श्री अरविन्द के शब्दों में कितना बड़ा सत्य छिपा पड़ा है| भारत की वर्तमान समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए अरविन्द के इन शब्दों को समझना आवश्यक है|
Sunday, 23 August 2026
श्री अरविन्द के शब्दों में कितना बड़ा सत्य छिपा पड़ा है|
" Spirituality is India's only politics, the fulfillment of the Sanatan Dharma its only Swaraj. I have no doubt we shall have to go through our parliamentary period in order to get rid of the notion of western democracy by seeing in practice how helpless it is to make nations blessed."
------ Sri Aurobindo ------
"If Thou art, then Thou knowest my heart. Thou knowest that I do not ask for Mukti, I do not ask for anything which others ask for. I ask only for strength to uplift this nation, I ask only to be allowed to live and work for this people whom I love and to whom I pray that I may devote my life."
---------- Sri Aurobindo ------
"When therefore it is said that India shall rise, it is the Sanatan Dharma that shall rise. When it is said that India shall be great, it is the Sanatan Dharma that shall be great. When it is said that India shall expand and extend herself, it is the Sanatan Dharma that shall expand and extend itself over the world. It is for the Dharma and by the Dharma that India exists."
--------- Sri Aurobindo ---------
भवसागर को गोते लगाए बिना पार करें :----
भवसागर को गोते लगाए बिना पार करें :----
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श्रुति भगवती कहती हैं .....
"प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते | अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ||
–मुण्डकोपनिषद्,२/२/४.
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प्रणव रूपी धनुष पर आत्मा रूपी बाण चढ़ाकर ब्रह्म रूपी लक्ष्य को बेधना है | बाण सीधा अपने लक्ष्य को बेधता है, इधर उधर कहीं भी नहीं जाता | वैसे ही अपने लक्ष्य परमात्मा की ओर ही पूर्ण तन्मयता से अग्रसर होना है, इधर-उधर कहीं भी नहीं देखना है |
See nothing, look at nothing but your goal ever shining before you.
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कठोपनिषद में भी लिखा है कि आत्मा को अधर अरणि और ओंकार को उत्तर अरणि बनाकर मंथन रूप अभ्यास करने से दिव्य ज्ञानरूप ज्योति का आविर्भाव होता है, जिसके आलोक से निगूढ़ आत्मतत्व का साक्षात्कार होता है|
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श्रीमद्भगवद्गीता में भी ओंकार को एकाक्षर ब्रह्म कहा है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
२३ अगस्त २०१७
अपनी प्रज्ञा को निरंतर हर समय -- अव्यय, अनंत, ज्योतिर्मय परमब्रह्म परमात्मा में ही स्थित रखें।
अपनी प्रज्ञा को निरंतर हर समय -- अव्यय, अनंत, ज्योतिर्मय परमब्रह्म परमात्मा में ही स्थित रखें। वे ही नारायण हैं, वे ही पुरुषोत्तम हैं, और वे ही परमशिव हैं। इसके लिए हमें वीतराग यानि राग-द्वेष और अहंकार से तो मुक्त तो होना ही होगा। यह आरंभिक लक्ष्य है।
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ध्यान साधना करते करते गुरु-कृपा से एक दिन, एक चक्राकार ब्रह्मज्योति: का वलय मेरे भ्रूमध्य में प्रकट हुआ। कालांतर में वह ब्रह्मज्योति सहस्त्रारचक्र में दिखायी देने लगी। एक दिन सहस्त्रार से ऊपर का आवरण हट गया और वह ब्रह्मज्योति: अनंताकाश में खूब विचरण करती हुई क्रमशः उस स्थान पर पहुँच गयी, गीता में जिसके बारे में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं
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"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम् यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
