होली के त्योहार को मनाने के तरीकों में एक सकारात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन आया है जो स्वागत योग्य व हर्ष का विषय है| पिछले साठ वर्षों से अधिक की स्पष्ट स्मृतियाँ हैं, जब होली का त्योहार अत्यधिक अश्लीलता व फूहड़ता से मनाया जाता था| लोग एक-दूसरे को अत्यधिक गंदी व अश्लील गालियां बकते थे और उनका आचरण भी बहुत अधिक निंदनीय होता था| मुझे यह देखकर स्वयं पर और अपने समाज पर शर्म आती थी कि इस पवित्र त्योहार को मनाने का तरीका इतना निकृष्ट और निंदनीय है| महिलाओं का तो साहस ही नहीं होता था कि घर से बाहर कदम भी रख सकें| मैं तो असहाय था और भगवान से प्रार्थना ही कर सकता था कि समाज से यह आसुरी-भाव और तामसिकता समाप्त हो|
.
अब तो परिदृश्य एकदम से ही बदल गया है| अब तो महिलाएँ भी खुले में फूलों की होली खेलती हैं, और भजन-कीर्तन करते हुए प्रभात-फेरी भी निकालती हैं| किसी भी तरह का फूहड़पन और अश्लीलता नहीं रही है| अबकी बार भी नगर के चुने हुए तीन-चार मंदिरों में महिलाओं ने खूब भजन-कीर्तन किए और ठाकुर जी के साथ फूलों की होली खेली|
.
समय का चक्र सही दिशा में जा रहा है| लोगों की मानसिकता और सोच में भी परिवर्तन हो रहा है| एक दिन में ही सब कुछ नहीं बदल सकता, लेकिन निश्चित रूप से धीरे-धीरे सकारात्मक परिवर्तन हो रहा है| लोगों में आध्यात्मिकता, भक्ति और परोपकार की भावना भी बढ़ रही है| आने वाला समय अच्छा ही अच्छा होगा|
ॐ तत्सत् !!
३१ मार्च २०२१