Sunday, 22 March 2026

हमें असत्य के अंधकार में कौन भटकाता है?

 हमें असत्य के अंधकार में कौन भटकाता है?

(यानि हमें परमात्मा से दूर कौन करता है? परमात्मा ही एकमात्र "सत्य" है, और उनसे विमुखता ही "असत्य" है।)
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यहाँ मैं जो कुछ भी लिख रहा हूँ, वह अपने अनुभवों से लिख रहा हूँ। मेरे अनुभव ही प्रमाण हैं। यदि कोई कमी है तो वह मेरे अनुभवों में ही हो सकती है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। हम असत्य के अंधकार में भटकते हैं इसका एकमात्र कारण हमारा "तमोगुण" है। अन्य कोई कारण नहीं है। यह तमोगुण हमारे में मुख्यतः "लोभ", "अहंकार", "प्रमाद" और "दीर्घसूत्रता" के रूप में व्यक्त होता है। तमोगुण से मुक्ति का मार्ग -- "वीतरागता" है, और इसका लक्षण "स्थितप्रज्ञता" है। "राग-द्वेष" और "अहंकार" से मुक्त जीवात्मा वीतराग है, और जिसकी प्रज्ञा निरंतर परमात्मा में स्थित है, वह स्थितप्रज्ञ है। ये दोनों एक-दूसरे के पूरक है। वीतरागता ही हमें महत् तत्व से जोड़ कर "महात्मा" बनाती है। महात्मा का लक्षण -- वीतरागता है। जो वीतराग नहीं है, वह कभी भी महात्मा नहीं हो सकता, उसे महात्मा न कहें।
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तमोगुण से मुक्ति के लिये हम या तो भगवान विष्णु (या उनके अवतारों), या जगन्माता, या वेदान्त दर्शन के अनुसार परमब्रह्म, या परमशिव की उपासना करें। श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम और परमशिव की अनुभूतियाँ एक ही होती हैं, अतः इनमें कोई भेद नहीं है। स्थितप्रज्ञता ही हमें परमात्मा का साक्षात्कार कराती है, और स्थितप्रज्ञ होने के लिए वीतराग होना आवश्यक है। तमोगुण से मुक्त हुए बिना हम आध्यात्म को नहीं समझ सकते। संक्षेप में तमोगुण ही हमें परमात्मा से विमुख करता है। अन्य कोई कारण नहीं है।
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जैसा मुझे समझ में आया, उसका सार ही यहाँ लिखा है। कोई कमी है तो वह मेरी समझ में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। आप सब के रूप में परमशिव को नमन॥
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ नमः शिवाय। ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२१ मार्च २०२६

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