Saturday, 27 June 2026

मोहनदास करमचंद गांधी को "महात्मा गांधी" किसने बनाया?

 


आज श्रीहनुमान-जयंती है इसे श्रीहनुमान-जन्मोत्सव या श्रीहनुमान प्राकट्योत्सव भी कहते हैं।

आज श्रीहनुमान-जयंती है इसे श्रीहनुमान-जन्मोत्सव या श्रीहनुमान प्राकट्योत्सव भी कहते हैं। सभी श्रद्धालुओं को नमन। हनुमान जी का प्राकट्य हमारे निज जीवन में हो, तभी इस उत्सव की सार्थकता है। श्रीहनुमान जी हमारी चेतना में हैं, कहीं बाहर नहीं। यह उत्सव प्रतिवर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस वर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा १ अप्रैल २०२६ को प्रातः ७ बजकर ६ मिनट से २ अप्रैल को प्रातः ७ बजकर ४१ मिनट तक थी। उदया तिथि के चलते हनुमान जयंती का उत्सव २ अप्रैल २०२६ को मनाया जा रहा है।

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मैं जो कुछ भी लिखने जा रहा हूँ, आज इसे लिखने की मुझे एक आंतरिक अनुमति है। लेकिन इसे वे ही समझ पायेंगे जिन पर भगवान की अनुकंपा है।
श्रीहनुमान जी की अनुभूतियाँ हमें गहरे ध्यान में होती है। जब भी हम सांस लेते हैं, तब हम पाते हैं कि वे कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में मूलाधारचक्र से सहस्त्रारचक्र के मध्य विचरण कर रहे हैं। और भी गहरे ध्यान में सहस्त्रारचक्र के ऊपर का आवरण हट जाता है, और सूक्ष्म जगत में ईश्वर की अनंतता से भी परे एक ज्योतिर्मय जगत के दर्शन होते हैं जिसके बारे में श्रीमद्भगवद्गीता कहती है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
श्रुति भगवती जिसके बारे में कठोपनिषद (२.२.१५) व मुंडकोपनिषद (२.२.१०) में कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥"
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उपरोक्त अनुभूतियाँ हमें हनुमान जी की परम कृपा से ही होती हैं जो प्राण-तत्व और वायु-तत्व के देवता हैं। वे हमें भक्ति, शक्ति, साहस और बुद्धि प्रदान करते हैं। वे हमें निस्वार्थ सेवा और समर्पण सिखाते हैं। वे हमारी हर सांस में जीवित और अमर हैं। उनका निवास मेरे हृदय (विचारों व भावों) में और मेरी साँसों में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। ध्यान में उनकी निरंतर अनुभूति मुझे अपनी चेतना में होती है। मुझे अपना माध्यम बना कर वे भगवान श्रीराम का ध्यान स्वयं करते हैं। यह उनकी परम अनुकंपा है। मैं उन्हें नमन करता हूँ। उन्हीं की परम कृपा मुझे राम जी का बोध कराती है।
"मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥" ॐ ॐ ॐ !!
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कृपा शंकर / २ अप्रेल २०२६

अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए परमात्मा की भक्ति एक व्यापार है ----

 जिसके हृदय में परमात्मा को उपलब्ध होने की भूख-प्यास और तड़प है, व अपनी सारी वेदनाओं के पश्चात भी जिसे परमात्मा से परमप्रेम है, वही वास्तविक भक्त है; अन्य सब लाभार्थी व्यापारी हैं, जिनके लिए अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए परमात्मा की भक्ति एक व्यापार है।

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कुछ भी पाने की आकांक्षा एक सूक्ष्म अहंकार है। आध्यात्म में महत्व कुछ होने का है, न कि कुछ पाने का। परमात्मा को अपने समर्पण की पूर्णता पर ही ध्यान दें। किसी भी तरह की कोई अपेक्षा या कामना न रखें। जो कुछ भी पाया जाता है, वह खोया भी जाता है। पाने को अब कुछ भी नहीं होना चाहिये। अनेक जन्मों से संचित पुण्यकर्मफलों का जब उदय होता है तब भगवान की भक्ति जागृत होती है। धन्य हैं वे सब लोग जिनमें भगवान की भक्ति जागृत है।
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हमारे में एक चुम्बकत्व (आकर्षण) है, वह चुम्बकत्व ही हमारे सारे कार्य करेगा। हम सिर्फ अपने समर्पण की पूर्णता पर ही ध्यान दें। हमारे विचारों में स्पष्टता और दृढ़ता हो, व किसी भी तरह का कोई संशय नहीं हो। किसी से कोई अपेक्षा मत रखो। ईश्वर से संवाद हेतु शब्दों की नहीं, भावों की आवश्यकता है। कौन किसके प्रति समर्पित हो? कौन किसको याद करे? कोई अन्य है ही नहीं। हमारा अस्तित्व परमात्मा को समर्पित है। परमात्मा की इस समग्रता को नमन !!
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जिसको भूख लगी है, वही भोजन करेगा, जिसको प्यास लगी है, वही पानी पीयेगा, जिसके हृदय में परमात्मा के लिये घोर अभीप्सा (अतृप्त असीम प्यास) है, वही भक्ति करेगा। अदम्य भयहीन साहस व निरंतर अध्यवसाय के बिना कोई आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती। संसार की उपलब्धियों के लिए जितने साहस और संघर्ष की आवश्यकता है, उस से कहीं बहुत अधिक संघर्ष और साहस आध्यात्मिक जीवन के लिए करना पड़ता है।
आप सब को नमन। आपका जीवन कृतकृत्य व कृतार्थ हो। ॐ शिव !!
कृपा शंकर
३ अप्रेल २०२६

सांसारिक मान-सम्मान और प्रसिद्धि की कामना, व वासनात्मक विचारों का कण मात्र भी अवशेष --- हमारी जड़ता और आध्यात्मिक अवनति की निशानी है।

 सांसारिक मान-सम्मान और प्रसिद्धि की कामना, व वासनात्मक विचारों का कण मात्र भी अवशेष --- हमारी जड़ता और आध्यात्मिक अवनति की निशानी है।

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सारी भागदौड़ और प्रयासों के पश्चात जब भी मैं स्वयं में स्थित होता हूँ, तो पाता हूँ कि जिसे में खोज रहा था, वह तो मैं स्वयं हूँ॥ गीता में भगवान कहते हैं ---
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है॥
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सारी सृष्टि सारा ब्रह्मांड -- मेरा शरीर है, सारे प्राणी मेरा परिवार हैं। मैं कूटस्थ ज्योतिर्मय ब्रह्म (निरंतर विस्तृत, सर्वव्यापक) परमशिव (परम कल्याणकारी) हूँ, जो इस समय यह एक अति साधारण, सामान्य, अकिंचन मनुष्य बन गया है।
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इस समय मैं एक निमित्त मात्र हूँ, कर्ता तो परमशिव है। मैं जो कुछ भी लिखता हूँ, वह मेरा सत्संग है, जिसका एकमात्र उद्देश्य -- अपने स्वयं, सनातन-धर्म और भारत के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करना है। मैं अपने या किसी अन्य के मनोरंजन के लिए बिल्कुल भी नहीं लिखता। कौन क्या सोचता है यह उसकी समस्या है, मेरी नहीं। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ अप्रेल २०२६

