Sunday, 22 March 2026

प्रार्थना ---

 प्रार्थना ---

"भारत एक सत्यनिष्ठ सनातन-धर्मपरायण परम शक्तिशाली आध्यात्मिक राष्ट्र अपने द्वीगुणित परम वैभव को प्राप्त कर अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान हो। इस राष्ट्र में कहीं किंचित मात्र भी असत्य का अंधकार न रहे। ॐ ॐ ॐ !!"
उपरोक्त संकल्प के साथ हम शक्ति आराधना कर रहे हैं। "हमारी गति जगन्माता (परमात्मा का मातृरूप) हैं। हम परमब्रह्म परमात्मा में प्रतिष्ठित हों। नववर्ष मंगलमय हो। ॐ ॐ ॐ !!"

नवरात्रि का पर्व हमारे जीवन में व्याप्त सब तरह के विकारों और अभावों को दूर कर सद्गुणों को प्राप्त करने की साधना है।

 नवरात्रि का पर्व हमारे जीवन में व्याप्त सब तरह के विकारों और अभावों को दूर कर सद्गुणों को प्राप्त करने की साधना है। हमारे जीवन में अभाव क्यों हैं? उनके कारणों का विश्लेषण कर उन्हें दूर कीजिये। मुख्य कारण है—जीवन में तमोगुण की प्रधानता, जिसके कारण प्रज्ञा यानी विवेक का अभाव है। इसी के कारण सब तरह की दरिद्रता है।

नवरात्रों के पर्व पर हम इसीलिए जगन्माता के तीन रूपों -- महासरस्वती, महालक्ष्मी, और महाकाली की आराधना करते हैं। इन तीनों का समन्वित रूप महादुर्गा है। महाकाली हमारे में सब तरह के विकारों को दूर करती है। महालक्ष्मी हर प्रकार की दरिद्रता दूर करती है। महासरस्वती हमें विवेक प्रदान कर आत्म-साक्षात्कार कराती है।
अपने विवेक से इस विषय पर ध्यान दें, और परमात्मा के मातृरूप की आराधना करें।
कृपा शंकर
२० मार्च २०२६

हमें असत्य के अंधकार में कौन भटकाता है?

 हमें असत्य के अंधकार में कौन भटकाता है?

(यानि हमें परमात्मा से दूर कौन करता है? परमात्मा ही एकमात्र "सत्य" है, और उनसे विमुखता ही "असत्य" है।)
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यहाँ मैं जो कुछ भी लिख रहा हूँ, वह अपने अनुभवों से लिख रहा हूँ। मेरे अनुभव ही प्रमाण हैं। यदि कोई कमी है तो वह मेरे अनुभवों में ही हो सकती है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। हम असत्य के अंधकार में भटकते हैं इसका एकमात्र कारण हमारा "तमोगुण" है। अन्य कोई कारण नहीं है। यह तमोगुण हमारे में मुख्यतः "लोभ", "अहंकार", "प्रमाद" और "दीर्घसूत्रता" के रूप में व्यक्त होता है। तमोगुण से मुक्ति का मार्ग -- "वीतरागता" है, और इसका लक्षण "स्थितप्रज्ञता" है। "राग-द्वेष" और "अहंकार" से मुक्त जीवात्मा वीतराग है, और जिसकी प्रज्ञा निरंतर परमात्मा में स्थित है, वह स्थितप्रज्ञ है। ये दोनों एक-दूसरे के पूरक है। वीतरागता ही हमें महत् तत्व से जोड़ कर "महात्मा" बनाती है। महात्मा का लक्षण -- वीतरागता है। जो वीतराग नहीं है, वह कभी भी महात्मा नहीं हो सकता, उसे महात्मा न कहें।
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तमोगुण से मुक्ति के लिये हम या तो भगवान विष्णु (या उनके अवतारों), या जगन्माता, या वेदान्त दर्शन के अनुसार परमब्रह्म, या परमशिव की उपासना करें। श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम और परमशिव की अनुभूतियाँ एक ही होती हैं, अतः इनमें कोई भेद नहीं है। स्थितप्रज्ञता ही हमें परमात्मा का साक्षात्कार कराती है, और स्थितप्रज्ञ होने के लिए वीतराग होना आवश्यक है। तमोगुण से मुक्त हुए बिना हम आध्यात्म को नहीं समझ सकते। संक्षेप में तमोगुण ही हमें परमात्मा से विमुख करता है। अन्य कोई कारण नहीं है।
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जैसा मुझे समझ में आया, उसका सार ही यहाँ लिखा है। कोई कमी है तो वह मेरी समझ में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। आप सब के रूप में परमशिव को नमन॥
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ नमः शिवाय। ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२१ मार्च २०२६

