ही बता सकता है। गुरु सेवा का अर्थ होता है -- "गुरु-प्रदत्त साधना का अनवरत नियमित अभ्यास।" परमात्मा के किस रूप का ध्यान करना है, वह भी गुरु ही बताता है।
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२१

विश्व की स्थिति बड़ी विचित्र है।

 विश्व की स्थिति बड़ी विचित्र है। यहाँ मैं अपनी आंतरिक अनुभूतियाँ ही लिख रहा हूँ जो विश्व की वर्तमान घटनाओं का मेरा विश्लेषण है। कोई आवश्यक नहीं है कि इससे कोई सहमत ही हो। मैं जो लिख रहा हूँ, किसी की भावनाओं को आहत किए बिना मेरा अभिव्यक्ति का अधिकार है।

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चीन से युद्ध करने के लिए अमेरिका इस समय बहुत अधिक व्याकुल है। उसके साथ साथ ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान और लगभग पूरा पश्चिमी यूरोप प्रतीक्षारत है। अपने वर्चस्व के विस्तार के लिए अमेरिका हृदय से चाहता है कि रूस, चीन और भारत का सर्वनाश हो। इन को नष्ट कर के ही अमेरिका विश्व पर राज्य कर सकता है।
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रूस का सर्वनाश करने के,लिए रूस को यूक्रेन से लड़ा दिया गया है। और अन्य रूस के पड़ोसियों को भी रूस से लड़ाने की योजनाएँ बन रही हैं। रूस से सीधे लड़ने की अमेरिका की हिम्मत नहीं है इसलिए रूस को पड़ोसियों से लड़ाया जा रहा है। चीन को मौका मिलते ही अमेरिका नष्ट कर देगा। वह कभी नहीं चाहेगा कि चीन एक महाशक्तिशाली देश बने। अमेरिका को पता है कि चीन को यदि अभी नष्ट नहीं किया गया तो चीन इतना शक्तिशाली हो जाएगा कि वह अमेरिका को ही नष्ट कर देगा। भारत से मित्रता इस समय अमेरिका कर रहा है क्योंकि चीन के विरुद्ध वह भारत का सहयोग चाहता है।
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चीन को नष्ट करने के बाद अमेरिका का अगला लक्ष्य भारत होगा ---
अमेरिकी साम्राज्यवाद के विस्तार में भारत का हिन्दुत्व सबसे बड़ा बाधक है।
लेकिन इसकी नौबत आएगी ही नहीं। चीन और रूस से युद्ध में अमेरिका स्वयं भी नष्ट हो सकता है। भारत एक महाशक्ति बनाकर उभरेगा।
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अधिक विस्तार से मैं और नहीं लिखना नहीं चाहता। आप अपने निज विवेक से सोच लीजिये कि क्या होगा। मैंने जो भी लिखा है वह एक कटु सत्य है।
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जय श्रीकृष्ण !! भारत की रक्षा भगवान करेंगे। भगवान ही दुष्टों का नाश कर सज्जनों की रक्षा करेंगे। वह समय शीघ्र आ रहा है।
"परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥"
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२२

कर्ता कौन है? ---

 सारी सृष्टि, सारे सूर्य-चन्द्र, ग्रह-नक्षत्र, सब एक नियम से चल रहे हैं। पृथ्वी नियमित रूप से अपने सूर्य की परिक्रमा कर रही है। अग्नि की लपट ऊपर की ओर, व जल की गति नीचे की ओर है। वायु अपनी ही चाल से चलती है। इस देह में रक्त का संचार हो रहा है, बाल और नाखून अपने आप बढ़ रहे हैं, भूख-प्यास व सर्दी-गर्मी लग रही है, शरीर की सारी क्रियाएँ अपने आप हो रही हैं। अपने आप ही अनेक तरह की वासनाओं का जन्म होता है। जीवन में सुख-दुःख की अनुभूतियाँ होती हैं। तरह तरह की स्पृहाओं/आकांक्षाओं व प्रेम और अभीप्सा का जन्म होता है। नित्य इतने लोगों का जन्म और मृत्यु होती है। इन सब का कर्ता कौन है? मैं कौन हूँ? कभी इन पर भी विचार करो, जीवन धन्य होगा।

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मेरी साधनाजन्य अनुभूति तो यही है कि एकमात्र कर्ता -- प्राण-तत्व के रूप में भगवती महाकाली है, जो सारे कर्मों की कर्ता है और उनका फल श्रीकृष्ण (परमशिव) को अर्पित कर रही हैं। लोकयात्रा हेतु मिले इस देह रूपी वाहन में वे कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में ब्रह्मनाड़ी में विचरण करते हुए स्वयं सारी साधना कर रही हैं और उसका फल परमशिव को अर्पित कर रही हैं।
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प्रश्न उठता है कि 'मैं' कौन हूँ? जिसका उत्तर अभी तो यही मिल रहा कि 'मैं' परमशिव की अनंत विराटता हूँ, जिसका एक अंश इस समय तो इस देह के माध्यम से व्यक्त हो रहा है। जिस दिन मुझ में विचरण कर रही भगवती स्वयं को परमशिव को समर्पित कर देगी, उस दिन मैं भी परमशिव के साथ एक हो जाऊंगा। यह उनका अनुग्रह और जीवन की पूर्णता होगी। कहीं कोई पृथकता का अवशेष नहीं रहेगा।
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जो गुरु रूप में, माता-पिता, व सभी संबंधियों के रूप में आईं, वे स्वयं भगवती ही थीं। वे ही इस जन्म से पूर्व मेरे साथ थीं, और वे ही मृत्यु के पश्चात भी मेरे साथ ही रहेंगी। उनका साथ शाश्वत है। जीवन के सारे अच्छे-बुरे अनुभवों की प्रदाता भी वे ही हैं। अंतिम बात यह कह रहा हूँ कि वे स्वयं ही मेरे और परमशिव परमात्मा के मध्य की कड़ी हैं। परमात्मा से मेरा संबंध उन्हीं के माध्यम से है। उनकी कृपा ही मुझे परमात्मा के साथ एक करेगी। और कुछ भी इस समय कहने के लिए नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२२

