Saturday, 27 June 2026

भारत की आध्यात्मिकता में भारत की सब समस्याओं का समाधान है ---

 मुझे वर्ग-भेद और वर्ग-संघर्ष से भय लगता है, क्योंकि वर्ग-संघर्ष से मार्क्सवाद का जन्म होता है। मुझे मार्क्सवाद से भय इसलिये लगता है क्योंकि मार्क्सवाद की नारकीयता को मैं बहुत गहराई से समझता हूँ। मार्क्सवाद का सबसे बड़ा शत्रु है भारत का वेदान्त-दर्शन। भारत के वेदान्त और योग-दर्शन के समक्ष मार्क्सवाद कहीं भी नहीं टिकता। इसीलिए मार्क्स, धर्म को अफीम का नशा कहता है।

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भारत की आध्यात्मिकता में भारत की सब समस्याओं का समाधान है। स्कन्द-पुराण के अनुसार शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही सत्य की दो अभिव्यक्तियाँ हैं। विष्णुसहस्त्रनाम के अनुसार भगवान विष्णु स्वयं ही यह विश्व बन गये हैं। भगवान विष्णु की समग्रता का ध्यान सम्पूर्ण सृष्टि यानि सम्पूर्ण ब्रह्मांड की विराटता का ध्यान है, जो हमें परमशिव पुरुषोत्तम की अनुभूति कराता है।
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥"
"पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः।
अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च॥२॥"
"योगो योग-विदां नेता प्रधान-पुरुषेश्वरः।
नारसिंह-वपुः श्रीमान केशवः पुरुषोत्तमः ॥३॥" (विष्णु सहस्त्रनाम)
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जो व्यक्ति भगवान विष्णु के अनंत विराट स्वरूप का नित्य नियमित ध्यान करता है वह इस पृथ्वी पर चलता-फिरता देवता है। सूक्ष्म जगत के देवता भी उसे नमन करते हुए आनंदित होते हैं। वह कुल और वे माता-पिता भी धन्य हैं जहां ऐसे महात्मा का जन्म होता है। उसकी सात पीढ़ियों का तुरंत उद्धार हो जाता है।
सार की बात यह है कि हम भगवान विष्णु की अनंत विराटता की चेतना में रहें। यही श्रीमद्भगवद्गीता में बताई हुई ब्राह्मीस्थिति है और यही कूटस्थ-चैतन्य है। यही ब्रह्मबोध है।
ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
१८ अप्रेल २०२६

हम भगवान विष्णु की अनंत विराटता की चेतना में रहें ---

 जो व्यक्ति भगवान विष्णु के अनंत विराट स्वरूप का नित्य नियमित ध्यान करता है वह इस पृथ्वी पर चलता-फिरता देवता है। सूक्ष्म जगत के देवता भी उसे नमन करते हुए आनंदित होते हैं। वह कुल और वे माता-पिता भी धन्य हैं जहां ऐसे महात्मा का जन्म होता है। उसकी सात पीढ़ियों का तुरंत उद्धार हो जाता है।

सार की बात यह है कि हम भगवान विष्णु की अनंत विराटता की चेतना में रहें। यही श्रीमद्भगवद्गीता में बताई हुई ब्राह्मीस्थिति है और यही कूटस्थ-चैतन्य है। यही ब्रह्मबोध है।
ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥ १८ अप्रेल २०२६

अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती की हार्दिक शुभ कामनाएँ --- .

 अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती की हार्दिक शुभ कामनाएँ ---

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हमारे पुण्य अक्षय हों। हमारा राष्ट्र परम वैभव को प्राप्त हो। हमारे राष्ट्र को सदा सही नेतृत्व मिले और कायरता का कोई अवशेष हम में न रहे। हम सब के जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो। आज की जैसी परिस्थितियाँ और वातावरण है उसमें हमें परशुराम जैसे अनेक व्यक्तित्वों की आवश्यकता है जो अधर्म का नाश कर धर्म की पुनः स्थापना कर सकें। हमें परशुराम की प्रतीक्षा है।
"ॐ जामदग्न्याय च विद्महे महावीराय च धीमहि, तन्नो परशुराम: प्रचोदयात्।"
परशुराम जयंती पर भगवान विष्णु के अनंत विराट रूप का ध्यान करें, जिसमें सारा ब्रह्मांड यानि समस्त सृष्टि समाहित हो, और अपने अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को उसमें विलीन कर दें।
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जब परशुराम पर मातृ-हत्या का पाप चढ़ा, वे उससे मुक्ति पाने को सभी तीर्थों में फिरे, किन्तु, कहीं भी परशु पर से उनकी वज्रमूठ नहीं खुली यानी उनके मन में से पाप का भान नहीं दूर हुआ। तब पिता ने उनसे कहा कि कैलास के समीप जो ब्रह्मकुण्ड है, उसमें स्नान करने से यह पाप छूट जायगा। निदान, परशुराम हिमालय पर चढ़कर कैलास पहुँचे और ब्रह्मकुण्ड में उन्होंने स्नान किया। ब्रह्मकुण्ड में डुबकी लगाते ही परशु उनके हाश से छूट कर गिर गया अर्थात् उनका मन पाप-मुक्त हो गया। तीर्थ को इतना जाग्रत देखकर परशुराम के मन में यह भाव जगा कि इस कुण्ड के पवित्र जल को पृथ्वी पर उतार देना चाहिए। अतएव, उन्होंने पर्वत काट कर कुण्ड से एक धारा निकाली, जिसका नाम, ब्रह्मकुण्ड से निकलने के कारण, ब्रह्मपुत्र हुआ। ब्रह्मकुण्ड का एक नाम लोहित-कुण्ड भी मिलता है। कुछ विद्वान कहते हैं कि ब्रह्मपुत्र की धारा परशुराम ने ब्रह्मकुण्ड से ही निकाली थी, आगे चलकर वह धारा लोहित-कुण्ड नामक एक अन्य कुण्ड में समा गयी। परशुराम ने उस कुण्ड से भी धारा को आगे निकाला, इसलिए, ब्रह्मपुत्र का एक नाम लोहित भी मिलता है। स्वयं कालिदास ने ब्रह्मपुत्र को लोहित नाम से ही अभिहित किया है। और जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी पर्वत से पृथ्वी पर अवतीर्ण होती है, वहाँ आज भी परशुराम-कुण्ड मौजूद है, जो हिन्दुओं का एक परम पवित्र तीर्थ माना जाता है। लोहित में गिर कर जब परशुराम का कुठार पाप-मुक्त हो गया, तब उस कुठार से उन्होंने एक सौ वर्ष तक लड़ाइयाँ लड़ीं और समन्तपंचक में पाँच शोणित-ह्रद बना कर पितरों का तर्पण किया। जब उनका प्रतिशोध शान्त हो गया, उन्होंने कोंकण के पास पहुँच कर अपना कुठार समुद्र में फेंक दिया और वे नवनिर्माण में प्रवृत्त हो गये। भारत का वह भाग, जो अब कोंकण और केरल कहलाता है, भगवान् परशुराम का ही बसाया हुआ है।
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भगवान विष्णु के दशावतारों में से छठे अंशावतार भगवान परशुराम हैं। उन्होने अधर्म के नाश व धर्म की स्थापना के लिए माता रेणुका और ऋषि जमदग्नि के घर त्रेतायुग में जन्म लिया था। वे चिरंजीवी हैं। पृथ्वी से अहंकारी व अधर्मी शासकों के विनाश के लिए उन्होंने भगवान शिव की आराधना की व उनसे एक परशु (फरसा) प्राप्त किया। द्वापर युग तक उनकी उपस्थिति का वर्णन मिलता है। परशुराम को 'भार्गव राम' या 'जामदग्न्य' के नाम से भी जाना जाता है।
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पुनश्च सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ। धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो। असत्य और अंधकार की भी सभी शक्तियों का नाश हो। भारत भूमि पर परशुराम जैसे अनेक परम तपस्वियों का जन्म हो। हर हर महादेव!!
महादेव महादेव महादेव!! ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ अप्रेल २०२६

