मुझे वर्ग-भेद और वर्ग-संघर्ष से भय लगता है, क्योंकि वर्ग-संघर्ष से मार्क्सवाद का जन्म होता है। मुझे मार्क्सवाद से भय इसलिये लगता है क्योंकि मार्क्सवाद की नारकीयता को मैं बहुत गहराई से समझता हूँ। मार्क्सवाद का सबसे बड़ा शत्रु है भारत का वेदान्त-दर्शन। भारत के वेदान्त और योग-दर्शन के समक्ष मार्क्सवाद कहीं भी नहीं टिकता। इसीलिए मार्क्स, धर्म को अफीम का नशा कहता है।
Saturday, 27 June 2026
भारत की आध्यात्मिकता में भारत की सब समस्याओं का समाधान है ---
हम भगवान विष्णु की अनंत विराटता की चेतना में रहें ---
जो व्यक्ति भगवान विष्णु के अनंत विराट स्वरूप का नित्य नियमित ध्यान करता है वह इस पृथ्वी पर चलता-फिरता देवता है। सूक्ष्म जगत के देवता भी उसे नमन करते हुए आनंदित होते हैं। वह कुल और वे माता-पिता भी धन्य हैं जहां ऐसे महात्मा का जन्म होता है। उसकी सात पीढ़ियों का तुरंत उद्धार हो जाता है।
अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती की हार्दिक शुभ कामनाएँ --- .
अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती की हार्दिक शुभ कामनाएँ ---
मैं तटस्थ नहीं रह सकता। नदी के तीर पर खड़ा हूँ, नदी में छलांग लगाये बिना नहीं रह सकता। जो होगा सो देखा जायेगा। यदि प्रारब्ध में जीवन लिखा है तो जीवित रहूँगा, अन्यथा होनी को कोई रोक नहीं सकता।
मैं तटस्थ नहीं रह सकता। नदी के तीर पर खड़ा हूँ, नदी में छलांग लगाये बिना नहीं रह सकता। जो होगा सो देखा जायेगा। यदि प्रारब्ध में जीवन लिखा है तो जीवित रहूँगा, अन्यथा होनी को कोई रोक नहीं सकता।
आने वाले समय में धर्म की, और वर्तमान लोकतन्त्र के स्थान पर धर्मरक्षक क्षत्रिय राजाओं के राज्य की पुनः स्थापना होगी।
मुझे बार बार यह अनुभूति होती है कि आने वाले समय में धर्म की, और वर्तमान लोकतन्त्र के स्थान पर धर्मरक्षक क्षत्रिय राजाओं के राज्य की पुनः स्थापना होगी। युग-परिवर्तन और धर्म की पुनः स्थापना का समय लगभग आ गया है। धर्म एक ही है जिसे वैशेषिक-सूत्रों में कणाद ऋषि ने परिभाषित किया है और मनुस्मृति में जिसके दस लक्षण बताए गए हैं। महाभारत ग्रंथ में इसे बड़ी गहराई से समझाया गया है। मुझे अपने स्वधर्म का बोध है और उसे ही निज जीवन में व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ। "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह" -- इसके अतिरिक्त कहने को अन्य कुछ भी नहीं है। ॐ तत् सत् !!
भगवत्पाद आद्यगुरु आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) के २५३३ वें जयंती महामहोत्सव (२१ अप्रेल २०२६) की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएं, बधाई और अभिनंदन ---
भगवत्पाद आद्यगुरु आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) के २५३३ वें जयंती महामहोत्सव (२१ अप्रेल २०२६) की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएं, बधाई और अभिनंदन ---
(१) सर्वश्रेष्ठ तीर्थ कौन सा है? (२) मन को कहाँ लगाएं? (३) किस की व क्या उपासना करें? (४) मनुष्य जीवन की सार्थकता क्या है? (५) कूटस्थ का अर्थ क्या है?