सनातन धर्म अभी भी जीवित क्यों है? ---

 सनातन धर्म अभी भी जीवित क्यों है? ---

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हरेक मनुष्य की चेतना में एक शाश्वत जिज्ञासा है -- सत्य को जानने की। सत्य ही परमात्मा है। दूसरे शब्दों में परमात्मा ही एक मात्र सत्य है जिसे जाने बिना मनुष्य को जीवन में संतुष्टि और तृप्ति नहीं मिलती। इस शाश्वत जिज्ञासा ने ही सनातन धर्म को जीवित रखा है। जब तक मनुष्य की चेतना में सत्य को जानने की जिज्ञासा है, तब तक सनातन धर्म अमर है, और जीवित रहेगा। सनातन धर्म तब तक रहेगा जब तक यह सृष्टि है।
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पुनर्जन्म, कर्मफल, आत्मा की शाश्वतता, और ईश्वर के अवतार -- ये सनातन धर्म के आधार हैं, जो कभी भी इस सृष्टि में समाप्त नहीं किए जा सकते, क्योंकि यह सृष्टि इन्हीं पर आधारित है।
देखिये क्या विडम्बना है!! ईसाईयायत, इस्लाम और मार्क्सवाद -- तीनों ही आपस में एक-दूसरे के शत्रु हैं, ये सदा ही आपस में लड़ते आए हैं, लेकिन हिन्दुत्व के विरोध में तीनों मिलकर एक हो जाते हैं।
सत्य को अस्थायी रूप से छिपाया तो जा सकता है, कभी नष्ट किया जा सकता।
असत्य का अंधकार कितना भी प्रबल हो, लेकिन प्रकाश के समक्ष टिक नहीं सकता।
इस समय तमोगुण की प्रधानता के कारण असत्य और अंधकार की शक्तियाँ हावी हैं। इसका निदान यही है कि हम अपने निजी जीवन में परमात्मा के प्रकाश को प्रकट करें। अन्य कोई उपाय नहीं है।
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पुनश्च: --- वर्तमान में "हिंसा" शब्द का अर्थ गलत लगाया गया है। महाभारत में विभिन्न संदर्भों में पचास से अधिक बार -- "अहिंसा परमो धर्म:" कहा गया है। यदि आप महाभारत का ठीक से स्वाध्याय करेंगे तो पायेंगे कि हिंसा का जन्म मनुष्य के लोभ और अहंकार से ही होता है। दूसरे शब्दों में लोभ और अहंकार से मुक्ति ही अहिंसा है।
"हिन्दू" शब्द का अर्थ जो मुझे समझ में आया है, वह यह है कि जो भी व्यक्ति हिंसा से दूर है, वह हिन्दू है। हिंसा -- यानि लोभ और अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही हिन्दू कहलाने का अधिकारी है।
दुर्भाग्य से इस समय ऐसा लग रहा है कि ईसाईयत से हिन्दुत्व हार रहा है। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता। ईसायत के दो ही आधार हैं -- मूल पाप की अवधारणा, और पुनरोत्थान। ये दोनों ही अवधारणाएँ काल्पनिक और अवैज्ञानिक हैं, व लोभ और भय पर आधारित हैं। इनमें कोई सत्य नहीं है। सारी अवैज्ञानिक और असत्य अवधारणाएँ एक दिन समाप्त हो जाएंगी।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२३

Monday, 17 August 2026

अब और अधिक समय मिलेगा भगवान की उपासना (भक्ति) के लिए ---

 अब और अधिक समय मिलेगा भगवान की उपासना (भक्ति) के लिए ---

माना कि चारों ओर बहुत अधिक घना अंधकार है, लेकिन मुझ निमित्त मात्र का काम तो परमात्मा को जीवन में व्यक्त कर उनका प्रकाश फैलाना ही है, और कुछ भी नहीं।
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आज शाम को कुछ देरी से मेरा लैपटॉप कामचलाऊ मरम्मत के बाद बापस आया है। सब ने एक नया डेस्कटॉप खरीदने, और इस लैपटॉप को रद्दी में डाल देने की सलाह दी है। अधिक से अधिक कुछ दिन और यह चल सकता है। इस लैपटॉप ने १३ वर्षों तक बहुत अच्छी सेवा दी है। जब तक चल रहा है, तब तक इसे ही ठोक-पीट कर चलाऊँगा। यह कैसे चल रहा है, यह देखकर तो मुझे भी आश्चर्य हो रहा है। ईश्वर की कृपा ही थी कि यह काम करना बंद हो गया। थोड़ा बहुत चल जाता है। मेरा मोबाइल एंड्रॉइड फोन भी अपना उपयोगी जीवन लगभग पूर्ण कर चुका है। इन दोनों का उपयोग कम कर दूंगा।
इससे लाभ यह होगा कि अब और अधिक समय मिलेगा भगवान की उपासना के लिए। अनावश्यक लेख नहीं लिखने पड़ेंगे। अनावश्यक संपर्क नहीं होंगे। परमात्मा के चैतन्य (ब्रह्मभाव) में स्थित रहने का निरंतर प्रयास ही मेरे लिए "उपासना" है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ अगस्त २०२२

मैं जला तो सही, पर अंधेरे को उजाला न दे सका ---

 मैं जला तो सही, पर अंधेरे को उजाला न दे सका ---

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इस लौकिक जीवन में अनेक बहुत बड़ी बड़ी भूलें मुझसे हुई हैं, जिनके दुष्परिणाम अब देखने में आ रहे हैं। लगता है यह सांसारिक जीवन एक गफ़लत और दुःस्वप्न ही था। अपनी गफ़लत को छिपाने के लिए हजारों बहाने ढूँढ़ता रहा, लेकिन मिला कुछ भी नहीं। इतना जीवन काल व्यतीत हो गया, कुछ पता ही नहीं चला। हरेक पुरानी स्मृति -- कल की सी बात लगती है।
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अब बात दूसरी है। भगवान के प्रेमसागर में मेरी हिमालय से भी बड़ी बड़ी भूलें, छोटे-मोटे कंकर-पत्थरों से अधिक नहीं हैं। वे कंकर-पत्थर वहाँ भी शोभा दे रहे हैं। इस लौकिक जीवन के संध्याकाल में भगवान ने कुछ विवेक की झलक सी दी है। उस विवेक के प्रकाश में जीवन की सारी भूलें, सारा अवशिष्ट जीवन, और अपना सम्पूर्ण अस्तित्व, परमशिव को समर्पित है। सम्पूर्ण अस्तित्व ही परमशिव है। परमशिव से पृथक अन्य कुछ भी नहीं है। हर समय स्वयं अनंत सर्वव्यापी परमशिव ही स्वयं में स्वयं का ध्यान कर रहे हैं।
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ अगस्त २०२३

सारे देवी-देवता परमात्मा की ही निरंतर उपासना करते हैं। उनकी शक्ति परमात्मा का ही अनुग्रह है। उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। फिर हम परमात्मा को छोड़कर, उनकी आराधना क्यों करते हैं?

 सारे देवी-देवता परमात्मा की ही निरंतर उपासना करते हैं। उनकी शक्ति परमात्मा का ही अनुग्रह है। उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। फिर हम परमात्मा को छोड़कर, उनकी आराधना क्यों करते हैं?

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श्रुतियों में, श्रीमद्भगवद्गीता में, और अनेक आगम ग्रन्थों में सारा मार्गदर्शन है। हमारा लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है, उससे कम कुछ भी नहीं। दिन-रात निरंतर परमात्मा का ही ध्यान करो। हम जहाँ भी हैं, परमात्मा वहीं हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, सारे संत-महात्मा भी वहीं है। हमारा अस्तित्व परमात्मा की उपस्थिती है। सदा यह भाव रखो कि मैं परमात्मा का एक उपकरण मात्र हूँ, मेरे माध्यम से परमात्मा ही स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं। मेरा कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। एकमात्र अस्तित्व परमात्मा का ही है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ अगस्त २०२३

सत्य-सनातन-धर्म की पुनःप्रतिष्ठा और वैश्वीकरण कब होगा?

  सत्य-सनातन-धर्म की पुनःप्रतिष्ठा और वैश्वीकरण कब होगा?

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(उत्तर) : जिस दिन निर्विवाद रूप से पूरा विश्व --
(१) कर्मफलों के सिद्धान्त, (२) पुनर्जन्म, और (३) आत्मा की शाश्वतता को स्वीकार कर लेगा, उस दिन से विश्व में सिर्फ सनातन-धर्म ही रहेगा। फिर ईश्वर के अवतारों पर भी सभी की आस्था होने लगेगी।
सनातन-धर्म के वर्तमान समय में तीन सबसे बड़े शत्रु हैं --
(१) पश्चिम यानि ईसाईयत का प्रभाव, (२) मार्क्सवाद और उसके प्रभाव से नास्तिकता, (३) इस्लामी जिहाद॥
इन से कैसे बचाव हो? इस विषय पर मनीषी विचार करें।
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सबसे पहिले हमें पुनर्जन्म को सत्य सिद्ध करना होगा, फिर कर्मफलों के सिद्धान्त को। आत्मा की शाश्वतता अपने आप ही लोगों के समझ में आ जाएगी।
संसार में इस समय तमोगुण सबसे अधिक व्याप्त है। उसी के कारण असत्य और अंधकार की शक्तियाँ छाई हुई हैं। जब तक तमोगुण की प्रधानता है तब तक आसुरी और पैशाचिक शक्तियों का वर्चस्व रहेगा। तमोगुण का प्रभाव कम होने पर ही मनुष्यों में विवेक जागृत होगा।
इस से अधिक लिखने का कोई लाभ नहीं है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ अगस्त २०२३

Sunday, 16 August 2026

परमात्मा के किस रूप का ध्यान करें ?

