हृदय में परमात्मा के प्रति परमप्रेम में निरंतर वृद्धि होगी तो आगे के सारे द्वार अपने आप ही खुल जायेंगे, सारे दीप अपने आप ही जल उठेंगे; और कहीं पर भी कोई अंधकार नहीं रहेगा
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मेरी बात को वे ही समझ सकते हैं जो पूर्ण भक्ति से नित्य-नियमित कम से कम दो-तीन घंटे भगवान का गहरा ध्यान करते हैं। अन्य कोई इसे नहीं समझ पायेगा, क्योंकि यह बुद्धि का नहीं, अनुभूति का विषय है। जहाँ तक आध्यात्म की बात है, मैं अपने स्वयं पर ही टिप्पणी कर सकता हूँ। किसी अन्य के बारे में बोलने का मुझे कोई अधिकार नहीं है।
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सच्चिदानंद वासुदेव पुरुषोत्तम अपना ध्यान स्वयं अपने ही कूटस्थ सूर्यमंडल में करते हैं, जिनका मैं एक निमित्त साक्षी मात्र हूँ। उनकी अनुभूति मुझे आकाश-तत्व, आनंद और परमशिव के रूप में होती है। जगन्माता के रूप में उनकी अनुभूति प्राण-तत्व के रूप में होती है। वह प्राण-तत्व ही आजकल सारी साधना कर रहा है। परमशिव की अनुभूतियाँ भी स्वयं जगन्माता ही करवाती हैं। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। और कुछ भी कहने को नहीं है।
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जो कुछ भी मैनें लिखा है पूरी जिम्मेदारी से लिखा है। मैं इसका साक्षी हूँ। कहीं पर भी कोई संशय नहीं है। आप सब में परमात्मा को नमन!!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० मई २०२३
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