सब तरह के कर्मफलों, पाप-पुण्य, व सांसारिकता से मुक्ति का एकमात्र उपाय -- "निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन" --

 सब तरह के कर्मफलों, पाप-पुण्य, व सांसारिकता से मुक्ति का एकमात्र उपाय -- "निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन" --

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जब तक हमारे विचारों व भावों में तमोगुण की प्रधानता है, तब तक ईश्वर के मार्ग पर हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। कितने भी पूजा-पाठ, जप-तप, यज्ञ-अनुष्ठान, और दान-पुण्य करने का दिखावा कर लें; लेकिन जब तक राग-द्वेष, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, लोभ व अहंकार है, तब तक हमारे पुण्य कुछ भी काम नहीं आयेंगे। इंद्रीय सुखों के प्रति आकर्षण, और सांसारिक सम्बन्धों के प्रति मिथ्या कर्तव्य बोध बड़े भ्रामक हैं। प्रमाद को तो भगवान सनत्कुुमार ने साक्षात मृत्यु बताया है। दीर्घसूत्रता है— शुभ कार्य को आगे टालने की प्रवृत्ति।
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने मुक्त होने का उपाय बताया है और वह है --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
अर्थात् -- "हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत? निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो॥"
"The Vedic Scriptures tell of the three constituents of life - the Qualities. Rise above all of them, O Arjuna, above all the pairs of opposing sensations; be steady in truth, free from worldly anxieties and centered in the Self."
भगवान हमें निस्त्रैगुण्य यानि त्रिगुणातीत होने को कहते हैं। इसके लिए --
संसार की कामनाओं का त्याग करते हुए हमें --
(१) निर्द्वन्द्व: --- सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय जैसे विपरीत परिस्थितियों (द्वंद्वों) से निर्लिप्त हो जाओ।
(२) नित्यसत्त्वस्थ -- सदा नित्य-निरंतर रहने वाले परमात्मा में स्थित रहो, यानी ज्ञान और शुद्धता (सत्त्वगुण) में स्थित रहो।
(३) निर्योगक्षेम --- न अप्राप्त वस्तु की इच्छा करो (योग) और न ही प्राप्त की रक्षा की चिंता (क्षेम) करो, क्योंकि भगवान् के शरणागत होने पर वे स्वयं योगक्षेम का वहन करते हैं।
(४) आत्मवान --- अपनी आत्मा में स्थित रहो, या परमात्मा के परायण हो जाओ, प्रमादरहित हो जाओ।
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ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
७ अप्रेल २०२६

एक बहुत पुरानी स्मृति ---

 एक बहुत पुरानी स्मृति है। सन २००१ की बात है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कच्छल द्वीप पर एक असामान्य रूप से अति विशाल और बहुत ही ऊँचे वृक्ष को देखा, जिस पर एक लता भी चढ़ी हुई थी| वृक्ष की जितनी ऊँचाई थी, लिपटते-लिपटते वहीं तक वह लता भी पहुँच गई थी| जीवन में पहली बार ऐसे उस दृश्य को देखकर परमात्मा और जीवात्मा की याद आ गई, और एक भाव-समाधि लग गई| वह बड़ा ही शानदार दृश्य था जहाँ मुझे परमात्मा की अनुभूति हुई| प्रभु को समर्पित होने से बड़ी कोई उपलब्धी नहीं है| जीवात्मा जब परमात्मा से लिपटी रहती है, तब वह भी परमात्मा से एकाकार होकर उसी ऊँचाई तक पहुँच जाती है| परमात्मा को हम कितना भी भुलायें, पर वे हमें कभी भी नहीं भूलते| सदा याद करते ही रहते हैं| उन्हें भूलने का प्रयास भी करते हैं तो वे और भी अधिक याद आते हैं| वास्तव में वे स्वयं ही हमें याद करते हैं| कभी याद न आए तो मान लेना कि -- "हम में ही न थी कोई बात, याद न तुम को आ सके।" ७ अप्रेल २०२६

हिन्दू शब्द का अर्थ है -- जो हिंसा से दूर है (यहाँ हिंसा का अर्थ लोभ व अहंकार से है जो हिंसा के एकमात्र कारण हैं)।

 जिनकी आस्था -- ईश्वर के अवतारों, आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल, पुनर्जन्म व अहिंसा में है, मैं उन्हे ही हिन्दू कहता हूँ। हिन्दू शब्द का अर्थ है -- जो हिंसा से दूर है (यहाँ हिंसा का अर्थ लोभ व अहंकार से है जो हिंसा के एकमात्र कारण हैं)।

दूसरे दृष्टिकोण से जिनकी सोच ऊर्ध्वमुखी है, व जो ईश्वर का निरंतर चिंतन करते हैं, वे हिन्दू हैं चाहे वे पृथ्वी के किसी भी भाग पर रहते हैं। ऐसे लोगों का समूह ही हिन्दू राष्ट्र है। ईश्वर का अनुस्मरण करते हुए हम अपने शत्रुओं का बध तो अवश्य करें, लेकिन हमारे मन में किसी भी तरह का क्रोध या घृणा न हो।
यह मेरा दृष्टिकोण है, जो आवश्यक नहीं कि पूर्णतः सही हो। इस विषय पर विद्वान मनीषियों के विचार आमंत्रित हैं। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
९ अप्रेल २०२६

ध्यान, समर्पण, कूटस्थ, महात्मा, वीतराग और स्थितप्रज्ञ ---

 ध्यान, समर्पण, कूटस्थ, महात्मा, वीतराग और स्थितप्रज्ञ ---

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परमप्रेम सहित परमात्मा का निरंतर चिंतन ही "ध्यान" है, जिसमें हम अपने अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) का पूर्ण समर्पण उन्हें करते हैं।
परमात्मा को हम अपने अन्तःकरण के सिवाय अन्य दे ही क्या सकते हैं? "पत्र, पुष्प, फल, और जल" तो एक भावना और लोकाचार है। भगवान कहते हैं --
"पत्रं पुष्पं फलं तोयं, यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि, प्रयतात्मनः॥" (गीता: ९:२६)
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भगवान श्रीकृष्ण ने एक बहुत ही सुंदर शब्द "कूटस्थ" का प्रयोग श्रीमद्भगवद्गीता में किया है जो उनकी कृपा से ही समझ में आ सकता है। उमकी परम कृपा और समर्पण का भाव रखते हुए हम कूटस्थ में निरंतर उनका ध्यान करें। कठोपनिषद के अनुसार, कूटस्थ वह सर्वोच्च आत्म-तत्व है जो सब कुछ बदल जाने के बाद भी स्वयं नहीं बदलता।
"ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥(गीता: ६:८)"
"ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥(गीता: १२:३)"
"द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥(गीता: १५-१६)"
(कठोपनिषद में कूटस्थ आत्मा (नित्य, अचल, निर्विकार) का वर्णन है।)
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आजकल हर किसी व्यक्ति के नाम के साथ हम लोग "महात्मा" लगा देते हैं, जो गलत है। महत् तत्व से जुड़ा व्यक्ति ही महात्मा कहलाने योग्य है। एक वीतराग व्यक्ति ही महत् तत्व से जुड़ कर "महात्मा" हो सकता है। राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त होकर जिसने परमात्मा की सर्वव्यापकता की अनुभूति की हो, वही वीतराग है। जिसकी प्रज्ञा निरंतर परमात्मा में स्थित हो वह स्थितप्रज्ञ है। परमात्मा को उपलब्ध होने के लिए वीतराग और स्थितप्रज्ञ होना आवश्यक है।
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ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
कृपा शंकर
११ अप्रेल २०२६

महात्मा कौन है? ---

 महात्मा कौन है?