 ध्यान हमेशा परमात्मा के आदित्य-वर्ण का ही किया जाता है। यह बात भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से कही है, जिस पर तनिक भी संशय नहीं किया जा सकता। भगवान कहते हैं --

"कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥८:९॥"
अर्थात् -- जो पुरुष सर्वज्ञ, प्राचीन (पुराण), सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर, सब के धाता, अचिन्त्यरूप, सूर्य के समान प्रकाश रूप और (अविद्या) अन्धकार से परे तत्त्व का अनुस्मरण करता है॥
Whoso meditates on the Omniscient, the Ancient, more minute than the atom, yet the Ruler and Upholder of all, Unimaginable, Brilliant like the Sun, Beyond the reach of darkness;
गीता के आठवें अध्याय का दो-तीन भाष्यों की सहायता से स्वाध्याय करें, और भगवान श्रीकृष्ण के सर्वव्यापी आदित्यवर्ण का ध्यान करें। भगवान आपकी सहायता अवश्य करेंगे। यह मैं अपने निजी अनुभव से कह रहा हूँ।
ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१६ अगस्त २०२५

Saturday, 15 August 2026

सिंहावलोकन या विहंगावलोकन ---

 "ॐ ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्|

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्| यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥"
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सिंहावलोकन या विहंगावलोकन कुछ भी कहिए, जब अतीत पर दृष्टि डालता हूँ तो एक प्रश्न उठता है कि क्या यह जीवन भी यों ही व्यर्थ चला गया है? कई जन्मों पूर्व एक संकल्प किया था, जिसके पश्चात कई जन्म निकल गए, पर वह संकल्प इस जन्म में भी पूर्ण नहीं हुआ| दोष स्वयं का ही है, किसी अन्य का नहीं; पूर्व जन्मों में कोई अच्छे कर्म नहीं किए थे, इसलिए यह जन्म लेना पड़ा, और यह भी व्यर्थ ही चला गया| कुछ भी सकारात्मक कार्य करने का साहस नहीं जुटा पाया| जब तक वह संकल्प पूर्ण नहीं होगा, फिर इसी धरा पर जन्म लेना पड़ेगा| अब तो भगवान स्वयं ही करुणावश मुझे माध्यम बना कर वह संकल्प पूर्ण करेंगे, जो मेरे वश की बात नहीं है|
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आत्मा नित्य मुक्त है, किसी भी तरह का मोक्ष या मुक्ति मुझे नहीं चाहिए| मुक्त तो पहले से ही हूँ, ये सारे बंधन अनेक जन्मों में स्वयं के द्वारा ही स्वयं पर थोपे हुए हैं, जिन से मुक्त होना अब स्वयं के वश की बात नहीं है| अब तो भगवान स्वयं ही करुणावश यह सारा कार्य करेंगे| मोक्ष की कामना एक बंधन से दूसरे बंधन में जाने की कामना है, जैसे लोहे की बेड़ियों के स्थान पर सोने-चाँदी की बेड़ियाँ पहिनना| स्वर्ग से अधिक घटिया स्थान इस सृष्टि में कोई अन्य नहीं है, वहाँ ईश्वर नहीं है, सिर्फ इंद्रिय भोग ही भोग हैं| पुण्य समाप्त होने पर धक्का मारकर बापस पृथ्वी पर फेंक दिया जाता है| वैसे ही जैसे आप किसी पहाड़ी पर किसी पाँच सितारा होटल में जायें, जब तक पैसा है, होटल वाले आपका स्वागत करेंगे, पैसा समाप्त होते ही बिना सामान के धक्का मार कर बाहर फेंक देंगे, जहाँ आप को कोई भिखारी भी नहीं पूछेगा|
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एक ही बात अच्छी हुई है कि पूर्व जन्म में जो मेरे गुरु थे, उनकी सत्ता सूक्ष्म जगत में है, जहाँ से वे सूक्ष्म देह में अब भी मेरा मार्गदर्शन और रक्षा कर रहे हैं| इस जन्म में भी वे ही गुरु और मार्गदर्शक व संरक्षक हैं| पूरी शाश्वतता में वे ही गुरु व मार्गदर्शक रहेंगे| उन्होने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा, क्योंकि वे मेरे सबसे बड़े हितैषी हैं| अब पूर्व जन्म की सभी स्मृतियों को भी भुला देना चाहता हूँ| किसी भी तरह की कोई कामना अब नहीं रही है|
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इस जन्म में मेरे जो आध्यात्मिक रूप से हितैषी मित्र थे, वे सब मेरे से नाराज चल रहे हैं क्योंकि मैं उनकी अपेक्षाओं और मापदण्डों पर कभी खरा नहीं उतर पाया| वे मुझे क्षमा करें| जो प्रारब्ध में लिखा होता है, वही होता है|
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हिमालय जितनी बड़ी-बड़ी अपनी सभी कमियों को और स्वयं को गुरु महाराज के चरण-कमलों में समर्पित कर रहा हूँ| वे परमात्मा के साथ एक हैं, उनमें और परमात्मा में कोई भेद नहीं है| अब से कभी किसी कामना का जन्म ही न हो|
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"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||"
कृपा शंकर
१५ अगस्त २०२०

महर्षि अरविन्द का उत्तरपाड़ा भाषण :---

  (श्री अरविन्द द्वारा दिया हुआ यह भाषण .....एक सर्वश्रेष्ठ लेख है जो मैंने अपने पूरे जीवनकाल में पढ़ा है| प्रत्येक भारतीय को यह लेख अवश्य पढना चाहिये| इसे अधिकाधिक साझा (Share) करें| श्रीअरविन्द [१८७२--१९५०] का अलीपुर जेल से छूटने के पश्चात यह उद्बोधन उत्तरपाड़ा में "धर्म रक्षिणी सभा" के वार्षिक अधिवेशन में ३० मई १९०९ को हुआ था| इसमें उन्होंने अपने जेल-जीवन का आध्यात्मिक अनुभव सुनाया, और साथ ही देश को सच्ची राष्ट्रीयता का संदेश दिया| इसमें उन्होंने बताया है कि सच्चा हिंदू धर्म, सच्चा सनातन धर्म क्या है और आज के संसार को उसकी क्यों आवश्यकता है)|

