जातिवाद वेद विरुद्ध है
Thursday, 23 April 2026
जातिवाद वेद विरुद्ध है ---
जातिगत एकता की बात ही वेदविरुद्ध है| जो वेदविरुद्ध है वह हमें कभी भी स्वीकार नहीं होना चाहिए| श्रुति भगवती ब्रह्म से एकत्व सिखाती है, वहाँ कोई जाति की बात नहीं है| एकस्तथा सर्व भूतान्तरात्मा, अर्थात सब प्राणियों में एक ही आत्मा छिपा हुआ है| प्रत्यगात्मा यानि ब्रह्म में एकत्व है| जातिगत एकता की बात करने वाले अज्ञान और माया के वशीभूत हैं|
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जो लोग जातिगत एकता की बातें करते हैं, मैं आध्यात्मिक रूप से उनका समर्थन नहीं करता हूँ| पर सामाजिक रूप से कभी कभी जातिगत एकता की बातें करना मेरी विवशता यानि मज़बूरी है क्योंकि भारत की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में अनारक्षित जातियों के विरुद्ध राजनीतिक अन्याय बहुत अधिक है|
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"जाति हमारी ब्रह्म है, माता पिता हैं राम|
गृह हमारा शुन्य है, अनहद में विश्राम||"
हमारी जाति "अच्युत" है| अर्थात् जो भगवान की जाति है, वह ही हमारी जाति है| ब्रह्म ही सत्य है और संसार मिथ्या है| अतः ब्रह्म से एकत्व ही सच्चा एकत्व है, इन सांसारिक जातियों से नहीं|
कृपा शंकर
२३ अप्रेल २०१९
२४ अप्रेल को सभी श्री अरविन्द आश्रमों में एक उत्सव मनाया जाता है ---
24अप्रेल को सभी श्री अरविन्द आश्रमों में एक उत्सव मनाया जाता है| वह है श्री माँ का अंतिम रूप से श्रीअरविन्द आश्रम पोंडिचेरी में स्थायी आगमन का दिन| सर्वप्रथम श्री माँ 1914 में आई थीं पर अंतिम व स्थाई रूप से 24 अप्रेल 1920 को आ कर पोंडिचेरी में बस गईं|
.24 नवम्बर 1926 को श्रीअरविन्द ने भगवान श्रीकृष्ण का पूर्ण साक्षात्कार किया और उसके पश्चात् श्री माँ को आश्रम का भार सौंप कर एकांत साधना में लीन हो गए| वर्ष में सिर्फ चार बार ही वे अपने शिष्यों को दर्शन देते थे| इन चार दिनों को श्री अरविन्द और श्री माँ एक कमरे में कुर्सी पर बैठ जाते और उनके शिष्य क्रमबद्ध होकर शांति से उनके सामने से पुष्प अर्पित करते हुए प्रणाम कर के निकल जाते|
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(1) 15 अगस्त 1872 को श्री अरविन्द का कोलकाता में जन्म हुआ और सात वर्ष की आयु में ही उनके माँ-बाप ने उन्हें लन्दन भेज दिया ताकि कोई भी भारतीय हिन्दू संस्कार उनमें न पड़े| उनके माँ-बाप ने उनको न तो अपनी मातृभाषा सिखाई और न कोई हिन्दू संस्कार दिए| वे चाहते थे कि उनका बालक पक्का अँगरेज़ बने|
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(2) 21 फरवरी 1878 को श्री माँ का पेरिस फ़्रांस में जन्म हुआ| उनके पिता तुर्क (Turk) मूल के थे और माँ मिश्र (Egypt) मूल कीं| उनका नाम रखा गया #मीरा अल्फासा| यह एक मुस्लिम नाम है|
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(3) 24 अप्रेल1920 को श्री माँ का पोंडिचेरी में अंतिम आगमन|
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(4) 24 नवम्बर 1926 सिद्धि दिवस|
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(* 'मीरा' मूल रूप से मध्य एशिया का एक सामान्य मुस्लिम नाम है| पूर्व सोवियत संघ के युक्रेन गणराज्य में मेरा घनिष्ठ परिचय मीरा नाम की एक अति विदूषी तातार मुस्लिम महिला से था| वह दस वर्ष तक चीन में राजनीतिक बन्दी भी रह चुकी थी| उसकी एक सम्बन्धी लडकी का नाम भी 'मीरा' था जिसे हिंदी भाषा और भारतीय नृत्य भी आते थे| कई वर्षों तक उसका मेरे साथ पत्राचार था|)
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इस लेख को लिखने का उद्देश्य 24 अप्रेल को श्री माँ को प्रणाम निवेदित करना है जिसने भारत और सनातन धर्म की महान सेवा की|
ॐ ॐ ॐ || २३ अप्रेल २०१६
सारा देश इस समय खनन माफियाओं के चंगुल में है ---
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सारा देश इस समय खनन माफियाओं के चंगुल में है
ॐ श्री गुरवे नमः|
आज मैं साधन क्रमों पर चर्चा करने वाला था पर उसके स्थान पर अपनी ही व्यथा व्यक्त करने जा रहा हूँ| अपने सामने इतना अन्याय देख रहा हूँ कि इस समाज से विरक्ति हो गयी है| इच्छा यही हो रही है कि विरक्त होकर सांसारिक चेतना से ऊपर उठ जाऊं और स्थाई रूप से एकांतवास करूं व इस समाज और इसकी चेतना से पृथक ही रहूँ|
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सारा देश इस समय खनन माफियाओं के चंगुल में है| हर जिले में पटवारी से जिलाधीश तक, और सिपाही से पुलिस अधीक्षक तक, और सारे मंत्रीगण खनन माफियाओं के बंधुआ मजदूर है| देश की बहुमूल्य खनिज संपदा की लूट हो रही है| और जो भी इन माफियाओं के मार्ग में आता है उसका अंत कर दिया जाता है|
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स्वतन्त्रता संग्राम में हमारे क्षेत्र में स्वतंत्रता सेनानियों के शिरोमणि थे --- पचेरी ग्राम के पं.ताड़केश्वर शर्मा| अंगरेज़ सरकार ने उनके पूरे परिवार को सगे सम्बन्धियों, महिलाओं और बच्चों सहित जेल में डाल रखा था| उनका घर, खेत और सारी सम्पति जब्त कर ली थी| तथाकथित आज़ादी के बाद उनके परिवार के जीवित बचे छ: सदस्यों को राष्ट्रपति ने सम्मानित भी किया था|