अपने चैतन्य की एक पीड़ा ---

 अपने चैतन्य की एक पीड़ा ---

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जैसे चुंबक की सूई का मुंह सदा उत्तर दिशा में रहता है वैसे ही मेरा मन तो सदा परमशिव की ओर ही रहता है लेकिन फिर भी पूर्वजन्मों के संस्कारवश चित्त की कुछ आसुरी वृत्तियाँ कभी कभी विक्षेप उत्पन्न कर देती हैं। जगन्माता को सब पता है। वे निश्चित रूप से मेरी सहायता करेंगी, क्योंकि सारी साधना तो वे स्वयं ही कर रही हैं। मैं कुछ भी नहीं करता। कुछ भी नहीं करने की साधना ही मेरी साधना है। जो भी साधना हो रही है, वह तो स्वयं जगन्माता द्वारा परमशिव की हो रही है। मैं तो एक निमित्त साक्षीमात्र हूँ।
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जब तक यह भौतिक देह चैतन्य है, तब तक परमशिव का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान आदि सब जगन्माता द्वारा होता रहेगा। इस देह के अंतिम समय तक चेतना में वे बनी रहेंगी। यही अब तक की एकमात्र उपलब्धि है --
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥६:२२॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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और क्या लिखूँ ? कुछ और है ही नहीं। मैं जहां भी हूँ, वहीं परमात्मा का परमधाम है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
अर्थात् -- उसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है और न चन्द्रमा और न अग्नि। जिसे प्राप्त कर मनुष्य पुन: (संसार को) नहीं लौटते हैं, वह मेरा परम धाम है॥
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भगवान ने आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल और पुनर्जन्म -- इन तीनों के उपदेश भी दिये हैं। यहाँ "गुणत्रय विभाग योग" में वे त्रिगुणों पर प्रकाश डाल रहे हैं, जिसे समझना बहुत आवश्यक है। सत्त्वगुण हमें सुख में आसक्त कर देता है, रजोगुण कर्म में, और तमोगुण ज्ञान को आवृत्त करके जीव को प्रमाद से युक्त कर देता है। वे हमारे बंधनों के बारे में बता रहे हैं --
"सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥१४:५॥"
अर्थात् -- हे महाबाहो ! सत्त्व, रज और तम ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण देही आत्मा को देह के साथ बांध देते हैं।
"तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥१४:६॥"
अर्थात् -- हे निष्पाप अर्जुन ! इन (तीनों) में, सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाशक और अनामय (निरुपद्रव, निर्विकार या निरोग) है; (वह जीव को) सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बांध देता है।।
"रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥१४:७॥"
अर्थात् -- हे कौन्तेय ! रजोगुण को रागस्वरूप जानो, जिससे तृष्णा और आसक्ति उत्पन्न होती है। वह देही आत्मा को कर्मों की आसक्ति से बांधता है॥
"तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥१४:८॥"
अर्थात् -- और हे भारत ! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जानो; जो समस्त देहधारियों (जीवों) को मोहित करने वाला है। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा जीव को बांधता है॥
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लेख लंबा नहीं हो जाये, इस भय से और अधिक नहीं लिखना चाहता। यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है जिसका स्वाध्याय आप स्वयं करें। सारे के सारे गुण हमें बंधनों में डालते है इसलिए सांख्ययोग में भगवान हमें निस्त्रेगुण्य होने को कहते हैं --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
अर्थात् -- हे अर्जुन, वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत, निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो॥
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हमारा अंतिम लक्ष्य तो स्थायी रूप से ब्राह्मी स्थिति को उपलब्ध होना ही नहीं, उससे भी परे जाना है --
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् -- हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
ॐ तत् सत् ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ मार्च २०२६