महर्षि अरविन्द का उत्तरपाड़ा भाषण :---
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जब मुझे आपकी सभा के इस वार्षिक अधिवेशन में बोलने के लिये कहा गया, तो मैंने यही सोचा था कि आज के लिये जो विषय चुना गया है उसी पर, अर्थात् हिंदू धर्म पर कुछ कहूंगा। मैं नहीं जानता कि उस इच्छा को मैं पूरा कर सकूंगा या नहीं, क्योंकि जैसे ही मैं यहां आकर बैठा, मेरे मन में एक संदेश आया और यह संदेश आपको और सारे भारत राष्ट्र को सुनाना है। यह वाणी मुझे पहले-पहल जेल में सुनायी दी थी और उसे अपने देशवासियों को सुनाने के लिये मैं जेल से बाहर आया हूं।
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पिछली बार जब में यहां आया था उसे एक वर्ष से ऊपर हो चुका है। उस बार मैं अकेला न था, तब मेरे साथ ही बैठे थे राष्ट्रीयता के एक परम शक्तिमान् दूत। उन दिनों वे उस एकांतवास से लौटकर आये थे जहां उन्हें भगवान् ने इसलिये भेजा था कि वे अपनी कालकोठरी की शांति और निर्जनता में उस वाणी को सुन सकें जो उन्हें सुनानी थी। उस समय आप सैंकड़ों की संख्या में उन्हीं का स्वागत करने आये थे। आज वे हमसे बहुत दूर हैं, वे हमसे हजारों मील के फासले पर हैं। दूसरे लोग भी, जिन्हें मैं अपने साथ काम करते हुए पाता था, आज अनुपस्थित हैं। देश पर जो तूफान आया था उसने उन्हें दूर-दूर बिखेर दिया है। इस बार एक वर्ष का समय निर्जनवास में बिताकर आया हूं और अब बाहर आकर देखता हूं कि सब कुछ बदल गया है। जो सदा मेरे साथ बैठते थे, जो सदा मेरे काम में सहयोग दिया करते थे, आज बर्मा में कैद हैं, दूसरे उत्तर में नजरबंद होकर सड़ रहे हैं। जब मैं बाहर आया तो मैंने अपने चारों ओर देखा, जिनसे सलाह और प्रेरणा पाने का अभ्यास था उन्हें खोजा। वे मुझे नहीं मिले। इतना ही नहीं, जब मैं जेल गया था तो सारा देश वंदेमातरम् की ध्वनि से गूंज रहा था, वह एक राष्ट्र बनने की आशा से जीवंत था। यह उन करोड़ों मनुष्यों की आशा थी जो गिरी हुई दशा से अभी-अभी ऊपर उठे थे। जब मैं जेल से बाहर आया तो मैंने इस ध्वनि को सुनने की कोशिश की, किंतु इसके स्थान पर निस्तब्धता थी। देश में सन्नाटा था और लोग हक्के-बक्के से दिखायी दिये, क्योंकि जहां पहले हमारे सामने भविष्य की कल्पना से भरा ईश्वर का उज्ज्वल स्वर्ग था वहां हमारे सिर पर धूसर आकाश दिखायी दिया जिससे मानवीय वज्र और बिजली की वर्षा हो रही थी। किसी को यह न दिखायी देता था कि किस ओर चलना चाहिये, चारों ओर से यही प्रश्न उठ रहा था ''अब क्या करें? हम क्या कर सकते हैं? मुझे भी पता न था कि अब क्या किया जा सकता है। लेकिन एक बात मैं जानता था, ईश्वर की जिस महान् शक्ति ने उस ध्वनि को जगाया था, उस आशा का संचार किया था उसी शक्ति ने यह सन्नाटा भेजा है। जो ईश्वर उस कोलाहल और आंदोलन में थे, वे ही इस विश्राम और निस्तब्धता में भी हैं। ईश्वर ने इसे भेजा है ताकि राष्ट्र क्षणभर के लिये रुककर अपने अंदर खोजे और जाने कि उनकी इच्छा क्या है। इस निस्तब्धता से मैं निरुत्साहित नहीं हुआ हूं, क्योंकि कारागार में इस निस्तब्धता के साथ मेरा परिचय हो चुका है और मैं जानता हूं कि मैंने एक वर्ष की लंबी कैद के विश्राम और निस्तब्धता में ही यह पाठ पढ़ा है। जब विपिनचंद्र पाल जेल से बाहर आये तो वह एक संदेश लेकर आये थे और वह प्रेरणा से मिला हुआ संदेश था। उन्होंने यहां जो वक्तृता दी थी वह मुझे याद है। उस वक्तृता का मर्म और अभिप्राय उतना राजनीतिक नहीं था जितना धार्मिक था। उन्होंने उस समय जेल के अंदर मिली हुई अनुभूति की, हम सबके अंदर जो भगवान् हैं, राष्ट्र के अंदर जो परमेश्वर हैं उनकी बात की थी। अपने बाद के व्याख्यानों में भी उन्होंने कहा था कि इस आंदोलन में जो शक्ति काम कर रही है वह सामान्य शक्ति की अपेक्षा महान् है और इसका हेतु भी साधारण हेतु से कहीं बढ़ कर है। आज मैं भी आपसे फिर मिल रहा हूं, मैं भी जेल से बाहर आया हूं और इस बार भी आप ही, इस उत्तरपाड़ा के निवासी ही, मेरा सबसे पहले स्वागत कर रहे हैं। किसी राजनीतिक सभा में नहीं, बल्कि उस समिति की सभा में जिसका उद्देश्य है धर्म की रक्षा। जो संदेश विपिनचंद्र पाल ने बक्सर जेल में पाया था, वही भगवान् ने मुझे अलीपुर में दिया। वह ज्ञान भगवान् नेे मुझे बारह महीने के कारावास में दिन-प्रतिदिन दिया और आदेश दिया है कि अब जब मैं जेल से बाहर आ गया हूं तो आपसे उसकी बात करूं ।
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मैं जानता था कि मैं जेल से बाहर निकल आऊंगा। यह वर्षभर की नजरबंदी केवल एक वर्ष के एकांतवास और प्रशिक्षण के लिये थी। भला किसी के लिये यह कैसे संभव होता कि वह मुझे जेल में उतने दिनों से अधिक रोक रखता जितने दिन भगवान् का हेतु सिद्ध करने के लिये आवश्यक थे? भगवान् ने कहने के लिये एक संदेश दिया है और करने के लिये एक काम। मैं यह जानता था कि जब तक यह संदेश सुना नहीं दिया जाता तब तक कोई मानव शक्ति मुझे चुप नहीं कर सकती, जब तक वह काम नहीं हो जाता तब तक कोई मानव शक्ति भगवान् के यंत्र को रोक नहीं सकती, फिर वह यंत्र चाहे कितना ही दुर्बल, कितना ही कमजोर क्यों न हो। अब जब कि मैं बाहर आ गया हूं, इन चंद मिनटों में ही मुझे एक ऐसी वाणी सुझायी गयी है जिसे व्यक्त करने कीे मेरी कोई इच्छा न थी। मेरे मन में जो कु छ था उसे भगवान् ने निकालकर फेंक दिया है और मैं जो कुछ बोल रहा हूं वह एक प्रेरणा के वश होकर, बाध्य होकर बोल रहा हूं।
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जब मुझे गिरफ्तार करके जल्दी-जल्दी लालबाजार की हवालात में पहुंचाया गया तो मेरी श्रद्धा क्षणभर के लिये डिग गयी थी, क्योंकि उस समय मैं भगवान् की इच्छा के मर्म को नहीं जान पाया था। इसलिये मैं क्षणभर के लिये विचलित हो गया और अपने हृदय में भगवान् को पुकारकर कहने लगा, ''यह क्या हुआ? मेरा यह विश्वास था कि मुझे अपने देशवासियों के लिये कोई विशेष काम करना है और जब तक वह काम पूरा नहीं हो जाता तबतक तुम मेरी रक्षा करोगे। तब फिर मैं यहां क्यों हूं और वह भी इस प्रकार के अभियोग में? एक दिन बीता, दो दिन बीते, तीन दिन बीत गये, तब मेरे अंदर से एक आवाज आयी, ''ठहरो और देखो कि क्या होता है। तब मैं शांत हो गया और प्रतीक्षा करने लगा। मैं लाल बाजार थाने से अलीपुर जेल में ले जाया गया और वहां मुझे एक महीने के लिये मनुष्यों से दूर एक निर्जन कालकोठरी में रखा गया। वहां मैं अपने अंदर विद्यमान भगवान् की वाणी सुनने के लिये, यह जानने के लिये कि वे मुझसे क्या कहना चाहते हैं और यह सीखने के लिये कि मुझे क्या करना होगा, रात-दिन प्रतीक्षा करने लगा।
