अपनी प्रज्ञा को निरंतर हर समय -- अव्यय, अनंत, ज्योतिर्मय परमब्रह्म परमात्मा में ही स्थित रखें। वे ही नारायण हैं, वे ही पुरुषोत्तम हैं, और वे ही परमशिव हैं। इसके लिए हमें वीतराग यानि राग-द्वेष और अहंकार से तो मुक्त तो होना ही होगा। यह आरंभिक लक्ष्य है।
.
ध्यान साधना करते करते गुरु-कृपा से एक दिन, एक चक्राकार ब्रह्मज्योति: का वलय मेरे भ्रूमध्य में प्रकट हुआ। कालांतर में वह ब्रह्मज्योति सहस्त्रारचक्र में दिखायी देने लगी। एक दिन सहस्त्रार से ऊपर का आवरण हट गया और वह ब्रह्मज्योति: अनंताकाश में खूब विचरण करती हुई क्रमशः उस स्थान पर पहुँच गयी, गीता में जिसके बारे में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं
>>>
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम् यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
.
अब वह ऊर्ध्वमूल ही मेरी प्रज्ञा का केंद्र है। वही जानने योग्य है। बाकी कुछ बचा ही नहीं हैं। गुरुकृपा से ही उस अखंडमंडलाकार चिदज्योति: का दर्शन अब नित्य निरंतर होता है। गुरु-प्रणाम मंत्र कहता है --
"अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः॥"
इस अखंडमंडलाकार ज्योति का दर्शन गुरु महाराज ही करा सकते हैं। इस ब्रह्मज्योति के दर्शन के उपरांत ही ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा होती है। ब्रह्म में विचरण ही ब्रह्मचर्य है। ईश्वर प्रदत्त विवेक का प्रकाश ही इस बात को ठीक से समझा सकता है।
.
जितनी भगवान ने मुझे बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षमता दी है, उतना ही लिख पाया हूँ। इससे अधिक लिखना मेरी क्षमता से परे है। अब दीर्घकाल तक और कुछ भी लिखने की इच्छा नहीं है। इस समय मैं ब्राह्मी-स्थिति/कूटस्थ-चैतन्य/और कैवल्य में स्थित हूँ। अब शब्दों का निर्माण असंभव होता जा रहा है। केवल परमात्मा की चेतना ही बनी रहेगी।
ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ अगस्त २०२५
No comments:
Post a Comment