गुरु-पूर्णिमा पर गुरु रूप में "कूटस्थ-ब्रहम" परमात्मा को नमन !! वे ही गुरु-रूप में हमारे समक्ष आते हैं। ध्यान साधना में भगवान स्वयं को "ज्योतिषांज्योति कूटस्थ अक्षर ब्रह्म" के रूप में प्रकट करते हैं। वे ही गुरु रूप में मेरे समक्ष आए। वे ही गुरु हैं, और वे ही शिष्य हैं। स्वयं उन्हीं की उपासना, उन्हीं के द्वारा, मुझे निमित्त बनाकर होती है।
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भगवान वेदव्यास का जन्म आषाढ़-पूर्णिमा को हुआ था। वे भगवान नारायण के रूप, विश्वगुरु हैं। उन्हीं के जन्मदिवस को गुरु-पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।
भगवान वेदव्यास ने भगवान श्रीकृष्ण के लिए -- "कृष्णं वंदे जगदगुरुम्" लिखा है। श्रीमद्भगवद्गीता भी महाभारत के भीष्म पर्व में वेदव्यास द्वारा लिखी गई है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को "कूटस्थ" बताया है।
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"कूटस्थ" एक अनुभूति है जिसमें साधक को ज्योतिर्मय-ब्रह्म के दर्शन और नाद-श्रवण -- आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य में होते हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१२ जुलाई २०२२