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इस एकांतवास में मुझे सबसे पहली अनुभूति हुई, पहली शिक्षा मिली। उस समय मुझे याद आया कि गिरफ्तारी से एक महीना या उससे भी कुछ अधिक पहले मुझे यह आदेश मिला था कि मैं अपने सारे कर्म छोड़कर एकांत में चला जाऊं और अपने अंदर खोज करूं ताकि भगवान् के साथ अधिक संपर्क में आ सकूं । मैं दुर्बल था और उस आदेश को स्वीकार न कर सका। मुझे अपना कार्य बहुत प्रिय था और हृदय में इस बात का अभिमान था कि यदि मैं न रहूं तो इस काम को धक्का पहुंचेगा, इतना ही नहीं शायद असफल और बंद भी हो जायेगा, इसलिये मुझे काम नहीं छोडऩा चाहिये। लेकिन मुझे ऐसा बोध हुआ कि वे मुझसे फिर बोले और उन्होंने कहा कि, ''जिन बंधनों को तोडऩे की शक्ति तुममें नहीं थी उन्हें तुम्हारे लिये मैंने तोड़ दिया है क्योंकि मेरी यह इच्छा नहीं है और न थी ही कि वे कार्य जारी रहें। तुम्हारे करने के लिये मैंने दूसरा काम चुना है और उसी के लिये मैं तुम्हें यहां लाया हूं ताकि मैं तुम्हें वह बात सिखा दूं जिसे तुम स्वयं नहीं सीख सके और तुम्हें अपने काम के लिये तैयार कर लूं। इसके बाद भगवान् ने मेरे हाथों में गीता रख दी। मेरे अंदर उनकी शक्ति प्रवेश कर गयी और मैं गीता की साधना करने में समर्थ हुआ। मुझे केवल बुद्धि द्वारा ही नहीं, बल्कि अनुभूति द्वारा यह जानना पड़ा कि श्री कृष्ण की अर्जुन से क्या मांग थी और वे उन लोगों से क्या मांगते हैं जो उनका कार्य करने की इच्छा रखते हैं, अर्थात् घृणा और कामना-वासना से मुक्त होना होगा, फल की इच्छा न रखकर भगवान् के लिये कर्म करना होगा, अपनी इच्छा का त्याग करना होगा और निश्चेष्ट तथा सच्चा यंत्र बनकर भगवान् के हाथों में रहना होगा, ऊंच और नीच, मित्र और शत्रु, सफलता और विफलता के प्रति समदृष्टि रखनी होगी और यह सब होते हुए भी उनके कार्य में कोई अवहेलना न आने पाये।
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मैंने यह जाना कि हिंदू धर्म का मतलब क्या है। बहुधा हम हिंदू धर्म, सनातन धर्म की बातें करते हैं, किंतु वास्तव में हममें से कम ही लोग यह जानते हैं कि यह धर्म क्या है। दूसरे धर्म मुख्य रूप से विश्वास, व्रत, दीक्षा और मान्यता को महत्त्व देते हैं, किंतु सनातन धर्म तो स्वयं जीवन है, यह इतनी विश्वास करने की चीज नहीं है जितनी जीवन में उतारने की चीज है। यही वह धर्म है जिसका लालन-पालन मानव-जाति के कल्याण के लिये प्राचीन काल से इस प्रायद्वीप के एकांतवास में होता आ रहा है। यही धर्म देने के लिये भारत उठ रहा है। भारतवर्ष, दूसरे देशों की तरह, अपने लिये ही या मजबूत होकर दूसरों को कुचलने के लिये नहीं उठ रहा। वह उठ रहा है सारे संसार पर वह सनातन ज्योति डालने के लिये जो उसे सौंपी गयी है। भारत का जीवन सदा ही मानव-जाति के लिये रहा है, उसे अपने लिये नहीं बल्कि मानव जाति के लिये महान् होना है।
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अत: भगवान् ने मुझे दूसरी वस्तु दिखायी-उन्होंने मुझे हिंदू धर्म के मूल सत्य का साक्षात्कार करा दिया। उन्होंने मेरे जेलरों के दिल को मेरी ओर मोड़ दिया, उन्होंने जेल के प्रधान अंग्रेज अधिकारी से कहा कि ''ये कालकोठरी में बहुत कष्ट पा रहे हैं, इन्हें कम-से-कम सुबह-शाम आध-आध घंटा कोठरी के बाहर टहलने की आज्ञा दे दी जाये। यह आज्ञा मिल गयी और जब मैं टहल रहा था तो भगवान् की शक्ति ने फिर मेरे अंदर प्रवेश किया। मैंने उस जेल की ओर दृष्टि डाली तो ऊंची दीवारों के अंदर बंद नहीं हूं, मुझे घेरे हुए थे वासुदेव। मैं अपनी कालकोठरी के सामने के पेड़ की शाखाओं के नीचे टहल रखा था, परंतु वहां पेड़ न था, मुझे प्रतीत हुआ कि वह वासुदेव हैं, मैंने देखा कि स्वयं श्री कृष्ण खड़े हैं और मेरे ऊपर अपनी छाया किये हुए हैं।
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मैंने अपनी कालकोठरी के सींखचों की ओर देखा, उस जाली की ओर देखा जो दरवाजे का काम कर रही थी, वहाँ भी वासुदेव दिखायी दिये। स्वयं नारायण संतरी बनकर पहरा दे रहे थे। जब मैं उन मोटे कंबलों पर लेटा जो मुझे पलंग की जगह मिले थे तो मैंने यह अनुभव किया कि मेरे सखा और प्रेमी श्री कृष्ण मुझे अपनी बाहुओं में लिये हुए हैं। मुझे उन्होंने जो गहरी दृष्टि दी थी उसका यह पहला प्रयोग था। मैंने जेल के कैदियों-चोरों, हत्यारों और बदमाशों को देखा और मुझे वासुदेव दिखायी पड़े, उन अंधेरे में पड़ी आत्माओं और बुरी तरह काम में लाये गये शरीरों में मुझे नारायण मिले। उन चोरों और डाकुओं में बहुत से ऐसे थे जिन्होंने अपनी सहानुभूति और दया के द्वारा मुझे लज्जित कर दिया, इस विपरीत परिस्थिति में मानवता विजयी हुई थी। इनमें से एक आदमी को मैंने विशेष रूप से देखा जो मुझे एक संत मालूम हुआ। वह हमारे देश का एक किसान था जो लिखना-पढऩा नहीं जानता था, जिसे डकैती के अभियोग में दस वर्ष का कठोर दंड मिला था। यह उनमें से एक व्यक्ति था जिन्हें हम वर्ग के मिथ्याभिमान में आकर 'छोटो लोक' (नीच) कहा करते हैं। फिर एक बार भगवान् मुझसे बोले, उन्होंने कहा 'अपना कुछ थोड़ा-सा काम करने के लिये मैंने तुम्हें जिनके बीच भेजा है उन लोगों को देखो। जिस जाति को मैं ऊपर उठा रहा हूँ उसका स्वरूप यही है और इसी कारण मैं उसे ऊपर उठा रहा हूँ।
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जब छोटी अदालत में मुकदमा शुरू हुआ और हम लोग मजिस्ट्रेट के सामने खड़े किये गये तो वहाँ भी मेरी अंतदृष्टि मेरे साथ थी। भगवान् ने मुझसे कहा, 'जब तुम जेल में डाले गये थे तो क्या तुम्हारे हृदय हताश नहीं हुआ था, क्या तुमने मुझे पुकारकर यह नहीं कहा था, कहाँ, तुम्हारी रक्षा कहां है? लो, अब मजिस्ट्रेट की ओर देखो, सरकारी वकील की ओर देखो। मैंने देखा कि अदालत की कुर्सी पर मजिस्ट्रेट नहीं, स्वयं वासुदेव नारायण बैठ थे। अब मैंने सरकारी वकील की ओर देखा पर वहां कोई सरकारी वकील नहीं दिखायी दिया, वहाँ तो श्री कृष्ण बैठे थे, मेरे सखा, मेरे प्रेमी वहाँ बैठे मुस्करा रहे थे। उन्होंने कहा, 'अब डरते हो? मैं सभी मनुष्यों में विद्यमान हूँ और उनके सभी कर्मों और शब्दों पर राज करता हूँ। मेरा संरक्षण अब भी तुम्हारे साथ है और तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारे विरुद्ध जो यह मुकदमा चलाया गया है उसे मेरे हाथों में सौंप दो। यह तुम्हारे लिये नहीं है। मैं तुम्हें यहाँ मुकदमें के लिये नहीं बल्कि किसी और काम के लिये लाया हूँ। यह तो मेरे काम का साधनमात्र है, इससे अधिक कुछ नहीं। इसके बाद जब सेशन जज की अदालत में विचार आरंभ हुआ तो मैं अपने वकील के लिये ऐसी बहुत-सी हिदायतें लिखने लगा कि गवाही में मेरे विरुद्ध कही गयी बातों में से कौन-सी बातें गलत हैं और किन-किन पर गवाहों से जिरह की जा सकती है। तब एक ऐसी घटना घटी जिसकी मैं आशा नहीं करता था। मेरे मुकदमें की पैरवी के लिये जो प्रबंध किया गया था वह एकाएक बदल गया और मेरी सफाई के लिये एक दूसरे ही वकील खड़े हुए। वे अप्रत्याशित रूप से आ गये- वे मेरे एक मित्र थे, किन्तु मैं नहीं जानता था कि वे आयेंगे। आप सभी ने उनका नाम सुना है, जिन्होंने मन से सभी विचार निकाल