कूटस्थ-चैतन्य में ही निरंतर रहने का अभ्यास करें ---
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वैसे तो हमारा मौन हमारी वाणी है। लेकिन यदि बोलना ही पड़े तो हमारी वाणी से निकला हर शब्द इस भाव से निकले जैसे स्वयं भगवान हमारी वाणी से बोल रहे हैं। नाप-तोल कर कम से कम, आवश्यक, त्रुटिहीन व स्पष्ट शब्दों का ही प्रयोग पूरे आत्मविश्वास से करें। गपशप, आत्मनिंदा, आत्मप्रशंसा और परनिंदा से बचें। किसी की अनावश्यक प्रशंसा न करें। दूसरों द्वारा की गयी प्रशंसा और निंदा की ओर ध्यान न दें। किसी की भी बातों से व्यक्तिगत रूप से आहत और प्रसन्न न हों।
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
२४ जुलाई २०२३
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