अपने चैतन्य की एक पीड़ा ---
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जैसे चुंबक की सूई का मुंह सदा उत्तर दिशा में रहता है वैसे ही मेरा मन तो सदा परमशिव की ओर ही रहता है लेकिन फिर भी पूर्वजन्मों के संस्कारवश चित्त की कुछ आसुरी वृत्तियाँ कभी कभी विक्षेप उत्पन्न कर देती हैं। जगन्माता को सब पता है। वे निश्चित रूप से मेरी सहायता करेंगी, क्योंकि सारी साधना तो वे स्वयं ही कर रही हैं। मैं कुछ भी नहीं करता। कुछ भी नहीं करने की साधना ही मेरी साधना है। जो भी साधना हो रही है, वह तो स्वयं जगन्माता द्वारा परमशिव की हो रही है। मैं तो एक निमित्त साक्षीमात्र हूँ।
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जब तक यह भौतिक देह चैतन्य है, तब तक परमशिव का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान आदि सब जगन्माता द्वारा होता रहेगा। इस देह के अंतिम समय तक चेतना में वे बनी रहेंगी। यही अब तक की एकमात्र उपलब्धि है --
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥६:२२॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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और क्या लिखूँ ? कुछ और है ही नहीं। मैं जहां भी हूँ, वहीं परमात्मा का परमधाम है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
अर्थात् -- उसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है और न चन्द्रमा और न अग्नि। जिसे प्राप्त कर मनुष्य पुन: (संसार को) नहीं लौटते हैं, वह मेरा परम धाम है॥
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भगवान ने आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल और पुनर्जन्म -- इन तीनों के उपदेश भी दिये हैं। यहाँ "गुणत्रय विभाग योग" में वे त्रिगुणों पर प्रकाश डाल रहे हैं, जिसे समझना बहुत आवश्यक है। सत्त्वगुण हमें सुख में आसक्त कर देता है, रजोगुण कर्म में, और तमोगुण ज्ञान को आवृत्त करके जीव को प्रमाद से युक्त कर देता है। वे हमारे बंधनों के बारे में बता रहे हैं --
"सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥१४:५॥"
अर्थात् -- हे महाबाहो ! सत्त्व, रज और तम ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण देही आत्मा को देह के साथ बांध देते हैं।
"तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥१४:६॥"
अर्थात् -- हे निष्पाप अर्जुन ! इन (तीनों) में, सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाशक और अनामय (निरुपद्रव, निर्विकार या निरोग) है; (वह जीव को) सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बांध देता है।।
"रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥१४:७॥"
अर्थात् -- हे कौन्तेय ! रजोगुण को रागस्वरूप जानो, जिससे तृष्णा और आसक्ति उत्पन्न होती है। वह देही आत्मा को कर्मों की आसक्ति से बांधता है॥
"तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥१४:८॥"
अर्थात् -- और हे भारत ! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जानो; जो समस्त देहधारियों (जीवों) को मोहित करने वाला है। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा जीव को बांधता है॥
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लेख लंबा नहीं हो जाये, इस भय से और अधिक नहीं लिखना चाहता। यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है जिसका स्वाध्याय आप स्वयं करें। सारे के सारे गुण हमें बंधनों में डालते है इसलिए सांख्ययोग में भगवान हमें निस्त्रेगुण्य होने को कहते हैं --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
अर्थात् -- हे अर्जुन, वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत, निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो॥
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हमारा अंतिम लक्ष्य तो स्थायी रूप से ब्राह्मी स्थिति को उपलब्ध होना ही नहीं, उससे भी परे जाना है --
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् -- हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
ॐ तत् सत् ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ मार्च २०२६
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