बाहर किये और इस मुकदमें के सिवा सारी वकालत बंद कर दी, जिन्होंने महीनों लगातार आधी-आधी रात तक जगकर मुझे बचाने के लिये अपना स्वास्थ्य बिगाड़ लिया- वे हैं श्री चित्तरंजन दास। जब मैंने उन्हें देखा तो मुझे संतोष हुआ, फिर भी मैं समझता था कि हिदायत लिखना जरूरी है। इसके बाद यह विचार हटा दिया गया और मेरे अंदर से आवाज आयी, 'यही आदमी है जो तुम्हारे पैरों के चारों ओर फैले जाल से तुम्हें बाहर निकालेगा। तुम इन कागजों को अलग धर दो। इन्हें तुम हिदायतें नहीं दोगे, मैं दूंगा। उस समय से इस मुकदमें के संबंध में मैंने अपनी ओर से अपने वकील से एक शब्द भी नहीं कहा, कोई हिदायत नहीं दी और यदि कभी मुझसे कोई सवाल पूछा गया तो मैंने सदा यही देखा कि मेरे उत्तर से मुकदमें को कोई मदद नहीं मिली। मैंने मुकदमा उन्हें सौंप दिया और उन्होंने पूरी तरह उसे अपने हाथों में ले लिया, और उसका परिणाम आप जानते ही हैं। मैं सदा यह जानता था कि मेरे संबंध में भगवान् की क्या इच्छा है, क्योंकि मुझे बार-बार यह वाणी सुनायी पड़ती थी, मेरे अंदर से सदा यह आवाज आया करती थी, 'मैं रास्ता दिखा रहा हूँ, इसलिये डरो मत।
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'मैं तुम्हें जिस काम के लिये जेल में लाया हूँ अपने उस काम की ओर मुड़ो और जब तुम जेल से बाहर निकलो तो यह याद रखना-कभी डरना मत, कभी हिचकिचाना मत। याद रखो, यह सब मैं कर रहा हूँ, तुम या और कोई नहीं। अत: चाहे जितने बादल घिरें, चाहे जितने खतरे और दु:ख-कष्ट आयें, कठिनाइयाँ हों, चाहे जितनी असंभवताएं आयें, कुछ भी असंभव नहीं है, कुछ भी कठिन नहीं है। मैं इस देश और इसके उत्थान में हूँ, मैं वासुदेव हूँ, मैं नारायण हूँ। जो कुछ मेरी इच्छा होगी वही होगा, दूसरों की इच्छा से नहीं। मैं जिस चीज को लाना चाहता हूँ उसे कोई मानव-शक्ति नहीं रोक सकती।
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इस बीच वे मुझे उस एकांत कालकोठरी से बाहर ले आये और मुझे उन लोगों के साथ रख दिया जिन पर मेरे साथ ही अभियोग चल रहा था। आज आपने मेरे आत्म-त्याग और देशप्रेम के बारे में बहुत कुछ कहा है। मैं जब से जेल से निकला हूँ तब से इसी प्रकार की बातें सुनता आ रहा हूँ, किन्तु ऐसी बातें सुनने से मुझे लज्जा आती है, मेरे अंदर एक तरह की वेदना होती है। क्योंकि मैं अपनी दुर्बलता जानता हूँ, मैं अपने दोष और त्रुटियों का शिकार हूँ। मैं इन बातों के बारे में पहले भी अंधा न था और जब मेरे एकांतवास में, ये सब-की-सब मेरे विरुद्ध खड़ी हो गयीं तो मैंने इनका पूरी तरह अनुभव किया। तब मुझे मालूम हुआ कि मनुष्य के नाते मैं दुर्बलताओं का एक ढेर हूँ, एक दोषभरा अपूर्ण यंत्र हूँ, मुझमें ताकत तभी आती है जब कोई उच्चतर शक्ति मेरे अंदर आ जाये। अब मैं उन युवकों के बीच में आया और मैंने देखा कि उनमें से बहुतों में एक प्रचण्ड साहस और अपने को मिटा देने की शक्ति है और उनकी तुलना में मैं कुछ भी नहीं हूँ। इनमें से एक-दो ऐसे थे जो केवल बल और चरित्र में ही मुझसे बढ़कर नहीं थे- ऐसे तो बहुत थे- बल्कि मैं जिस बुद्धि की योग्यता का अभिमान रखता था, उसमें भी बढ़े हुए थे। भगवान् ने मुझसे फिर कहा, 'यही वह युवक-दल, वह नवीन और बलवान जाति है जो मेरे आदेश से ऊपर उठ रही है। ये तुमसे अधिक बड़े हैं। तुम्हें भय किस बात का है? यदि तुम इस काम से हट जाओ या सो जाओ तो भी काम पूरा होगा। कल तुम इस काम से हटा दिये जाओ तो ये युवक तुम्हारे काम को उठा लेंगे और उसे इतने प्रभावशाली ढंग से करेंगे जैसे तुमने भी नहीं किया। तुम्हें इस देश को एक वाणी सुनाने के लिये मुझसे कुछ बल मिला है, यह वाणी इस जाति को ऊपर उठाने में सहायता देगी। यह वह दूसरी बात थी जो भगवान् ने मुझसे कही।
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इसके बाद अचानक कुछ हुआ और क्षणभर में मुझे एक कालकोठरी के एकांतवास में पहुँचा दिया गया। इस एकांतवास में मेरे अंदर क्या हुआ यह कहने की प्रेरणा नहीं हो रही, बस इतना काफी है कि वहाँ दिन-प्रतिदिन भगवान् ने अपने चमत्कार दिखाये और मुझे हिन्दू धर्म के वास्तविक सत्य का साक्षात्कार कराया। पहले मेरे अंदर अनेक प्रकार के संदेह थे। मेरा लालन-पालन इंग्लैण्ड में विदेशी भावों और सर्वथा विदेशी वातावरण में हुआ था। एक समय मैं हिन्दू धर्म की बहुत-सी बातों को मात्र कल्पना समझता था, यह समझता था कि इसमें बहुत कुछ केवल स्वप्न, भ्रम या माया है। परन्तु अब दिन-प्रतिदिन मैंने हिन्दू धर्म के सत्य को, अपने मन में, अपने प्राण में और अपने शरीर में अनुभव किया। वे मेरे लिये जीवित अनुभव हो गये और मेरे सामने ऐसी सब बातें प्रकट होने लगीं जिनके बारे में भौतिक विज्ञान कोई व्याख्या नहीं दे सकता। जब मैं पहले-पहल भगवान् के पास गया तो पूरी तरह भक्ति-भाव के साथ नहीं गया था, पूरी तरह ज्ञानी के भाव से भी नहीं गया था। बहुत दिन हुए, स्वदेशी-आंदोलन शुरू होने से पहले और मेरे सार्वजनिक काम में घुसने से कुछ वर्ष पहले बड़ौदा में मैं उनकी ओर बढ़ा था।
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उन दिनों जब मैं भगवान् की ओर बढ़ा तो मुझे उनपर जीवंत श्रद्धा न थी। उस समय मेरे अंदर अज्ञेयवादी था, नास्तिक था, संदेहवादी था और मुझे पूरी तरह विश्वास न था कि भगवान् हैं भी। मैं उनकी उपस्थिति का अनुभव नहीं करता था। फिर भी कोई चीज थी जिसने मुझे वेद के सत्य की ओर, गीता के सत्य की ओर, हिन्दूधर्म के सत्य की ओर आकर्षित किया। मुझे लगा कि इस योग में कहीं पर कोई महाशक्तिशाली सत्य अवश्य है, वेदांत पर आधारित इस धर्म में कोई परम बलशाली सत्य अवश्य है। इसलिये जब मैं योग की ओर मुड़ा और योगाभ्यास करके यह जानने का संकल्प किया कि मेरी बात सच्ची है या नहीं तो मैंने उसे इस भाव और इस प्रार्थना से शुरू किया। मैंने कहा, 'हे भगवान्, यदि तुम हो तो तुम मेरे हृदय की बात जानते हो। तुम जानते हो कि मैं मुक्ति नहीं मांगता, मैं ऐसी कोई चीज नहीं मांगता जो दूसरे मांगा करते हैं। मैं केवल इस जाति को ऊपर उठाने की शक्ति मांगता हूँ, मैं केवल यह मांगता हूँ कि मुझे इस देश के लोगों के लिये, जिनसे मैं प्यार करता हूँ, जीने और कर्म करने की आज्ञा मिले और यह प्रार्थना करता हूँ कि मैं अपना जीवन उनके लिये लगा सकूं। मैंने योगसिद्धि पाने के लिये बहुत दिनों तक प्रयास किया और अंत में किसी हद तक मुझे मिली भी, पर जिस बात के लिये मेरी बहुत अधिक इच्छा थी उसके संबंध में मुझे संतोष नहीं हुआ। तब उस जेल के, उस कालकोठरी के एकांतवास में मैंने उसके लिये फिर से प्रार्थना की। मैंने कहा, 'मुझे अपना आदेश दो, मैं नहीं जानता कि कौन-सा काम करूं और कैसे करूं। मुझे एक संदेश दो।