आजकल 'महात्मा' शब्द का बहुत अधिक दुरुपयोग हो रहा है। हम हर किसी को महात्मा नहीं कह सकते। सांख्य योग में एक शब्द आता है "महत्"। जो ईश्वर के महत् तत्व से जुड़ा है, वही महात्मा है। भगवान विष्णु की सर्वव्यापक विराटता को ही महत् कहते हैं।
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महात्माओं के सत्संग में उनके श्रीमुख से सुना है कि एक वीतराग (राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त) व्यक्ति ही महात्मा हो सकता है। एक लंपट (कामी, व्यभिचारी, अनैतिक या भ्रष्ट आचरण वाला व्यक्ति) कभी महात्मा नहीं हो सकता। ऐसे ही एक विष्णुद्रोही जिसे भगवान विष्णु से द्रोह है, कभी महात्मा नहीं हो सकता। ऐसे लोगों को महात्मा कहना गलत है। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
१३ अप्रेल २०२६
पुनश्च: --- मेरे उपरोक्त दृष्टिकोण से तो मोहनदास गांधी, भीमराव अंबेडकर, और ज्योतिबा फूले --- महात्मा कहलाने की पात्रता बिलकुल नहीं रखते। इन्हें महात्मा कहना महात्मा शब्द का अपमान है।

इस पृथ्वी पर एक ही राष्ट्र है जिसका नाम "भारत" है, अन्य सब कलिकाल की भ्रांतियाँ हैं।

 इस पृथ्वी पर एक ही राष्ट्र है जिसका नाम "भारत" है, अन्य सब कलिकाल की भ्रांतियाँ हैं। राष्ट्र उसे कहते हैं जो चारों पुरुषार्थों द्वारा प्रजा का रञ्जन करे।

मैं अपने दोनों हाथ उठाकर, ईश्वर को साक्षी मानते हुए प्रतिज्ञा और संकल्प करता हूँ कि -- "भारत की राजनीति -- सत्य-सनातन-धर्म होगी, व भारत अपने द्विगुणित परम वैभव के साथ एक अखंड धर्मनिष्ठ राष्ट्र होगा। असत्य और अंधकार की शक्तियाँ भारत से मिट जायेंगी।"
"ॐ विष्णवे नमः", "ॐ विष्णवे नमः", "ॐ विष्णवे नमः" "ॐ स्वस्ति"॥
कृपा शंकर
१५ अप्रेल २०२६

ईश्वर की आज्ञा सर्वोपरी ---

 ईश्वर की आज्ञा सर्वोपरी ---

मुझे ईश्वर की आज्ञा है -- अवशिष्ट जीवन में सब कुछ भूल कर पूरा समय परमात्मा के चिंतन-मनन, निदिध्यासन और ध्यान में ही व्यतीत करने की। अब ईश्वर की आज्ञा ही सर्वोपरी है। इस भौतिक जीवन में जन्म से पूर्व भी परमात्मा ही साथ में थे, भौतिक मृत्यु के उपरांत भी परमात्मा ही साथ में रहेंगे, और इस समय भी आप सब के रूपों में परमात्मा ही मेरे साथ हैं। वे ही शत्रु-मित्र, माता-पिता, भाई-बहिन, सगे-संबंधियों व अन्य सभी रूपों में आए, व इस समय भी आप सब के सभी रूपों में वे ही मेरे साथ हैं। अब कौन किसे नमन करे? सब कुछ तो परमात्मा है। उनके सिवाय अन्य कुछ है भी नहीं।
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इस जीवन में मुझ अकिंचन के लिए मेरा स्वधर्म (परमात्मा की भक्ति और शरणागति द्वारा पूर्ण समर्पण) ही सबसे अधिक प्रधान है। मैं क्या चाहता हूँ, और क्या नहीं, इसका अब कोई महत्व नहीं है। परमात्मा की क्या इच्छा है, एकमात्र महत्व उसी का है। मुझे पता है कि मेरा स्वधर्म क्या है। मुझे परमब्रह्म परमात्मा से खूब प्रेम है, और खूब अति दुर्लभ आध्यात्मिक और लौकिक अनुभव भी इसी जीवन में मुझे हुए हैं। जीवन में पूर्ण संतुष्टि है, लेकिन परमात्मा के लिए एक गहन अभीप्सा हृदय में सदा बनी रहती है।
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इस समय मेरे लिए मेरे सनातन-धर्म से अधिक बड़ा कुछ भी अन्य नहीं है। यही मेरे लिए जन्म और मृत्यु है। शिव और विष्णु व उनके अवतारों में मेरी पूर्ण समझ और आस्था है। परमात्मा के मातृ रूप की भी मुझे बहुत अनुभूतियाँ हुई हैं।
इस भौतिक जीवन का भी मैंने खूब गहराई से अनुभव लिया है। इसी जीवन में जब साम्यवाद था तब मुझे कुछ पूर्व मार्क्सवादी देशों (रूस, लाटविया, चीन, उत्तरी कोरिया, यूक्रेन, व रोमानिया) के नारकीय जीवन को बहुत समीप से देखने का अवसर मिला है। इसके अतिरिक्त जीवन में खूब अति दुर्लभ यात्राएं भी की हैं। सन १९८५ ई में एक बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा समुद्री मार्ग से की थी। चीन की महान दीवार, मिश्र के पिरामिड्स और स्फिन्क्स, व कनाडा का नियाग्रा फ़ॉल्स दो दो बार बहुत अच्छी तरह से देखा है। यूरोप, अमेरिका व जापान में बहुत घूमा हूँ। नौ मुस्लिम देशों की यात्रा की है। अपने स्तर पर स्वाध्याय भी खूब किया है। जीवन में बड़े अच्छे से अच्छे, व खराब से खराब लोगों से भी मिलना बहुत हुआ है, जिनसे बहुत कुछ सीखा और खूब अनुभव लिया है। आसुरी स्वभाव के लोगों ने मुझे ठगा भी बहुत अधिक है, भगवान उनसे मेरी सदा रक्षा करें। मैंने कुछ समय नौ सेना में भी काम किया था जिसमें सन १९६५ व १९७१ में पाकिस्तान से हुए युद्धों के समय एक युद्धपोत व एक पनडुब्बी में सक्रिय सेवा भी की थी। जहाँ तक आध्यात्म की बात है, खूब अति-दुर्लभ आध्यात्मिक अनुभव भी मुझे हुए हैं।
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लेकिन इन सब का अब कोई महत्व नहीं है। एकमात्र महत्व परमात्मा की भक्ति और अनुभूतियों का ही है। जीवन के अच्छे व बुरे सभी पक्षों को भूलकर अब वर्तमान जीवन परमात्मा को पूर्णतः समर्पित है। इस जन्म में मुझे वैराग्य नहीं लिखा है। मोक्ष व मुक्ति की मुझे कोई कामना नहीं है। आत्मा नित्य मुक्त है। हरेक जन्म में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो।
कृपा शंकर / १७ अप्रेल २०२६
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ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः॥ शं नो भवत्वर्यमा॥ शं न इन्द्रो बृहस्पतिः॥ शं नो विष्णुरुरुक्रमः।
ॐ नमो ब्रह्मणे॥ नमस्ते वायो॥ त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि॥ त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि॥ ऋतं वदिष्यामि॥ सत्यं वदिष्यामि॥ तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु॥ अवतु माम्‌। अवतु वक्तारम्‌।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
(कृष्ण यजुर्वेद, तैत्तिरीयोपनिषद् शिक्षावल्ली प्रथमोऽनुवाकः)
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आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरितासउद्भिदः।
देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ (ऋग्वेद (१.८९.१)

