अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती की हार्दिक शुभ कामनाएँ ---
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हमारे पुण्य अक्षय हों। हमारा राष्ट्र परम वैभव को प्राप्त हो। हमारे राष्ट्र को सदा सही नेतृत्व मिले और कायरता का कोई अवशेष हम में न रहे। हम सब के जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो। आज की जैसी परिस्थितियाँ और वातावरण है उसमें हमें परशुराम जैसे अनेक व्यक्तित्वों की आवश्यकता है जो अधर्म का नाश कर धर्म की पुनः स्थापना कर सकें। हमें परशुराम की प्रतीक्षा है।
"ॐ जामदग्न्याय च विद्महे महावीराय च धीमहि, तन्नो परशुराम: प्रचोदयात्।"
परशुराम जयंती पर भगवान विष्णु के अनंत विराट रूप का ध्यान करें, जिसमें सारा ब्रह्मांड यानि समस्त सृष्टि समाहित हो, और अपने अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को उसमें विलीन कर दें।
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जब परशुराम पर मातृ-हत्या का पाप चढ़ा, वे उससे मुक्ति पाने को सभी तीर्थों में फिरे, किन्तु, कहीं भी परशु पर से उनकी वज्रमूठ नहीं खुली यानी उनके मन में से पाप का भान नहीं दूर हुआ। तब पिता ने उनसे कहा कि कैलास के समीप जो ब्रह्मकुण्ड है, उसमें स्नान करने से यह पाप छूट जायगा। निदान, परशुराम हिमालय पर चढ़कर कैलास पहुँचे और ब्रह्मकुण्ड में उन्होंने स्नान किया। ब्रह्मकुण्ड में डुबकी लगाते ही परशु उनके हाश से छूट कर गिर गया अर्थात् उनका मन पाप-मुक्त हो गया। तीर्थ को इतना जाग्रत देखकर परशुराम के मन में यह भाव जगा कि इस कुण्ड के पवित्र जल को पृथ्वी पर उतार देना चाहिए। अतएव, उन्होंने पर्वत काट कर कुण्ड से एक धारा निकाली, जिसका नाम, ब्रह्मकुण्ड से निकलने के कारण, ब्रह्मपुत्र हुआ। ब्रह्मकुण्ड का एक नाम लोहित-कुण्ड भी मिलता है। कुछ विद्वान कहते हैं कि ब्रह्मपुत्र की धारा परशुराम ने ब्रह्मकुण्ड से ही निकाली थी, आगे चलकर वह धारा लोहित-कुण्ड नामक एक अन्य कुण्ड में समा गयी। परशुराम ने उस कुण्ड से भी धारा को आगे निकाला, इसलिए, ब्रह्मपुत्र का एक नाम लोहित भी मिलता है। स्वयं कालिदास ने ब्रह्मपुत्र को लोहित नाम से ही अभिहित किया है। और जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी पर्वत से पृथ्वी पर अवतीर्ण होती है, वहाँ आज भी परशुराम-कुण्ड मौजूद है, जो हिन्दुओं का एक परम पवित्र तीर्थ माना जाता है। लोहित में गिर कर जब परशुराम का कुठार पाप-मुक्त हो गया, तब उस कुठार से उन्होंने एक सौ वर्ष तक लड़ाइयाँ लड़ीं और समन्तपंचक में पाँच शोणित-ह्रद बना कर पितरों का तर्पण किया। जब उनका प्रतिशोध शान्त हो गया, उन्होंने कोंकण के पास पहुँच कर अपना कुठार समुद्र में फेंक दिया और वे नवनिर्माण में प्रवृत्त हो गये। भारत का वह भाग, जो अब कोंकण और केरल कहलाता है, भगवान् परशुराम का ही बसाया हुआ है।
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भगवान विष्णु के दशावतारों में से छठे अंशावतार भगवान परशुराम हैं। उन्होने अधर्म के नाश व धर्म की स्थापना के लिए माता रेणुका और ऋषि जमदग्नि के घर त्रेतायुग में जन्म लिया था। वे चिरंजीवी हैं। पृथ्वी से अहंकारी व अधर्मी शासकों के विनाश के लिए उन्होंने भगवान शिव की आराधना की व उनसे एक परशु (फरसा) प्राप्त किया। द्वापर युग तक उनकी उपस्थिति का वर्णन मिलता है। परशुराम को 'भार्गव राम' या 'जामदग्न्य' के नाम से भी जाना जाता है।
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पुनश्च सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ। धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो। असत्य और अंधकार की भी सभी शक्तियों का नाश हो। भारत भूमि पर परशुराम जैसे अनेक परम तपस्वियों का जन्म हो। हर हर महादेव!!
महादेव महादेव महादेव!! ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ अप्रेल २०२६
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