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अब वह ऊर्ध्वमूल ही मेरी प्रज्ञा का केंद्र है। वही जानने योग्य है। बाकी कुछ बचा ही नहीं हैं। गुरुकृपा से ही उस अखंडमंडलाकार चिदज्योति: का दर्शन अब नित्य निरंतर होता है। गुरु-प्रणाम मंत्र कहता है --
"अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः॥"
इस अखंडमंडलाकार ज्योति का दर्शन गुरु महाराज ही करा सकते हैं। इस ब्रह्मज्योति के दर्शन के उपरांत ही ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा होती है। ब्रह्म में विचरण ही ब्रह्मचर्य है। ईश्वर प्रदत्त विवेक का प्रकाश ही इस बात को ठीक से समझा सकता है।
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जितनी भगवान ने मुझे बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षमता दी है, उतना ही लिख पाया हूँ। इससे अधिक लिखना मेरी क्षमता से परे है। अब दीर्घकाल तक और कुछ भी लिखने की इच्छा नहीं है। इस समय मैं ब्राह्मी-स्थिति/कूटस्थ-चैतन्य/और कैवल्य में स्थित हूँ। अब शब्दों का निर्माण असंभव होता जा रहा है। केवल परमात्मा की चेतना ही बनी रहेगी।
ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ अगस्त २०२५
अपनी प्रज्ञा अब परमात्मा को सौंप रहा हूँ। मेरी प्रज्ञा अब से परमात्मा में ही स्थित रहेगी।
अपनी प्रज्ञा अब परमात्मा को सौंप रहा हूँ। मेरी प्रज्ञा अब से परमात्मा में ही स्थित रहेगी।
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जहाँ तक मेरा दिमाग चलता था और बुद्धि काम करती थी, वहाँ तक मैंने सब कुछ लिख दिया है। लिखने को अब कुछ बचा ही नहीं है। इससे अधिक दिमाग और बुद्धि मुझ में नहीं है। अब तक पाँच हजार के लगभग पोस्ट/लेख लिख चुका हूँ। मन भर गया है इसलिये अब परमात्मा को अपना अन्तःकरण और प्रज्ञा बापस लौटा रहा हूँ।
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किसी भी तरह की कोई भी कामना/आकांक्षा अब मुझमें अवशिष्ट नहीं है। अवशिष्ट जीवन परमात्मा को पूर्णतः समर्पित है। आप सब मेरी मंगलमय शुभ कामनाएँ स्वीकार कीजिये। परमात्मा में मैं आपके साथ एक हूँ।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ अगस्त २०२५
२३ अगस्त २०२५
मेरा शत्रु कहीं बाहर नहीं, मेरे भीतर ही बैठा है - --
मेरा शत्रु कहीं बाहर नहीं, मेरे भीतर ही बैठा है। मुझे मेरी सब कमियों का पता है, लेकिन उनके समक्ष मैं असहाय हूँ। भगवान से मैंने प्रार्थना की तो भगवान ने कहा कि अपने सब शत्रु मुझे सौंप दो, लेकिन उनसे पहले स्वयं को (यानि अपने को) मुझे (यानि भगवान को) अर्पित करना होगा। स्वयं को अर्पित करने में बाधक है मेरा लोभ और अहंकार, यानि कुछ होने का और खोने का भाव।
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मेरी चेतना और प्रज्ञा दोनों ही परमात्मा को समर्पित ही नहीं, परमात्मा में स्थित है। इस जीवन का बहुत थोड़ा सा भाग बाकी बचा है, यानि इस दीपक में बहुत कम ईंधन बाकी बचा है। अब उसकी चिंता नहीं है। सारी चेतना, प्रज्ञा और सारा अस्तित्व, परमात्मा को समर्पित है। मेरी कोई मृत्यु नहीं है, मैं शाश्वत हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ अगस्त २०२५
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पुनश्च: --- जैसे एक सुपात्र शिष्य की रक्षा गुरु-परंपरा करती है, वैसे ही भगवान को अपना अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) सौंप देने वाले भक्त की रक्षा का दायित्व भगवान स्वयं लेते हैं --
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
अर्थात् - यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है॥
हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है| तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता ||
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