मुझे वर्ग-भेद और वर्ग-संघर्ष से भय लगता है, क्योंकि वर्ग-संघर्ष से मार्क्सवाद का जन्म होता है। मुझे मार्क्सवाद से भय इसलिये लगता है क्योंकि मार्क्सवाद की नारकीयता को मैं बहुत गहराई से समझता हूँ। मार्क्सवाद का सबसे बड़ा शत्रु है भारत का वेदान्त-दर्शन। भारत के वेदान्त और योग-दर्शन के समक्ष मार्क्सवाद कहीं भी नहीं टिकता। इसीलिए मार्क्स, धर्म को अफीम का नशा कहता है।
.
भारत की आध्यात्मिकता में भारत की सब समस्याओं का समाधान है। स्कन्द-पुराण के अनुसार शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही सत्य की दो अभिव्यक्तियाँ हैं। विष्णुसहस्त्रनाम के अनुसार भगवान विष्णु स्वयं ही यह विश्व बन गये हैं। भगवान विष्णु की समग्रता का ध्यान सम्पूर्ण सृष्टि यानि सम्पूर्ण ब्रह्मांड की विराटता का ध्यान है, जो हमें परमशिव पुरुषोत्तम की अनुभूति कराता है।
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥"
"पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः।
अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च॥२॥"
"योगो योग-विदां नेता प्रधान-पुरुषेश्वरः।
नारसिंह-वपुः श्रीमान केशवः पुरुषोत्तमः ॥३॥" (विष्णु सहस्त्रनाम)
.
जो व्यक्ति भगवान विष्णु के अनंत विराट स्वरूप का नित्य नियमित ध्यान करता है वह इस पृथ्वी पर चलता-फिरता देवता है। सूक्ष्म जगत के देवता भी उसे नमन करते हुए आनंदित होते हैं। वह कुल और वे माता-पिता भी धन्य हैं जहां ऐसे महात्मा का जन्म होता है। उसकी सात पीढ़ियों का तुरंत उद्धार हो जाता है।
सार की बात यह है कि हम भगवान विष्णु की अनंत विराटता की चेतना में रहें। यही श्रीमद्भगवद्गीता में बताई हुई ब्राह्मीस्थिति है और यही कूटस्थ-चैतन्य है। यही ब्रह्मबोध है।
ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
१८ अप्रेल २०२६
No comments:
Post a Comment