Saturday, 27 June 2026

अनुभवों की गहनता के साथ-साथ मान्यताएँ भी दृढ़ हो जाती हैं ---

हमें जब कुछ भी पता नहीं होता, तब एक बार तो लकीर का फकीर बनना पड़ता है। फिर जैसे जैसे निजानुभूतियाँ दृढ़ होती जाती हैं, साधक -- लकीर का फकीर नहीं रहता। इस समय मेरे अनुसंधान का विषय -- ब्रह्म, और कूटस्थ हैं, जो दोनों ही मुझे निरंतर अनुभूत हो रहे हैं। जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण और गुरु-रूप में दक्षिणामूर्ति शिव --- तत्व रूप में दोनों एक हैं, जिनसे मुझे निरंतर मार्ग-दर्शन प्राप्त हो रहा है। इस समय परमब्रह्म परमात्मा की अनुभूति मुझे ऊर्ध्वमूल कूटस्थ में पुरुषोत्तम के रूप में हो रही है। उन्हीं की परम कृपा से अज्ञान का अंधकार शनैः शनैः दूर हो रहा है। जिस मार्ग पर मैं चल रहा हूँ, वह अद्वैत-वेदान्त का मार्ग है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार "कूटस्थ" और "ब्रह्म" मूलतः एक — अपरिछिन्न हैं।

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कूटस्थ का अर्थ है अविचल, अविकारी, कालव्यापी आत्म-तत्त्व, जो माया और संसार के परिवर्तनों से अप्रभावित रहता है। ब्रह्म परम सत्य है। कूटस्थ ही ब्रह्म का अनुभवगम्य अविनाशी रूप है। ब्रह्मज्योति के रूप में यह सृष्टि का बीज है। माया से परे शुद्ध चैतन्य को ब्रह्म कहते हैं। "कूटस्थ" शब्द का प्रयोग -- आत्मा, पुरुष, ब्रह्म तथा ईश्वर के लिए होता है जो परम सत्ता के स्वरूप को व्यक्त करता है। कूटस्थ का अर्थ है कूट का अधिष्ठान अथवा आधार। कूट शब्द माया अथवा प्रकृति के लिए प्रयुक्त हुआ है। माया जीवों के जन्म, मरण, अज्ञान, दु:ख आदि का कारण होने से अनेक दोषों से परिपूर्ण है। माया का अधिष्ठान होने के कारण आत्मा, ब्रह्म अथवा ईश्वर कूटस्थ कहे गए हैं। अनेक प्रकार से स्थित होने के कारण ब्रह्म भी कूटस्थ है।
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आचार्य शंकर के अनुसार कूटस्थ होने के कारण ब्रह्म -- अचल और नित्य है। वह सदा एक रूप में रहनेवाला परमार्थिक तत्व हैं। आचार्य शंकर के अनुसार ब्रह्म में परिणाम अथवा परिवर्तन संभव नहीं है, क्योंकि वह कूटस्थ है। वह बिना परिवर्तित हुए ही अपनी माया शक्ति द्वारा जगत्‌ आदि अनेक रूपों में व्यक्त होता है। संसार के सब पदार्थ देशकाल से सीमित तथा कारण-सिद्धांत से नियंत्रित होते हैं। किंतु कूटस्थ ब्रह्म इनसे पूर्णरूप से स्वतंत्र है। वह समस्त विश्व को व्याप्त करता है, किंतु उससे भी परे है। प्रकृति से उत्पन्न सभी पदार्थ क्षर तथा नश्वर हैं किंतु कूटस्थ --अक्षर व अविनाशी है। वह शुद्ध चैतन्य है, जो केवल ज्ञाता है, ज्ञेय नहीं। इंद्रिय, वाणी, मन तथा बुद्धि के द्वारा उसका ज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि वह इन सबका आधार है। उसी की चेतना के प्रकाश से ये सब प्रकाशित होते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार आत्मसाक्षात्कार होने से योगी कूटस्थ और जितेंद्रिय हो जाता है। जीवन के द्वंद्व उसे प्रभावित नहीं कर पाते। वह कर्मबंधन से सर्वथा मुक्त और नित्यमोक्ष प्राप्त है --
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥६:८॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- जो योगी ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो विकार रहित (कूटस्थ) और जितेन्द्रिय है, जिसको मिट्टी, पाषाण और कंचन समान है, वह (परमात्मा से) युक्त कहलाता है॥
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आत्मा का जो निरन्तर ध्यान करता है, वह आत्मसंयमी पुरुष शीघ्र ही दिव्य तृप्ति और आनन्द का अनुभव पाकर पूर्णयोगी बन जाता है। उसकी तृप्ति शास्त्रों के पाण्डित्य की नहीं, वरन् दिव्य आत्मानुभूति की होती है। वेदान्त में आत्मा को ही कूटस्थ कहा गया है। कूटस्थ का अर्थ हुआ जो कूट के समान अविचल अविकारी रहता है। ज्ञानविज्ञान से सन्तुष्ट पुरुष कूटस्थ आत्मा को जानकर स्वयं भी सभी परिस्थितियों में कूटस्थ बनकर रहता है। वह समदर्शी बन जाता है। उसके लिए मिट्टी पाषाण और स्वर्ण -- सब समान होते हैं।
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अपने गूढ अनुभवों को इससे अधिक नहीं लिख सकता, और कभी लिखूंगा भी नहीं। भगवान की प्रेरणा से ही इतना सब लिख पाया हूँ। अब आगे का सारा जीवन पुरुषोत्तम की ध्यान-साधना में ही बिताने की अभीप्सा है। आप सब में मैं स्वयं को ही नमन करता हूँ। ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ मई २०२६

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