मैं तटस्थ नहीं रह सकता। नदी के तीर पर खड़ा हूँ, नदी में छलांग लगाये बिना नहीं रह सकता। जो होगा सो देखा जायेगा। यदि प्रारब्ध में जीवन लिखा है तो जीवित रहूँगा, अन्यथा होनी को कोई रोक नहीं सकता।

 मैं तटस्थ नहीं रह सकता। नदी के तीर पर खड़ा हूँ, नदी में छलांग लगाये बिना नहीं रह सकता। जो होगा सो देखा जायेगा। यदि प्रारब्ध में जीवन लिखा है तो जीवित रहूँगा, अन्यथा होनी को कोई रोक नहीं सकता।

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तीर पर कैसे रुकूँ मैं आज लहरों का निमंत्रण? मैं कहीं भी टिक नहीं पाता। प्रवाह ही तृप्ति है, प्रवाह ही जीवन है, और निष्क्रियता मृत्यु। प्रवाह का आरंभ ही स्पंदन है। वह स्पंदन ही हमें परमात्मा की अनभूति कराता है।
"विषमता की पीड़ा से व्यक्त, हो रहा स्पंदित विश्व महान।" प्रवाह परमात्मा है। उसमें स्वयं का विलय ही परमात्मा की प्राप्ति है। वह प्रवाह हमें कूटस्थ (अविनाशी आत्म-तत्व) में अनुभूत होता है। उसी में विसर्जित हो जाना भगवान को समर्पण है।
(इस आलेख का आरंभ बच्चन जी की एक कविता की एक पंक्ति से किया था। आगे प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी की कुछ पंक्तियों का सहारा लिया है। फिर सामवेद के छांदोग्य उपनिषद में ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार और देवर्षि नारद के साथ सत्संग लाभ लेते हैं।)
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"तपस्वी क्यों हो इतने क्लांत? वेदना का यह कैसा वेग?
आह! तुम कितने अधिक हताश, बताओ यह कैसा उद्वेग?"
"जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
जगत की ज्वालाओं का मूल।
ईश का वह रहस्य वरदान,
कभी मत इसको जाओ भूल॥"
"विषमता की पीडा से व्यक्त, हो रहा स्पंदित विश्व महान।
यही दुख-सुख विकास का सत्य, यही भूमा का मधुमय दान।"
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यहाँ भूमा तत्व की बात की गई है। भूमा तत्व ही ब्रह्मज्ञान है। इस शब्द का प्रयोग ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार ने अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को उपदेश देते समय किया है। भूमा के प्रति सचेतन हो जाना ही ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति है। इसका संकेत सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद (७:२३:१) में है।
(इसका ज्ञान ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य और भगवत्-कृपा से ही हो सकता है।) भगवान सनतकुमार की कृपा ही इसका बोध करा सकती है :--- "यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति॥"
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इसके अर्थ और इससे आगे की अनभूति सुपात्र शिष्य को अनंत ज्योतिर्मय ब्रह्म, और भगवान विष्णु की अनंत विराटता के गहन ध्यान में गुरु रूप ब्रह्म की परम कृपा से ही होती है। हरेक श्रद्धालु को इसकी अनुभूति का अधिकार है, लेकिन सद्गुरु रूप ब्रह्म की परम कृपा का होना भी अति आवश्यक है। यही ब्रह्मज्ञान है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ अप्रेल २०२६

आने वाले समय में धर्म की, और वर्तमान लोकतन्त्र के स्थान पर धर्मरक्षक क्षत्रिय राजाओं के राज्य की पुनः स्थापना होगी।

 मुझे बार बार यह अनुभूति होती है कि आने वाले समय में धर्म की, और वर्तमान लोकतन्त्र के स्थान पर धर्मरक्षक क्षत्रिय राजाओं के राज्य की पुनः स्थापना होगी। युग-परिवर्तन और धर्म की पुनः स्थापना का समय लगभग आ गया है। धर्म एक ही है जिसे वैशेषिक-सूत्रों में कणाद ऋषि ने परिभाषित किया है और मनुस्मृति में जिसके दस लक्षण बताए गए हैं। महाभारत ग्रंथ में इसे बड़ी गहराई से समझाया गया है। मुझे अपने स्वधर्म का बोध है और उसे ही निज जीवन में व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ। "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह" -- इसके अतिरिक्त कहने को अन्य कुछ भी नहीं है। ॐ तत् सत् !!

कृपा शंकर
२० अप्रेल २०२६

भगवत्पाद आद्यगुरु आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) के २५३३ वें जयंती महामहोत्सव (२१ अप्रेल २०२६) की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएं, बधाई और अभिनंदन ---

  भगवत्पाद आद्यगुरु आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) के २५३३ वें जयंती महामहोत्सव (२१ अप्रेल २०२६) की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएं, बधाई और अभिनंदन ---

