Friday, 24 July 2026

ज्योतिर्मय आत्म-शिवलिंग क्या है?

 ज्योतिर्मय आत्म-शिवलिंग क्या है?

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जिसके अन्दर सबका विलय होता है उसे लिंग कहते हैं| स्थूल जगत का सूक्ष्म जगत में, सूक्ष्म जगत का कारण जगत में और कारण जगत का सभी आयामों से परे .... तुरीय चेतना में विलय हो जाता है| उस तुरीय चेतना का प्रतीक हैं .... शिवलिंग, जो साधक के कूटस्थ में निरंतर जागृत रहता है| उस पर ध्यान से चेतना ऊर्ध्वमुखी होने लगती है| ध्यान में आत्मतत्व की अनुभूति ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप एक बृहत लिंगाकार में होती है, जिस में सारी सृष्टि समाहित है|
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ध्यान उन परमशिव का ही हो, जिनकी अनुभूति गुरुकृपा से कूटस्थ में ज्योतिर्मय आत्म-शिवलिंग के रूप में होती है| उन की गहन अनुभूति के पश्चात सारे संचित कर्मफल, विक्षेप और आवरण, उन्हीं में विलीन होने लगते हैं| फिर उन्हीं की उपासना हो और चेतना वहीं पर रहे, अन्यत्र कहीं भी नहीं, अन्यथा भटकाव की पीड़ा और कष्ट बड़ा भयंकर है, जिसे मैं अनेक बार भुगत चुका हूँ| अब और नहीं भटकना चाहता|
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कुछ अति गूढ़ मूल-तत्व की बातें परमात्मा की विशेष कृपा से ही समझ में आ सकती हैं, जिन्हें अन्य कोई नहीं, स्वयं परमात्मा ही समझा सकते हैं| उन के मार्ग-दर्शन के पश्चात इधर-उधर अन्यत्र कहीं भी नहीं देखना चाहिए| भगवान परमशिव, जीवात्मा को संसारजाल, कर्मजाल और मायाजाल से मुक्त कर, स्थूल, सूक्ष्म और कारण देह के तीन पुरों को ध्वंश कर महाचैतन्य में प्रतिष्ठित कराते है, अतः वे त्रिपुरारी हैं| वे ही मेरे परम आराध्य हैं|
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सर्वश्रेष्ठ सत्संग ... परमात्मा का संग है| साधक को नाप-तोल कर कम से कम और सिर्फ आवश्यक, त्रुटिहीन व स्पष्ट शब्दों का ही प्रयोग पूरे आत्मविश्वास से करना चाहिए| आत्मनिंदा, आत्मप्रशंसा और परनिंदा से बचें| किसी की अनावश्यक प्रशंसा भी हमारी हानि करती है| दूसरों द्वारा की गयी प्रशंसा और निंदा की ओर ध्यान न दें| किसी की भी बातों से व्यक्तिगत रूप से आहत न हों, और आल्हादित भी न हों|
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परमात्मा की चेतना में रहते हुए बात करें| कुछ भी बोलते समय हमारी आतंरिक चेतना कूटस्थ में हो| अपनी बात को पूरे आत्मविश्वास से प्रस्तुत करें| बोलते समय यह भाव रखें कि स्वयं भगवान हमारी वाणी से बोल रहे हैं|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जुलाई २०२०

रूस-उकराइन युद्ध अब दिन-प्रतिदिन बड़ा भयंकर और विकट होता जा रहा है, जो महाविनाश का रूप ले सकता है ---

 रूस-उकराइन युद्ध अब दिन-प्रतिदिन बड़ा भयंकर और विकट होता जा रहा है, जो महाविनाश का रूप ले सकता है। जब तक अमेरिका की अर्थव्यवस्था सशक्त है, तब तक यह युद्ध चलता रहेगा। यह युद्ध अमेरिका द्वारा रूस पर थोपा गया है। जब अमेरिका आर्थिक रूप से कमजोर होगा तभी यह युद्ध रुकेगा। यूरोप के देश और NATO -- अमेरिका के दम पर ही उछल-कूद कर रहे हैं। उनमें से किसी में भी दम नहीं है कि रूस से युद्ध कर सके।

