परमात्मा की दिव्य ज्योति से हमारी सम्पूर्ण चेतना आलोकित हो। असत्य के अंधकार का कणमात्र भी अवशेष कहीं न रहे। सम्पूर्ण भारत में भगवान श्रीकृष्ण की मुरली की मधुर ध्वनि, और भगवान श्रीराम के कोदंड धनुष की टंकार सुनाई दे। धर्म रूपी नंदी पर बैठकर भ्रमण करते हुए भगवान शिव सभी को सर्वत्र दृष्टिगोचर हों। पूरा भारत सत्य-धर्मनिष्ठ हो। और देखने को कुछ बचा ही नहीं है। और कुछ भी नहीं चाहिए। यह संत-महात्माओं, त्यागी-तपस्वियों, सिद्ध-योगियों, भक्तों, दानियों और शूरवीरों का देश सदा अज्ञान के अन्धकार में नहीं रह सकता।
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एक निःशब्द ध्वनि चित्त को तन्मय कर रही है। घनीभूत प्राण प्रवाहित हो रहे हैं। कूटस्थ ब्रह्म प्रत्यक्ष हों। गीता में भगवान ने मेरे जैसे भटके हुए अधमाधम और असाध्य पतितों को भी भगवत्-प्राप्ति का वचन दिया है, अतः निराशा और चिंता की कोई बात नहीं है।
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
अर्थात् -- "यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है॥"
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"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात् -- "सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥"
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.ॐ तत् सत् ॥ ॐ शांति शांति शांति॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२४ मई २०२६
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