Saturday, 20 June 2026

जो साधक निरंतर परमात्मा की चेतना में रहते हैं उनका हरेक कार्य परमात्मा स्वयं करते हैं ---

जो साधक निरंतर परमात्मा की चेतना में रहते हैं उनका हरेक कार्य परमात्मा स्वयं करते हैं। परमात्मा का यथासंभव अधिकतम समय तक गहनतम ध्यान नित्य करें। आप सब से मिले प्रेम के लिये मैं सदा आपका आभारी हूँ। परमात्मा में सदा मैं आपके साथ एक हूँ। सहस्त्रारचक्र में और उससे भी ऊपर दिखाई दे रही ज्योति में -- गुरु-चरणों का ध्यान करें। उनके चरण-कमलों में निश्चित रूप से आश्रय मिलेगा। उनके चरण-कमल ही भगवान श्रीहरिः और भगवान परमशिव के चरण-कमल हैं। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर २० जून २०२५

Wednesday, 17 June 2026

आध्यात्मिक मार्ग पर हम सब की सबसे बड़ी बाधा — "लोकेषणा" है।

लोकेषणा के पश्चात अन्य भी अनेक बाधाएँ हैं, लेकिन वे लोकेषणा से बड़ी नहीं हैं। संसार में यश, प्रसिद्धि और दूसरों से प्रशंसा की चाह को ही लोकेषणा कहते हैं। यह एक मरीचिका और भटकाव है, जिससे अहंकार ही तृप्त होता है, और कुछ भी नहीं मिलता। तृप्ति -- केवल परमात्मा की प्रत्यक्ष उपस्थिती में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। सभी विषयों में अनासक्त और मौन व्यक्ति ही परम सिद्ध मुनि हो सकता है।
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कूटस्थ (कालातीत परम आत्म-चैतन्य) सूर्यमण्डल में परमात्मा और स्वयं का निरंतर ध्यान करते रहें, आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाएँगे। कहीं अन्धकार नहीं रहेगा। कूटस्थ में स्वयं की और परमात्मा की उपस्थिति गहनतम प्रेम के साथ हो। अन्य कोई भी आसक्ति व स्पृहा न रहे। ईश्वर के अतिरिक्त संसार में अन्य कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है। वे उपलब्ध हो गए तो सब कुछ मिल गया।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
१७ जून २०२६

लोकेषणा -- एक मरीचिका और भटकाव ही है

लोकेषणा (संसार में यश, प्रसिद्धि और दूसरों से प्रशंसा की चाह) -- एक मरीचिका और भटकाव ही है। इससे अहंकार ही पुष्ट होता है, कोई तृप्ति नहीं मिलती। तृप्ति - सिर्फ भगवान की उपासना में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। सभी विषयों में अनासक्त व्यक्ति ही परम सिद्ध हो सकता है।

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कूटस्थ में भगवान इसी क्षण यहीं हैं, और नित्य हैं। उनके प्रति श्रद्धा, विश्वास, परमप्रेम और अभीप्सा हो तो आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं, कहीं अन्धकार नहीं रहता। सर्वप्रथम हम भगवान को उपलब्ध हों। कूटस्थ में भगवान की उपस्थिति गहनतम प्रेम के साथ हो। अन्य कोई भी आसक्ति व स्पृहा न रहे। भगवान के अतिरिक्त संसार में अन्य कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है। भगवान मिल गए तो सब कुछ मिल गया।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ जून २०२३

Tuesday, 16 June 2026

हठयोग पर जो भी उपलब्ध साहित्य है उसमें सबसे मुख्य "घेरण्ड संहिता" है ।

 हठयोग पर जो भी उपलब्ध साहित्य है उसमें सबसे मुख्य "घेरण्ड संहिता" है| इस पर प्रामाणिक और सबसे अच्छा ज्ञान "बिहार स्कूल ऑफ योगा" मुंगेर (बिहार) के आचार्य स्वामी निरंजनानन्द ने दिया है| उन्होने घेरण्ड संहिता पर भाष्य और अन्य अनेक प्रामाणिक पुस्तकें लिखी हैं| उनके सन्यासी व अन्य शिष्य हठयोग का प्रामाणिक ज्ञान पूरे विश्व में दे रहे हैं| घेरण्ड मुनि का समय विवादास्पद है| अंग्रेज़ इतिहासकार उन्हें १७वीं शताब्दी का बताते हैं जो अविश्वसनीय है| घेरण्ड संहिता में सात अध्याय हैं जो निम्न विषयों पर प्रकाश डालते हैं .... षट्कर्म, आसन, मुद्रा, प्रत्याहार, प्राणायाम, ध्यान, और समाधि|

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भारत के एक विश्वविख्यात योगाचार्य योग के नाम पर जो भी आसन, प्राणायाम आदि जो कुछ भी सिखा रहे हैं वह घेरण्ड संहिता का ज्ञान है, जिसका श्रेय वे पातंजलि ऋषि को दे रहे हैं| यह असत्य का प्रचार है|
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इसके अतिरिक्त दो और प्रामाणिक ग्रंथ हैं .... 'शिव संहिता" और "हठयोग प्रदीपिका"| ये दोनों ग्रंथ "घेरण्ड संहिता" से भी अधिक प्राचीन हैं| ये दोनों ग्रंथ नाथ संप्रदाय के मुख्य ग्रन्थों में आते हैं| इनमें भी हठयोग का पूरा ज्ञान है| इन ग्रन्थों के आचार्य स्वयं गुरु गोरखनाथ हैं| शिवसंहिता की रचना उनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ की है और हठयोगप्रदीपिका की रचना उनके शिष्य स्वात्मारामनाथ की है। 16 जून 2020

ध्यान ---

 

"वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥१०:२२॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
(अर्थात् -- मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में वासव (इन्द्र) हूँ; मैं इन्द्रियों में मन और भूतप्राणियों में चेतना (ज्ञानशक्ति) हूँ॥)

ध्यान :--- आज्ञा चक्र में एक प्रकाश की कल्पना करें जो समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है| पूरा ब्रह्मांड उसी प्रकाश के घेरे में है| फिर यह भाव करें कि "मैं स्वयं ही वह प्रकाश हूँ, यह देह नहीं"।

"परमात्मा की पूर्ण कृपा मुझ पर है| मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व, मेरा सम्पूर्ण प्रेम परमात्मा को समर्पित है| मेरा प्रेम पूरी समष्टि में व्याप्त है| पूरी समष्टि ही मेरा प्रेम है| समस्त प्रेम मैं स्वयं हूँ| जहां भी मैं हूँ, वहीं परमात्मा हैं| परमात्मा सदा मेरे साथ हैं| मेरे से पृथक कुछ भी नहीं है| मैं यह देह नहीं, परमात्मा की सर्वव्यापकता हूँ|".
"मैं ज्योतिषांज्योति हूँ, सारे सूर्यों का सूर्य हूँ, प्रकाशों का प्रकाश हूँ| जैसे भगवान भुवन भास्कर के समक्ष अन्धकार टिक नहीं सकता वैसे ही मेरे परम प्रेम रूपी प्रकाश के समक्ष अज्ञान, असत्य और अन्धकार की शक्तियां नहीं टिक सकतीं|"
"मैं पूर्ण हूँ, सम्पूर्ण पूर्णता हूँ, परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हूँ| मेरी पूर्णता ही सच्चिदानंद है, मेरी पूर्णता ही परमेश्वर है| मैं मेरे प्रियतम प्रभु के साथ एक हूँ|"
शिवोहं शिवोहं शिव शिव शिव !! जय गुरु !! ॐ गुरु !! ॐ ॐ ॐ॥
(अब अजपा-जप की गहन साधना दीर्घकाल यानि खूब देर तक करें।)
कृपा शंकर
१६ जून २०१६