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इस योगयुक्त अवस्था में मुझे दो संदेश मिले। पहला यह था, 'मैंने तुम्हें एक काम सौंपा है और वह है इस जाति के उत्थान में सहायता देना। शीघ्र ही वह समय आयेगा जब तुम्हें जेल के बाहर जाना होगा, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि इस बार तुम्हें सजा हो या तुम अपना समय, औरों की तरह अपने देश के लिये कष्ट सहते हुए बिताओ। मैंने तुम्हें काम के लिये बुलाया है और यही वह आदेश है जो तुमने मांगा था। मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि जाओ और काम करो। दूसरा संदेश आया, वह इस प्रकार था, 'इस एक वर्ष के एकांतवास में तुम्हें कुछ दिखाया गया है, वह चीज दिखायी गयी है जिसके बारे में तुम्हें संदेह था, वह है हिन्दुधर्म का सत्य। इसी धर्म को मैं संसार के सामने उठा रहा हूँ, यही वह धर्म है जिसे मैंने ऋषि-मुनियों और अवतारों के द्वारा विकसित किया और पूर्ण बनाया है और अब यह धर्म अन्य जातियों में मेरा काम करने के लिये बढ़ रहा है। मैं अपनी वाणी का प्रसार करने के लिये इस जाति को उठा रहा हूँ। यही वह सनातन धर्म है जिसे तुम पहले सचमुच नहीं जानते थे, किन्तु जिसे अब मैंने तुम्हारे सामने प्रकट कर दिया है। तुम्हारे अंदर जो नास्तिकता थी, जो संदेह था उनका उत्तर दे दिया गया है, क्योंकि मैंने अंदर और बाहर स्थूल और सूक्ष्म, सभी प्रमाण दे दिये हैं और उनसे तुम्हें संतोष हो गया है। जब तुम बाहर निकलो तो सदा अपनी जाति को यही वाणी सुनाना कि वे सनातन धर्म के लिये उठ रहे हैं, वे अपने लिये नहीं बल्कि संसार के लिये उठ रहे हैं। मैं उन्हें संसार की सेवा के लिये स्वतंत्रता दे रहा हूँ। अतएव जब यह कहा जाता है कि भारतवर्ष ऊपर उठेगा तो उसका अर्थ होता है सनातन धर्म ऊपर उठेगा| जब कहा जाता है कि भारतवर्ष महान् होगा तो उसका अर्थ होता है सनातन धर्म महान् होगा। जब कहा जाता है कि भारतवर्ष बढ़ेगा और फैलेगा तो इसका अर्थ होता है सनातन धर्म बढ़ेगा और संसार पर छा जायेगा। धर्म के लिये और धर्म के द्वारा ही भारत का अस्तित्व है। धर्म की महिमा बढ़ाने का अर्थ है देश की महिमा बढ़ाना। मैंने तुम्हें दिखा दिया है कि मैं सब जगह हूँ, सभी मनुष्यों और सभी वस्तुओं में, हूँ, मैं इस आंदोलन में हूँ और केवल उन्हीं के अंदर कार्य नहीं कर रहा जो देश के लिये मेहनत कर रहे हैं बल्कि उनके अंदर भी जो उनका विरोध करते और मार्ग में रोड़े अटकाते हैं। मैं प्रत्येक व्यक्ति के अंदर काम कर रहा हूँ और मनुष्य चाहे जो कुछ सोचें या करें, पर वे मेरे हेतु की सहायता करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकते। वे भी मेरा ही काम कर रहे हैं, वे मेरे शत्रु नहीं बल्कि मेरे यंत्र हैं। तुम यह जाने बिना भी कि तुम किस ओर जा रहे हो, अपनी सारी क्रियाओं के द्वारा आगे बढ़ रहे हो। तुम करना चाहते हो कुछ और पर कर बैठते हो कुछ और। तुम एक परिणाम को लक्ष्य बनाते हो और तुम्हारे प्रयास ऐसे हो जाते हैं जो उससे भिन्न या उल्टे परिणाम लाते हैं। शक्ति का आविर्भाव हुआ है और उसने लोगों में प्रवेश किया है। मैं एक जमाने से इस उत्थान की तैयारी करता आ रहा हूँ और अब वह समय आ गया है अब मैं ही इसे पूर्णता की ओर ले जाऊंगा।
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यही वह वाणी है जो मुझे आपको सुनानी है। आपकी सभा का नाम है 'धर्मरक्षिणी सभाÓ। अस्तु, धर्म का संरक्षण, दुनिया के सामने हिन्दुधर्म का संरक्षण और उत्थान- यही कार्य हमारे सामने है। परन्तु हिन्दुधर्म क्या है? वह धर्म क्या है जिसे हम सनातन धर्म कहते हैं? वह हिन्दुधर्म इसी नाते है कि हिन्दुजाति ने इसको रखा है, क्योंकि समुद्र और हिमालय से घिरे हुए इस प्रायद्वीप के एकांतवास में यह फला-फूला है, क्योंकि इस पवित्र और प्राचीन भूमि पर इसकी युगों तक रक्षा करने का भार आर्यजाति को सौंपा गया था। परन्तु यह धर्म किसी एक देश की सीमा से घिरा नहीं है, यह संसार के किसी सीमित भाग के साथ विशेष रूप से और सदा के लिये बंधा नहीं है। जिसे हम हिन्दूधर्म कहते हैं वह वास्तव में सनातन धर्म है, क्योंकि यही वह विश्वव्यापी धर्म है जो दूसरे सभी धर्मों का आलिंगन करता है। यदि कोई धर्म विश्वव्यापी न हो तो वह सनातन भी नहीं हो सकता। कोई संकुचित धर्म, सांप्रदायिक धर्म, अनुदार धर्म कुछ काल और किसी मर्यादित हेतु के लिये ही रह सकता है। यही एक ऐसा धर्म है जो अपने अंदर सायंस के आविष्कारों और दर्शनशास्त्र के चिंतनों का पूर्वाभास देकर और उन्हें अपने अंदर मिलाकर जड़वाद पर विजय प्राप्त कर सकता है। यही एक धर्म है जो मानवजाति के दिल में यह बात बैठा देता है कि भगवान् हमारे निकट हैं, यह उन सभी साधनों को अपने अंदर ले लेता है जिनके द्वारा मनुष्य भगवान् के पास पहुँच सकते हैं। यही एक ऐसा धर्म है जो प्रत्येक क्षण, सभी धर्मों के माने हुए इस सत्य पर जोर देता है कि भगवान् हर आदमी और हर चीज में हैं तथा हम उन्हीं में चलते-फिरते हैं और उन्हीं में हम निवास करते हैं। यही एक ऐसा धर्म है जो इस सत्य को केवल समझने और उसपर विश्वास करने में ही हमारा सहायक नहीं होता बल्कि अपनी सत्ता के अंग-अलंग में इसका अनुभव करने में भी हमारी मदद करता है। यही एक धर्म है जो संसार को दिखा देता है कि संसार क्या है- वासुदेव की लीला। यही एक ऐसा धर्म है जो हमें यह बताता है कि इस लीला में हम अपनी भूमिका अच्छी-से-अच्छी तरह कैसे निभा सकते हैं, जो हमें यह दिखाता है कि इसके सूक्ष्म-से-सूक्ष्म नियम क्या हैं, इसके महान्-से-महान् विधान कौन-से हैं। यही एक ऐसा धर्म है जो जीवन की छोटी-से-छोटी बात को भी धर्म से अलग नहीं करता, जो यह जानता है कि अमरता क्या है और जिसने मृत्यु की वास्तविकता को हमारे अंदर से एकदम निकाल दिया है।
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यही वह वाणी है जो आपको सुनाने के लिये आज मेरी जबान पर रख दी गयी थी। मैं जो कुछ कहना चाहता था वह तो मुझसे अलग कर दिया गया है और जो मुझे कहने के लिये दिया गया है उससे अधिक मेरे पास कहने के लिये कुछ नहीं है। जो वाणी मेरे अंदर रख दी गयी थी केवल वही आपको सुना सकता हूँ। अब वह समाप्त हो चुकी है। पहले भी एक बार जब मेरे अंदर यही शक्ति काम कर रही थी तो मैंने आपसे कहा था कि यह आंदोलन राजनीतिक आंदोलन नहीं है और राष्ट्रीयता राजनीति नहीं, बल्कि एक धर्म है, एक विश्वास है, एक निष्ठा है। उसी बात को आज फिर मैं दोहराता हूँ, किन्तु आज मैं उसे दूसरे ही रूप में उपस्थित कर रहा हूँ। आज मैं यह नहीं कहता कि राष्ट्रीयता एक विश्वास है, एक धर्म है, एक निष्ठा हे, बल्कि मैं यह कहता हूँ कि सनातन धर्म ही हमारे लिये राष्ट्रीयता है। यह हिन्दुजाति सनातन धर्म को लेकर ही पैदा हुई है, उसी को लेकर चलती है और उसी को लेकर पनपती है। जब सनातन धर्म की हानि होती है तब इस जाति की भी अवनति होती है और यदि सनातन धर्म का विनाश संभव होता तो सनातन धर्म के साथ ही-साथ इस जाति का विनाश हो जाता। सनातन धर्म ही है राष्ट्रीयता। यही वह संदेश है जो मुझे आपको सुनाना है।