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उनके पौत्र पं.प्रदीप शर्मा पर्यावरण प्रेमी होने के कारण और परोपकार हेतु खनिज माफियों के विरुद्ध संघर्षरत थे| दो माह पूर्व उनके परिवार के अनुसार पुलिस की मिलीभगत से चुनौती देकर भोजन करते समय घर से बाहर बुलाकर उनकी ह्त्या कर दी गयी और लाश को एक-डेढ़ फुट गहरे नाले में फेंक दिया गया| उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर आसपास के गाँवों से हजारों लोग एकत्र हो गए व जिले के कई प्रतिष्ठित लोग भी आ गए तब प्रशासन ने पूर्ण आश्वासन दिया था कि मामले की निष्पक्ष जांच होगी| उनके शरीर पर और गले पर चोट के निशान भी थे|
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अब सरकार यह सिद्ध करने पर अड़ी हुई है कि पं.प्रदीप शर्मा ने पानी में डूब कर आत्म-हत्या की है| सरकारी पोस्ट मार्टम रिपोर्ट में भी दम घुटने से मौत दिखाई गई है और शरीर पर चोटों के निशान नहीं होना बताया है| उनके गाँव पचेरी में अभी तक आन्दोलन चल रहा है| सारे गाँव के लोग पाबन्द किए गए हैं| आस पास के गाँवों में पूर्ण बंद रहा है और प्रशासन ने जन आन्दोलन को कुचलने की पूर्ण चेष्टा की है| पं.प्रदीप शर्मा के घर का ताला तोड़कर उनका चलभाष और अन्य साक्ष्य चोरी किये गए| जाँच के नाम पर सारे साक्ष्यों को मिटाया गया है| क्या इतने जीवट का व्यक्ति जो खनन माफियाओं के विरुद्ध संघर्ष कर रहा था एक फुट गहरे पानी में डूब कर आत्म-ह्त्या करेगा?
क्या कोई एक फुट गहरे पानी में डूब कर आत्म-हत्या कर सकता है?
दो महीने बीत जाने पर भी किसी नामजद को गिरफ्तार नहीं किया गया है| CBI से जाँच की मांग नहीं मानी जा रही है| यदि CBI से जाँच हो तो पूरी सरकार बेनकाब हो जायेगी| पर सीबीआई भी तो सरकार से ही आदेश लेगी|
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कल जिला मुख्यालय पर एक बहुत बड़ा धरना दिया गया जिसमे अनेक पूर्व वरिष्ठ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी, प्रसिद्ध डॉक्टर, प्रबुद्धजन, शिक्षाविद और मातृशक्ति थी| सबने इस घटना की निंदा की| ज्ञापन लेने के लिए कोई अधिकारी उपलब्ध नहीं था| अब उस महान स्वतंत्रता सेनानी के परवार के सदस्यों ने निर्णय लिया है की वे अपने सम्मान लौटा देंगे और आमरण अनशन करेंगे|
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जब एक प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी का परिवार इन खनन माफियाओं से सुरक्षित नहीं है तो एक सामान्य जन का क्या हाल होगा?
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और भी अनेक बातें हैं जो पीड़ित करती हैं| इसमें दोष बुरे लोगों का नहीं है| दोष तो हमारा ही है हम निर्बल और संवेदन हीन बन गए हैं|
दुनिया को खतरा बुरे लोगों की ताकत से नहीं है बल्कि अच्छों की दुर्बलता के कारण है|
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वर्त्तमान में Democracy (लोकतंत्र) समाप्त होकर Plutocracy (धनी व कुटिल लोगों का राज्यतंत्र) रह गयी है| वर्त्तमान लोकतंत्रीय व्यवस्था काले विषधर उगल रही है और हम उन्हें दूध पिला रहे हैं| आज की राजनीति आत्मा पर लात मार रही है और हम वफादारी के साथ अपनी दुम हिला रहे हैं|
हम सत्य को कहने से डर रहे हैं|
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अधिक से अधिक 50 या 60 प्रतिशत मतदान होता है फिर ये मत अनेक प्रत्याशियों में बँट जाते हैं| मात्र 20-25 मत प्राप्त करने वाला व्यक्ति जनप्रतिनिधी बन जाता है|
वोट बेंक की राजनीति, जातिवाद, साम्प्रदायिकता की भावना भड़का कर, पैसे शराब आदि बाँट कर 15 से 20 प्रतिशत वोट प्राप्त कर लेने वाले की जीत पक्की है| सारे माफिया इसी तरीके से सत्ता में आते हैं|
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हमारे मन में लाचारी का भाव की मैं अकेला क्या कर सकता हूँ, मेरी कौन सुनेगा आदि के कारण ही यह democracy बदल कर plutocracy हो गई है| मैं सभी पाठकों से निवेदन करता हूँ की हम सब यह संकल्प करें की अगले चुनावों में शत-प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को प्राप्त करें| समाज के जिस पात्र भाई बहिन का नाम मतदाता सूचि में नहीं है वे अपना नाम जुड़ायें| मतदान वाले दिन सूर्य उदय होते ही एक धार्मिक कर्तव्य मानकर मतदान देने पहुँच जाएँ| अन्यथा यही अन्याय और माफिया राज्य सहने के लिए तैयार रहें| सोचें, विचारें और सक्रियता से आगे बढ़ें अन्यथा पांचाली के चीर हरण में जो चुप रहेंगे उन्हें भावी पीढी कभी क्षमा नहीं करेगी|
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शुभ कामनाएँ| जय जननी जय भारत|
२३ अप्रेल २०१३
सनातन धर्म के अनुसार भोजन ग्रहण करने के कुछ नियम हैं ---
सनातन धर्म के अनुसार भोजन ग्रहण करने के कुछ नियम हैं ---
सनातन धर्म के अनुसार भोजन ग्रहण करने के कुछ नियम हैं ---
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१ पांच अंगो ( दो हाथ, २ पैर, मुख ) को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करें !
२. गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है !
३. प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है !
४. पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए !
५. दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है !
६ . पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है !
७. शैय्या पर, हाथ पर रख कर, टूटे फूटे वर्तनो में भोजन नहीं करना चाहिए !
८. मल मूत्र का वेग होने पर, कलह के माहौल में, अधिक शोर में, पीपल, वट वृक्ष के नीचे, भोजन नहीं करना चाहिए!
९ परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए !
१०. खाने से पूर्व अन्न देवता, अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के, उनका धन्यवाद देते हुए, तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इस्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए !
११. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से, मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर (गाय, कुत्ता, और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घर वालो को खिलाये !
१२. इर्षा, भय, क्रोध, लोभ, रोग, दीन भाव, द्वेष भाव, के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है !
१३. आधा खाया हुआ फल, मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए !
१४. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए !
१५. भोजन के समय मौन रहे!
१६. भोजन को बहुत चबा चबा कर खाए !
१७. रात्री में भरपेट न खाए !
१८. गृहस्थ को ३२ ग्रास से ज्यादा न खाना चाहिए !
१९. सबसे पहले मीठा, फिर नमकीन, अंत में कडुवा खाना चाहिए !
२०. सबसे पहले रस दार, बीच में गरिस्थ, अंत में द्रव्य पदार्थ ग्रहण करे !
२१. थोडा खाने वाले को --आरोग्य, आयु, बल,सुख, सुन्दर संतान और सौंदर्य प्राप्त होता है !
२२. जिसने ढिंढोरा पीट कर खिलाया हो वहाँ कभी न खायें !
२३. कुत्ते का छुवा, रजस्वला स्त्री का परोसा, श्राद्ध का निकाला, बासी, मुँह से फूँक मरकर ठंडा किया, बाल गिरा हुवा भोजन, अनादर युक्त, अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करें !
कुंडलिनी जागरण, कूटस्थ चैतन्य और ब्राह्मी-स्थिति ---
कुंडलिनी-जागरण, कूटस्थ-चैतन्य और ब्राह्मी-स्थिति ---
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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने लगभग तीन बार "कूटस्थ" शब्द का प्रयोग किया है। यह बड़ा ही पवित्र शब्द है, मेरे विचार से इसका एकमात्र अर्थ जो सरलतम भाषा में हो सकता है, वह है --"अविनाशी आत्म चैतन्य"। इसका कोई दूसरा अर्थ नहीं है। गीता के दूसरे अध्याय के अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने "ब्राह्मी-स्थिति" की चर्चा की है। इस "ब्राह्मी-स्थिति" और "कूटस्थ-चैतन्य" का अर्थ एक ही है। ये दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं, इनमें कोई भेद नहीं है। बौद्धिक रूप से "अविनाशी आत्म-चैतन्य" को समझना असंभव है। इसे केवल परमात्मा की परम कृपा द्वारा ही समझा जा सकता है। यानि जिस पर परमात्मा की कृपा हो, वही इसे समझ सकता है।
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मैं ईश्वर की प्रेरणा से ही निम्न पंक्तियाँ लिख पा रहा हूँ। बिना उनकी कृपा के एक शब्द भी नहीं लिख सकता। उनकी कृपा से ही श्रीमद्भगवद्गीता के "पुरुषोत्तम-योग" को समझ पाया हूँ, जिसे बिना उनकी कृपा के कोई नहीं समझ सकता। यह गीता का सार है जो गीता के पंद्रहवें अध्याय के आरंभिक चार मंत्रों में समाहित है। श्रीमद्भगवद्गीता मेरा प्राण है, उसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। यहाँ मैं गीता पर चर्चा कर रहा हूँ, यह भगवान के परमप्रेम की ही अभिव्यक्ति है। व्यक्तिगत रूप से मैं इसकी चर्चा भविष्य में किसी से भी कभी भी नहीं करूंगा। यह मेरा व्यक्तिगत विषय है।
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यहाँ मैं कुंडलिनी जागरण के ऊपर लिख रहा हूँ। इस विषय पर बहुत अधिक झूठ परोसा गया है। कुंडलिनी-जागरण कोई जादू-मंत्र नहीं है। यह हमारे सूक्ष्म देह के मेरुदण्ड में होने वाली एक अनुभूति है जो ईश्वर की परमकृपा से सभी भक्तों को होती है। उनके भक्त इसकी चर्चा नहीं करते। कुंडलिनी-जागरण का एकमात्र लाभ यह है कि इससे हमारे सारे बौद्धिक संशय दूर हो जाते हैं। परमात्मा की अवधारणा अधिक अच्छी तरह समझ में आ सकती है। इससे होने वाली हानि यही है कि इस में यदि ब्रह्मचर्य का पालन न किया जाये, यानि आचार-विचार में शुद्धि न हो तो मस्तिष्क की एक स्थायी गंभीर विकृति उत्पन्न हो सकती है जिसे इस जन्म में दूर नहीं किया जा सकता। एक दूसरा ही जन्म उसके लिए लेना पड़ता है। जिनकी आस्था ईश्वर में नहीं है, वे इस विषय से दूर रहें। यह उनका विषय नहीं है। नहीं तो आप पागल हो जाएँगे।