भगवान की भक्ति — एक बड़ा जोखिम भरा धंधा है।

 भगवान की भक्ति — एक बड़ा जोखिम भरा धंधा है। इस में कुछ मिलता नहीं है, बल्कि जो कुछ भी पास में है, वह भी छीन लिया जाता है। लेकिन बड़ा आनंद और बड़ा प्रबल आकर्षण इसमें है। भगवान ने अपनी कुछ बड़ी भयंकर शर्तें रख दी हैं, जिनकी पालना बड़ी कठिन ही नहीं, लगभग असंभव है। लेकिन हम भी उन्हें पा कर ही रहेंगे।

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(१) पहली शर्त तो है — अव्यभिचारिणी भक्ति और अनन्य योग। भगवान ने अपने स्वयं के अतिरिक्त अन्य किसी भी चाहत को व्यभिचार कहा है। उनकी उपासना में यह भाव कि उनके अतिरिक्त अन्य कोई भी या कुछ भी नहीं है; का होना अनिवार्य है। भगवान बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं। वे १००% प्रेम मांगते हैं। उनके यहाँ ९९.९९% भी नहीं चलता।
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(२) दूसरी शर्त तो और भी भयंकर है। इसमें उनका मांग-पत्र है जैसे कोई लड़का अपने विवाह में दहेज मांग रहा हो। उनकी मांगे निम्न हैं --
"अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम॥"
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(३) उनकी तीसरी शर्त उनके मांग-पत्र का अगला पृष्ठ है --
इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म मृत्यु वृद्धावस्था व्याधि और दुख में दोष दर्शन॥"
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(४) उनकी चौथी शर्त जो उनके मांग-पत्र का अगला व अंतिम पृष्ठ है --
"आसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता॥"
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मेरा मामला तो पूरी तरह से बिगड़ चुका है। बड़ी निराशाजनक, नियंत्रण से बाहर, विफल हो गई Hopeless स्थिति है। लेकिन जहां भी मैं हूँ, वहाँ भगवान को आना ही पड़ेगा। वे भी मेरे बिना नहीं रह सकते। ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर / १८ अप्रेल २०२६

भारत की आध्यात्मिकता में भारत की सब समस्याओं का समाधान है ---

 मुझे वर्ग-भेद और वर्ग-संघर्ष से भय लगता है, क्योंकि वर्ग-संघर्ष से मार्क्सवाद का जन्म होता है। मुझे मार्क्सवाद से भय इसलिये लगता है क्योंकि मार्क्सवाद की नारकीयता को मैं बहुत गहराई से समझता हूँ। मार्क्सवाद का सबसे बड़ा शत्रु है भारत का वेदान्त-दर्शन। भारत के वेदान्त और योग-दर्शन के समक्ष मार्क्सवाद कहीं भी नहीं टिकता। इसीलिए मार्क्स, धर्म को अफीम का नशा कहता है।

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भारत की आध्यात्मिकता में भारत की सब समस्याओं का समाधान है। स्कन्द-पुराण के अनुसार शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही सत्य की दो अभिव्यक्तियाँ हैं। विष्णुसहस्त्रनाम के अनुसार भगवान विष्णु स्वयं ही यह विश्व बन गये हैं। भगवान विष्णु की समग्रता का ध्यान सम्पूर्ण सृष्टि यानि सम्पूर्ण ब्रह्मांड की विराटता का ध्यान है, जो हमें परमशिव पुरुषोत्तम की अनुभूति कराता है।
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥"
"पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः।
अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च॥२॥"
"योगो योग-विदां नेता प्रधान-पुरुषेश्वरः।
नारसिंह-वपुः श्रीमान केशवः पुरुषोत्तमः ॥३॥" (विष्णु सहस्त्रनाम)
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जो व्यक्ति भगवान विष्णु के अनंत विराट स्वरूप का नित्य नियमित ध्यान करता है वह इस पृथ्वी पर चलता-फिरता देवता है। सूक्ष्म जगत के देवता भी उसे नमन करते हुए आनंदित होते हैं। वह कुल और वे माता-पिता भी धन्य हैं जहां ऐसे महात्मा का जन्म होता है। उसकी सात पीढ़ियों का तुरंत उद्धार हो जाता है।
सार की बात यह है कि हम भगवान विष्णु की अनंत विराटता की चेतना में रहें। यही श्रीमद्भगवद्गीता में बताई हुई ब्राह्मीस्थिति है और यही कूटस्थ-चैतन्य है। यही ब्रह्मबोध है।
ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
१८ अप्रेल २०२६

हम भगवान विष्णु की अनंत विराटता की चेतना में रहें ---

 जो व्यक्ति भगवान विष्णु के अनंत विराट स्वरूप का नित्य नियमित ध्यान करता है वह इस पृथ्वी पर चलता-फिरता देवता है। सूक्ष्म जगत के देवता भी उसे नमन करते हुए आनंदित होते हैं। वह कुल और वे माता-पिता भी धन्य हैं जहां ऐसे महात्मा का जन्म होता है। उसकी सात पीढ़ियों का तुरंत उद्धार हो जाता है।

सार की बात यह है कि हम भगवान विष्णु की अनंत विराटता की चेतना में रहें। यही श्रीमद्भगवद्गीता में बताई हुई ब्राह्मीस्थिति है और यही कूटस्थ-चैतन्य है। यही ब्रह्मबोध है।
ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥ १८ अप्रेल २०२६

अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती की हार्दिक शुभ कामनाएँ --- .

 अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती की हार्दिक शुभ कामनाएँ ---

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हमारे पुण्य अक्षय हों। हमारा राष्ट्र परम वैभव को प्राप्त हो। हमारे राष्ट्र को सदा सही नेतृत्व मिले और कायरता का कोई अवशेष हम में न रहे। हम सब के जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो। आज की जैसी परिस्थितियाँ और वातावरण है उसमें हमें परशुराम जैसे अनेक व्यक्तित्वों की आवश्यकता है जो अधर्म का नाश कर धर्म की पुनः स्थापना कर सकें। हमें परशुराम की प्रतीक्षा है।
"ॐ जामदग्न्याय च विद्महे महावीराय च धीमहि, तन्नो परशुराम: प्रचोदयात्।"
परशुराम जयंती पर भगवान विष्णु के अनंत विराट रूप का ध्यान करें, जिसमें सारा ब्रह्मांड यानि समस्त सृष्टि समाहित हो, और अपने अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को उसमें विलीन कर दें।
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जब परशुराम पर मातृ-हत्या का पाप चढ़ा, वे उससे मुक्ति पाने को सभी तीर्थों में फिरे, किन्तु, कहीं भी परशु पर से उनकी वज्रमूठ नहीं खुली यानी उनके मन में से पाप का भान नहीं दूर हुआ। तब पिता ने उनसे कहा कि कैलास के समीप जो ब्रह्मकुण्ड है, उसमें स्नान करने से यह पाप छूट जायगा। निदान, परशुराम हिमालय पर चढ़कर कैलास पहुँचे और ब्रह्मकुण्ड में उन्होंने स्नान किया। ब्रह्मकुण्ड में डुबकी लगाते ही परशु उनके हाश से छूट कर गिर गया अर्थात् उनका मन पाप-मुक्त हो गया। तीर्थ को इतना जाग्रत देखकर परशुराम के मन में यह भाव जगा कि इस कुण्ड के पवित्र जल को पृथ्वी पर उतार देना चाहिए। अतएव, उन्होंने पर्वत काट कर कुण्ड से एक धारा निकाली, जिसका नाम, ब्रह्मकुण्ड से निकलने के कारण, ब्रह्मपुत्र हुआ। ब्रह्मकुण्ड का एक नाम लोहित-कुण्ड भी मिलता है। कुछ विद्वान कहते हैं कि ब्रह्मपुत्र की धारा परशुराम ने ब्रह्मकुण्ड से ही निकाली थी, आगे चलकर वह धारा लोहित-कुण्ड नामक एक अन्य कुण्ड में समा गयी। परशुराम ने उस कुण्ड से भी धारा को आगे निकाला, इसलिए, ब्रह्मपुत्र का एक नाम लोहित भी मिलता है। स्वयं कालिदास ने ब्रह्मपुत्र को लोहित नाम से ही अभिहित किया है। और जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी पर्वत से पृथ्वी पर अवतीर्ण होती है, वहाँ आज भी परशुराम-कुण्ड मौजूद है, जो हिन्दुओं का एक परम पवित्र तीर्थ माना जाता है। लोहित में गिर कर जब परशुराम का कुठार पाप-मुक्त हो गया, तब उस कुठार से उन्होंने एक सौ वर्ष तक लड़ाइयाँ लड़ीं और समन्तपंचक में पाँच शोणित-ह्रद बना कर पितरों का तर्पण किया। जब उनका प्रतिशोध शान्त हो गया, उन्होंने कोंकण के पास पहुँच कर अपना कुठार समुद्र में फेंक दिया और वे नवनिर्माण में प्रवृत्त हो गये। भारत का वह भाग, जो अब कोंकण और केरल कहलाता है, भगवान् परशुराम का ही बसाया हुआ है।
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भगवान विष्णु के दशावतारों में से छठे अंशावतार भगवान परशुराम हैं। उन्होने अधर्म के नाश व धर्म की स्थापना के लिए माता रेणुका और ऋषि जमदग्नि के घर त्रेतायुग में जन्म लिया था। वे चिरंजीवी हैं। पृथ्वी से अहंकारी व अधर्मी शासकों के विनाश के लिए उन्होंने भगवान शिव की आराधना की व उनसे एक परशु (फरसा) प्राप्त किया। द्वापर युग तक उनकी उपस्थिति का वर्णन मिलता है। परशुराम को 'भार्गव राम' या 'जामदग्न्य' के नाम से भी जाना जाता है।
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पुनश्च सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ। धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो। असत्य और अंधकार की भी सभी शक्तियों का नाश हो। भारत भूमि पर परशुराम जैसे अनेक परम तपस्वियों का जन्म हो। हर हर महादेव!!
महादेव महादेव महादेव!! ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ अप्रेल २०२६

मैं तटस्थ नहीं रह सकता। नदी के तीर पर खड़ा हूँ, नदी में छलांग लगाये बिना नहीं रह सकता। जो होगा सो देखा जायेगा। यदि प्रारब्ध में जीवन लिखा है तो जीवित रहूँगा, अन्यथा होनी को कोई रोक नहीं सकता।

 मैं तटस्थ नहीं रह सकता। नदी के तीर पर खड़ा हूँ, नदी में छलांग लगाये बिना नहीं रह सकता। जो होगा सो देखा जायेगा। यदि प्रारब्ध में जीवन लिखा है तो जीवित रहूँगा, अन्यथा होनी को कोई रोक नहीं सकता।

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तीर पर कैसे रुकूँ मैं आज लहरों का निमंत्रण? मैं कहीं भी टिक नहीं पाता। प्रवाह ही तृप्ति है, प्रवाह ही जीवन है, और निष्क्रियता मृत्यु। प्रवाह का आरंभ ही स्पंदन है। वह स्पंदन ही हमें परमात्मा की अनभूति कराता है।
"विषमता की पीड़ा से व्यक्त, हो रहा स्पंदित विश्व महान।" प्रवाह परमात्मा है। उसमें स्वयं का विलय ही परमात्मा की प्राप्ति है। वह प्रवाह हमें कूटस्थ (अविनाशी आत्म-तत्व) में अनुभूत होता है। उसी में विसर्जित हो जाना भगवान को समर्पण है।
(इस आलेख का आरंभ बच्चन जी की एक कविता की एक पंक्ति से किया था। आगे प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी की कुछ पंक्तियों का सहारा लिया है। फिर सामवेद के छांदोग्य उपनिषद में ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार और देवर्षि नारद के साथ सत्संग लाभ लेते हैं।)
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"तपस्वी क्यों हो इतने क्लांत? वेदना का यह कैसा वेग?
आह! तुम कितने अधिक हताश, बताओ यह कैसा उद्वेग?"
"जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
जगत की ज्वालाओं का मूल।
ईश का वह रहस्य वरदान,
कभी मत इसको जाओ भूल॥"
"विषमता की पीडा से व्यक्त, हो रहा स्पंदित विश्व महान।
यही दुख-सुख विकास का सत्य, यही भूमा का मधुमय दान।"
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यहाँ भूमा तत्व की बात की गई है। भूमा तत्व ही ब्रह्मज्ञान है। इस शब्द का प्रयोग ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार ने अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को उपदेश देते समय किया है। भूमा के प्रति सचेतन हो जाना ही ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति है। इसका संकेत सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद (७:२३:१) में है।
(इसका ज्ञान ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य और भगवत्-कृपा से ही हो सकता है।) भगवान सनतकुमार की कृपा ही इसका बोध करा सकती है :--- "यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति॥"
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इसके अर्थ और इससे आगे की अनभूति सुपात्र शिष्य को अनंत ज्योतिर्मय ब्रह्म, और भगवान विष्णु की अनंत विराटता के गहन ध्यान में गुरु रूप ब्रह्म की परम कृपा से ही होती है। हरेक श्रद्धालु को इसकी अनुभूति का अधिकार है, लेकिन सद्गुरु रूप ब्रह्म की परम कृपा का होना भी अति आवश्यक है। यही ब्रह्मज्ञान है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ अप्रेल २०२६

आने वाले समय में धर्म की, और वर्तमान लोकतन्त्र के स्थान पर धर्मरक्षक क्षत्रिय राजाओं के राज्य की पुनः स्थापना होगी।

 मुझे बार बार यह अनुभूति होती है कि आने वाले समय में धर्म की, और वर्तमान लोकतन्त्र के स्थान पर धर्मरक्षक क्षत्रिय राजाओं के राज्य की पुनः स्थापना होगी। युग-परिवर्तन और धर्म की पुनः स्थापना का समय लगभग आ गया है। धर्म एक ही है जिसे वैशेषिक-सूत्रों में कणाद ऋषि ने परिभाषित किया है और मनुस्मृति में जिसके दस लक्षण बताए गए हैं। महाभारत ग्रंथ में इसे बड़ी गहराई से समझाया गया है। मुझे अपने स्वधर्म का बोध है और उसे ही निज जीवन में व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ। "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह" -- इसके अतिरिक्त कहने को अन्य कुछ भी नहीं है। ॐ तत् सत् !!