Wednesday, 10 June 2026

भगवान का भक्त कभी नष्ट नहीं होता --

 जीवन में कभी भी विपरीत परिस्थितियाँ और संकट काल अचानक ही आ सकते हैं, जिन में जीवित रहने हेतु भगवान की कृपा होना आवश्यक है। भगवान भी श्रद्धालुओं की ही रक्षा करते हैं, जो उन को अपना मन, बुद्धि, चित्त, और अहंकार समर्पित कर देते हैं। भगवान का भक्त कभी नष्ट नहीं होता --

"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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भगवान की कृपा प्राप्त करनी हो, तो किसी अधिकारी आचार्य से सीख कर साधना करनी आवश्यक है। आने वाले समय में बाढ़, चक्रवात, भूकंप आदि प्राकृतिक आपदायें आ सकती हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ सकता है, तीसरा विश्वयुद्ध आरंभ हो सकता है। ईश्वर की उपासना तो करनी ही पड़ेगी, आज नहीं तो कल। लेकिन आग लगाने पर कुआँ खोदना कितना उपयोगी होगा, उसकी आप कल्पना कर सकते हैं।
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आप सब महान आत्माओं को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१० जून २०२१

Tuesday, 9 June 2026

ब्राह्मण समाज में जागृति और एकता कैसे हो? ---

ब्राह्मण समाज में जागृति और एकता कैसे हो?

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किसी भी पौधे की जड़ों में जल न देकर उसकी पत्तियों में ही जल दिया जाये तो वह पौधा कभी भी वृक्ष नहीं बनेगा। ब्राह्मण समाज की जड़ें धर्म में बहुत गहरी जमी हुई हैं, उन जड़ों की उपेक्षा कर के वर्तमान में ब्राह्मण समाज के लगभग सारे नेता पत्तियों में ही पानी दे रहे हैं।
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ब्राह्मण एकता के नाम पर आजकल -- ब्राह्मण अधिकारियों और राजनेताओं का सार्वजनिक सम्मान किया जाता है। इससे वे अधिकारी और नेता तो अपने अहंकार को तृप्त कर के चले जाते हैं, और समाज के नेताओं के अपने मतलब हेतु अधिकारियों व नेताओं से मधुर संबंध बन जाते हैं। लेकिन इस से समाज को कुछ नहीं मिलता है।
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कभी कभी अच्छे नंबर लाने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित कर दिया जाता है। ठीक है प्रोत्साहन देना चाहिए, लेकिन उन विद्यार्थियों को भी समाज के प्रति कुछ कर्तव्य बोध होना चाहिए, अन्यथा समाज को कोई लाभ नहीं है।
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ब्राह्मण समाज की सबसे बड़ी समस्या है -- नवयुवक/नवयुवतियों में धर्मशिक्षा का अभाव। आज की पीढ़ी को अपने धर्म की शिक्षाओं का ज्ञान नहीं है। इसके लिए छुट्टियों में प्रशिक्षण वर्ग चलाये जाने चाहियें।
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(१) संस्कृत भाषा की शिक्षा बच्चों को दी जाये। बच्चों को संस्कृत का इतना ज्ञान तो हो कि वे "श्री सूक्त" और "पुरुष सूक्त" का शुद्ध उच्चारण सहित पाठ कर सकें, और इसका अर्थ भी समझा सकें।
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(२) सभी युवा किशोरों का सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार करवा कर, उन्हें वैदिक प्राणायाम, और गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाये। गायत्री जप का महत्व भी बताया जाये और विधि-विधान से संध्या कर्म भी सिखाया जाये।
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(३) भगवान से परमप्रेम (भक्ति) प्रत्येक ब्राह्मण को होना चाहिए। भगवान की भक्ति ही ब्राह्मण का मुख्य गुण है। युवकों, युवतियों व सभी जिज्ञासुओं को कोई न कोई साधना/उपासना अवश्य करनी चाहिए।
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स्वनामधान्य भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) भगवती श्रीविद्या के उपासक थे। श्रीविद्या साधना पर ही उनका ग्रंथ "सौन्दर्य लहरी" बहुत प्रसिद्ध है। इस साधना का क्रम होता है। दस महाविद्याओं में से एक किसी की भी साधना से समाज की मानसिक, बौद्धिक, आर्थिक, आध्यात्मिक -- सब तरह की दरिद्रता दूर होगी।
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जिनकी भगवान विष्णु के अवतारों में श्रद्धा है उन्हें, भगवान श्रीराम या श्रीकृष्ण की उपासना करनी चाहिए।
जिनकी श्रद्धा शिव में है उन्हें परमशिव का ध्यान करना चाहिए।
जिनकी श्रद्धा हनुमान जी में है, उन्हें हनुमान जी की उपासना करनी चाहिए।
गीता का नित्य नियमित पाठ अर्थ समझते हुए करना चाहिए।
कुल मिलाकर बात यह है कि भगवान से परमप्रेम प्रत्येक ब्राह्मण को होना चाहिए। यही एक ब्राह्मण का सबसे बड़ा गुण है। ब्राह्मण समाज समय समय पर आपस में मिलता जुलता रहेगा तो प्रेम भी बना रहेगा।
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ब्राह्मणों ने अपना धर्म छोड़ दिया इसीलिए पूरे हिन्दू जाति की दुर्दशा हो रही है। ब्राह्मण अपने धर्म पर दृढ़ रहेंगे तो पूरे हिन्दू समाज का उत्थान होगा।
सभी को सप्रेम सादर नमन!!
"ॐ नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
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कृपा शंकर
८ जून २०२२

भारत का भविष्य "धर्म-सापेक्षता" में है, 'धर्म-निरपेक्षता" में नहीं ---

 भारत का भविष्य "धर्म-सापेक्षता" में है, 'धर्म-निरपेक्षता" में नहीं। धर्म-निरपेक्षता का अर्थ है -- अधर्म-सापेक्षता। भारत की अस्मिता "सनातन-धर्म" है। भारत कोई भूमि का टुकड़ा मात्र नहीं, एक जीवंत सूक्ष्म सत्ता है। वास्तव में सनातन धर्म ही भारत है, और भारत ही सनातन धर्म है। सनातन धर्म का उत्थान ही भारत का उत्थान है, और सनातन धर्म का पतन ही भारत का पतन है। धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है।

रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ ही भारत के प्राण हैं। भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में जो आश्वासन दिया है, उसी पर आस्था और श्रद्धा-विश्वास के कारण हम जीवित हैं। अन्यथा अब तक जीवित रहने का अन्य कोई कारण नहीं है।
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४:७॥"
"परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥४:८॥"
"जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥४:९॥"
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४:११॥"
९ जून २०२५

Saturday, 6 June 2026

शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक

आज ही के दिन ६ जून १६७४ को रायगढ़ में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था जो भारतीय इतिहास की एक गौरवशाली गाथा है| महान विजयनगर साम्राज्य के बाद पहली बार भारत में स्वराज्य की स्थापना हुई| शिवाजी का राज्याभिषेक काशी के वेद-पुराण-उपनिषदों के ज्ञाता पंडित गंगाधर भट्ट द्वारा किया गया| पंडित गंगाधर भट्ट ने शिवाजी की वंशावली के विस्तृत अध्ययन के बाद यह सिद्ध किया के उनका भोंसले वंश मूलतः मेवाड़ के वीरश्रेष्ठ सिसोदिया राजवंश की ही एक शाखा है| शिवाजी मूल रूप से सिसोदिया राजपूत थे| उन के पूर्वज मेवाड़ से महाराष्ट्र जाकर बस गए थे| (नेपाल का राजवंश भी सिसोदिया राजपूत ही है). गौ-ब्राह्मण प्रतिपालक, क्षत्रिय कुलगौरव, राजाधिराज, योगीराज श्री श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की जय !