(उत्तर) : (१) जहां भी मेरा अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) स्वतः ही कूटस्थ में रमण करने लगे, वहीं सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। (२) अपने मन को सब विषय-वासनाओं से बाहर खींचकर निरंतर कूटस्थ में ही लगाये रखें। (३) कूटस्थ में स्वयं को विलीन कर कूटस्थ की ही उपासना करें। (४) मनुष्य जीवन की सार्थकता कूटस्थ-चैतन्य यानि ब्राह्मी स्थिति है। (५) "कालव्यापी अविनाशी आत्म-तत्व को ही 'कूटस्थ' कहते है।"
निष्काम भाव से "आत्मा" यानि "आत्म-तत्व" की ही साधना करनी चाहिए ---
निष्काम भाव से "आत्मा" यानि "आत्म-तत्व" की ही साधना करनी चाहिए ---
"ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥"
"ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥"
भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करते करते जो मनुष्य इस देह का त्याग करते हैं, उन्हें परमगति प्राप्त होती है।
श्रीमद्भगवद्गीता का पंद्रहवाँ अध्याय (पुरुषोत्तम योग) मुझे सर्वप्रिय है। यह पूरी श्रीमद्भगवद्गीता का सार है। इस की साधना और ध्यान में जितना आनंद मिलता है, उतना अन्यत्र कहीं भी नहीं है। यही इस जीवन का सार है। इस संसार से विदाई के समय भगवान पुरुषोत्तम का ही सचेतन ध्यान हो, पुरुषोत्तम योग का ही सचेतन पाठ हो, और उन्हीं का ध्यान करते करते उन्हीं के लोक में गति हो। जो भगवान पुरुषोत्तम हैं, वे ही परमशिव हैं। दोनों में कोई भेद नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!
"हं सः" मैं वह हूँ। यह समस्त ब्रह्मांड, यह सारी सृष्टि मैं हूँ।
हम भगवान का ध्यान या भजन करते हैं; यह हमारा भ्रम है, जो जितनी शीघ्र टूट जाये उतना अच्छा ! भगवान ही हमारा ध्यान रखते हैं, वे ही हमारे प्राण व सर्वस्व हैं। भगवान ही हमारे माध्यम से स्वयं की साधना करते हैं। वे हमारे साथ एक हैं। वे ही अपना ध्यान कर रहे हैं --
ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।
ले चल वहाँ भुलावा देकर
कूटस्थ चैतन्य ---
कूटस्थ चैतन्य ---
प्रेम के स्थान पर मोह क्यों उत्पन्न होता है? मोह से हमारा पतन क्यों होता है?
प्रेम के स्थान पर मोह क्यों उत्पन्न होता है? मोह से हमारा पतन क्यों होता है?
अनुभवों की गहनता के साथ-साथ मान्यताएँ भी दृढ़ हो जाती हैं ---
हमें जब कुछ भी पता नहीं होता, तब एक बार तो लकीर का फकीर बनना पड़ता है। फिर जैसे जैसे निजानुभूतियाँ दृढ़ होती जाती हैं, साधक -- लकीर का फकीर नहीं रहता। इस समय मेरे अनुसंधान का विषय -- ब्रह्म, और कूटस्थ हैं, जो दोनों ही मुझे निरंतर अनुभूत हो रहे हैं। जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण और गुरु-रूप में दक्षिणामूर्ति शिव --- तत्व रूप में दोनों एक हैं, जिनसे मुझे निरंतर मार्ग-दर्शन प्राप्त हो रहा है। इस समय परमब्रह्म परमात्मा की अनुभूति मुझे ऊर्ध्वमूल कूटस्थ में पुरुषोत्तम के रूप में हो रही है। उन्हीं की परम कृपा से अज्ञान का अंधकार शनैः शनैः दूर हो रहा है। जिस मार्ग पर मैं चल रहा हूँ, वह अद्वैत-वेदान्त का मार्ग है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार "कूटस्थ" और "ब्रह्म" मूलतः एक — अपरिछिन्न हैं।