आत्मज्ञान ही स्वतन्त्रता और परमधर्म है ...

हमारा "स्व" परमात्मा, और "तंत्र" उसकी व्यवस्था है| आत्म-साक्षात्कार यानि आत्मज्ञान ही स्वतन्त्रता है, और परमात्मा से पृथकता ही परतंत्रता है| परमात्मा से पृथकता का कारण है ... राग-द्वेष, अहंकार, लोभ, भय और क्रोध; अन्यथा परमात्मा तो नित्यप्राप्त है| आत्मज्ञान का बोध स्थितप्रज्ञता में होता है| भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं ...

"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः| वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते||२:५६||"
अर्थात् दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है, जिसके मन से राग, भय, और क्रोध नष्ट हो गये हैं, वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है||
आचार्य शंकर अपने भाष्य में कहते हैं ...
दुःख तीन प्रकार के होते हैं ... "आध्यात्मिक", "आधिभौतिक" और "आधिदैविक"| इन दुःखों से जिनका मन उद्विग्न यानि क्षुभित नहीं होता उसे "अनुद्विग्नमना" कहते हैं| सुखों की प्राप्ति में जिसकी स्पृहा यानि तृष्णा नष्ट हो गयी है (ईंधन डालने से जैसे अग्नि बढ़ती है वैसे ही सुख के साथ साथ जिसकी लालसा नहीं बढ़ती) वह "विगतस्पृह" कहलाता है| राग, द्वेष और अहंकार से मुक्ति वीतरागता है| जो वीतराग है और जिसके भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, वह "वीतरागभयक्रोध" कहलाता है| ऐसे गुणोंसे युक्त जब कोई हो जाता है तब वह "स्थितधी" यानी "स्थितप्रज्ञ" और मुनि या संन्यासी कहलाता है|
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सब प्रकार के मायावी बंधनों और पाशों से मुक्त होकर ही हम स्वतंत्र हो सकते हैं| स्वतन्त्रता भीतर है, बाहर नहीं| हमारे बिना भी यह संसार चलता रहेगा| हमारे जीवन का उद्देश्य परमात्मा को उपलब्ध होना है, न कि उसकी रचना को| हमारे प्रभु किस बात से प्रसन्न होते हैं, वही महत्वपूर्ण है, न कि अन्य कुछ| आत्मा की पूर्णता के द्वारा ही बाह्य परिवेश को पूर्ण बनाया जा सकता है| परमात्मा उपयोगितावाद की कोई उपयोगी वस्तु नहीं है| हम अपना परम प्रेम परमात्मा को देंगे तो हमारी रक्षा भी होगी, और मार्गदर्शन भी प्राप्त होगा|
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हमारी कैसी स्थिति है? ... एक अस्पताल में भर्ती रोगी "स्वास्थ्य दिवस" मनाते थे| स्वस्थ होने का झंडा फहरा कर सब एक दुसरे को स्वस्थ होने का अभिनंदन और बधाई देते थे| डॉक्टर उनका उपचार नहीं कर सकते थे क्योंकि डॉक्टर स्वयं बीमार थे और स्वस्थ होने व स्वस्थ करने का नाटक करते थे| मरीजों को बिना दवा दिए ही बोलते थे कि तुम तो अब स्वस्थ हो, देखो अपना स्वस्थ होने का झंडा फहर रहा है| यही स्थिति हमारी है|
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ अगस्त २०२०