Thursday, 4 June 2026

"परम प्रेम" और "समर्पण" का स्वभाव हमें अपने "शिवत्व" का बोध कराता है .....

"परम प्रेम" और "समर्पण" का स्वभाव हमें अपने "शिवत्व" का बोध कराता है .....

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परमात्मा से पूर्ण प्रेम करो, "अनाहत नाद" या "ज्योति" के रूप में, या अपने अन्य किसी प्रियतम के रूप में साकार या निराकार, पर प्रेम करो| गीता में भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाओं का सार ही भक्ति और समर्पण है ....
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः|९:३४||"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||
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अपने भौतिक व्यक्तित्व का मोह हमें हिंसक बनाता है| भिन्नता से भेद की उत्पत्ति होती है, और भेद से भय और हिंसा उत्पन्न होती है| भयभीत प्राणी दूसरों को भी भयभीत करता है और हिंसक बन जाता है| व्यक्तित्व की दासता और मोह हमें हिंसक बना देता है| इस व्यक्तित्व की दासता से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है ..... "परमात्मा से परम-प्रेम और समर्पण"|
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परमात्मा से "पूर्ण प्रेम" और "समर्पण" हमें अपने "शिवत्व" का बोध कराता है| जब हम परमात्मा को "प्रेम" और "समर्पण" करते हैं तब वही "प्रेम" और "समर्पण" अनंत गुणा होकर हमें ही बापस मिलता है| जब हम उन के "शिवत्व" में विलीन हो जाते हैं, वह "शिवत्व" भी हमारे में विलीन हो जाता है| तब हम "जीव" नहीं, स्वयं साक्षात शिव बन जाते हैं| जहाँ कोई क्रिया-प्रतिक्रिया, मिलना-बिछुड़ना, अपेक्षा व मांग नहीं, जो बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा से भी परे है, वह असीमता, अनंतता व सम्पूर्णता हम स्वयं हैं| हमारा पृथक अस्तित्व उस परम प्रेम और परम सत्य को व्यक्त करने के लिए है| भक्ति और समर्पण द्वारा हम जीव से शिव बनें|
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ॐ तत्सत् ! शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ अप्रेल २०१९

सेक्युलरिज्म (धर्म निरपेक्षता) का जन्म कैसे हुआ ? .....

 सन १८५१ ई.में इंग्लैंड के राजा हेनरी आठवें को अपनी पत्नी को तलाक देना था जिसके लिए पॉप की अनुमति आवश्यक थी| पॉप ने वह अनुमति नहीं दी| इसलिए पॉप के आदेश को ठुकराने के लिए इंग्लेंड में धर्मनिरपेक्षता यानि सेकुलरिज्म का सिद्धांत बनाया गया जिसके अंतर्गत इंग्लैंड का राजा पॉप के आदेश को मानने केलिए बाध्य नहीं था| सेकुलर का मतलब है चर्च के आदेश को नहीं मानने वाला| हम आज उन्हीं अंग्रेजों की नक़ल कर के सेकुलर बन रहे हैं|

"यथा ब्रज गोपिकानाम्" ----

 "यथा ब्रज गोपिकानाम्" ----

कभी कभी ईश्वर से विछोह भी अच्छा है क्योंकि उसमें मिलने का आनंद समाया होता है| मिलने में वियोग की पीड़ा भी होती है|
वह स्थिति सब से अच्छी है जहाँ ना कोई मिलना है और ना कोई विछुड़ना| क्योंकि की जो मिलता और विछुड़ता है वह तो आप स्वयं ही हो| आपसे पृथक कुछ है ही नहीं|
कभी जब आप एक अति उत्तुंग पर्वत के शिखर से नीचे की गहराई में झांकते हो तो वह डरावनी गहराई भी आपमें झाँकती है| ऐसे ही जब आप नीचे से अति उच्च पर्वत को घूरते हो तो वह पर्वत भी आपको घूरता है| जिसकी आँखों में आप देखते हो वे आँखें भी आपको देखती हैं| जिससे भी आप प्रेम या घृणा करते हो उससे वैसी ही प्रतिक्रिया कई गुणा होकर आपको ही प्राप्त होती है|
वैसे ही जब आप प्रभु को प्रेम करते हो तो वह प्रेम अनंत गुणा होकर आपको ही प्राप्त होता है| वह प्रेम आप स्वयं ही हो| प्रभु में आप समर्पण करते हो तो प्रभु भी आपमें समर्पण करते हैं| जब आप उनके शिवत्व में विलीन हो जाते हो तो आप में भी वह शिवत्व विलीन हो जाता है और आप स्वयं साक्षात् शिव बन जाते हो| जहाँ ना कोई क्रिया-प्रतिक्रिया है, ना कोई मिलना-बिछुड़ना, जहाँ कोई अपेक्षा या माँग नहीं है, जो बैखरी मध्यमा पश्यन्ति और परा से भी परे है, वह असीमता, अनंतता व सम्पूर्णता आप स्वयं ही हो|
आपका पृथक अस्तित्व उस परम प्रेम और परम सत्य को व्यक्त करने के लिए ही है|
ॐ शिव | शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
झुंझुनू(राजस्थान)
03 जून 2014

Wednesday, 3 June 2026

मैं जड़-चेतन और यह सारी सृष्टि हूँ। केवल मैं हूँ। ---

मैं जड़-चेतन और यह सारी सृष्टि हूँ। केवल मैं हूँ। मैं ही परमब्रह्म परमशिव और विष्णु हूँ। मुझसे अन्य कोई या कुछ भी नहीं है।

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सृष्टिकर्ता परमात्मा से जुड़ कर ही इस सृष्टि की सबसे बड़ी सेवा हम कर सकते हैं। स्वयं में उनको निरंतर व्यक्त करें। कमर को सदा सीधी रखते हुए खेचरी/अर्ध-खेचरी/शांभवी मुद्रा में बैठें, और भ्रूमध्य की ओर अपने नेत्रों के गोलकों को स्थिर कर कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करें।
जब भी समय मिले तब गीता के १५वें अध्याय "पुरुषोत्तम योग" का स्वाध्याय करें और उसके आरंभ के ऊर्ध्वमूल वाले श्लोकों को समझते हुए तदानुसार ऊर्ध्वमूल में ही ध्यान करते हुए अपनी चेतना का अनंत में विस्तार करें।
मैं पूर्ण सत्यनिष्ठा से यह कह रहा हूँ कि गीता के स्वाध्याय से मेरे सारे संशय दूर हुए हैं, और अनेक रहस्य अनावृत हुए हैं। ज्ञान, भक्ति और कर्म -- इन तीनों विषयों को भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत अच्छी तरह समझाया है।
हमारा निवास आनंद-सिंधु के मध्य हैं, अब कभी प्यासे नहीं रहेंगे।
हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ जून २०२२