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आज वैशाख शुक्ल पंचमी (२१ अप्रेल २०२६) को आचार्य शंकर की २५३३ वीं जयंती है। उनका जन्म जीसस क्राइस्ट से ५०८ वर्ष पूर्व वैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था। इसी तरह उनका देहावसान जीसस क्राइस्ट से ४७४ वर्ष पूर्व हुआ था। दुर्भावना से पश्चिमी विद्वान् उनका जन्म ईसा के ७८८ वर्ष बाद होना बताते हैं, जो गलत है। शंकराचार्य मठों से उपलब्ध प्राचीनतम पांडुलिपियों, अन्य ग्रंथों में दिए विवरणों और ग्रहों की तत्कालीन स्थितियों के आधार पर उनकी सही जन्म तिथि की गणना भारतीय विद्वानों द्वारा दुबारा की गई थी।
उनकी जयंती पर उन को नमन एवं सभी सनातन धर्मावलम्बियों का अभिनन्दन॥
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एक महानतम परम विलक्षण प्रतिभा जिसने कभी इस पृथ्वी पर विचरण कर सनातन धर्म का पुनरोद्धार किया था, के बारे में लिखने का मेरा यह प्रयास सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। आज वैशाख शुक्ल पञ्चमी को उनका जन्म मेरे जैसे उनकी परंपरा के सभी अनुयायियों के ह्रदय में हुआ है, अतः शिव स्वरुप भगवान भाष्यकार शङ्करभगवद्पादाचार्य को नमन, जिनकी परम ज्योति हमारे कूटस्थ (अविनाशी आत्म-चैतन्य) में निरंतर प्रज्ज्वलित है।
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आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को मालाबार प्रान्त (केरल) के कालड़ी गाँव में तैत्तिरीय शाखा के एक यजुर्वेदी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे माता-पिता की एकमात्र सन्तान थे। बचपन में ही उनके पिता का देहान्त हो गया था। उस समय सारे भारत में नास्तिकता का बोलबाला था। उस नास्तिकता के प्रभाव को दूरकर उन्होंने वेदान्त और भक्ति की ज्योति से सारे देश को आलोकित कर दिया। सनातन धर्म की रक्षा हेतु उन्होंने भारत में चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की तथा शंकराचार्य पद की स्थापना करके उस पर अपने चारों शिष्यों को आसीन किया।
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आदि शंकराचार्य के बारे में सामान्य जन में यही धारणा है कि उन्होंने सिर्फ अद्वैतवाद या अद्वैत वेदांत को प्रतिपादित किया। पर यह सही नहीं है। अद्वैतवादी से अधिक वे एक भक्त थे, और उन्होंने भक्ति को अधिक महत्व दिया। अद्वैतवाद के प्रतिपादक तो उनके परम गुरु ऋषि गौड़पाद थे, जिन्होनें 'माण्डुक्यकारिका' ग्रन्थ की रचना की। आचार्य गौड़पाद ने माण्डुक्योपनिषद पर आधारित अपने ग्रन्थ मांडूक्यकारिका में जिन तत्वों का निरूपण किया उन्हीं का शंकराचार्य ने विस्तृत रूप दिया। अपने परम गुरु को श्रद्धा निवेदन करने हेतु शंकराचार्य ने सबसे पहिले माण्डुक्यकारिका पर भाष्य लिखा।
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शंकराचार्य के गुरु योगीन्द्र गोविन्दपाद थे जिन्होंने पिचासी श्लोकों के ग्रन्थ 'अद्वैतानुभूति' की रचना की। उनकी और भगवान पातंजलि की गुफाएँ पास पास ओंकारेश्वर के निकट नर्मदा तट पर घने वन में हैं। वहाँ आसपास और भी गुफाएँ हैं जहाँ अनेक सिद्ध संत तपस्यारत हैं। पूरा क्षेत्र तपोभूमि है। राजाधिराज मान्धाता ने यहीं पर शिवजी के लिए इतनी घनघोर तपस्या की थी कि शिवजी को ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होना पड़ा जो ओंकारेश्वर कहलाता है।
अपने 'विवेक चूडामणि' ग्रन्थ में शंकराचार्य कहते हैं ---
"भक्ति प्रसिद्धा भव मोक्षनाय नात्र ततो साधनमस्ति किंचित्।"
-- "साधना का आरम्भ भी भक्ति से होता है और उसका चरम उत्कर्ष भी भक्ति में ही होता है|"
भक्ति और ज्ञान दोनों एक ही हैं। उन्होंने संस्कृत भाषा में इतने सुन्दर भक्ति पदों की रचनाएँ की हैं जो अति दिव्य और अनुपम हैं। उनमे भक्ति की पराकाष्ठा है। इतना ही नहीं परम ज्ञानी के रूप में उन्होंने ब्रह्म सूत्रों, उपनिषदों और गीता पर भाष्य लिखे हैं जो अनुपम हैं।
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यदि भगवान भाष्यकार आदि शंकराचार्य तत्कालीन विकृत हो चुके नास्तिक बौद्ध मत का खंडन करके सनातन धर्म की पुनःस्थापना नहीं करते तो आज भारत, भारत नहीं होता, बल्कि एक पूर्णरूपेण इस्लामिक देश होता। इस्लाम का प्रतिरोध भारत इसी लिए कर पाया क्योंकि यहाँ सनातन धर्म पुनः स्थापित हो चुका था। बौद्धों ने अपना सिर कटा लिया या धर्मान्तरित हो गए पर इस्लाम की धार का प्रतिरोध नहीं कर पाये। तुर्की सहित पूरा मध्य एशिया (उज्बेकिस्तान, कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान) और अफगानिस्तान बौद्ध मतानुयायी हो गया था। वहाँ के मुसलमान पहिले हिन्दू थे, फिर बौद्ध बने। बौद्ध मत में अनेक विकृतियाँ आ गयीं और उसके अनुयायी अत्यधिक अहिंसक और बलहीन हो गये। वे इस्लाम की धार का सामना नहीं कर पाये और मुसलमान बनने को बाध्य हो गए।
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जब इस्लाम का जन्म हुआ तब इस्लाम की आक्रामक धार इतनी तीक्ष्ण थी कि १०० वर्ष के भीतर भीतर पूरा अरब (जो हिन्दू था), बेबीलोन (वर्तमान इराक, कुवैत), पश्चिम एशिया -- यमन से लेबनान तक, उत्तरी अफ्रीका (सोमालिया, इथियोपिया, जिबूती, सूडान, मिश्र, लीबिया, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया और मोरक्को), मध्य एशिया के सारे देश (ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, अज़र्बेजान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान आदि), रूस के तातारिस्तान, देगिस्तान व चेचेनिया आदि प्रदेश और पूरा फारस (वर्त्तमान ईरान) इस्लाम की पताका के अंतर्गत आ गये।
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लेकिन इस्लाम की आंधी लगभग एक सहस्त्र वर्ष राज्य कर के भी भारत को नष्ट नहीं कर पाई, क्योंकि यहाँ सनातन धर्म के अनुयायियों द्वारा भक्ति आन्दोलन द्वारा हर प्रकार के विदेशी आक्रमण का प्रतिरोध हुआ। मौलाना हाली ने दुःख प्रकट करते हुए लिखा था ---
"वो दीने हिजाजी का बेबाक बेड़ा
निशां जिसका अक्साए आलम में पहुंचा
मज़ाहम हुआ कोई खतरा न जिसका
न अम्मां में ठटका, न कुलज़म में झिझका
किए पै सिपर जिसने सातों समंदर
वो डुबा दहाने में गंगा के आकर॥"
यानी इस्लाम का जहाज़ी बेड़ा जो सातों समुद्र बेरोक-टोक पार करता गया और अजेय रहा, वह जब हिंदुस्थान पहुंचा और उसका सामना यहां की संस्कृति से हुआ तो वह गंगा की धारा में सदा के लिए डूब गया॥
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मेरी दृष्टी में भगवान भाष्यकार शङ्कर भगवद्पादाचार्य महानतम और दिव्यतम प्रतिभा थे जिन्होंने ढ़ाई हजार वर्षों पूर्व इस धरा पर विचरण किया। सनातन धर्म की रक्षा ऐसे ही महापुरुषों से हुई है। धन्य है यह भारतभूमि जिसने ऐसी महान आत्माओं को जन्म दिया।
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सिंध पर पहला सफल इस्लामी आक्रमण सन ७१२ ईस्वी में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुआ था। इस अभियान में राजा दाहिर को हराकर सिंध पर विजय प्राप्त की गयी जो भारत में इस्लामी शासन का आरंभ था। अतः अंग्रेज़ इतिहासकारों द्वारा आदि शंकराचार्य का जन्म सन ७८८ ई में बताना तो और भी हास्यास्पद है।
सत्य तो यह भी है कि गुरु गोरखनाथ का जन्म आचार्य शंकर से भी बहुत पहिले हुआ था जिसे अंग्रेज़ इतिहासकार ११वीं सदी में बताते हैं। योग और तंत्र शास्त्र कालखंड में लुप्त हो गये थे जिन्हें नाथ संप्रदाय के योगियों ने ढूंढ निकाला। आचार्य शंकर श्रीविद्या यानि भगवती श्रीललितामहात्रिपुरसुंदरी की आराधना करते थे। उन्हें श्रीविद्या के तंत्र में दीक्षा गुरु गोरखनाथ ने दी थी। यह बात मुझे एक सिद्ध दण्डी सन्यासी ने बताई थी।
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ अप्रेल २०२६

(१) सर्वश्रेष्ठ तीर्थ कौन सा है? (२) मन को कहाँ लगाएं? (३) किस की व क्या उपासना करें? (४) मनुष्य जीवन की सार्थकता क्या है? (५) कूटस्थ का अर्थ क्या है?