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ॐ नमः शिवाय !! मैं शिव, विष्णु और उनके अवतारों में पूर्ण आस्था रखता हूँ। शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। दोनों ही परमब्रह्म परमात्मा की दो पृथक पृथक अभिव्यक्तियाँ हैं। आप सब का जीवन कृतकृत्य और कृतार्थ हो।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ अप्रेल २०२६
अज़ान के बोल ---
इस लेख का उद्देश्य निष्पक्ष दृष्टि से बिना किसी पूर्वाग्रह के सभी की जानकारी को बढ़ाना ही है| हम नित्य दिन में पाँच बार ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से मस्जिदों से बोली जा रही अज़ान की आवाज़ सुनते हैं| अज़ान की बांग हुई है इसका अर्थ है अब नमाज़ पढ़ी ही जाएगी| यह श्रद्धावानों को नमाज़ का समय होने की व नमाज पढ़ने की याद दिलाने के लिए होती है| इस लेख को मैं जन साधारण की जानकारी के लिए शेयर कर रहा हूँ| इसके अर्थों को मन ही मन अवश्य समझें|
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इस समय मेरी आयु 72 वर्ष की है| जीवन में भगवान ने मुझे विश्व के ग्यारह मुस्लिम देशों .... मोरक्को, सऊदी अरब, मिश्र, तुर्की, मलयेशिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, यमन और ईरान जाने का अवसर दिया है| उपरोक्त ग्यारह देशों में जहाँ तक मुझे याद है, मैनें ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से कहीं पर भी अज़ान की आवाज नहीं सुनी|
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जब मैं 20 वर्ष का था तब तक भारत की किसी भी मस्जिद पर ध्वनि-विस्तारक यंत्र नहीं लगे थे| सन 1970 के दशक के आरंभ में पूरे भारत में हर मस्जिद पर बड़े-बड़े ध्वनि-विस्तारक यंत्र लग गए और full volume से उनका मुंह दूसरों के मोहल्लों की ओर कर के ही बजाया जाता है| क्या यह एक मनोवैज्ञानिक आक्रमण नहीं है? हर हिन्दू को इसके अर्थ का पता होना चाहिए| यदि पता होगा तभी तो वे कोई प्रतिक्रिया करेंगे|
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रमज़ान का मुक़द्दस महिना भी कल या परसों से शुरू हो जाएगा| यह चाँद दिखाई देने पर निर्भर है| सभी श्रद्धालुओं को इस की शुभ कामनाएँ|
ॐ नमः शिवाय !!
23 April 2020
अज़ान इस्लाम में नमाज़(Pray) के लिए बुलाने के लिए ऊँचे स्वर में जो शब्द कहे जाते हैं, उन्हें कहते हैं ।
कुछ इस तरह के बोल हैं अज़ान में: यह अरबी ज़ुबान के बोल हैं:-
1)अल्लाहु अकबर (चार बार) Allahu Akbar Allahu Akbar (twice)
2) अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह (दो बार ) Ashahadu an la ilaha illa Allah (twice)
3)अशहदु अन्ना मुहमदन रसूल्लुल्लाह (दो बार) Ashahadu ana Muhamadan Rasoollullah (twice)
4)हैया ‘अल-सलाह (दो बार) Haya ‘ala asalah (twice)
5)हैया ‘अलल फ़लाह (दो बार) Haya ‘ala al falah (twice)
6)अल्लाहु अकबर (दो बार) Allahu Akbar Allahu Akbar (once)
7)ला इलाहा इल्लल्लाह (एक बार) La ilaha ila Allah (once)
1)अल्लाहु अकबर (चार बार) Allahu Akbar Allahu Akbar (twice)
2) अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह (दो बार ) Ashahadu an la ilaha illa Allah (twice)
3)अशहदु अन्ना मुहमदन रसूल्लुल्लाह (दो बार) Ashahadu ana Muhamadan Rasoollullah (twice)
4)हैया ‘अल-सलाह (दो बार) Haya ‘ala asalah (twice)
5)हैया ‘अलल फ़लाह (दो बार) Haya ‘ala al falah (twice)
6)अल्लाहु अकबर (दो बार) Allahu Akbar Allahu Akbar (once)
7)ला इलाहा इल्लल्लाह (एक बार) La ilaha ila Allah (once)
तो ये थे अरबी ज़ुबान के बोल अब मैं इसके मायने(Meaning) बताता हूँ;-
“अल्लाहु अकबर” का अर्थ होता है “अल्लाह महान है”
“अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह” का अर्थ होता है “मैं गवाही देता हूँ; कोई उपास्य नहीं सिवाय अल्लाह के”
“अशहदु अन्ना मुहमदन रसूल्लुल्लाह” का अर्थ होता है “मैं गवाही देता हूँ; मुहम्मद (saw) अल्लाह के रसूल (दूत) हैं“
“हैया ‘अल-सलाह” का अर्थ होता है “आओ नमाज़ की तरफ़“
“हैया ‘अलल फ़लाह” का अर्थ होता है “आओ सफ़लता की ओर“
“ला इलाहा इल्लल्लाह” का अर्थ होता है “कोई उपास्य नहीं सिवाय अल्लाह के“
उम्मीद करता हूँ आप सबको इसके मायने मालूम चल गए होंगे और अज़ान का सन्देश भी…
“अल्लाहु अकबर” का अर्थ होता है “अल्लाह महान है”
“अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह” का अर्थ होता है “मैं गवाही देता हूँ; कोई उपास्य नहीं सिवाय अल्लाह के”
“अशहदु अन्ना मुहमदन रसूल्लुल्लाह” का अर्थ होता है “मैं गवाही देता हूँ; मुहम्मद (saw) अल्लाह के रसूल (दूत) हैं“
“हैया ‘अल-सलाह” का अर्थ होता है “आओ नमाज़ की तरफ़“