"आनन्द सिन्धु मध्य तव वासा, बिनु जाने तू मरत पियासा" ---

  "आनन्द सिन्धु मध्य तव वासा, बिनु जाने तू मरत पियासा" ---

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आज तक के इस जीवन में जितने भी संतों से मेरा सत्संग हुआ है, एक बात तो प्रायः सभी ने कही है कि मनुष्य की देह, बुद्धि, भक्ति और सत्संग लाभ पा कर भी परमात्मा का चिंतन मनन और ध्यान न करना प्रमाद यानि मृत्यु है|
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अब स्वयं के बारे में सोच कर ही विचार होता है कि मैं जीवित हूँ या मृत ?
लगता है मृत ही अधिक हूँ|
गुण गोविन्द गायो नहीं, जनम अकारथ कीन।
कहे नानक हरिः भज मना, जा विध जल की मीन॥
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क्षण क्षण बीत गये, कितने दिन-रात, महीने-वर्ष और जीवन बीत गया। माया के पीछे भागे तो -- "माया मिली न राम" -- वाली कहावत स्वयं पर ही चरितार्थ हो गयी। परमात्मा सामने है, उसका महासागर उमड़ रहा है, फिर भी उससे भेद है। मेरी इस पीड़ा को मैं ही जानता हूँ।
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"आनन्द सिन्धु मध्य तव वासा, बिनु जाने तू मरत पियासा।
धन्य हैं गोसांई बाबा तुलसीदासजी जो हम सब के लिए इतनी बड़ी बात कह गये कि तुम आनन्द के समुद्र में रह रहे हो, लेकिन बिना जाने प्यासे मर रहे हो।
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हे परमशिव, रक्षा करो। आप मेरे समक्ष हैं, फिर भी मैं उल्टी दिशा में आपसे दूर आपकी इस मृग-मरीचिका रूपी माया के पीछे भाग रहा हूँ। त्राहिमाम् त्राहिमाम् त्राहिमाम् रक्षा करो हे राम ! अपने ध्यान से मुझे विमुख मत करो | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
०३ जून २०१७

Tuesday, 2 June 2026

भगवान की भक्ति से क्या मिलेगा? --- -- (संशोधित व पुनःप्रेषित लेख) .

 भगवान की भक्ति से क्या मिलेगा? --- -- (संशोधित व पुनःप्रेषित लेख)

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इस प्रश्न का सर्वोत्तम उत्तर तो भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के ९वें अध्याय में दिया है।
इस प्रश्न के उत्तर रामचरितमानस व भागवत में भी अनेक प्रसंगों में दिये हुए हैं।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥९:२९॥"
अर्थात् - मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ॥
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लेकिन व्यावहारिक बात तो यह है कि --
"भगवान की भक्ति में सिर्फ भगवान ही मिलेंगे, भौतिक/सांसारिक दृष्टि से कुछ भी नहीं मिलेगा। जो कुछ स्वयं के पास में है, वह भी छीन लिया जाएगा। सारी विषय-वासनाएँ और कामनाएँ समाप्त हो जायेंगी, और इस दुनियाँ के भोग हमारे लायक नहीं रहेंगे।"
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जिन्हें कुछ सांसारिक सामान चाहिए वे भगवान की भक्ति नहीं करें, क्योंकि भगवान एक स्वार्थी प्रेमी हैं, वे हमारा १००% (शत-प्रतिशत) प्रेम मांगते हैं। उनके यहाँ ९९.९९% भी नहीं चलेगा। हम उन्हें अपना शत-प्रतिशत देंगे तभी वे आएंगे।
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ईसाईयों के ग्रन्थों में भी यही बात कही गई है --
"For unto every one that hath shall be given, and he shall have abundance: but from him, that hath not shall be taken away even that which he hath. (Matthew 25:29 KJV).
(दुर्भाग्य से पश्चिमी जगत ने इस बात को नहीं माना, और अपने स्वयं के ही अर्थ लगा लिए)
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झूठे वैराग्य और झूठी भक्ति का ढोंग हमें भगवान से दूर करता है। अपने शब्दों या अभिनय के द्वारा एक झूठे वैराग्य और झूठी भक्ति का प्रदर्शन -- सबसे बड़ा छल और धोखा है, जो हम स्वयं के साथ करते हैं। हम किसी को प्रभावित करने के लिए दिखावा करते हैं, यह एक बहुत बड़ा और छिपा हुआ दुःखदायी अहंकार है। किसी को प्रभावित करने से क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिर्फ अहंकार की ही तृप्ति होगी। महत्वपूर्ण हम नहीं, भगवान हैं, जो हमारे ह्रदय में हैं।
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हम अपने रूप, गुण, धन, विद्या, बल, पद, यौवन और व्यक्तित्व का भी बहुत अधिक दिखावा कर के दूसरों को हीन और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहते हैं। यह भी स्वयं को धोखा देना, और भगवान का अपमान करना है।
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वर्णाश्रम धर्म का पालन करके भी यदि प्रभु में प्रेम नहीं हुआ तो क्या लाभ?
और प्रभु में प्रेम हो गया तो वर्णाश्रम धर्म का पालन न हुआ तो क्या हानि?
आप सब में परमात्मा को नमन !!
कृपा शंकर
२ जून २०२२

कोई भी आध्यात्मिक साधना हो या कोई भी आस्था --- उसके औचित्य का एक ही मापदंड है -- "परमात्मा की अनुभूति" ---

कोई भी आध्यात्मिक साधना हो या कोई भी आस्था --- उसके औचित्य का एक ही मापदंड है -- "परमात्मा की अनुभूति"। आप किसी भी मार्ग पर चल रहे हों, यदि आपको दिव्य प्रेम, आनंद, और परमात्मा की निरंतर अनुभूति होती है तो वह मार्ग सही है; अन्यथा गलत। हमारा लक्ष्य केवल परमात्मा है।

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एक बार परमात्मा की गहनतम अनुभूति हो जाये तब न तो कोई गुरु है और न कोई शिष्य। न कोई भूतकाल है और न वर्तमान। उस समय हम कालातीत हैं। अपना सम्पूर्ण विलय परमात्मा में कर दें। जो हमें परमात्मा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे और मार्ग बताए, उस महापुरुष का स्वागत है। लेकिन किसी का भी साथ शाश्वत नहीं है। यहाँ कोई अन्य नहीं है। केवल परमात्मा ही सत्य है, हम उसके साथ एक हैं। अन्य कोई नहीं है, हम भी नहीं। कालातीत परम चेतना को ही कूटस्थ कहते हैं। हम कूटस्थ चैतन्य में रहें।
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ध्यानस्थ होते ही हमारी चेतना सूक्ष्म जगत में चली जाती है। ध्यान के जिस आसन पर हम बैठते हैं, वह हमारा राजसिंहासन है। ध्यानस्थ होने पर सूक्ष्म जगत के सारे अनंत आकाश, सारे ब्रह्मांड, सारी आकाश-गंगाएँ, सारे चाँद, तारे, नक्षत्र और सारी सृष्टि -- हमारे साथ एक हो जाती हैं। जो कुछ भी सृष्ट हुआ है, और जो कुछ भी सृष्ट होना है, वह सम्पूर्ण अस्तित्व हम हैं। हमारे से पृथक कुछ भी नहीं है। परमात्मा के प्रेम और आनंद के रूप में हम व्यक्त होते हैं। समस्त सृष्टि हमारा परिवार, और समस्त ब्रह्मांड हमारा घर है। हम अनंत असीम सर्वत्र हैं। हम और हमारे प्रभु एक हैं। ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ जून २०२६

Saturday, 30 May 2026

कुर्द जाति क्या मूल रूप से हिन्दू है?

 कुर्द जाति क्या मूल रूप से हिन्दू है? क्या ये महाराजा विक्रमादित्य के कृत-सैनिक हैं? फारसी का कुर्द शब्द क्या संस्कृत के कृत शब्द का अपभ्रंस है?