नित्य नियमित ध्यान साधना -- अनिवार्य है। इसका कोई विकल्प नहीं है।

 नित्य नियमित ध्यान साधना -- अनिवार्य है। इसका कोई विकल्प नहीं है।

यह गुरु महाराज का स्पष्ट आदेश है। यदि परमात्मा की चेतना में मृत्यु भी हो जाये तो वह इस नारकीय सांसारिक जीवन को जीने से तो अधिक श्रेष्ठ है।
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जैसी हमारी श्रद्धा होती है, वैसे ही हम हो जाते हैं। यह अकाट्य सत्य है। हमारी श्रद्धा भी सात्विक, राजसिक और तामसिक होती हैं। श्रद्धा के अनुसार ही हमारी वासनाएं होती हैं। हमारे समस्त विचार, भावनाएं, और कर्म, हमारी श्रद्धा के अनुरूप ही होते हैं। जब हम स्वयं को यह देह मानते हैं तो हमारा अहंकार भी उतना ही अधिक प्रबल होगा। इसलिए नित्य नियमित ध्यान-साधना परम आवश्यक है, क्योंकि ध्यान हम परमात्मा की विराट असीम अनंत सर्वव्यापकता का करते हैं। विराटता का ध्यान करते हमारी चेतना भी विराट, अनंत और सर्वव्यापक हो जाती है।
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साधना में सबसे पहली सफलता वीतरागता है। बिना वीतराग हुए हम सफल नहीं हो सकते। "वीतरागविषयं वा चित्तम्" (योगसूत्र 1.37)। वीतराग महापुरुष के ध्यान या चिंतन से हमारा चित्त भी वीतराग हो जाता है। रामचरितमानस में भरत जी का चरित्र वीतरागता का सर्वोच्च उदाहरण है। भगवान श्रीराम का चरित्र भी परम वीतराग है। नित्य नियमित ध्यान द्वारा ही हम दम्भ, अहंकार, कामुकता और राग-द्वेष से मुक्ति पा सकते हैं। वीतरागता ही हमारे साधुत्व की परिचायक है। बिना नित्य-नियमित ध्यान साधना के हम वीतराग नहीं बन सकते। ध्यान साधना में किसी भी तरह की आकांक्षा न हो तो हमारी निष्काम साधना सात्विक होती है। निष्काम साधना ही सर्वश्रेष्ठ है जो हमें तुरंत ईश्वर से जोड़ देती है। इसके लिए नियमितता चाहिए। अतः नित्य नियमित और गहन ध्यान साधना अनिवार्य है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ मार्च २०२६

गुरु महाराज से प्राप्त एक आंतरिक आदेश के अनुसार ---

 "ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव यद् भद्रं तन्न आ सुव॥"

गुरु महाराज से प्राप्त एक आंतरिक आदेश के अनुसार मुझे अपने सम्पूर्ण-समर्पण यानि ध्यान-साधना की अवधि को क्रमशः बढ़ाकर अधिकाधिक संभव समय तक करनी है। ध्यान के समय मैं यह शरीर नहीं, समष्टि के साथ एक होता हूँ। कुछ भी मुझसे पृथक नहीं होता है। ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि अपनी साधना स्वयं करती है। स्वयं परमात्मा ही मेरा अस्तित्व हैं। उनसे पृथक कुछ भी नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ मार्च २०२६