सबसे अधिक आनंद का विषय
सबसे अधिक आनंद का विषय
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आजकल गर्मी पड़ रही है, सर्दी बिल्कुल भी नहीं है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में जल्दी उठिए (लगभग तीन-साढ़े तीन बजे) और शौचादि से निवृत होकर खुले में घर की छत पर या अन्य किसी खुले स्थान पर एक कंबल बिछा कर बैठ जाइए। नितंबों के नीचे एक पतली गद्दी लगा लीजिये ताकि कमर सीधी रहे। ठुड्डी भूमि के समानांतर। कुछ देर हठयोग के कुछ प्राणायाम कीजिए। उनके साथ यदि हो सके तो तीन-चार बार उज्जयी प्राणायाम भी कीजिए। बहुत लाभदायी सिद्ध होगा।
हमारी आध्यात्मिक साधना में विघ्न आने का एकमात्र कारण हमारा लोभ और अहंकार ही है, जो कर्ताभाव के कारण होता है। हमारा लोभ और अहंकार ही हमें पतन के मार्ग पर धकेलता है। अन्य कोई कारण नहीं है।
हमारी आध्यात्मिक साधना में विघ्न आने का एकमात्र कारण हमारा लोभ और अहंकार ही है, जो कर्ताभाव के कारण होता है। हमारा लोभ और अहंकार ही हमें पतन के मार्ग पर धकेलता है। अन्य कोई कारण नहीं है।
हमारा कर्ताभाव ही आध्यात्म में हमारे पतन का एकमात्र कारण है। परमात्मा को ही एकमात्र कर्ता बनायें, और निरंतर ब्राह्मी-स्थिति (कूटस्थ-चैतन्य/ब्रह्म-चैतन्य) में बने रहें। भगवान को अर्पित किये बिना कुछ भी खाना -- "चोरी" और "पाप का भक्षण" है।
अब कुछ दिन तक और कुछ भी नहीं लिखेंगे। धर्म व राष्ट्र की रक्षा हेतु उपासना तो कर ही सकते हैं।
अब कुछ दिन तक और कुछ भी नहीं लिखेंगे। धर्म व राष्ट्र की रक्षा हेतु उपासना तो कर ही सकते हैं।
भारत इस सृष्टि का भविष्य, और एक सनातन चिन्मय सत्ता है, जो अमर है और सदा अमर रहेगी।
भारत इस सृष्टि का भविष्य, और एक सनातन चिन्मय सत्ता है, जो अमर है और सदा अमर रहेगी। यहाँ ईश्वर स्वयं अवतृत होते हैं। भारत की अस्मिता और भविष्य "सत्य-सनातन-धर्म" है। हम परमात्मा के प्रकाश को फैलाते रहेंगे तो हमारी विजय सुनिश्चित है। कोई माने या न माने पर जीवन के अंतिम काल में सभी को यह मानना ही पड़ता है कि उन्हें अपने जीवन की युवावस्था में ही भगवान से जुड़ जाना चाहिए था व भगवत्-साक्षात्कार ही उन के जीवन का एकमात्र लक्ष्य और उद्देश्य होना चाहिए था। संसार से राग-द्वेष और अहंकार ही सारी समस्याओं की जड़ होते हैं। जब तक यह बात समझ में आती है, तब तक बहुत अधिक देरी हो जाती है। इसी उधेड़बुन में प्राण छूट जाते हैं।
परमात्मा को पूर्ण-समर्पण तत्काल अभी और इसी समय अपरिहार्य और अत्यावश्यक है ---
परमात्मा को पूर्ण-समर्पण तत्काल अभी और इसी समय अपरिहार्य और अत्यावश्यक है --- लेकिन यह फलीभूत कैसे हो ? इस जीवन का अवशेष अति अति अल्प है। मेरा उच्चतम लक्ष्य परमात्मा को पूर्ण समर्पण है। आज अभी इसी समय से वह करना होगा, क्योंकि यह अंतिम अवसर है --