कृपा शंकर
२० अप्रेल २०२६

भगवत्पाद आद्यगुरु आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) के २५३३ वें जयंती महामहोत्सव (२१ अप्रेल २०२६) की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएं, बधाई और अभिनंदन ---

  भगवत्पाद आद्यगुरु आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) के २५३३ वें जयंती महामहोत्सव (२१ अप्रेल २०२६) की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएं, बधाई और अभिनंदन ---

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आज वैशाख शुक्ल पंचमी (२१ अप्रेल २०२६) को आचार्य शंकर की २५३३ वीं जयंती है। उनका जन्म जीसस क्राइस्ट से ५०८ वर्ष पूर्व वैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था। इसी तरह उनका देहावसान जीसस क्राइस्ट से ४७४ वर्ष पूर्व हुआ था। दुर्भावना से पश्चिमी विद्वान् उनका जन्म ईसा के ७८८ वर्ष बाद होना बताते हैं, जो गलत है। शंकराचार्य मठों से उपलब्ध प्राचीनतम पांडुलिपियों, अन्य ग्रंथों में दिए विवरणों और ग्रहों की तत्कालीन स्थितियों के आधार पर उनकी सही जन्म तिथि की गणना भारतीय विद्वानों द्वारा दुबारा की गई थी।
उनकी जयंती पर उन को नमन एवं सभी सनातन धर्मावलम्बियों का अभिनन्दन॥
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एक महानतम परम विलक्षण प्रतिभा जिसने कभी इस पृथ्वी पर विचरण कर सनातन धर्म का पुनरोद्धार किया था, के बारे में लिखने का मेरा यह प्रयास सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। आज वैशाख शुक्ल पञ्चमी को उनका जन्म मेरे जैसे उनकी परंपरा के सभी अनुयायियों के ह्रदय में हुआ है, अतः शिव स्वरुप भगवान भाष्यकार शङ्करभगवद्पादाचार्य को नमन, जिनकी परम ज्योति हमारे कूटस्थ (अविनाशी आत्म-चैतन्य) में निरंतर प्रज्ज्वलित है।
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आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को मालाबार प्रान्त (केरल) के कालड़ी गाँव में तैत्तिरीय शाखा के एक यजुर्वेदी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे माता-पिता की एकमात्र सन्तान थे। बचपन में ही उनके पिता का देहान्त हो गया था। उस समय सारे भारत में नास्तिकता का बोलबाला था। उस नास्तिकता के प्रभाव को दूरकर उन्होंने वेदान्त और भक्ति की ज्योति से सारे देश को आलोकित कर दिया। सनातन धर्म की रक्षा हेतु उन्होंने भारत में चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की तथा शंकराचार्य पद की स्थापना करके उस पर अपने चारों शिष्यों को आसीन किया।
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आदि शंकराचार्य के बारे में सामान्य जन में यही धारणा है कि उन्होंने सिर्फ अद्वैतवाद या अद्वैत वेदांत को प्रतिपादित किया। पर यह सही नहीं है। अद्वैतवादी से अधिक वे एक भक्त थे, और उन्होंने भक्ति को अधिक महत्व दिया। अद्वैतवाद के प्रतिपादक तो उनके परम गुरु ऋषि गौड़पाद थे, जिन्होनें 'माण्डुक्यकारिका' ग्रन्थ की रचना की। आचार्य गौड़पाद ने माण्डुक्योपनिषद पर आधारित अपने ग्रन्थ मांडूक्यकारिका में जिन तत्वों का निरूपण किया उन्हीं का शंकराचार्य ने विस्तृत रूप दिया। अपने परम गुरु को श्रद्धा निवेदन करने हेतु शंकराचार्य ने सबसे पहिले माण्डुक्यकारिका पर भाष्य लिखा।
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शंकराचार्य के गुरु योगीन्द्र गोविन्दपाद थे जिन्होंने पिचासी श्लोकों के ग्रन्थ 'अद्वैतानुभूति' की रचना की। उनकी और भगवान पातंजलि की गुफाएँ पास पास ओंकारेश्वर के निकट नर्मदा तट पर घने वन में हैं। वहाँ आसपास और भी गुफाएँ हैं जहाँ अनेक सिद्ध संत तपस्यारत हैं। पूरा क्षेत्र तपोभूमि है। राजाधिराज मान्धाता ने यहीं पर शिवजी के लिए इतनी घनघोर तपस्या की थी कि शिवजी को ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होना पड़ा जो ओंकारेश्वर कहलाता है।
अपने 'विवेक चूडामणि' ग्रन्थ में शंकराचार्य कहते हैं ---
"भक्ति प्रसिद्धा भव मोक्षनाय नात्र ततो साधनमस्ति किंचित्।"
-- "साधना का आरम्भ भी भक्ति से होता है और उसका चरम उत्कर्ष भी भक्ति में ही होता है|"
भक्ति और ज्ञान दोनों एक ही हैं। उन्होंने संस्कृत भाषा में इतने सुन्दर भक्ति पदों की रचनाएँ की हैं जो अति दिव्य और अनुपम हैं। उनमे भक्ति की पराकाष्ठा है। इतना ही नहीं परम ज्ञानी के रूप में उन्होंने ब्रह्म सूत्रों, उपनिषदों और गीता पर भाष्य लिखे हैं जो अनुपम हैं।
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यदि भगवान भाष्यकार आदि शंकराचार्य तत्कालीन विकृत हो चुके नास्तिक बौद्ध मत का खंडन करके सनातन धर्म की पुनःस्थापना नहीं करते तो आज भारत, भारत नहीं होता, बल्कि एक पूर्णरूपेण इस्लामिक देश होता। इस्लाम का प्रतिरोध भारत इसी लिए कर पाया क्योंकि यहाँ सनातन धर्म पुनः स्थापित हो चुका था। बौद्धों ने अपना सिर कटा लिया या धर्मान्तरित हो गए पर इस्लाम की धार का प्रतिरोध नहीं कर पाये। तुर्की सहित पूरा मध्य एशिया (उज्बेकिस्तान, कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान) और अफगानिस्तान बौद्ध मतानुयायी हो गया था। वहाँ के मुसलमान पहिले हिन्दू थे, फिर बौद्ध बने। बौद्ध मत में अनेक विकृतियाँ आ गयीं और उसके अनुयायी अत्यधिक अहिंसक और बलहीन हो गये। वे इस्लाम की धार का सामना नहीं कर पाये और मुसलमान बनने को बाध्य हो गए।
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जब इस्लाम का जन्म हुआ तब इस्लाम की आक्रामक धार इतनी तीक्ष्ण थी कि १०० वर्ष के भीतर भीतर पूरा अरब (जो हिन्दू था), बेबीलोन (वर्तमान इराक, कुवैत), पश्चिम एशिया -- यमन से लेबनान तक, उत्तरी अफ्रीका (सोमालिया, इथियोपिया, जिबूती, सूडान, मिश्र, लीबिया, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया और मोरक्को), मध्य एशिया के सारे देश (ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, अज़र्बेजान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान आदि), रूस के तातारिस्तान, देगिस्तान व चेचेनिया आदि प्रदेश और पूरा फारस (वर्त्तमान ईरान) इस्लाम की पताका के अंतर्गत आ गये।
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लेकिन इस्लाम की आंधी लगभग एक सहस्त्र वर्ष राज्य कर के भी भारत को नष्ट नहीं कर पाई, क्योंकि यहाँ सनातन धर्म के अनुयायियों द्वारा भक्ति आन्दोलन द्वारा हर प्रकार के विदेशी आक्रमण का प्रतिरोध हुआ। मौलाना हाली ने दुःख प्रकट करते हुए लिखा था ---
"वो दीने हिजाजी का बेबाक बेड़ा
निशां जिसका अक्साए आलम में पहुंचा
मज़ाहम हुआ कोई खतरा न जिसका
न अम्मां में ठटका, न कुलज़म में झिझका
किए पै सिपर जिसने सातों समंदर
वो डुबा दहाने में गंगा के आकर॥"
यानी इस्लाम का जहाज़ी बेड़ा जो सातों समुद्र बेरोक-टोक पार करता गया और अजेय रहा, वह जब हिंदुस्थान पहुंचा और उसका सामना यहां की संस्कृति से हुआ तो वह गंगा की धारा में सदा के लिए डूब गया॥
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मेरी दृष्टी में भगवान भाष्यकार शङ्कर भगवद्पादाचार्य महानतम और दिव्यतम प्रतिभा थे जिन्होंने ढ़ाई हजार वर्षों पूर्व इस धरा पर विचरण किया। सनातन धर्म की रक्षा ऐसे ही महापुरुषों से हुई है। धन्य है यह भारतभूमि जिसने ऐसी महान आत्माओं को जन्म दिया।
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सिंध पर पहला सफल इस्लामी आक्रमण सन ७१२ ईस्वी में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुआ था। इस अभियान में राजा दाहिर को हराकर सिंध पर विजय प्राप्त की गयी जो भारत में इस्लामी शासन का आरंभ था। अतः अंग्रेज़ इतिहासकारों द्वारा आदि शंकराचार्य का जन्म सन ७८८ ई में बताना तो और भी हास्यास्पद है।
सत्य तो यह भी है कि गुरु गोरखनाथ का जन्म आचार्य शंकर से भी बहुत पहिले हुआ था जिसे अंग्रेज़ इतिहासकार ११वीं सदी में बताते हैं। योग और तंत्र शास्त्र कालखंड में लुप्त हो गये थे जिन्हें नाथ संप्रदाय के योगियों ने ढूंढ निकाला। आचार्य शंकर श्रीविद्या यानि भगवती श्रीललितामहात्रिपुरसुंदरी की आराधना करते थे। उन्हें श्रीविद्या के तंत्र में दीक्षा गुरु गोरखनाथ ने दी थी। यह बात मुझे एक सिद्ध दण्डी सन्यासी ने बताई थी।
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ अप्रेल २०२६