“हैया ‘अलल फ़लाह” का अर्थ होता है “आओ सफ़लता की ओर“
“ला इलाहा इल्लल्लाह” का अर्थ होता है “कोई उपास्य नहीं सिवाय अल्लाह के“
उम्मीद करता हूँ आप सबको इसके मायने मालूम चल गए होंगे और अज़ान का सन्देश भी…
Saturday, 11 April 2026
हमें भगवत्-प्राप्ति यानि आत्म-साक्षात्कार क्यों नहीं होता? ---
हमें भगवत्-प्राप्ति यानि आत्म-साक्षात्कार क्यों नहीं होता? ---
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सरलतम और स्पष्टतम शब्दों में इसका एक ही उत्तर है, और वह यह है कि हमारे में सत्यनिष्ठा (ईमानदारी) की कमी है। अन्य कोई कारण नहीं है। हम स्वयं के प्रति सत्यनिष्ठ (ईमानदार) नहीं हैं। हम स्वयं को ठगना चाहते हैं और स्वयं के द्वारा ही ठगे जा रहे हैं।
किसी भी सांसारिक उपलब्धी के लिए तो हम दिन रात एक कर देते हैं, हाडतोड़ परिश्रम करते हैं, पर जो उच्चतम उपलब्धी है वह हम सिर्फ ऊँची ऊँची बातों के शब्दजाल से ही प्राप्त करना चाहते हैं। वास्तविकता तो यह है कि हम परमात्मा को प्राप्त करना ही नहीं चाहते। हम सिर्फ सांसारिक सुखों को, सांसारिक उपलब्धियों को, और अधिक से अधिक अपने अहंकार की तृप्ति के लिए ही भगवान की विभूतियों को प्राप्त करना चाहते हैं। हमारे लिए भगवान एक माध्यम यानी साधन मात्र है, पर लक्ष्य यानी साध्य तो संसार है। कोई दो लाख में से एक व्यक्ति ही ऐसा होता है जो परमात्मा को पाना चाहता है। प्राचीन भारत एक अपवाद था। यहाँ की सनातन संस्कृति ही विकसित हुई, परमात्मा यानी ब्रह्म को पाने का ही लक्ष्य बनाकर। यहाँ की संस्कृति में सम्मान हुआ तो ब्रह्मज्ञों का ही।
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जीवात्मा का उद्गम जहाँ से हुआ है, वहाँ अपने स्त्रोत में उसे बापस तो जाना ही पड़ेगा चाहे लाखों जन्म और लेने पड़े। तभी जीवन चक्र पूर्ण होगा। इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, बहुत सारा सद्साहित्य इस विषय पर उपलब्ध है| अनेक संत महात्मा हैं जो निष्ठावान मुमुक्षुओं का मार्गदर्शन करते रहते हैं। अतः और लिखने की आवश्यकता नहीं है। जब ह्रदय में अहैतुकी परम प्रेम और निष्ठा होती है तब भगवान मार्गदर्शन स्वयं ही करते हैं। पात्रता होने पर सद्गुरु का आविर्भाव भी स्वतः ही होता है।
जब हम अग्नि के समक्ष बैठते हैं तो ताप की अनुभूति अवश्य होती है। कई बार अनुभूति ना होने पर भी ताप तो मिलता ही है। वैसे ही जब भी हम परमात्मा का स्मरण या ध्यान करते हैं तो उनके अनुग्रह की प्राप्ति अवश्य होती है।
परमात्मा को पाने का मार्ग है अहैतुकी (Unconditional) परम प्रेम। प्रेम में कोई माँग नहीं होती, मात्र शरणागति और समर्पण होता है। प्रेम, गहन अभीप्सा और समर्पण हो तो और कुछ भी नहीं चाहिए। सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है।
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अपने प्रेमास्पद का ध्यान निरंतर तेलधारा के सामान होना चाहिए| प्रेम हो तो आगे का सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है और आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं। जो लोग सेवानिवृत है उन्हें तो अधिक से अधिक समय नामजप और ध्यान में बिताना चाहिए। सांसारिक नौकरी में अपना वेतन प्राप्त करने के लिए दिन में कम से कम आठ घंटे काम करना पड़ता है। व्यापारी की नौकरी तो चौबीस घंटे की होती है। कुछ समय भगवान की नौकरी भी करनी चाहिए। जब जगत मजदूरी देता है तो भगवान क्यों नहीं देंगे? उनसे मजदूरी तो माँगनी ही नहीं चाहिए। माँगना ही है तो सिर्फ उनका प्रेम, प्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं।
प्रेम को ही मजदूरी मान लीजिये| एक बात का ध्यान रखें -- मजदूरी उतनी ही मिलेगी जितनी आप मेहनत करोगे। बिना मेहनत के मजदूरी नहीं मिलेगी। इस सृष्टि में निःशुल्क कुछ भी नहीं है। हर चीज की कीमत चुकानी पडती है।
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सार :--- हमें परमात्मा की प्राप्ति इसलिए नहीं होती क्योंकि हम परमात्मा को प्राप्त करना ही नहीं चाहते। हम स्वयं के प्रति सत्यनिष्ठ (ईमानदार) नहीं हैं। अपने अहंकार की तृप्ति के लिए भक्ति का झूठा दिखावा करते हैं। अपनी मानसिक कल्पना से और झूठे शब्द जाल से स्वयं को ठग रहे हैं। हमने परमात्मा को तो साधन बना रखा है, पर साध्य तो संसार ही है।
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आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को बारंबार प्रणाम। आप सब की जय हो।
आप मेरे हृदय का सर्वश्रेष्ठ प्रेम स्वीकार करें।
ॐ तत् सत् | श्रीगुरवे नमः। ॐ नमः शिवाय। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
कृपाशंकर
११ अप्रेल २०२६
निरंतर ब्रह्म-चिंतन और भक्ति मेरा स्वभाव है, अन्यथा मैं अभावग्रस्त हूँ ---