 (उत्तर) : (१) जहां भी मेरा अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) स्वतः ही कूटस्थ में रमण करने लगे, वहीं सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। (२) अपने मन को सब विषय-वासनाओं से बाहर खींचकर निरंतर कूटस्थ में ही लगाये रखें। (३) कूटस्थ में स्वयं को विलीन कर कूटस्थ की ही उपासना करें। (४) मनुष्य जीवन की सार्थकता कूटस्थ-चैतन्य यानि ब्राह्मी स्थिति है। (५) "कालव्यापी अविनाशी आत्म-तत्व को ही 'कूटस्थ' कहते है।"

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श्रीमद्भगवद्गीता में "कूटस्थ", भगवान श्रीकृष्ण द्वारा प्रयुक्त शब्द है। अमरकोष के अनुसार कूटस्थ का अर्थ है -- "कालव्यापी स कूटस्थ:" अर्थात जो काल को व्याप्त किए हुए है, वह त्रिकालकर्ता -- भूत, भविष्य, और वर्तमान का नियंत्रक "कूटस्थ" है। समष्टि में व्याप्त चैतन्य सत्ता ही "कूटस्थ" है। मुझे जो समझ में आया है, उसके अनुसार कूटस्थ शब्द का अर्थ -- "कालव्यापी अविनाशी आत्म तत्व" है, जिसकी अनुभूति तो सर्वत्र होती है, लेकिन कहीं भी दिखाई नहीं देता। कूटस्थ यानि आत्म-तत्व का कभी नाश नहीं हो सकता। "अविनाशी आत्म-तत्व ही कूटस्थ है।"
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(प्रश्न) : मुझे कूटस्थ शब्द का अर्थ कैसे समझ में आया?
(उत्तर) : एक दिन ध्यान करते करते विद्युत की आभा के समान एक ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होकर समस्त ब्रह्मांड में फैल गयी। उस ज्योति की आभा सर्वत्र थी, सब कुछ यानि सारा अस्तित्व उस ज्योति में था। उससे परे कुछ भी नहीं था। अपना दर्शन देकर वह ज्योति धीरे धीरे कुछ समय पश्चात लुप्त हो गयी। लेकिन ध्यान-साधना में अब उसके दर्शन नित्य होते हैं। धीरे धीरे उस ज्योति के साथ साथ प्रणव नाद का भी श्रवण होने लगा। उस ज्योति के दर्शन, और नादानुसंधान -- कूटस्थ में नित्य होने लगे हैं। उनके बिना हृदय तड़प उठता है। इससे कूटस्थ शब्द का अर्थ ठीक से समझ में आया।
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जब तक पूर्ण तृप्ति और संतुष्टि न मिले, तब तक भगवान का खूब ध्यान करें। उन्हें अपनी स्मृति में हर समय रखें। जब भी समय मिले भगवान का स्मरण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करें।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! महादेव महादेव महादेव !!
कृपा शंकर
२२ अप्रेल २०२६

निष्काम भाव से "आत्मा" यानि "आत्म-तत्व" की ही साधना करनी चाहिए ---

 निष्काम भाव से "आत्मा" यानि "आत्म-तत्व" की ही साधना करनी चाहिए ---

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यह मेरा निजी अनुभव है कि स्वयं से पृथक कुछ भी नहीं है। निष्काम साधना ही हमें जीवनमुक्त बना सकती है। सकाम साधना -- बंधन और पुनर्जन्म का कारण बनती हैं। किसी भी तरह की कोई कामना या आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। जो भी साधना भोग व योग दोनों का आश्वासन देती हैं, वे भी बंधनों में ही डालती हैं। जैसे प्रकाश और अंधकार साथ-साथ नहीं रह सकते, वैसे ही राम और काम कभी साथ साथ नहीं हो सकते। इसी लिए गीता में भगवान हमें निष्काम, वीतराग, निस्त्रेगुण्य और स्थितप्रज्ञ होने को कहते हैं। साधना वो ही करनी चाहिए जो हमें वीतराग, निस्त्रेगुण्य और स्थितप्रज्ञ बनाती हैं। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२३ अप्रेल २०२६

"ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥"

 "ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥"

कर्ता भाव से मुक्त होकर निरंतर आत्मा में रमण करें। आत्माराम का कोई कर्तव्य नहीं है। भगवान कहते हैं ---
"जो मनुष्य आत्मा में ही रमने वाला, आत्मा में ही तृप्त, तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट है, उसके लिये इस कोई संसार में कोई कर्तव्य नहीं रहता॥३:१७॥"
"इस जगत् में उस पुरुष का कृत और अकृत से कोई प्रयोजन नहीं है और न वह किसी वस्तु के लिये भूतमात्र पर आश्रित होता है॥३"१८॥""
"इसलिए, तुम अनासक्त होकर सदैव कर्तव्य कर्म का सम्यक् आचरण करो; क्योकि, अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ परमात्मा को प्राप्त होता है॥३:१९॥"
"जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है॥१८:१७॥"
"यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥३:१७॥"
"नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥३:१८॥"
"तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥३:१९॥"
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१८:१७॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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सभी में परमात्मा को नमन !! ॐ तत् सत्।
कृपा शंकर
२४ अप्रेल २०२६

भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करते करते जो मनुष्य इस देह का त्याग करते हैं, उन्हें परमगति प्राप्त होती है।

 श्रीमद्भगवद्गीता का पंद्रहवाँ अध्याय (पुरुषोत्तम योग) मुझे सर्वप्रिय है। यह पूरी श्रीमद्भगवद्गीता का सार है। इस की साधना और ध्यान में जितना आनंद मिलता है, उतना अन्यत्र कहीं भी नहीं है। यही इस जीवन का सार है। इस संसार से विदाई के समय भगवान पुरुषोत्तम का ही सचेतन ध्यान हो, पुरुषोत्तम योग का ही सचेतन पाठ हो, और उन्हीं का ध्यान करते करते उन्हीं के लोक में गति हो। जो भगवान पुरुषोत्तम हैं, वे ही परमशिव हैं। दोनों में कोई भेद नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!

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"ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ॥ (१)
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ (२)
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ (३)
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ (४)
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌ ॥ (५)
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ (६)
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ (७)
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्‌ ॥ (८)
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ (९)
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌ ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ (१०)
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्‌ ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ (११)
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्‌ ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्‌ ॥ (१२)
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ (१३)
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्‌ ॥ (१४)
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्‌ ॥ (१५)
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ (१६)
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ (१७)
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ (१८)
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्‌ ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ (१९)
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥" (२०)
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जीवन के अंतकाल में पुरुषोत्तम-योग का पाठ करते करते, और भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करते करते जो मनुष्य इस देह का त्याग करते हैं, उन्हें परमगति प्राप्त होती है। इसे कंठस्थ करके इसका पाठ नित्य करें। भगवान पुरुषोत्तम की उपासना से बड़ी कोई अन्य उपासना नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!

"हं सः" मैं वह हूँ। यह समस्त ब्रह्मांड, यह सारी सृष्टि मैं हूँ।

 हम भगवान का ध्यान या भजन करते हैं; यह हमारा भ्रम है, जो जितनी शीघ्र टूट जाये उतना अच्छा ! भगवान ही हमारा ध्यान रखते हैं, वे ही हमारे प्राण व सर्वस्व हैं। भगवान ही हमारे माध्यम से स्वयं की साधना करते हैं। वे हमारे साथ एक हैं। वे ही अपना ध्यान कर रहे हैं --

"हं सः" मैं वह हूँ। यह समस्त ब्रह्मांड, यह सारी सृष्टि मैं हूँ।
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हमारे अस्तित्व के पीछे परमात्मा का प्रकाश है। उस प्रकाश पर आस्था, श्रद्धा और विश्वाश रखिये। जो भी होगा वह अच्छा ही होगा। परमात्मा को हर समय अपनी स्मृति में रखें। रात्री को सोने से पूर्व, और प्रातःकाल उठते ही कुछ देर उन का भजन करें। सभी श्रद्धालुओं की रक्षा होगी। परमात्मा का इतना चिंतन करें कि वे ही हमारी सारी चिंताएँ करें। वे हर समय हर स्थान पर हमारे साथ हैं। हमारा प्रथम, अंतिम और एकमात्र लक्ष्य परमात्मा को उपलब्ध होना है। परमात्मा ही परम सत्य है। परमात्मा में हम सब एक हैं। परमात्मा ही हमारे अस्तित्व हैं।
प्रियतम परमात्मा से पृथक कोई भी या कुछ भी अन्य नहीं है। जहाँ हम हैं, वहीं हमारे प्रियतम हैं। कोई भेद नहीं है। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
२५ अप्रेल २०२६

ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।

 ले चल वहाँ भुलावा देकर

मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।
जिस निर्जन में सागर लहरी,
अम्बर के कानों में गहरी,
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो-
तज कोलाहल की अवनी रे ।
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समीक्षकों की दृष्टि में जयशंकर प्रसाद की लिखी यह कविता हिंदी साहित्य में छायावाद की एक उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है। लेकिन मेरी दृष्टि में यह परमात्मा की भक्ति की एक उत्कृष्ट रचना है। यहाँ नाविक कौन है? परमात्मा ही नाविक है। यहाँ निर्जन में सागर लहरी -- स्वयं का अस्तित्व यानि कूटस्थ-चैतन्य है। कोलाहल की अवनी में प्रेम-कथा -- परमात्मा के नाम यानि प्रणव की ध्वनि का स्पंदन है जो निरंतर सुनाई दे रहा है। चारों ओर आनंद ही आनंद है। परमात्मा के सिवाय किसी अन्य का कोई अस्तित्व ही नहीं है। पूरी कविता इस प्रकार है --
ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।
जिस निर्जन में सागर लहरी,
अम्बर के कानों में गहरी,
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो-
तज कोलाहल की अवनी रे ।
जहाँ साँझ-सी जीवन-छाया,
ढीली अपनी कोमल काया,
नील नयन से ढुलकाती हो-
ताराओं की पाँति घनी रे ।
जिस गम्भीर मधुर छाया में,
विश्व चित्र-पट चल माया में,
विभुता विभु-सी पड़े दिखाई-
दुख-सुख बाली सत्य बनी रे ।
श्रम-विश्राम क्षितिज-वेला से
जहाँ सृजन करते मेला से,
अमर जागरण उषा नयन से-
बिखराती हो ज्योति घनी रे !
ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।

कूटस्थ चैतन्य ---

 कूटस्थ चैतन्य ---

भगवान श्रीकृष्ण ने "कालव्यापी परम चेतना" को व्यक्त करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता में "कूटस्थ" शब्द का प्रयोग अनेक बार किया है। तत्पश्चात् १९वीं शताब्दी में वाराणसी के महान गृहस्थ योगी श्री श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय (३० सितम्बर १८२८ – २६ सितम्बर १८९५) ने कूटस्थ शब्द का प्रयोग सर्वाधिक किया है। अब तो उनकी परंपरा में, और आध्यात्मिक क्षेत्र में यह शब्द बहुत सामान्य हो गया है।
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हम निरंतर कूटस्थ-चैतन्य में रहें, और कूटस्थ का ही ध्यान करें। यह सर्वव्यापी अनंतता में समर्पण की अनुभूति है जिसमें हम निरंतर परमात्मा की असीम अनंत चेतना में स्वयं का विलय करते हैं, और उसी चेतना से एकाकार होकर रहते हैं। आज्ञाचक्र पर ध्यान करते करते साधक की पात्रतानुसार एक श्वेत ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है। आरंभ में यह थोड़ी धुंधली होती है तत्पश्चात अत्यधिक चमकीले रंग में परिवर्तित होकर एक श्वेत पंचकोणीय नक्षत्र का आकार ले लेती है। इसके चारों ओर दूध जैसे रंग की एक श्वेत आभा बिखरी होती है जो एक नीले और स्वर्णिम चक्राकार से घिरी रहती है। शनैः शनैः उस ज्योति में से प्रणव नाद की ध्वनि निःसृत होने लगती है। उस सर्वव्यापी ज्योति व नाद में, जो सारी सृष्टि में व्याप्त है, व सारी सृष्टि जिसमें समाहित है, स्वयं की चेतना का विलय करते हुए ध्यान किया जाता है। यह ध्यान किया जाता है कि मैं यह नश्वर देह नहीं, सर्वव्यापी अनंत चैतन्य हूँ। वह सर्वव्यापी अनंतता की चेतना ही कालातीत परम चैतन्य है, और यही कूटस्थ चैतन्य है। इसे ही कूटस्थ कहते हैं।
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जिन्हें संस्कृत भाषा का ज्ञान है, और जिनका संस्कृत भाषा में शब्दों का उच्चारण शुद्ध है, उन्हें पुरुष सूक्त का नित्य पाठ करना चाहिए। मेरी अपनी आस्था है कि हर घर में नित्य शिवपूजा और गीतापाठ अवश्य होना चाहिए। गीता के कम से कम पाँच श्लोकों का अर्थ समझते हुए नित्य पाठ करना चाहिए। भगवान शिव देवाधिदेव हैं, उनकी पूजा से सभी देवताओं की पूजा हो जाती है। जो नित्य वेदपाठ करना चाहते हैं, उसके लिए निम्न विधि महात्माओं ने बताई है --
पुरुषसूक्त का नित्य पाठ वेदपाठ ही है। यदि समय मिले तो पुरुषसूक्त के साथ साथ -- श्री-सूक्त, रुद्र-सूक्त, सूर्य-सूक्त और भद्र-सूक्त का पाठ भी करें। उपरोक्त पाँचों सूक्तों का पाठ अधिक से अधिक एक घंटे में हो जाता है। इनका फल पूरे वेदपाठ के बराबर है। जिनको अभ्यास है वे आधे घंटे में ही पाँचों सूक्तों का पाठ कर लेते हैं। इस विषय पर किसी श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ महात्मा से मार्गदर्शन प्राप्त करें।
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जिनका उपनयन यानि यज्ञोपवीत संस्कार हो चुका है, उन्हें नित्य कम से कम दस (१० की संख्या में) बार गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए। अधिकतम की कोई सीमा नहीं है। कोई संशय है तो जहाँ से आपने दीक्षा ली हैं वहीं से अपनी गुरु-परंपरा में अपने संशय का निवारण करें। गायत्री जप का अधिकार उन्हें ही है जिनका उपनयन संस्कार हो चुका है, अन्यों को नहीं। अपनी अपनी गुरु-परंपरानुसार नित्य संध्या करें।
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अब एक व्यक्तिगत बात कहना चाहता हूँ। मेरे इस शरीर की भौतिक आयु भी बहुत अधिक हो गई है। एक किनारे पर बैठा हूँ, आगे का कोई भरोसा नहीं है। अतः सारा अवशिष्ट जीवन परम शिव परमात्मा को समर्पित है। जो परम शिव हैं, वे ही श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम हैं, वे ही वेदान्त के परम ब्रह्म हैं, और वे ही भगवान विष्णु व उनके सारे अवतार हैं। मेरे शाश्वत मित्र तो वे पुराण-पुरुष स्वयं हैं, जिनका साथ शाश्वत है। जैसी भी और जो भी उनकी इच्छा है वही मेरी इच्छा है, और कुछ भी नहीं।
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥"
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ मई २०२६

प्रेम के स्थान पर मोह क्यों उत्पन्न होता है? मोह से हमारा पतन क्यों होता है?

 प्रेम के स्थान पर मोह क्यों उत्पन्न होता है? मोह से हमारा पतन क्यों होता है?