(१) सर्वश्रेष्ठ तीर्थ कौन सा है? (२) मन को कहाँ लगाएं? (३) किस की व क्या उपासना करें? (४) मनुष्य जीवन की सार्थकता क्या है? (५) कूटस्थ का अर्थ क्या है?

 (उत्तर) : (१) जहां भी मेरा अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) स्वतः ही कूटस्थ में रमण करने लगे, वहीं सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। (२) अपने मन को सब विषय-वासनाओं से बाहर खींचकर निरंतर कूटस्थ में ही लगाये रखें। (३) कूटस्थ में स्वयं को विलीन कर कूटस्थ की ही उपासना करें। (४) मनुष्य जीवन की सार्थकता कूटस्थ-चैतन्य यानि ब्राह्मी स्थिति है। (५) "कालव्यापी अविनाशी आत्म-तत्व को ही 'कूटस्थ' कहते है।"

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श्रीमद्भगवद्गीता में "कूटस्थ", भगवान श्रीकृष्ण द्वारा प्रयुक्त शब्द है। अमरकोष के अनुसार कूटस्थ का अर्थ है -- "कालव्यापी स कूटस्थ:" अर्थात जो काल को व्याप्त किए हुए है, वह त्रिकालकर्ता -- भूत, भविष्य, और वर्तमान का नियंत्रक "कूटस्थ" है। समष्टि में व्याप्त चैतन्य सत्ता ही "कूटस्थ" है। मुझे जो समझ में आया है, उसके अनुसार कूटस्थ शब्द का अर्थ -- "कालव्यापी अविनाशी आत्म तत्व" है, जिसकी अनुभूति तो सर्वत्र होती है, लेकिन कहीं भी दिखाई नहीं देता। कूटस्थ यानि आत्म-तत्व का कभी नाश नहीं हो सकता। "अविनाशी आत्म-तत्व ही कूटस्थ है।"
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(प्रश्न) : मुझे कूटस्थ शब्द का अर्थ कैसे समझ में आया?
(उत्तर) : एक दिन ध्यान करते करते विद्युत की आभा के समान एक ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होकर समस्त ब्रह्मांड में फैल गयी। उस ज्योति की आभा सर्वत्र थी, सब कुछ यानि सारा अस्तित्व उस ज्योति में था। उससे परे कुछ भी नहीं था। अपना दर्शन देकर वह ज्योति धीरे धीरे कुछ समय पश्चात लुप्त हो गयी। लेकिन ध्यान-साधना में अब उसके दर्शन नित्य होते हैं। धीरे धीरे उस ज्योति के साथ साथ प्रणव नाद का भी श्रवण होने लगा। उस ज्योति के दर्शन, और नादानुसंधान -- कूटस्थ में नित्य होने लगे हैं। उनके बिना हृदय तड़प उठता है। इससे कूटस्थ शब्द का अर्थ ठीक से समझ में आया।
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जब तक पूर्ण तृप्ति और संतुष्टि न मिले, तब तक भगवान का खूब ध्यान करें। उन्हें अपनी स्मृति में हर समय रखें। जब भी समय मिले भगवान का स्मरण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करें।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! महादेव महादेव महादेव !!
कृपा शंकर
२२ अप्रेल २०२६