निरंतर ब्रह्म-चिंतन और भक्ति मेरा स्वभाव है, अन्यथा मैं अभावग्रस्त हूँ।
"शांभवी मुद्रा में पुराण-पुरुष भगवान श्रीकृष्ण स्वयं के पुरुषोत्तम रूप का ध्यान कर रहे हैं। उनसे अन्य इस सम्पूर्ण सृष्टि में कुछ भी नहीं है। सम्पूर्ण विश्व उन्हीं के परम प्रेम की अभिव्यक्ति है।"
मैं एक धर्मनिष्ठ सनातनी हिन्दू हूँ। मुझे मेरी आस्थाओं पर गर्व है। मेरा संकल्प है कि -- "सत्य सनातन धर्म की पुनःप्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो। भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान हों। भारत में छाया असत्य का अंधकार सदा के लिए दूर हो।"
भगवान निश्चित रूप से मेरी सुनेंगे। जो मेरे विचारों से सहमत नहीं हैं, वे विष की तरह मुझे छोड़ सकते हैं। ॐ तत् सत् ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ अप्रेल २०२६
मनुष्य देह में हमारा जन्म अपने प्रारब्ध कर्मों का फल भोगने के लिए ही होता है ---
मनुष्य देह में हमारा जन्म अपने प्रारब्ध कर्मों का फल भोगने के लिए , या नए कर्मों की सृष्टि करने के लिए, या सब तरह के कर्मफलों से मुक्त होने के लिए ही होता है| जब तक संचित कर्म अवशिष्ट हैं तब तक बारंबार पुनर्जन्म होता ही रहेगा| इस निरंतर पुनरागमन से मुक्ति के लिए अहंभाव को समर्पित करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है| यह मनुष्य देह, इस देह की कामनापूर्ति के लिए नहीं मिली है| यह एक साधन है जिसका उपयोग परमात्मा की प्राप्ति के लिए ही करना चाहिए| हमने पूर्वजन्मों में मुक्तिदायक अच्छे कर्म नहीं किये इसीलिये यह जन्म लेना पड़ा| अपनी गुरू परम्परानुसार गुरू प्रदत्त साधना खूब मन लगाकर पूर्ण भक्तिभाव से करें|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
११ अप्रेल २०१७
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से और भारत की गौरवपूर्ण परम वैभवशाली परम्परानुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही नववर्ष का प्रारम्भ है|
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से और भारत की गौरवपूर्ण परम वैभवशाली परम्परानुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही नववर्ष का प्रारम्भ है|
इसका प्रारंभ जगन्माता की आराधना से होता है| भगवान श्री राम की आराधना भी इस समय होती है|
आज के ही दिन इस सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने की, भगवन श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ, बहुत सारी अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं घटित हुईं और २०७० वर्ष पूर्व महाराजा विक्रमादित्य ने हूण और शक आक्रमणकारियों को पराजित कर उन्हें सनातन धर्म में आत्मसात किया|
महाराज विक्रमादित्य का राज्य वर्तमान ईरान, अरब और तुर्की तक था| ईरान में उनकी एक मूर्ती मिली थी जिस में वे धोती पहिने भारतीय वेश-भूषा में एक घोड़े पर सवार हैं| कुछ इतिहासकार कहते हैं कि उनका निधन भी ईरान में हुआ| इराक और तुर्की की कुर्द जाति उनके भारतीय कृत सैनिकों की ही वंशज है| उनका समय भारत का गौरवशाली युग था|
मैं अपने पूर्ण ह्रदय से अपने सभी मित्रों और पाठकों को नववर्ष की शुभ कामनाएँ और मेरा नमस्कार प्रेषित करता हूँ| अपने स्नेह और आशीर्वाद की कृपा मुझ जैसे अकिंचन स्नेहाभिलाषी पर करते रहें|
कृपा शंकर
११ अप्रैल २०१३
Friday, 10 April 2026
माँ से कुछ माँगना ही है तो सिर्फ प्रेम ही माँगना चाहिए फिर सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है ---
सत्रहवीं शताब्दी में बंगाल में एक भक्त कवि हुए हैं जिनका नाम रामप्रसाद सेन था| बँगला भाषा में लिखी उनकी रचनाओं को रामप्रसादी बोलते हैं| उनके भक्त बताते हैं कि जगन्माता नित्य उन्हें काली के रूप में दर्शन देतीं और बात भी करती| उनकी कुछ कविताओं का अनुवाद करवा कर मैनें कई वर्षों पूर्व अध्ययन भी किया था| उनसे जगन्माता कोई वरदान माँगने के लिए कहतीं तो वे माँ से सिर्फ उनका पूर्ण प्रेम ही माँगते| सदा माँ का उत्तर यही होता कि यदि मैं तुम्हें अपना पूर्ण प्रेम दे दूँगी तो मेरे पास कुछ भी नहीं बचेगा|
माँ से कुछ माँगना ही है तो सिर्फ प्रेम ही माँगना चाहिए फिर सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है|
कृपा शंकर
१० अप्रेल २०१९
श्रीराम नवमी की शताधिक मंगलमय शुभकामनाएँ ---
श्रीराम नवमी की शताधिक मंगलमय शुभकामनाएँ
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"बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥"
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥
मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ॥
बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा॥
सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना॥
