Saturday, 27 June 2026

प्रेम के स्थान पर मोह क्यों उत्पन्न होता है? मोह से हमारा पतन क्यों होता है?

 प्रेम के स्थान पर मोह क्यों उत्पन्न होता है? मोह से हमारा पतन क्यों होता है?

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प्रेम और मोह में क्या अंतर है? मोह से हमारा पतन क्यों होता है? इसका उत्तर जानने के लिए जब भी भगवान से प्रार्थना करता था, तो दुर्गासप्तशती के एक श्लोक के रूप में एक ही उत्तर मिलता था ---
"ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥"
उपरोक्त श्लोक के सिवाय अन्य कोई उत्तर कभी नहीं मिला।
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आज अचानक ही उपरोक्त प्रश्न का बड़ा स्पष्ट उत्तर मिला जिसके पश्चात कोई संशय नहीं रहा। "प्रेम के स्थान पर मोह के उत्पन्न होने का एकमात्र कारण हमारा अहंकार है।" भक्ति के रूप में परमात्मा से प्रेम तो हर समय रहता है। लेकिन जब भी अहंकार जागृत होता है, तब प्रेम तो लुप्त हो जाता है और प्रेम के स्थान पर मोह उत्पन्न हो जाता है। "मोह उत्पन्न होने से हमारा पतन उसी क्षण से आरंभ हो जाता है।"
मोह का जन्म अहंकार से होता है। जब हम किसी व्यक्ति को 'अपना' मानकर उसे अपनी इच्छा के अनुसार चलाना चाहते हैं, तो वह प्रेम, मोह में परिवर्तित हो जाता है, और मोहग्रस्त व्यक्ति का उसी क्षण से पतन आरंभ होने लगता है।
सार रूप में यह हमारा लोभ और अहंकार ही है जो हमारे पतन का मुख्य कारण है। अन्य कोई इससे बड़ा कारण नहीं है।
लोभ और अहंकार -- सब बुराइयों के जनक हैं। मेरी बात को जो भी समझ लेंगे उनका निश्चित रूप से कल्याण होगा।
हरिः ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
६ मई २०२६

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