विकिपीडिया के अनुसार कुर्द (کورد) या कुर्द लोग, पश्चिम एशिया से एक ईरानी जातीय समूह है। वे कुर्दिस्तान के मूल निवासी हैं, जो दक्षिणपूर्वी तुर्की, उत्तर-पश्चिमी ईरान, उत्तरी इराक और उत्तरपूर्वी सीरिया में फैला एक भौगोलिक क्षेत्र है। इनका कोई देश नहीं है। इनके बारे में जानने की जिज्ञासा है।
पुनश्च: ---
मुझे लगता है कि महाराजा विक्रमादित्य का साम्राज्य पश्चिम में फारस, अरब और रोम तक था। उत्तर में पूरा मध्य एशिया, और पूरा शिविर (जिसे हम साइबेरिया कहते हैं उसे रूसी भाषा में "Сибирь" सिबिर कहते हैं) था। पूर्व में विएतनाम तक, और दक्षिण में मलेशिया और इन्डोनेशिया तक था।
कुछ वर्षों पूर्व ईरान में हुई एक खुदाई में महाराजा विक्रमादित्य की मूर्ति मिली थी जिसमें वे एक घोड़े पर बैठे हुए हैं, धोती पहिन रखी है, कमर में तलवार लटकी हुई है। यह समाचार मैंने कहीं पढ़ा था। यह भी पढ़ा था कि उनकी मृत्यु फारस (वर्तमान ईरान) में हुई थी। यह भी पढ़ा था कि उनके साथ जो सैनिक थे वे वही रह गये। वे कृत (सेवा निवृत) थे। समय के साथ उन्हें इस्लाम अपनाना पड़ा, और वे ही "कुर्द" कहलाये। उनमें कुछ यजीदी भी हैं। लेकिन मूल रूप से सभी हिन्दू थे।
यह अनुसंधान का विषय है, मुझे इस बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है। आप सभी को धन्यवाद॥
३१ मई २०२५

Wednesday, 20 May 2026

ब्रह्मज्ञान का अभाव इस संसार में हमारी दुर्गति का मुख्य कारण है --- .

ब्रह्मज्ञान का अभाव इस संसार में हमारी दुर्गति का मुख्य कारण है ---
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ब्रह्मज्ञान ही हमारी वास्तविक शक्ति है। ब्रह्मज्ञ होने पर असत्य और अंधकार की शक्तियाँ हमारा कुछ भी अहित नहीं कर सकतीं। हम ब्रह्ममय हों, यही समष्टि की सबसे बड़ी सेवा है।
ब्रह्मज्ञान के लिए सर्वप्रथम तो परमात्मा से प्रार्थना करें, फिर किन्हीं श्रौत्रीय (जिन्हें श्रुतियों यानि वेदों का ज्ञान हो) और ब्रहमनिष्ठ महात्मा (जिनकी पूर्ण निष्ठा ब्रह्म में हो) से मार्गदर्शन प्राप्त कर उनके सान्निध्य में उनके द्वारा बताई हुई विधि से वैदिक साधना का आरंभ करें।
यदि ऐसे आचार्य नहीं भी मिलते हैं तो दक्षिणामूर्ति रूप में भगवान शिव, और जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण तो हैं ही। उन्हें गुरु मान कर उपनिषदों व श्रीमद्भगवद्गीता में बताई हुई साधना का आरंभ करें। फिर वे लौकिक सद्गुरु की उचित व्यवस्था भी कर देंगे। लौकिक रूप से एक ब्रह्मनिष्ठ और श्रौत्रीय आचार्य ही सद्गुरु हो सकता है। अन्य कोई नहीं।
ब्रह्मज्ञान ही भूमाविद्या है। ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार ने अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को ब्रह्मज्ञान का जो उपदेश दिया था, उसका नाम उन्होने भूमा-विद्या रखा।
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भगवान विष्णु या भगवान शिव की निरंतर विस्तृत हो रही ज्योतिर्मय सर्वव्यापक अनंतता का ही कूटस्थ-चैतन्य में ध्यान करें। साधनाकाल में अपने इस नश्वर देह को भूल जाएँ। परमात्मा की ज्योतिर्मय अनंतता ही हमारा शरीर है, और हम परमात्मा के साथ एक हैं। ध्यान साधना में अकिंचन-भाव को भूल जाएँ, और सर्वदा सर्वस्व-भाव में ही स्थित रहें।
मेरुदंड सर्वदा उन्नत और ठुड्डी भूमि के सामानांतर रहे। पूर्ण खेचरी या अर्ध-खेचरी मुद्रा में ध्यानस्थ होने से पूर्व कुछ देर तक प्राणायाम करें, फिर "अजपा-जप" से आरंभ करें। तत्पश्चात मूर्धा में प्रणव मंत्र का जप करें। भगवान की कृपा फलीभूत हुई तो सारा मार्गदर्शन और साधना में सफलता भी प्राप्त हो जाएगी। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
१९ मई २०२६

Tuesday, 19 May 2026

एक-दो बातें हैं जो मुझे विचलित कर देती हैं।

 एक-दो बातें हैं जो मुझे विचलित कर देती हैं।

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पहली बात तो भाषा की है। मैं सरल से सरल हिन्दी भाषा में लिखता हूँ, इस से अधिक सरल भाषा नहीं हो सकती, फिर भी अनेक लोग मुझसे शिकायत करते हैं कि मेरी भाषा उन्हें समझ में नहीं आती। यदि समझ में नहीं आती तो भाषा का अध्ययन करो, अपना शब्द-कोष बढ़ाओ।
सड़क छाप भाषा का प्रयोग कर मैं अपना स्तर नीचा नहीं कर सकता। जो मेरी हिन्दी भाषा को नहीं समझते, उन्हें हिन्दी भाषा का ज्ञान ही नहीं है। वे मुझे नहीं पढ़ें।
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मैं जिन विषयों पर लिखता हूँ, यदि वे किसी को अच्छे नहीं लगते तो वे मुझे प्रतिबंधित (Restrict) या अवरुद्ध (Block) कर दें। मैं अपने स्वभाव के अनुकूल और आत्म-संतुष्टि के लिए लिखता हूँ, किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं।
आध्यात्म में भक्ति और वेदान्त की बातें मुझे बहुत प्रिय हैं इसलिए मैं गीता और उपनिषदों की बातें सरल से सरल भाषा में लिखता रहता हूँ। अपना स्तर इससे अधिक नीचे नहीं गिरा सकता।
विश्व के अनेक देशों की मैंने खूब यात्राएं की हैं, और विदेशों में खूब रहा हूँ। पहले उनके बारे में खूब लिखता था; अब उनके बारे में लिखना पूरी तरह बंद कर दिया है। अब लिखूँगा तो केवल आध्यात्म पर ही लिखूँगा, अन्यथा कुछ भी नहीं लिखूँगा। सभी को नमन !!
कृपा शंकर
19 मई 2024

Saturday, 16 May 2026

मैं तो फूल हूँ, मुरझा गया तो मलाल कैसा? तुम तो महक हो, तुम्हें अभी हवाओं में समाना है .....

मैं तो फूल हूँ, मुरझा गया तो मलाल कैसा?
तुम तो महक हो, तुम्हें अभी हवाओं में समाना है .....
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किसी को किसी के प्रति भी द्वेष नहीं रखना चाहिए| राग और द्वेष ये दो ही पुनर्जन्म यानि इस संसार में बारम्बार आने के कारण हैं| जिससे भी हम द्वेष रखते हैं, अगले जन्म में उसी के घर जन्म लेना पड़ता है| जिस भी परिस्थिति और वातावरण से हमें द्वेष हैं वह वातावरण और परिस्थिति हमें दुबारा मिलती है| बुराई का प्रतिकार करो, युद्धभूमि में शत्रु का भी संहार करो पर ह्रदय में घृणा बिलकुल भी ना हो| परमात्मा को कर्ता बनाकर सब कार्य करो| कर्तव्य निभाते हुए भी अकर्ता बने रहो| सारे कार्य परमात्मा को समर्पित कर दो, फल की अपेक्षा या कामना मत करो|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ मई २०१९

अपने दिन का आरंभ भगवान के ध्यान से कीजिए ---

 अपने दिन का आरंभ भगवान के ध्यान से कीजिए। वैसे तो पूरी गीता ही योग शास्त्र है, लेकिन उसके १५ वें अध्याय "पुरुषोत्तम योग" के आरंभिक ६ श्लोकों में योग-साधना के सारे सूत्र समाहित हैं। लेकिन वे भगवान की कृपा से ही समझ में आ सकते हैं। उन्हें बौद्धिक रूप से समझने मात्र का ही नहीं, निज जीवन में अवतरित कीजिए।