गगन बिमल संकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा॥
बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी॥
अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा॥
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"सियाराम-मय, सब जग जानी, करहूँ प्रणाम, जोरी जुग-पानी॥"
कृपा शंकर
Thursday, 2 April 2026
भक्ति और सेवा के मार्ग में श्रीहनुमान जी से बड़ा अन्य कोई भक्त या सेवक, भगवान का नहीं है ---
भक्ति और सेवा के मार्ग में श्रीहनुमान जी से बड़ा अन्य कोई भक्त या सेवक, भगवान का नहीं है। वे स्वयं प्रत्यक्ष देवता हैं। सफलता उनके पीछे-पीछे चलती है। उन्होंने कभी कोई विफलता नहीं देखी। असत्य और अंधकार की कोई आसुरी शक्ति, उनके समक्ष नहीं टिक सकती। उनसे अधिक शक्तिशाली और ज्ञानी अन्य कोई नहीं है। हनुमान जी की शक्ति ही हम सब की और इस राष्ट्र की रक्षा करेगी।
"अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥"
श्रीहनुमान जी की अनुभूतियाँ हमें गहरे ध्यान में होती है। जब भी हम सांस लेते हैं, तब हम पाते हैं कि वे कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में मूलाधारचक्र से सहस्त्रारचक्र के मध्य विचरण कर रहे हैं। और भी गहरे ध्यान में सहस्त्रारचक्र के ऊपर का आवरण हट जाता है, और सूक्ष्म जगत में ईश्वर की अनंतता से भी परे एक ज्योतिर्मय जगत के दर्शन होते हैं जिसके बारे में श्रीमद्भगवद्गीता कहती है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
श्रुति भगवती जिसके बारे में कठोपनिषद (२.२.१५) व मुंडकोपनिषद (२.२.१०) में कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥"
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उपरोक्त अनुभूतियाँ हमें हनुमान जी की परम कृपा से ही होती हैं जो प्राण-तत्व और वायु-तत्व के देवता हैं। वे हमें भक्ति, शक्ति, साहस और बुद्धि प्रदान करते हैं। वे हमें निस्वार्थ सेवा और समर्पण सिखाते हैं। वे हमारी हर सांस में जीवित और अमर हैं। उनका निवास मेरे हृदय (विचारों व भावों) में और मेरी साँसों में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। ध्यान में उनकी निरंतर अनुभूति मुझे अपनी चेतना में होती है। मुझे अपना माध्यम बना कर वे भगवान श्रीराम का ध्यान स्वयं करते हैं। यह उनकी परम अनुकंपा है। मैं उन्हें नमन करता हूँ। उन्हीं की परम कृपा मुझे राम जी का बोध कराती है।
"मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥" ॐ ॐ ॐ !!
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कृपा शंकर / २ अप्रेल २०२६
Wednesday, 1 April 2026
भगवान ने ही मुझे पकड़ रखा है ---
लोग मुझसे पूछते हैं कि आपने भगवान को क्यों पकड़ रखा है? वास्तविकता यह है कि मैंने भगवान को नहीं पकड़ा, भगवान ने ही मुझे पकड़ रखा है। अब मैं असहाय हूँ। किसी को घने वन में कोई सिंह या व्याघ्र पकड़ ले तो वह मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता। जो करना है वह तो सिंह या व्याघ्र ही करेगा। भगवान की पकड़ से मैं बहुत अधिक आनंदित हूँ। उनकी पकड़ बनी रहे, और उसमें निरंतर वृद्धि हो। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
२८ मार्च २०२६
उन अनंतातीत पुराण-पुरुष परमात्मा को नमन ---
उन अनंतातीत पुराण-पुरुष परमात्मा को नमन ---
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लगता है कि मैंने कभी किसी पूर्वजन्म में कोई पुण्यकार्य किया होगा, जिसका फल अब मिल रहा है। इस जन्म में यदि भूल से भी कुछ अच्छा काम किया है तो वह मुझे याद नहीं है। इस संसार के लिए एक अनुपयुक्त व्यक्ति (Misfit person) मात्र बन कर रह गया हूँ। कहीं भी जाऊँ, कुछ भी करूँ, मन अनायास ही पुराण-पुरुष परमात्मा के चरण-कमलों में स्वतः ही लिप्त हो जाता है। कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ता।
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अब जैसी उन पुराण-पुरुष परमात्मा की इच्छा, जो अनायास ही मुझे प्राप्त हो रहे हैं। अब इसमें आनंद भी आने लगा है। आध्यात्म का कोई भी रहस्य अपने आप में अब रहस्य नहीं रहा है। भगवान सहज रूप से स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं
(यहाँ सहज का अर्थ है— जिसने साथ-साथ जन्म लिया है)।
मैं उन पुराण-पुरुष की शरण में हूँ, जिनकी शरणागति से सभी श्रद्धालुओं ने कृतकृत्य होकर निज जीवन को कृतार्थ किया है। वे पुराण-पुरुष ही पुरुषोत्तम हैं, और वे ही परमशिव हैं। मैं एक अकिंचन निमित्त साक्षी-मात्र, उन्हें नमन करता हूँ। आचार्य शंकर ने अपने ग्रंथ "विवेक चूड़ामणि" के १३१ वें मंत्र में पुराण-पुरुष की वंदना की है --
"एषोऽन्तरात्मा पुरुषः पुराणो निरन्तराखण्ड-सुखानुभूति |
सदा एकरूपः प्रतिबोधमात्र येनइषिताः वाक्असवः चरन्ति ||" ॐ ॐ ॐ !!