निष्काम भाव से "आत्मा" यानि "आत्म-तत्व" की ही साधना करनी चाहिए ---

 निष्काम भाव से "आत्मा" यानि "आत्म-तत्व" की ही साधना करनी चाहिए ---

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यह मेरा निजी अनुभव है कि स्वयं से पृथक कुछ भी नहीं है। निष्काम साधना ही हमें जीवनमुक्त बना सकती है। सकाम साधना -- बंधन और पुनर्जन्म का कारण बनती हैं। किसी भी तरह की कोई कामना या आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। जो भी साधना भोग व योग दोनों का आश्वासन देती हैं, वे भी बंधनों में ही डालती हैं। जैसे प्रकाश और अंधकार साथ-साथ नहीं रह सकते, वैसे ही राम और काम कभी साथ साथ नहीं हो सकते। इसी लिए गीता में भगवान हमें निष्काम, वीतराग, निस्त्रेगुण्य और स्थितप्रज्ञ होने को कहते हैं। साधना वो ही करनी चाहिए जो हमें वीतराग, निस्त्रेगुण्य और स्थितप्रज्ञ बनाती हैं। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२३ अप्रेल २०२६

"ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥"

 "ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥"

कर्ता भाव से मुक्त होकर निरंतर आत्मा में रमण करें। आत्माराम का कोई कर्तव्य नहीं है। भगवान कहते हैं ---
"जो मनुष्य आत्मा में ही रमने वाला, आत्मा में ही तृप्त, तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट है, उसके लिये इस कोई संसार में कोई कर्तव्य नहीं रहता॥३:१७॥"
"इस जगत् में उस पुरुष का कृत और अकृत से कोई प्रयोजन नहीं है और न वह किसी वस्तु के लिये भूतमात्र पर आश्रित होता है॥३"१८॥""
"इसलिए, तुम अनासक्त होकर सदैव कर्तव्य कर्म का सम्यक् आचरण करो; क्योकि, अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ परमात्मा को प्राप्त होता है॥३:१९॥"
"जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है॥१८:१७॥"
"यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥३:१७॥"
"नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥३:१८॥"
"तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥३:१९॥"
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१८:१७॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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सभी में परमात्मा को नमन !! ॐ तत् सत्।
कृपा शंकर
२४ अप्रेल २०२६

भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करते करते जो मनुष्य इस देह का त्याग करते हैं, उन्हें परमगति प्राप्त होती है।

 श्रीमद्भगवद्गीता का पंद्रहवाँ अध्याय (पुरुषोत्तम योग) मुझे सर्वप्रिय है। यह पूरी श्रीमद्भगवद्गीता का सार है। इस की साधना और ध्यान में जितना आनंद मिलता है, उतना अन्यत्र कहीं भी नहीं है। यही इस जीवन का सार है। इस संसार से विदाई के समय भगवान पुरुषोत्तम का ही सचेतन ध्यान हो, पुरुषोत्तम योग का ही सचेतन पाठ हो, और उन्हीं का ध्यान करते करते उन्हीं के लोक में गति हो। जो भगवान पुरुषोत्तम हैं, वे ही परमशिव हैं। दोनों में कोई भेद नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!

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"ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ॥ (१)
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ (२)
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ (३)
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ (४)
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌ ॥ (५)
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ (६)
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ (७)
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्‌ ॥ (८)
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ (९)
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌ ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ (१०)
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्‌ ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ (११)
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्‌ ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्‌ ॥ (१२)
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ (१३)
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्‌ ॥ (१४)
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्‌ ॥ (१५)
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ (१६)
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ (१७)
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ (१८)
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्‌ ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ (१९)
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥" (२०)
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जीवन के अंतकाल में पुरुषोत्तम-योग का पाठ करते करते, और भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करते करते जो मनुष्य इस देह का त्याग करते हैं, उन्हें परमगति प्राप्त होती है। इसे कंठस्थ करके इसका पाठ नित्य करें। भगवान पुरुषोत्तम की उपासना से बड़ी कोई अन्य उपासना नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!

"हं सः" मैं वह हूँ। यह समस्त ब्रह्मांड, यह सारी सृष्टि मैं हूँ।

 हम भगवान का ध्यान या भजन करते हैं; यह हमारा भ्रम है, जो जितनी शीघ्र टूट जाये उतना अच्छा ! भगवान ही हमारा ध्यान रखते हैं, वे ही हमारे प्राण व सर्वस्व हैं। भगवान ही हमारे माध्यम से स्वयं की साधना करते हैं। वे हमारे साथ एक हैं। वे ही अपना ध्यान कर रहे हैं --

"हं सः" मैं वह हूँ। यह समस्त ब्रह्मांड, यह सारी सृष्टि मैं हूँ।
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हमारे अस्तित्व के पीछे परमात्मा का प्रकाश है। उस प्रकाश पर आस्था, श्रद्धा और विश्वाश रखिये। जो भी होगा वह अच्छा ही होगा। परमात्मा को हर समय अपनी स्मृति में रखें। रात्री को सोने से पूर्व, और प्रातःकाल उठते ही कुछ देर उन का भजन करें। सभी श्रद्धालुओं की रक्षा होगी। परमात्मा का इतना चिंतन करें कि वे ही हमारी सारी चिंताएँ करें। वे हर समय हर स्थान पर हमारे साथ हैं। हमारा प्रथम, अंतिम और एकमात्र लक्ष्य परमात्मा को उपलब्ध होना है। परमात्मा ही परम सत्य है। परमात्मा में हम सब एक हैं। परमात्मा ही हमारे अस्तित्व हैं।
प्रियतम परमात्मा से पृथक कोई भी या कुछ भी अन्य नहीं है। जहाँ हम हैं, वहीं हमारे प्रियतम हैं। कोई भेद नहीं है। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
२५ अप्रेल २०२६

ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।

 ले चल वहाँ भुलावा देकर

मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।
जिस निर्जन में सागर लहरी,
अम्बर के कानों में गहरी,
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो-
तज कोलाहल की अवनी रे ।
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समीक्षकों की दृष्टि में जयशंकर प्रसाद की लिखी यह कविता हिंदी साहित्य में छायावाद की एक उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है। लेकिन मेरी दृष्टि में यह परमात्मा की भक्ति की एक उत्कृष्ट रचना है। यहाँ नाविक कौन है? परमात्मा ही नाविक है। यहाँ निर्जन में सागर लहरी -- स्वयं का अस्तित्व यानि कूटस्थ-चैतन्य है। कोलाहल की अवनी में प्रेम-कथा -- परमात्मा के नाम यानि प्रणव की ध्वनि का स्पंदन है जो निरंतर सुनाई दे रहा है। चारों ओर आनंद ही आनंद है। परमात्मा के सिवाय किसी अन्य का कोई अस्तित्व ही नहीं है। पूरी कविता इस प्रकार है --
ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।
जिस निर्जन में सागर लहरी,
अम्बर के कानों में गहरी,
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो-
तज कोलाहल की अवनी रे ।
जहाँ साँझ-सी जीवन-छाया,
ढीली अपनी कोमल काया,
नील नयन से ढुलकाती हो-
ताराओं की पाँति घनी रे ।
जिस गम्भीर मधुर छाया में,
विश्व चित्र-पट चल माया में,
विभुता विभु-सी पड़े दिखाई-
दुख-सुख बाली सत्य बनी रे ।
श्रम-विश्राम क्षितिज-वेला से
जहाँ सृजन करते मेला से,
अमर जागरण उषा नयन से-
बिखराती हो ज्योति घनी रे !
ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।