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मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह सबसे पहिले दूसरों की कमी देखता है। मेरे में लाख कमियाँ होंगी, लेकिन उनसे किसी अन्य की कोई हानि नहीं होगी, अतः मेरी कमियों की चिंता छोड़ दें, उनके लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ, कोई अन्य नहीं। अपनी स्वयं की कमियों को दूर करने का प्रयास करें। मेरे में लाखों कमियाँ हैं, लेकिन मैं हर समय ईश्वर की चेतना में रहता हूँ, यही मेरा एकमात्र गुण है। मैं स्वयं को सदा ईश्वर के सन्मुख पाता हूँ। मेरी बुराई करने से मेरी बुराइयों के अतिरिक्त किसी को कुछ भी नहीं मिलेगा। यदि देखना है तो ईश्वर में स्वयं को देखो।
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भगवान कहते हैं --
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥"
"न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥१५:३॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
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अपने भाष्य में आचार्य शंकर कहते हैं कि "संसार से विरक्त हुए पुरुष को ही भगवान का तत्त्व जानने का अधिकार है, अन्य को नहीं"। उनका युग दूसरा था। उस समय समाज में इतने अभाव और कष्ट नहीं थे, जितने अब हैं। इसलिए परमात्मा की कृपा भी इस युग में शीघ्र ही हो जाती है।
१६ मई २०२३

श्रीविद्या, अद्वैत-वेदान्त, और पुरुषोत्तम-योग ---

 श्रीविद्या, अद्वैत-वेदान्त, और पुरुषोत्तम-योग ---

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दण्डीस्वामी महात्माओं के सत्संग में उनके श्रीमुख से सुना है कि "श्रीविद्या" की दीक्षा अंतिम दीक्षा होती है, उसके पश्चात कोई अन्य दीक्षा नहीं होती। आचार्य शंकर "श्रीविद्या" के उपासक थे। उन्होने इस पर "सौन्दर्य लहरी" नामक ग्रंथ भी लिखा है। उन्हे अद्वैत-वेदान्त दर्शन का आचार्य कहा जाता है जो गलत है। अद्वैत वेदान्त दर्शन के आचार्य तो ऋषि गौड़पाद थे जो आचार्य गोविंद भगवत्पाद के गुरु थे। उन्होंने १२ मंत्रों के अथर्ववेदीय "मांडूक्य उपनिषद" की व्याख्या अपने २१५ मंत्रों के ग्रंथ "माण्डूक्यकारिका" में की है। अद्वैत वेदान्त दर्शन का यह सर्वोच्च प्रामाणिक ग्रंथ है। इसमें जागृत स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं को मिथ्या मानकर आत्मा की तुरीयअवस्था को सर्वोच्च सत्य बताया गया है।
अपने परम गुरु ऋषि गौड़पाद को सम्मान देते हुए "मांडूक्यकारिका" पर आचार्य शंकर ने सबसे पहिला भाष्य लिखा था। तत्पश्चात अन्य भाष्यों की रचना उनसे हुई।
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पुरुषोत्तम योग --- कर्ताभाव से मुक्त होने पर "पुरुषोत्तम-योग" ही सर्वोच्च योग है, जो श्रीमद्भगवद्गीता का सार है। उससे उच्चतर या श्रेष्ठतर कोई अन्य योग नहीं है। लेकिन इसका अभ्यास वे ही कर पाते हैं जो कर्ताभाव से मुक्त होते हैं। जब तक कर्ताभाव है, तब तक किसी भी परिस्थिति में यह योग सिद्ध नहीं हो सकता। यह क्रियायोग का अगला भाग है। यह योग भगवान श्रीकृष्ण की परमकृपा से ही समझ में आ सकता है और वे ही इसमें एकमात्र कर्ता होते हैं। मुझे भी इसका ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण की परमकृपा से ही हुआ है। उनकी कृपा होने पर यह अपने आप ही समझ में आ जाता है। भगवान कहते हैं --
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥"
"न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥१५:३॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
ॐ तत् सत् ॥
कृपा शंकर
१६ मई २०२६

Wednesday, 13 May 2026

सीता नवमी की शुभ कामनाएँ ---

 सीता नवमी की शुभ कामनाएँ ---

"उद्भव स्थिति संहार कारिणीं क्लेश हारिणीम्| सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं राम वल्लभाम्||"
आज वैशाख शुक्ल नवमी को सीतानवमी है जिसे "जानकी नवमी" भी कहते हैं| आज ही के दिन माँ सीता का प्राकट्य हुआ था| आज ही के दिन पुष्य नक्षत्र में राजा जनक ने संतान प्राप्ति की कामना से यज्ञ की भूमि तैयार करने के लिए भूमि जोती थी और उसी समय उन्हें पृथ्वी में दबी हुई एक बालिका मिली थी| जोती हुई भूमि को तथा हल की नोक को सीता कहते हैं| यही वजह थी कि उनका नाम सीता रखा गया| यह स्थान बिहार के सीतामढी जिले में पुनौरा धाम कहलाता है|
"जनकसुता जगजननी जानकी| अतिसय प्रिय करुणानिधान की||
ताके जुग पदकमल मनावउं| जासु कृपा निर्मल मति पावउँ||" १३ मई २०१९

Monday, 11 May 2026

जिसने मुझे मेरे होने का बोध कराया, वे ही मेरे परमात्मा हैं, और वे ही यह "मैं" हूँ ---

 जिसने मुझे मेरे होने का बोध कराया, वे ही मेरे परमात्मा हैं, और वे ही यह "मैं" हूँ। मैं यह देह नहीं, मेरे प्रियतम, सर्वव्यापी मेरे प्रभु के साथ एक हूँ।

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कभी एकांत में ब्रह्ममुहूर्त के समय बिलकुल अकेले में ध्यान करें। सहस्त्रारचक्र पर ओंकार का मानसिक जप करते हुए इस भौतिक देह से बाहर आ जाएँ। शरीर की ओर न देखें। शरीर से बाहर रहते हुए ही खूब देर तक ध्यान करें, तभी परमशिव की अनुभूति होगी। जब आनंद आ जाये, जब तृप्ति हो जाये, तब बापस इस शरीर में लौट आओ। .
यह भाव हर समय बना रहे कि भगवान निरंतर हमारे साथ हैं| वे एक पल के लिए भी हमारे से दूर नहीं हो सकते| यह अपने आप में ही एक बहुत बड़ी साधना है| भगवान हैं, यहीं पर है, सर्वत्र हैं, इसी समय हैं, सर्वदा हैं, वे ही सब कुछ हैं, और सब कुछ वे ही हैं| वे ही हमारे हृदय में धडक रहे हैं, वे ही इन नासिकाओं से सांसें ले रहे हैं, इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, इन हाथों से वे ही हर कार्य कर रहे हैं, इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, इस मन और बुद्धि से वे ही सोच रहे हैं, हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व वे ही हैं| सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि वे ही हैं| वे परम विराट और अनंत हैं| हम तो निमित्त मात्र, उन के एक उपकरण मात्र हैं| भगवान स्वयं ही हमें माध्यम बना कर सारा कार्य कर रहे हैं| कर्ता हम नहीं, स्वयं भगवान हैं|
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सारी महिमा भगवान की है| भगवान ने जहाँ भी रखा है और जो भी दायित्व दिया है उसे हम नहीं, स्वयं भगवान ही कर रहे हैं| वे ही जगन्माता हैं, वे ही परमपुरुष हैं| हम उन के साथ एक हैं| कहीं कोई भेद नहीं है| ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ मई २०२०