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प्रेम और मोह में क्या अंतर है? मोह से हमारा पतन क्यों होता है? इसका उत्तर जानने के लिए जब भी भगवान से प्रार्थना करता था, तो दुर्गासप्तशती के एक श्लोक के रूप में एक ही उत्तर मिलता था ---
"ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥"
उपरोक्त श्लोक के सिवाय अन्य कोई उत्तर कभी नहीं मिला।
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आज अचानक ही उपरोक्त प्रश्न का बड़ा स्पष्ट उत्तर मिला जिसके पश्चात कोई संशय नहीं रहा। "प्रेम के स्थान पर मोह के उत्पन्न होने का एकमात्र कारण हमारा अहंकार है।" भक्ति के रूप में परमात्मा से प्रेम तो हर समय रहता है। लेकिन जब भी अहंकार जागृत होता है, तब प्रेम तो लुप्त हो जाता है और प्रेम के स्थान पर मोह उत्पन्न हो जाता है। "मोह उत्पन्न होने से हमारा पतन उसी क्षण से आरंभ हो जाता है।"
मोह का जन्म अहंकार से होता है। जब हम किसी व्यक्ति को 'अपना' मानकर उसे अपनी इच्छा के अनुसार चलाना चाहते हैं, तो वह प्रेम, मोह में परिवर्तित हो जाता है, और मोहग्रस्त व्यक्ति का उसी क्षण से पतन आरंभ होने लगता है।
सार रूप में यह हमारा लोभ और अहंकार ही है जो हमारे पतन का मुख्य कारण है। अन्य कोई इससे बड़ा कारण नहीं है।
लोभ और अहंकार -- सब बुराइयों के जनक हैं। मेरी बात को जो भी समझ लेंगे उनका निश्चित रूप से कल्याण होगा।
हरिः ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
६ मई २०२६

अनुभवों की गहनता के साथ-साथ मान्यताएँ भी दृढ़ हो जाती हैं ---

हमें जब कुछ भी पता नहीं होता, तब एक बार तो लकीर का फकीर बनना पड़ता है। फिर जैसे जैसे निजानुभूतियाँ दृढ़ होती जाती हैं, साधक -- लकीर का फकीर नहीं रहता। इस समय मेरे अनुसंधान का विषय -- ब्रह्म, और कूटस्थ हैं, जो दोनों ही मुझे निरंतर अनुभूत हो रहे हैं। जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण और गुरु-रूप में दक्षिणामूर्ति शिव --- तत्व रूप में दोनों एक हैं, जिनसे मुझे निरंतर मार्ग-दर्शन प्राप्त हो रहा है। इस समय परमब्रह्म परमात्मा की अनुभूति मुझे ऊर्ध्वमूल कूटस्थ में पुरुषोत्तम के रूप में हो रही है। उन्हीं की परम कृपा से अज्ञान का अंधकार शनैः शनैः दूर हो रहा है। जिस मार्ग पर मैं चल रहा हूँ, वह अद्वैत-वेदान्त का मार्ग है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार "कूटस्थ" और "ब्रह्म" मूलतः एक — अपरिछिन्न हैं।

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कूटस्थ का अर्थ है अविचल, अविकारी, कालव्यापी आत्म-तत्त्व, जो माया और संसार के परिवर्तनों से अप्रभावित रहता है। ब्रह्म परम सत्य है। कूटस्थ ही ब्रह्म का अनुभवगम्य अविनाशी रूप है। ब्रह्मज्योति के रूप में यह सृष्टि का बीज है। माया से परे शुद्ध चैतन्य को ब्रह्म कहते हैं। "कूटस्थ" शब्द का प्रयोग -- आत्मा, पुरुष, ब्रह्म तथा ईश्वर के लिए होता है जो परम सत्ता के स्वरूप को व्यक्त करता है। कूटस्थ का अर्थ है कूट का अधिष्ठान अथवा आधार। कूट शब्द माया अथवा प्रकृति के लिए प्रयुक्त हुआ है। माया जीवों के जन्म, मरण, अज्ञान, दु:ख आदि का कारण होने से अनेक दोषों से परिपूर्ण है। माया का अधिष्ठान होने के कारण आत्मा, ब्रह्म अथवा ईश्वर कूटस्थ कहे गए हैं। अनेक प्रकार से स्थित होने के कारण ब्रह्म भी कूटस्थ है।
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आचार्य शंकर के अनुसार कूटस्थ होने के कारण ब्रह्म -- अचल और नित्य है। वह सदा एक रूप में रहनेवाला परमार्थिक तत्व हैं। आचार्य शंकर के अनुसार ब्रह्म में परिणाम अथवा परिवर्तन संभव नहीं है, क्योंकि वह कूटस्थ है। वह बिना परिवर्तित हुए ही अपनी माया शक्ति द्वारा जगत्‌ आदि अनेक रूपों में व्यक्त होता है। संसार के सब पदार्थ देशकाल से सीमित तथा कारण-सिद्धांत से नियंत्रित होते हैं। किंतु कूटस्थ ब्रह्म इनसे पूर्णरूप से स्वतंत्र है। वह समस्त विश्व को व्याप्त करता है, किंतु उससे भी परे है। प्रकृति से उत्पन्न सभी पदार्थ क्षर तथा नश्वर हैं किंतु कूटस्थ --अक्षर व अविनाशी है। वह शुद्ध चैतन्य है, जो केवल ज्ञाता है, ज्ञेय नहीं। इंद्रिय, वाणी, मन तथा बुद्धि के द्वारा उसका ज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि वह इन सबका आधार है। उसी की चेतना के प्रकाश से ये सब प्रकाशित होते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार आत्मसाक्षात्कार होने से योगी कूटस्थ और जितेंद्रिय हो जाता है। जीवन के द्वंद्व उसे प्रभावित नहीं कर पाते। वह कर्मबंधन से सर्वथा मुक्त और नित्यमोक्ष प्राप्त है --
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥६:८॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- जो योगी ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो विकार रहित (कूटस्थ) और जितेन्द्रिय है, जिसको मिट्टी, पाषाण और कंचन समान है, वह (परमात्मा से) युक्त कहलाता है॥
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आत्मा का जो निरन्तर ध्यान करता है, वह आत्मसंयमी पुरुष शीघ्र ही दिव्य तृप्ति और आनन्द का अनुभव पाकर पूर्णयोगी बन जाता है। उसकी तृप्ति शास्त्रों के पाण्डित्य की नहीं, वरन् दिव्य आत्मानुभूति की होती है। वेदान्त में आत्मा को ही कूटस्थ कहा गया है। कूटस्थ का अर्थ हुआ जो कूट के समान अविचल अविकारी रहता है। ज्ञानविज्ञान से सन्तुष्ट पुरुष कूटस्थ आत्मा को जानकर स्वयं भी सभी परिस्थितियों में कूटस्थ बनकर रहता है। वह समदर्शी बन जाता है। उसके लिए मिट्टी पाषाण और स्वर्ण -- सब समान होते हैं।
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अपने गूढ अनुभवों को इससे अधिक नहीं लिख सकता, और कभी लिखूंगा भी नहीं। भगवान की प्रेरणा से ही इतना सब लिख पाया हूँ। अब आगे का सारा जीवन पुरुषोत्तम की ध्यान-साधना में ही बिताने की अभीप्सा है। आप सब में मैं स्वयं को ही नमन करता हूँ। ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ मई २०२६

सबसे अधिक आनंद का विषय

सबसे अधिक आनंद का विषय 

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आजकल गर्मी पड़ रही है, सर्दी बिल्कुल भी नहीं है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में जल्दी उठिए (लगभग तीन-साढ़े तीन बजे) और शौचादि से निवृत होकर खुले में घर की छत पर या अन्य किसी खुले स्थान पर एक कंबल बिछा कर बैठ जाइए। नितंबों के नीचे एक पतली गद्दी लगा लीजिये ताकि कमर सीधी रहे। ठुड्डी भूमि के समानांतर। कुछ देर हठयोग के कुछ प्राणायाम कीजिए। उनके साथ यदि हो सके तो तीन-चार बार उज्जयी प्राणायाम भी कीजिए। बहुत लाभदायी सिद्ध होगा।