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कहने को तो क्रीमिया, दोनेत्स्क और लुहान्स्क पर उकराइन का अधिकार कराने के लिए के लिए अमेरिका उकराइन को भड़का कर यह युद्ध करवा रहा है; लेकिन असली उद्देश्य है रूस को पराजित कर उसकी आर्थिक लूट। अगला नंबर चीन और भारत का होगा। अमेरिका की हथियार लॉबी, ड्रग लॉबी और कुछ गुप्त संस्थाएं बहुत मज़बूत है, जो पूरे विश्व को अपने आधीन करना चाहती हैं। डॉलर की अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता और बढ़ी हुई दर के कारण ही अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था इतनी मजबूत है। यदि विश्व के देश डॉलर में लेन-देन बंद कर दें तो अमेरिका की दादागिरी समाप्त हो जायेगी।
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नवीं शताब्दी तक तो उकराइन का कोई अस्तित्व ही नहीं था। कीव रूस के ही आधीन और उसका ही एक भाग था। १९वीं सदी में ऑस्ट्रिया और रूस के बीच में यूक्रेन की स्थिति एक ग्रामीण क्षेत्र जैसी थी। यहाँ के बारे में बहुत लिख चुका हूँ। अब और लिखने का धैर्य नहीं है। सोवियत संघ के समय स्टालिन द्वारा किए गए क्रूर अत्याचारों के उपरांत भी उकराइन ने बहुत उल्लेखनीय प्रगति की। सोवियत संघ की सेना में बहुत बड़ी संख्या में उच्चाधिकारी और सैनिक उकराइन के थे। सबसे अधिक उद्योग-धंधे और पढ़ाई-लिखाई भी उकराइन में थी। वहाँ की भूमि बहुत उपजाऊ है जो पूरे सोवियत संघ को अन्न खिलाती थी। रूस और उकराइन की हजारों युवतियों और युवकों के वैवाहिक संबंध थे।
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अमेरिका ने ही वहाँ विघटन की स्थिति उत्पन्न की और सोवियत संघ का विघटन करवा दिया। उकराइन एक पृथक गणराज्य बना। अमेरिका ने वहाँ तुर्की के माध्यम से अफीम की बहुत अधिक उपलब्धता करवाई जिससे लाखों लोग नशे के अभ्यस्त और भ्रष्ट हो गए। अमेरिका द्वारा वहाँ की चुनी हुई सरकार को सत्ता से बेदखल करवा कर झेलेंस्की नाम के एक नशेड़ी विदूषक को वहाँ का राष्ट्रपति बनवा दिया गया। यह झेलेंस्की एक तानाशाह है जो चुनाव नहीं करवाता है, और बड़ी क्रूरता से शासन कर रहा है। उसने अपने देश को बर्बाद कर दिया है।
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जब निकिता सेर्गेईविच ख्रूश्चेव सोवियत संघ के राष्ट्रपति थे, उन्होने क्रीमिया को उक्रेन का भाग बना दिया; अन्यथा क्रीमिया रूस का ही भाग था। निकिता खूश्चेव का जन्म उकराइन की सीमा पर स्थित एक रूसी गाँव में हुआ, लेकिन वे उकराइन में ही बस गए, और स्वयं को उकराइनी मानते थे। उन्होने अपनी जवानी में आजीविका के लिए उकराइन की रेलवे में मजदूरी की थी। क्रीमिया पर रूसी अधिकार ऐतिहासिक है। दोनेत्स्क और लुहान्स्क में रूसी भाषी लोग अधिक हैं। उकराइन की अजोव बटालियन ने रूसी भाषी लोगों का जनसंहार आरंभ कर दिया। अबोध बच्चों तक की हत्या बड़ी क्रूरता से की जाने लगी। रूस में शरणार्थियों की बाढ़ सी आ गई। तब रूस को बाध्य होकर यह युद्ध आरंभ करना पड़ा। रूस को यह युद्ध आठ महीनों पहिले ही आरंभ कर देना चाहिए था।
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रूस पराजय को तो स्वीकार नहीं करेगा। यदि उसे लगेगा की वह हार रहा है तो पूरे अमेरिका को राख़ के ढेर में बदलने में देरी नहीं करेगा। इतनी क्षमता तो वह रखता है। विश्व में शांति स्थापित हो, यही मेरी प्रार्थना है। किसी समय दोनों ही देशों में मेरे खूब मित्र थे। उकराइन के ओडेसा नगर में अनेक ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहर थीं, जो अब नष्ट हो गई हैं।
कृपा शंकर
२४ जुलाई २०२३

कूटस्थ-चैतन्य में ही निरंतर रहने का अभ्यास करें ---

 कूटस्थ-चैतन्य में ही निरंतर रहने का अभ्यास करें ---

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वैसे तो हमारा मौन हमारी वाणी है। लेकिन यदि बोलना ही पड़े तो हमारी वाणी से निकला हर शब्द इस भाव से निकले जैसे स्वयं भगवान हमारी वाणी से बोल रहे हैं। नाप-तोल कर कम से कम, आवश्यक, त्रुटिहीन व स्पष्ट शब्दों का ही प्रयोग पूरे आत्मविश्वास से करें। गपशप, आत्मनिंदा, आत्मप्रशंसा और परनिंदा से बचें। किसी की अनावश्यक प्रशंसा न करें। दूसरों द्वारा की गयी प्रशंसा और निंदा की ओर ध्यान न दें। किसी की भी बातों से व्यक्तिगत रूप से आहत और प्रसन्न न हों।
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
२४ जुलाई २०२३