शिवभाव में स्थित होकर शिव का ध्यान करें ---
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"शिवो भूत्वा शिवं यजेत्" यह शिवपुराण का एक प्रसिद्ध सूत्र है, जिसका अर्थ है शिव बनकर ही शिव की आराधना करें। उपास्य के गुण उपासक में आये बिना नहीं रहते। हम परमात्मा के अंश हैं, उनके अमृतपुत्र हैं, और हमारा हृदय वैराग्य, भक्ति, विनम्रता और देवत्व से परिपूर्ण है। हम प्रभु के साथ एक हैं। अपनी बुराई-अच्छाई, अवगुण-गुण, पाप-पुण्य, सारे कर्मफल, यहाँ तक कि अपना सम्पूर्ण अस्तित्व शिव को समर्पित कर दें। किसी भी तरह की कोई कामना न रहे। हम परमात्मा की परम चैतन्यमय सर्वव्यापकता हैं।
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प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर हाथ-पाँव व मुंह धोकर पद्मासन या सिद्धासन या स्थिर सुखासन में अपने आसन पर बैठिये। मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर हो। मेरुदंड उन्नत और ठुड्डी भूमि के समानान्तर रहे। पूर्ण-खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में शिवनेत्र होकर यानि बिना तनाव के भ्रूमध्य में दृष्टि स्थिर रखते हुए अपनी चेतना को आज्ञाचक्र (जहाँ मेरुशीर्ष यानि Medulla है) पर स्थिर करें। आज्ञाचक्र से अपनी चेतना को सर्वत्र समस्त ब्रह्मांड में विस्तृत कर दें। अजपा-जप और नाद-श्रवण करते हुए शिवभाव में स्थित होकर शिव का ध्यान करें। शिवकृपा से विक्षेप और आवरण की मायावी शक्तियों का प्रभाव नहीं रहेगा। आवरण हटेगा तो हम स्वयं को शिव के साथ एक ही पायेंगे।
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विश्व में किसी को भी विचलित कर देने वाली अनेक घटनाएँ हो रही हैं, अनेक राष्ट्रविरोधी कार्य हो रहे हैं जिनसे पीड़ा होती है। लेकिन अंततः निज विवेक ने यह सोचने को बाध्य किया है कि इस तरह विचलित होने से कुछ लाभ नहीं है। किसी भी परिस्थिति में हम अपना सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं? वही करना चाहिए। मेरा विवेक तो यही कहता है कि निज जीवन में परमात्मा का स्मरण करते हुए हमें अधर्म और अन्याय का प्रतिकार तो करना ही चाहिये, लेकिन "परमात्मा का ध्यान", और "परमात्मा से समष्टि के कल्याण की प्रार्थना" करना न भूलें। यह सर्वाधिक सकारात्मक कार्य है। परमात्मा हमारे जीवन में बहे, अपना जीवन हम उन्हें समर्पित कर दें। यह सृष्टि—सृष्टिकर्ता परमात्मा की है। वे अपनी सृष्टि को चलाने में सक्षम हैं। उन्हें हमारी सलाह की आवश्यकता नहीं है।
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कुछ काम की अति महत्वपूर्ण बातें ---
(१) दो श्वासों के मध्य का संधिक्षण वास्तविक "संध्या" और परमात्मा की उपासना का सर्वश्रेष्ठ अबूझ मुहूर्त है। लौकिक रूप से तो संध्याकाल -- प्रातः, सायं, मध्यरात्री और मध्याह्न में आता है, लेकिन एक भक्त के लिए प्रत्येक श्वास और निःश्वास, व निःश्वास और श्वास के मध्य का संधिक्षण "संध्याकाल" है। उस हर क्षण में परमात्मा का स्मरण होना ही चाहिए क्योंकि परमात्मा स्वयं ही सभी प्राणियों के माध्यम से साँसें ले रहे हैं, और यह उनका प्राणियों को सबसे बड़ा उपहार है। हर एक श्वास जन्म है, और हर एक निःश्वास मृत्यु। इनके मध्य के संधिक्षणों में सदा परमात्मा का स्मरण हो।
(२) जब दोनों नासिका छिद्रों से सांस चल रही हो तो वह परमात्मा के ध्यान का सर्वश्रेष्ठ समय है।
(३) आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य में सभी सिद्धियों का निवास है। इन सिद्धियों का मोह छूट जाये, इसके लिए सहस्त्रार में श्रीगुरु-चरणों का ध्यान करते हैं। सहस्त्रार में स्थिति -- श्रीगुरुचरणों में आश्रय है।
(४) ब्रह्मरंध्र से परे की अनंतता से भी परे की अनुभूतियाँ परमशिव का बोध कराती हैं। जो परमशिव हैं, वे ही श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम हैं। वहाँ स्थित होकर जीव स्वयं शिव हो जाता है।
(५) श्वास के प्राकृतिक प्रवाह के प्रति सतत सजगता रखते हुए, तालु में जिह्वा को गड़ा कर रखना -- श्रीगुरुचरणों का स्पर्श है।
(६) कुण्डलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन ही योग है। सारी साधना तो कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में भगवती/जगन्माता स्वयं कर रही हैं, और उसके कर्मफल परमशिव को अर्पित कर रही हैं। हम कर्ता नहीं, केवल एक निमित्त और साक्षीमात्र हैं।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मार्च २०२६
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