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अब आँखों की पुतलियों को भ्रूमध्य की ओर स्थिर कर, परमात्मा की अनंतता का ध्यान कीजिए। एक कल्पना कीजिए कि आपके भ्रूमध्य से एक ज्योति निकलकर सारे ब्रह्मांड में विस्तृत हो गई है। वह ज्योति सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है, और सारी सृष्टि उस ज्योति में समाहित है। वह ज्योति आप स्वयं हैं, यह नश्वर देह नहीं। यह ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान है जिसे अजपा-जप कहते हैं। इसका वैदिक नाम "हंसवती ऋक" है। इसे हंसःयोग भी कहते हैं। एक बार सारी सांस बाहर फेंक दो। जितनी देर बिना सांस के रह सको उतनी देर तक तक रहो। अब सांस को अपने आप चलने दो। जब सांस भीतर जाए तब "सोsssss" और जब सांस बाहर जाए तब "हंsssss" का जप मानसिक रूप से कीजिए। किसी भी तरह की ध्वनि मुंह से न निकले। सोहं के स्थान पर "हंसः" मंत्र का जप भी कर सकते हैं, इससे अजपा-गायत्री का ध्यान भी हो जाता है। इस साधना को पूर्ण खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में किया जाये तो बहुत अधिक लाभदायक है। जब कुंभक लग जाये यानि सांस अस्थायी रूप से रुक जाये उस समय में आप प्रणव मंत्र का मानसिक जप कीजिये। महावाक्य "तत्वमसी" (तत् त्वं असि) का ही विस्तार है "सोहं", जिसका आप ध्यान कर रहे हैं। लगभग एक घंटे तक यह ध्यान कीजिये तत्पश्चात दो तीन बार शिव-संहिता में बताई हुई महामुद्रा का अभ्यास कर इसका समापन कर सकते हैं। हठयोग के केवल तीन ही मौलिक ग्रंथ हैं -- "घेरण्ड-संहिता", "हठयोग-प्रदीपिका" और "शिव-संहिता" जो बाजार में पुस्तकों की हर बड़ी दुकान पर उपलब्ध हैं। हठयोग की किसी अन्य पुस्तक की आवश्यकता नहीं है। मुख्य आवश्यकता परमात्मा से परमप्रेम (भक्ति) की है, जिसके बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते।
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आप परमात्मा को समर्पित होकर ध्यान साधना कीजिए। आप आनंद से भर जाओगे। पूरे दिन परमात्मा के तारक मंत्र "राम" का मानसिक जप कीजिये। अजपा-जप की विधि अनेक महात्माओं ने समझाई हैं, जिनकी अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं। लेकिन सर्वाधिक विस्तार से इसका वर्णन मैंने "तपोभूमि नर्मदा" नामक पुस्तक के पांचवें खंड के मध्य में देखा है। अनेक महात्माओं के सत्संगों में इस विषय को बड़े ध्यान से सुना है।
परमात्मा के रूप आप सब को मेरा नमन। मैं उपलब्ध नहीं हूँ। किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकूँगा। ॐ तत् सत्॥
कृपा शंकर
८ मई २०२६

हमारी आध्यात्मिक साधना में विघ्न आने का एकमात्र कारण हमारा लोभ और अहंकार ही है, जो कर्ताभाव के कारण होता है। हमारा लोभ और अहंकार ही हमें पतन के मार्ग पर धकेलता है। अन्य कोई कारण नहीं है।

 हमारी आध्यात्मिक साधना में विघ्न आने का एकमात्र कारण हमारा लोभ और अहंकार ही है, जो कर्ताभाव के कारण होता है। हमारा लोभ और अहंकार ही हमें पतन के मार्ग पर धकेलता है। अन्य कोई कारण नहीं है।

आध्यात्मिक साधना वो ही सफल होती है जो परमात्मा को कर्ता बनाकर समष्टि के कल्याण के लिए की जाती है। जहां समष्टि के कल्याण की भावना होती है, और कर्ताभाव नहीं रहता (यानि परमात्मा ही एकमात्र कर्ता होते हैं) वहीं सफलता निश्चित रूप से मिलती है। परमात्मा के प्रति हमारा समर्पण पूर्ण होगा तभी हम सफल होंगे। परमात्मा को पूर्ण समर्पण और निज जीवन में उनकी अभिव्यक्ति -- सनातन धर्म है। हमारा हर कार्य परमात्मा की प्रसन्नता के लिए हो। ॐ तत् सत् !! महादेव महादेव महादेव !!
कृपा शंकर
१० मई २०२६

हमारा कर्ताभाव ही आध्यात्म में हमारे पतन का एकमात्र कारण है। परमात्मा को ही एकमात्र कर्ता बनायें, और निरंतर ब्राह्मी-स्थिति (कूटस्थ-चैतन्य/ब्रह्म-चैतन्य) में बने रहें। भगवान को अर्पित किये बिना कुछ भी खाना -- "चोरी" और "पाप का भक्षण" है।

हमारा कर्ताभाव ही आध्यात्म में हमारे पतन का एकमात्र कारण है। परमात्मा को ही एकमात्र कर्ता बनायें, और निरंतर ब्राह्मी-स्थिति (कूटस्थ-चैतन्य/ब्रह्म-चैतन्य) में बने रहें। भगवान को अर्पित किये बिना कुछ भी खाना -- "चोरी" और "पाप का भक्षण" है।
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वे कौन हैं ? -- जो आपके पैरों से चल रहे हैं? आपके हाथों से काम कर रहे हैं? आपकी आँखों से देख रहे हैं? आपके हृदय में धड़क रहे हैं? आपके कानों से सुन रहे हैं? आपकी नासिकाओं से सांस ले रहे हैं? और आपके अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को चैतन्य बनाये हुए हैं। परमात्मा ही आपके प्राण हैं। उनका प्राण-तत्व ही आपकी चेतना से निकल गया तो आपकी देह मृत है। एकमात्र अस्तित्व उन्हीं का है। उनके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं है। अतः अभी से उन्हें जानने और पाने का प्रयास करें। वे निकटतम से भी अधिक निकट और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हैं।
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आप भोजन करते हैं, उसे कौन ग्रहण करता है और पचाता है? उसे भगवान ही ग्रहण करते हैं और भगवान ही पचाते हैं। इसका प्रमाण गीता में भगवान का यह कथन है ---
"अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१५:१४॥"
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: "मैं (परमात्मा) वैश्वानर रूप (जठराग्नि या पाचनाग्नि) धारण करके सभी प्राणियों के शरीर में स्थित होकर, प्राण और अपान वायु के संयोग से चार प्रकार के भोजन को पचाता हूँ।"
चार प्रकार के भोजन (चतुर्विधं अन्न:) चुष्ट (चबाकर खाए जाने वाले): रोटी, फल, सब्जियाँ। भक्ष्य (चबाए बिना निगलने वाले): दूध, दही, तरल पदार्थ। लेह्य (चाटने वाले): घी, शहद, मक्खन। भोज्य (पीने वाले): पानी, जूस।
ब्रह्म ही सब कुछ है, और जीव का शरीर भी उसी की लीला है।
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आहार वो ही ग्रहण करें जिसे हम भगवान को अर्पित कर सकते हैं (यानि जिसका भोग/प्रसाद भगवान को लगा सकते हैं)। हम भोजन करते हैं, यह एक ब्रह्मकर्म है। इसका प्रमाण गीता में भगवान का बताया हुआ यह भोजन-मंत्र है --
"ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥४:२४॥"
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भगवान को अर्पित किए बिना कुछ भी खाना -- "चोरी" और "पाप का भक्षण" है। हम भोजन करते हैं, यह एक यज्ञ है। इस यज्ञ से देवता तृप्त होते हैं। वे तृप्त हुए देवता ही हमारा कल्याण करते हैं। गीता में भगवान कहते हैं --
"देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥३:११॥"
अर्थात् -- "तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतागण तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुये परम श्रेय को तुम प्राप्त होगे॥
"इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥३:१२॥"
अर्थात् -- "यज्ञ द्वारा पोषित देवतागण तुम्हें इष्ट भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिये हुये भोगों को जो पुरुष उनको दिये बिना ही भोगता है वह निश्चय ही चोर है॥
"यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥३:१३॥"
अर्थात् -- यज्ञ के अवशिष्ट अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो लोग केवल स्वयं के लिये ही पकाते हैं वे तो पापों को ही खाते हैं॥
"अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥३:१४॥"
अर्थात् -- समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं अन्न की उत्पत्ति पर्जन्य से। पर्जन्य की उत्पत्ति यज्ञ से और यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होता है॥
यानि -- सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है।
इससे आगे भगवान कहते हैं कि -- जो मनुष्य इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों में रमण करनेवाला अघायु (पापमय जीवन बितानेवाला) मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है।
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भगवान ने आत्माराम यानि जो व्यक्ति सदैव आत्मा में रमण करता है, को जीवन मुक्त बताया है, और कहा है कि उसका कोई सांसारिक दायित्व नहीं है। वह जीवन मुक्त है। जब तक हम आत्मा में रमण नहीं करते तब तक हम सांसारिक दायित्वों से बंधे हैं।
"नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥३:१८॥"
अर्थात् -- इस जगत् में उस पुरुष का कृत और अकृत से कोई प्रयोजन नहीं है और न वह किसी वस्तु के लिये भूतमात्र पर आश्रित होता है॥
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ॐ तत् सत्। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
कृपा शंकर
11मई 2026