सनातन-धर्म ही भारत राष्ट्र का सत्व, मर्म, मूलाधार और प्राण है।

 सनातन-धर्म ही भारत राष्ट्र का सत्व, मर्म, मूलाधार और प्राण है। सनातन-धर्म के बिना भारत का कोई अस्तित्व नहीं है। सनातन-धर्म ही इस सम्पूर्ण सृष्टि का भविष्य है। सनातन-धर्म की निश्चित रूप से पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा।

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हम सब जो भी आध्यात्मिक साधना करते हैं, उस से सनातन-धर्म की रक्षा होती है। जीवन की सत्य, सनातन और सर्वोत्कृष्ट अभिव्यक्ति धर्म है, और यह सनातन-धर्म ही हमारी रक्षा करेगा। हमें भी उसकी रक्षा करनी होगी।
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हम सनातन काल से ही सदा वीर, तेजस्वी और पराक्रमी रहे हैं। हमारा लक्ष्य - परमात्मा है। सनातन-धर्म की रक्षा हेतु भारत को एक हिन्दू-राष्ट्र बनाना अपरिहार्य है।
ॐ तत्सत् !! जय हिन्दू राष्ट्र !! 🙏🌹🕉🕉🕉🌹🙏
कृपा शंकर
११ मई २०२२

Sunday, 10 May 2026

हम अपने जीवन में सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं ?

 हम अपने जीवन में सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं ?

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देश, धर्म, समाज, राष्ट्र, मानवता और पूरी सृष्टि की सेवा में विषम से विषम परिस्थितियों में हम अपने जीवन में सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं ? यह प्रश्न सदा मेरे चैतन्य में रहा है| इसके समाधान हेतु अध्ययन भी खूब किया, अनेक ऐसी संस्थाओं से भी जुडा रहा जो समाज-सेवा का कार्य करती हैं| अनेक धार्मिक संस्थाओं से भी जुड़ा पर कहीं भी संतुष्टि नहीं मिली| कई तरह की साधनाएँ भी कीं, अनेक तथाकथित धार्मिक लोगों से भी मिला पर निराशा ही हाथ लगी| धर्म और राष्ट्र से स्वाभाविक रूप से खूब प्रेम रहा है| धर्म के ह्रास और राष्ट्र के पतन से भी बहुत व्यथा हुई है| सदा यही जानने का प्रयास किया कि जो हो गया सो तो हो गया उसे तों बदल नहीं सकते पर इसी क्षण से क्या किया जा सकता है जो जीवन मे सर्वश्रेष्ठ हो और सबके हित में हो|
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ध्यान-साधना में विस्तार की अनुभूतियों ने यह तो स्पष्ट कर दिया कि मैं यह शरीर नहीं हूँ| ईश्वर के दिव्य प्रेम, आनंद और उसकी झलक अनेक बार मिली| यह अनुभूति भी होती रहती है कि स्वयं के अस्तित्व की एक उच्चतर प्रकृति तो एक विराट ज्योतिर्मय चैतन्य को पाने के लिए अभीप्सित है पर एक निम्न प्रकृति बापस नीचे कि भौतिक, प्राणिक और मानसिक चेतना की ओर खींच रही है| आत्मा की अभीप्सा तो इतनी तीब्र है वह परमात्मा के बिना नहीं रह सकती पर निम्न प्रकृति उस ओर एक कदम भी नहीं बढ़ने देती|
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यह भी जीवन मे स्पष्ट हो गया कि उस परम तत्व को पाना ही सबसे बड़ी सेवा हो सकती है जो की जा सकती है| गहन ध्यान में मैं यह शरीर नहीं रहता बल्कि मेरी चेतना समस्त अस्तित्व से जुड़ जाती है| यह स्पष्ट अनुभूत होता रहता है कि हर श्वाश के साथ मैं उस चेतना से एकाकार हो रहा हूँ और हर निःश्वाश के साथ वह चेतना अवतरित होकर समस्त सृष्टि को ज्योतिर्मय बना रही है| उसी स्थिति मे बना रहना चाहता हूँ पर निम्न प्रकृति फिर नीचे खींच लाती है| ईश्वर से प्रार्थनाओं के उत्तर मे जो अनुभूतियाँ मुझे हुई उन्हें व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ|
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सबसे पहिले तों यह स्पष्ट किया गया गया है कि जो भी साधना हम करते हैं वह स्वयं के लिए नहीं बल्कि भगवान के लिए है| उसका उद्देश्य सिर्फ उनकी इच्छा को कार्यान्वित करना है| मोक्ष की कामना सबसे बड़ा बंधन है| उसकी कोई आवश्यकता नहीं है| आत्मा तों नित्य मुक्त है| बंधन केवल भ्रम हैं| ईश्वर को पूर्ण समर्पण करणा होगा| सारी कामना, वासना, माँगें, राय और विचार सब उसे समर्पित करने होंगे तभी वह स्वयं सारी जिम्मेदारी ले लेगा| कर्म-फल ही नहीं कर्म भी उसे समर्पित करने होंगे| समूचे ह्रदय और शक्ति के साथ स्वयं को उसके हाथों मे सौंप देना होगा| कर्ता ही नहीं दृष्टा भी उसे ही बनाना होगा, तभी वह सारी कठिनाइयों और संकटों से पार करेगा| सारे कर्म तो स्वयं उनकी शक्ति ही करती है और उन्हें ही अर्पित करती हैं| किसी भी तरह का सात्विक अहंकार नहीं रखना है| इससे अधिक व्यक्त करने की मेरी क्षमता नहीं है|
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सार की बात जिससे अधिक व्यक्त करना मेरी क्षमता से परे है वह यह कि स्वयं को ईश्वर का एक उपकरण मात्र बनाकर उसके हाथ मे सौंप देना है| फिर वो जो भी करेगा वही सर्वश्रेष्ठ होगा| यही सबसे बड़ा कर्तव्य और सबसे बड़ी सेवा है|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० मई २०१२

भगवान एक छोटे और भोले-भाले बालक की तरह ही लगते हैं। पता नहीं वे इतनी बड़ी सृष्टि कैसे चला लेते हैं ?

 भगवान एक छोटे और भोले-भाले बालक की तरह ही लगते हैं| पता नहीं, वे इतनी बड़ी सृष्टि कैसे चला लेते हैं? उनको डांट भी दो तो वे बुरा नहीं मानते, और लौट कर फिर बापस हँसते हुए आ जाते हैं| उन पर तरस भी आता है और उन से पूरा प्रेम भी बना रहता है| भाव जगत में वे हर बात का उत्तर भी देते हैं| कम से कम मुझे तो उनसे पूरी संतुष्टि है| एक बड़े काम की रहस्यमय बात भी उन्होने आज बताई है| उनके सर्वव्यापी ब्रह्मरूप से तो मुझे भाव जगत में उनका बालरूप ही अधिक अच्छा लगता है| भगवान उसी रूप में अच्छे लगते हैं जिनसे मित्रतावश लड़ाई-झगड़ा भी कर सकें, और जिन के साथ खेल भी सकें| उनके साथ एकत्व नहीं, उनका मित्र रूप चाहिए| ब्रह्मभाव में तो कभी भी स्थित हो सकते हैं पर उन का मित्रभाव बड़ा दुर्लभ है| आगे अब जैसी उनकी इच्छा॥ ११ मई २०२१

