Sunday, 22 March 2026

स्वयं परमात्मा ही मेरा अस्तित्व हैं। उनसे पृथक कुछ भी नहीं है।

 "ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव यद् भद्रं तन्न आ सुव॥"

गुरु महाराज से प्राप्त एक आंतरिक आदेश के अनुसार मुझे अपने सम्पूर्ण-समर्पण यानि ध्यान-साधना की अवधि को क्रमशः बढ़ाकर अधिकाधिक संभव समय तक करनी है। ध्यान के समय मैं यह शरीर नहीं, समष्टि के साथ एक होता हूँ। कुछ भी मुझसे पृथक नहीं होता है। ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि अपनी साधना स्वयं करती है। स्वयं परमात्मा ही मेरा अस्तित्व हैं। उनसे पृथक कुछ भी नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ मार्च २०२६

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