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श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन ने पुराण-पुरुष की स्तुति इस प्रकार की है --
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥"
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥११:३९॥"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥"
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मैं पुराण-पुरुष भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व अर्पित करता हूँ। ये मन बुद्धि चित्त अहंकार, कारण सूक्ष्म व भौतिक देह, अपनी तन्मात्राओं सहित सारी इंद्रियाँ, सारा धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, अच्छे-बुरे सारे कर्म और उनके फल, सब कुछ उन्हें अर्पित है। स्वयं को भी शरणागति द्वारा उन्हें समर्पित करता हूँ। वे मेरा समर्पण स्वीकार करे।
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"कस्तूरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु: करे कंकणम्।
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावली,
गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूड़ामणि:॥"
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"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने,
प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥"
"नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च,
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥"
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"वसुदॆव सुतं दॆवं कंस चाणूर मर्दनम्।
दॆवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम्॥"
"वंशीविभूषित करान्नवनीरदाभात् ,
पीताम्बरादरूण बिम्बफला धरोष्ठात्।
पूर्णेंदु सुन्दर मुखादरविंदनेत्रात् ,
कृष्णात्परं किमपि तत्वमहं न जाने॥"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
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कृपा शंकर
२९ मार्च २०२६
नास्तिक व आस्तिक कौन हैं? .
(प्रश्न) : नास्तिक व आस्तिक कौन हैं?
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(उत्तर) : जो वेदों को अपौरुषेय नहीं मानते, वे नास्तिक हैं। जो वेदों को अपौरुषेय मानते हैं, वे आस्तिक हैं।
भारत के नास्तिक मतों में प्रमुख हैं -- जैन , बौद्ध, व चार्वाक मत।
आज यहाँ चार्वाक मत की ही चर्चा कर रहा हूँ, अन्य नास्तिक मतों की बाद में किसी दिन करूँगा। वर्तमान में चार्वाक मत संगठित मत नहीं है, लेकिन चार्वाक मतानुयायी छद्म रूप से भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में भरे पड़े हैं। भारत में तो उनकी संख्या बहुत अधिक है।
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जीवन में दुख से बचकर अधिकतम इंद्रिय सुख पाने को ही बुद्धिमानी मानना— चार्वाक मत है। यह दर्शन 'भोगवाद' और 'सुखवाद' पर जोर देता है और मृत्यु के बाद जीवन को नहीं मानता। चार्वाक मत केवल प्रत्यक्ष प्रमाण (जो आँखों से दिखे) को स्वीकार करता है। यह आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग-नर्क और वेदों को पूरी तरह नकारता है। इसका मुख्य सिद्धांत "यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्" (जब तक जीओ तब तक सुख से जीओ, उधार लेकर भी घी पीओ) है। किसी भी युक्ति से दूसरों का पैसा हड़पो और खूब मौज-मस्ती करो। दूसरों का पैसा कभी वापस मत करो। ये लोग यदि किसी भगवान को मानते भी हैं तो उसी को मानते हैं, जो उनकी चोरी में सहायक हो। ऐसे लोग भारत में कदम-कदम पर हैं, जो दूसरों को ठगने का अवसर ढूंढते रहते हैं। चार्वाक का नाम उन्होंने कभी सुना नहीं होगा, लेकिन वे कार्य सारा उसी के मतानुसार करते हैं। ये वामपंथी भी चार्वाक से कम नहीं हैं।
कृपा शंकर
३० मार्च २०२६
ईश्वर के मार्ग पर हम भटकते क्यों हैं ?
ईश्वर के मार्ग पर हम भटकते क्यों हैं ?
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कुछ देर पूर्व ही मन में एक प्रश्न उठा कि हम भटकते क्यों हैं? तभी निम्न पंक्तियाँ लिखने की प्रेरणा प्राप्त हुई, जिन्हें लिख रहा हूँ। आध्यात्मिक साधना में भटकाव का एकमात्र कारण -- हमारा राग-द्वेष और अहंकार है। अन्य कोई कारण नहीं है। भगवान ने इसका निदान "वीतरागता" बतलाया है। राग, द्वेष और अहंकार से मुक्ति ही वीतरागता है। हमारी प्रज्ञा निरंतर परमात्मा में स्थित रहे तो हम स्थितप्रज्ञ कहलाते हैं। वहाँ कोई भटकाव नहीं है। लेकिन एक वीतराग व्यक्ति ही स्थितप्रज्ञ हो सकता है। वीतराग व्यक्ति ही महत् तत्व से जुड़कर महात्मा कहलाता है। वीतरागता ही महात्मा होने का लक्षण है।
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गुरुकृपा से हम कूटस्थ में ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करते हुए अजपा-जप, और पूर्ण या अर्धखेचरी मुद्रा में ओंकार का श्रवण व जप करते है। यह साधना हमें वीतरागता की ओर अग्रसर करती है। अंततः भगवान की अनुकंपा ही हमें सिद्धि प्रदान करती है। मुख्य बात भगवान की कृपा है। हमें भगवान की परम कृपा कैसे प्राप्त हो? यही हमारे विचार का विषय हो।
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हमारे वश में एक ही बात है, और वह है— भगवान से परम प्रेम। भक्ति-सूत्रों का छठा सूत्र कहता है -- "यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति।" यहाँ आत्माराम का अर्थ है आत्मा में रमण। जो आत्माराम है वह बाहरी विषयों की खोज छोड़ देता है, व अपने भीतर ही आत्मा के परमानंद में निरंतर संतुष्ट और लीन रहता है। यह आत्मा में रमण यानि आत्माराम होना भी एक बहुत बड़ी साधना है जो हमें वीतराग बनाती है।
कठोपनिषद में भी इस विषय पर कुछ उपदेश हैं जो हमें -- ''ज्ञानवान, सचेतनमना तथा सदा शुचिमान् होकर परम पद को प्राप्त करने को कहते हैं।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
३० मार्च २०२६
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