भगवती छिन्नमस्ता ---

 भगवती छिन्नमस्ता ---

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आज पता नहीं क्यों भगवती छिन्नमस्ता अपनी परम कृपा करते हुए मुझे बार-बार याद आ रही हैं। मेरी चेतना में वे ही छाई हुई हैं। लगता है इसके पीछे कोई न कोई रहस्य है। मैं तो उनका बालक हूँ, वे जो भी काम मुझ अकिंचन से लेना चाहें वह लें, मैं तो एक निमित्त मात्र हूँ। उन का विग्रह बड़ा ही आकर्षक और प्रिय है, जिसे समझने वाले ही समझते हैं। वे स्वयं ही अपने आप आकर मुझ अकिंचन पर अपनी कृपा वर्षा कर रही हैं। उन की महिमा अपार है, जिसका वर्णन करने की सामर्थ्य मुझ अकिंचन में नहीं है। फिर भी अपनी अति अल्प और अति सीमित बुद्धि से प्रयास करता हूँ। कोई त्रुटि हो तो भगवती मुझे क्षमा करें। हे भगवती, तुम्हारी जय हो!!
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भगवती छिन्नमस्ता ने कामदेव और उनकी कामासक्ता धर्मपत्नी रति को एक बड़े पद्म (कमल के फूल) में लिटा रखा है, और दंडायमान होकर उन पर वीर-मुद्रा में खड़ी हैं। भगवती के देह की प्रभा करोड़ों सूर्यों के समान है, लेकिन वे परम मंगलमयी हैं। जो वीर साधक वासनाओं पर विजय पा सकता है, वह ही भगवती की साधना कर सकता है। भगवती के साधक के आसपास किसी तरह की कोई सांसारिक वासना आ भी नहीं सकती, क्योंकि वे परम वैराग्य प्रदान करती हैं।
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वे दिगंबरा हैं, दशों-दिशाएँ उनके वस्त्र हैं। वे सर्वव्यापी हैं। उनके मस्तक में सर्पाबद्ध मणि है, तीन नेत्र हैं और वक्ष स्थल पर कमल की माला है। उनके देह की कान्ति जावा पुष्प की तरह रक्तवर्णा है। उनके दाहिने हाथ में खड़ग है, जिस से उन्होने अपना स्वयं का सिर काट कर बाएँ हाथ में ले रखा है, जिस का मुंह ऊपर की ओर है। अपने साधक का सारा अहंकार भी वे इसी तरह नष्ट कर के उसकी चेतना को ऊर्ध्वमुखी कर देती हैं। वे वेदान्त की मूर्ति हैं।
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उनके धड़ से शोणित की तीन धाराएँ निकल रही हैं। बीच की रुधिर धारा ज्ञान की धारा है, जो सुषुम्ना नाड़ी में जागृत कुंडलिनी महाशक्ति की प्रतीक है। अहंभाव से मुक्त होने पर ही कुंडलिनी, आज्ञाचक्र का भेदन कर सहस्त्रार में प्रवेश करती है। इस ज्ञानधारा का पान वे स्वयं कर रही हैं। यह बताता है कि अपने साधक को वे परमशिव भाव में स्थित कर ही देती हैं।
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बाईं ओर से निकलती हुई रुधिर की धारा, बल की धारा है, जो खंग-खप्पर धारिणी, मायारूपी, कृष्णवर्णा, अति बलशाली, अज्ञसेविका सखी डाकिनी महाशक्ति के मुँह में गिर रही है जो प्रलय काल के समान सम्पूर्ण जगत् का भक्षण करने में समर्थ है, लेकिन ज्ञानशून्य है। इसके तीनों नेत्र बिजली के समान चंचल हैं, हृदय में सर्प विराजमान है, और अत्यधिक भयानक स्वरूप है।
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दाहिनी ओर से निकलती रक्त की धारा क्रिया रूपी है, जो देवी के दाहिने भाग में खड़ी श्वेतवर्णा, खुले केश, कैंची और खप्पर धारण किये, विद्या-साधिका वर्णिनी महाशक्ति के मुँह में गिरती है। यह सखी बड़े उच्च स्तर की साधिका है, जिनके मस्तक में नागमणि सुशोभित है।
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काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी व कमला --- इन देवियों को दस महाविद्या कहा जाता हैं। इनका संबंध भगवान विष्णु के दस अवतारों से हैं। जैसे भगवान श्रीराम की शक्ति तारा है, भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति काली है, वैसे ही भगवान नृसिंह की शक्ति छिन्नमस्ता है। भगवती छिन्नमस्ता और भगवान नृसिंह के बीजमंत्र भी एक हैं।
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जहाँ तक मुझे पता है, भगवती छिन्नमस्ता के मुख्यतः दो ही मंदिर भारत में हैं -- एक तो झारखंड में रामगढ़ के पास राजरप्पा में है, दूसरा हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले का प्रसिद्ध चिंत्यपूर्णी मंदिर है।
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दसों महाविद्याओं की उत्पत्ति पंचप्राणों (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान) से होती है। पंचप्राणों के पाँच सौम्य और पाँच उग्र रूप ही दस महाविद्याएँ हैं| ये पंचप्राण ही गणपति गणेश जी के गण हैं, जिनके अधिपती ओंकार रूप में गणपति गणेश जी स्वयं हैं।
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तिब्बत का वज्रयान बौद्धमत -- भगवती छिन्नमस्ता की ही साधना है| वज्रयान का साधना मंत्र है --- "ॐ मणिपद्मे हुं"। "ॐ" -- तो परमात्मा का वाचक है। "हुं" -- भगवती छिन्नमस्ता का बीज मंत्र है। "मणिपद्मे" का अर्थ है --- जो देवी, मणिपुर चक्र के पद्म में निवास करती हैं। अतः "ॐ मणिपद्मे हुं" का अर्थ हुआ -- मैं मणिपुर चक्र के पद्म में स्थित छिन्नमस्ता देवी को नमन करता हूँ। मणिपुर पद्म में ही उनका निवास है। भगवती छिन्नमस्ता सुषुम्ना नाड़ी की उपनाड़ी "वज्रा" में विचरण करती हैं, इसलिए उनके अनुयायी तिब्बत के लामाओं का मत "वज्रयान" कहलाता है। वज्रयान मत के लामा चिंत्यपूर्णि मंदिर में आराधना के लिए खूब आते हैं।
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सुषुम्ना नाड़ी में चित्रा, वज्रा, और ब्राह्मी उपनाड़ियों का रहस्य यह है कि कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होकर यदि सुषुम्ना की उपनाड़ी ब्राह्मी में प्रवेश करती हैं तो ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है, वज्रा में सारी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, और चित्रा में ब्रह्मज्ञान और सिद्धियों के अतिरिक्त अन्य सब कुछ प्राप्त हो जाता है। यह एक गोपनीय विद्या है जिसकी चर्चा सार्वजनिक रूप से करने का निषेध है।
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गुरु गोरखनाथ ने सारी सिद्धियाँ भगवती छिन्नमस्ता से प्राप्त की थीं। अपने एक ग्रंथ (गोरक्ष-पद्धति या गोरक्ष संहिता) )के द्वितीय अध्याय के आरंभ में गुरु गोरखनाथ ने माँ छिन्नमस्ता की बड़ी सुंदर स्तुति लिखी है। छिन्नमस्ता की साधना वैदिक काल से ही है। वैदिक काल में इस साधना का नाम दूसरा था। कभी विस्तार से लिखने कि आज्ञा मिली तब ही और लिख पाऊँगा, अभी तो इतना ही लिखने का आदेश है। ॐ तत्सत् !!
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मैं भगवती छिन्नमस्ता को बारंबार प्रणाम करता हूँ, जिनकी परम कृपा मुझे परमशिव भाव में स्थित कर रही है। भगवती की परम कृपा बनी रहे, और अन्य कुछ भी नहीं चाहिए।
"ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवैरोचनीये हुं हुं फट् स्वाहा॥"
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कृपा शंकर
१० मई २०२१
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संलग्न चित्र इंटरनेट की एक वेबसाइट से साभार लिया है, जिन्हें धन्यवाद।