साकार और निराकार परमात्मा की साधना में क्या भेद हैं? मुझे तो आज तक कोई भेद कहीं नहीं दिखाई दिया। वास्तव में निराकार कुछ है ही नहीं। जिस की भी सृष्टि हुई है, उसका कुछ न कुछ आकार है ही, चाहे वह शब्द रूप में हो या प्रकाश रूप में। कुछ लोग अपने गुरु को सच्चा गुरु बताते हैं और दूसरों के गुरु को झूठा गुरु। बड़ी विचित्र बात है! उनके लिए गुरु मनुष्य है या तत्व? स्वयं को वे लोग यह शरीर मानते हैं। उन सब को दूर से ही प्रणाम !! निराकार का अर्थ होता है -- "सारे आकार जिसके हों, वह निराकार है।" मैं मूर्ति-पूजा का भी समर्थक हूँ, और साकार साधना का भी। इस सृष्टि में कुछ भी निराकार नहीं है। सारे आकार परमात्मा के हैं, वे इन आकारों में भी, और इन से परे भी हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !! "ॐ तत्सत् !! कृपा शंकर ३० अप्रेल २०२३