शिवभाव में स्थित होकर शिव का ध्यान करें ---



शिवभाव में स्थित होकर शिव का ध्यान करें ---

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"शिवो भूत्वा शिवं यजेत्" यह शिवपुराण का एक प्रसिद्ध सूत्र है, जिसका अर्थ है शिव बनकर ही शिव की आराधना करें। उपास्य के गुण उपासक में आये बिना नहीं रहते। हम परमात्मा के अंश हैं, उनके अमृतपुत्र हैं, और हमारा हृदय वैराग्य, भक्ति, विनम्रता और देवत्व से परिपूर्ण है। हम प्रभु के साथ एक हैं। अपनी बुराई-अच्छाई, अवगुण-गुण, पाप-पुण्य, सारे कर्मफल, यहाँ तक कि अपना सम्पूर्ण अस्तित्व शिव को समर्पित कर दें। किसी भी तरह की कोई कामना न रहे। हम परमात्मा की परम चैतन्यमय सर्वव्यापकता हैं।
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प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर हाथ-पाँव व मुंह धोकर पद्मासन या सिद्धासन या स्थिर सुखासन में अपने आसन पर बैठिये। मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर हो। मेरुदंड उन्नत और ठुड्डी भूमि के समानान्तर रहे। पूर्ण-खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में शिवनेत्र होकर यानि बिना तनाव के भ्रूमध्य में दृष्टि स्थिर रखते हुए अपनी चेतना को आज्ञाचक्र (जहाँ मेरुशीर्ष यानि Medulla है) पर स्थिर करें। आज्ञाचक्र से अपनी चेतना को सर्वत्र समस्त ब्रह्मांड में विस्तृत कर दें। अजपा-जप और नाद-श्रवण करते हुए शिवभाव में स्थित होकर शिव का ध्यान करें। शिवकृपा से विक्षेप और आवरण की मायावी शक्तियों का प्रभाव नहीं रहेगा। आवरण हटेगा तो हम स्वयं को शिव के साथ एक ही पायेंगे।
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विश्व में किसी को भी विचलित कर देने वाली अनेक घटनाएँ हो रही हैं, अनेक राष्ट्रविरोधी कार्य हो रहे हैं जिनसे पीड़ा होती है। लेकिन अंततः निज विवेक ने यह सोचने को बाध्य किया है कि इस तरह विचलित होने से कुछ लाभ नहीं है। किसी भी परिस्थिति में हम अपना सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं? वही करना चाहिए। मेरा विवेक तो यही कहता है कि निज जीवन में परमात्मा का स्मरण करते हुए हमें अधर्म और अन्याय का प्रतिकार तो करना ही चाहिये, लेकिन "परमात्मा का ध्यान", और "परमात्मा से समष्टि के कल्याण की प्रार्थना" करना न भूलें। यह सर्वाधिक सकारात्मक कार्य है। परमात्मा हमारे जीवन में बहे, अपना जीवन हम उन्हें समर्पित कर दें। यह सृष्टि—सृष्टिकर्ता परमात्मा की है। वे अपनी सृष्टि को चलाने में सक्षम हैं। उन्हें हमारी सलाह की आवश्यकता नहीं है।
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कुछ काम की अति महत्वपूर्ण बातें ---
(१) दो श्वासों के मध्य का संधिक्षण वास्तविक "संध्या" और परमात्मा की उपासना का सर्वश्रेष्ठ अबूझ मुहूर्त है। लौकिक रूप से तो संध्याकाल -- प्रातः, सायं, मध्यरात्री और मध्याह्न में आता है, लेकिन एक भक्त के लिए प्रत्येक श्वास और निःश्वास, व निःश्वास और श्वास के मध्य का संधिक्षण "संध्याकाल" है। उस हर क्षण में परमात्मा का स्मरण होना ही चाहिए क्योंकि परमात्मा स्वयं ही सभी प्राणियों के माध्यम से साँसें ले रहे हैं, और यह उनका प्राणियों को सबसे बड़ा उपहार है। हर एक श्वास जन्म है, और हर एक निःश्वास मृत्यु। इनके मध्य के संधिक्षणों में सदा परमात्मा का स्मरण हो।
(२) जब दोनों नासिका छिद्रों से सांस चल रही हो तो वह परमात्मा के ध्यान का सर्वश्रेष्ठ समय है।
(३) आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य में सभी सिद्धियों का निवास है। इन सिद्धियों का मोह छूट जाये, इसके लिए सहस्त्रार में श्रीगुरु-चरणों का ध्यान करते हैं। सहस्त्रार में स्थिति -- श्रीगुरुचरणों में आश्रय है।
(४) ब्रह्मरंध्र से परे की अनंतता से भी परे की अनुभूतियाँ परमशिव का बोध कराती हैं। जो परमशिव हैं, वे ही श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम हैं। वहाँ स्थित होकर जीव स्वयं शिव हो जाता है।
(५) श्वास के प्राकृतिक प्रवाह के प्रति सतत सजगता रखते हुए, तालु में जिह्वा को गड़ा कर रखना -- श्रीगुरुचरणों का स्पर्श है।
(६) कुण्डलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन ही योग है। सारी साधना तो कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में भगवती/जगन्माता स्वयं कर रही हैं, और उसके कर्मफल परमशिव को अर्पित कर रही हैं। हम कर्ता नहीं, केवल एक निमित्त और साक्षीमात्र हैं।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मार्च २०२६

स्वयं परमात्मा ही मेरा अस्तित्व हैं। उनसे पृथक कुछ भी नहीं है।

 "ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव यद् भद्रं तन्न आ सुव॥"

गुरु महाराज से प्राप्त एक आंतरिक आदेश के अनुसार मुझे अपने सम्पूर्ण-समर्पण यानि ध्यान-साधना की अवधि को क्रमशः बढ़ाकर अधिकाधिक संभव समय तक करनी है। ध्यान के समय मैं यह शरीर नहीं, समष्टि के साथ एक होता हूँ। कुछ भी मुझसे पृथक नहीं होता है। ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि अपनी साधना स्वयं करती है। स्वयं परमात्मा ही मेरा अस्तित्व हैं। उनसे पृथक कुछ भी नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ मार्च २०२६

हमारे राष्ट्र की अस्मिता -- शाश्वत सत्य सनातन-धर्म है ---

 हमारे राष्ट्र की अस्मिता -- शाश्वत सत्य सनातन-धर्म है, जो सदा अक्षुण्ण रहेगा। सारी सृष्टि इसके नियमों से चल रही है। जब इस पर मर्मांतक प्रहार होते हैं, तब हमारा सर्वोपरी कर्तव्य -- राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा करना है। हमें कोई मुक्ति नहीं चाहिए क्योंकि हम तो नित्यमुक्त हैं। सारे बंधन भ्रम हैं। नित्यमुक्त को मुक्ति की कैसी कामना?

इस राष्ट्र का ब्रह्मतेज और क्षात्रत्व हम जागृत करेंगे, यह हम सबका संकल्प है। इस राष्ट्र को अन्धकार व असत्य से मुक्त करायेंगे। हम जीयेंगे तो स्वाभिमान और आत्मगौरव से, अन्यथा नहीं रहेंगे। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ मार्च २०२६