अब कुछ दिन तक और कुछ भी नहीं लिखेंगे। धर्म व राष्ट्र की रक्षा हेतु उपासना तो कर ही सकते हैं।

 अब कुछ दिन तक और कुछ भी नहीं लिखेंगे। धर्म व राष्ट्र की रक्षा हेतु उपासना तो कर ही सकते हैं।

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मेरा सारा चिंतन अद्वैत वेदान्त का है लेकिन सारी उपासना परमात्मा के साकार रूप की ही होती है। मेरे लिए साकार का अर्थ है -- सारे आकार जिसके हों, वह साकार है। जो भी सृष्ट हुआ है उसका आकार तो है ही। सृष्टि में कुछ भी बिना आकार के नहीं है।
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कुछ प्रत्यक्ष शक्तियाँ हैं जिन्हें कोई नहीं नकार सकता। कोई चाहे या न चाहे, उन की उपासना हुए बिना नहीं रहती। एक तो शक्ति है श्रीहनुमान जी की। और दूसरी शक्ति है भगवान श्रीकृष्ण की। मैं अपने विचार किसी पर थोपना नहीं चाहता, लेकिन जो अनुभूत सत्य है वह तो कभी बदल नहीं सकता।
साधना के मापदंड बदलते रहते हैं। एक परम शिवभक्त थे जिन्होंने जीवन भर नियमित रूप से शिव की आराधना की, लेकिन अपनी वृद्धावस्था में वे श्रीराधा-कृष्ण के भक्त हो गये। श्रीराधा-कृष्ण का ध्यान करते करते ही उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। ऐसे ही अनेक अद्वैत-वेदांती हैं, जो वृद्धावस्था में हनुमान जी की उपासना करने लगते हैं। उनका कथन है की वे जो कुछ भी हैं, वह वे अपने अनुभवों से हैं।
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मेरे सबसे यही प्रार्थना है कि लकीर के फकीर नहीं बनें। साधना के क्षेत्र में अपने अनुभव लो, और जो कुछ भी करो वह अपने निजी अनुभवों से प्रेरणा लेकर करो। किसी अन्य की नकल कर के कुछ भी मत करो। मैं कुछ दिन एक अद्वैत वेदांतियों के आश्रम में रहा था। वहाँ दिन का आरंभ सामूहिक रूप से आचार्य शंकर के "निर्वाण-षटकम", श्रीमद्भगवद्गीता के क्रमशः एक अध्याय, और रामचरितमानस के सुंदर कांड के क्रमशः पाँच दोहों और उनके मध्य की सभी चौपाइयों के पाठ से होता था। ऐसा तो मैंने कोई भी आश्रम आज तक नहीं देखा जहां शिवपूजा नहीं होती हो। कुछ बातें और अनुभव गोपनीय होते हैं, उन्हे गोपनीय रखो, लेकिन जो कुछ भी अंतिम रूप से सीखना है वह अपने अनुभवों से सीखो। अपने विचार किसी पर मत थोपो, और अपने ऊपर किसी दूसरे को भी उसके विचार मत थोपने दो। अपने अनुकूल जो भी साधना सर्वश्रेष्ठ है वह साधना करो। परमात्मा को निरंतर अपनी स्मृति में रखो।
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ॐ तत् सत् !! कृपा शंकर
१२ मई २०२६

भारत इस सृष्टि का भविष्य, और एक सनातन चिन्मय सत्ता है, जो अमर है और सदा अमर रहेगी।

भारत इस सृष्टि का भविष्य, और एक सनातन चिन्मय सत्ता है, जो अमर है और सदा अमर रहेगी। यहाँ ईश्वर स्वयं अवतृत होते हैं। भारत की अस्मिता और भविष्य "सत्य-सनातन-धर्म" है। हम परमात्मा के प्रकाश को फैलाते रहेंगे तो हमारी विजय सुनिश्चित है। कोई माने या न माने पर जीवन के अंतिम काल में सभी को यह मानना ही पड़ता है कि उन्हें अपने जीवन की युवावस्था में ही भगवान से जुड़ जाना चाहिए था व भगवत्-साक्षात्कार ही उन के जीवन का एकमात्र लक्ष्य और उद्देश्य होना चाहिए था। संसार से राग-द्वेष और अहंकार ही सारी समस्याओं की जड़ होते हैं। जब तक यह बात समझ में आती है, तब तक बहुत अधिक देरी हो जाती है। इसी उधेड़बुन में प्राण छूट जाते हैं।

कृपा शंकर
१२ मई २०२६

परमात्मा को पूर्ण-समर्पण तत्काल अभी और इसी समय अपरिहार्य और अत्यावश्यक है ---

 परमात्मा को पूर्ण-समर्पण तत्काल अभी और इसी समय अपरिहार्य और अत्यावश्यक है --- लेकिन यह फलीभूत कैसे हो ? इस जीवन का अवशेष अति अति अल्प है। मेरा उच्चतम लक्ष्य परमात्मा को पूर्ण समर्पण है। आज अभी इसी समय से वह करना होगा, क्योंकि यह अंतिम अवसर है --

"क्षणभंगुर - जीवन की कलिका, कल प्रातः को जाने खिली न खिली।
मलयाचल की शुचि शीतल मन्द, सुगन्ध समीर मिली न मिली।
कलि काल कुठार लिए फिरता, तन नम्र से चोट झिली न झिली।
कहले हरिः नाम अरी रसना, फिर अन्त समय में हिली न हिली॥" (कवि: नम्र)
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"नलिनी-दल-गत-जलमति तरलम्। तद्वज्-जीवितमतिशय-चपलम्॥
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तम्। लोकं शोक-हतं च समस्तम्॥" (मोहमुद्गर)
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श्रीमद्भगवद्गीता व उपनिषदों से अनेक मंत्र अपनी बात के समर्थन में उद्धृत कर सकता हूँ, लेकिन उनकी आवश्यकता नहीं है। अनेक वर्षों की कठोर साधना व कठिन श्रम से मैंने स्वयं को प्रशिक्षित किया है -- परमब्रह्म परमात्मा की उपासना के लिए। उसी को व्यवहार रूप में चरितार्थ करना होगा। कमियाँ अनेक हैं, लेकिन वे सब स्वयं के व्यक्तित्व में हैं। वे सब दूर की जा सकती हैं। स्वयं के आत्म-बल और दृढ़ संकल्प को पुनर्जागृत करना होगा। समय अधिक नहीं बचा है, इसका आभास हो रहा है। परमशिव की अपार कृपा मुझ पर है यही एकमात्र सहारा है। वे ही पुरुषोत्तम हैं जिनकी स्पष्ट अनुभूति मुझे हो रही है ---
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥"
"न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥१५:३॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
यहीं पर भगवान को पूर्ण समर्पित होना है। ॐ तत् सत् ॥
कृपा शंकर
१७ मई २०२६