Saturday, 18 July 2026

'एकोहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति ---

 'एकोहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति ---

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कल मध्यरात्रि में लगभग १.३० बजे सोते हुए अचानक ही नींद में एक विचार आया कि इस पूरी सृष्टि में मैं अकेला हूँ, मेरे से अन्य कोई नहीं है, और न कभी होगा।
"एकोहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति।" इस विचार से सोते हुए उठ गया। यह वेदवाक्य है, जिसका अभिप्राय है कि इस ब्रह्माण्ड मे एक ईश्वर ही है, अन्य कोई नहीं है। वही सब भूतों में है, वही सर्वत्र है, और जितने भी रूप दिखाई दे रहे हैं, सब में उसी की सत्ता है।
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इस नाम से नरेंद्र कोहली का लिखा हुआ एक उपन्यास भी है, जिसे मैंने नहीं पढ़ा है। मेरे ऊपर Jean-Paul Sartre नाम के पश्चिमी विचारक का भी कोई प्रभाव नहीं है, लेकिन उसकी उक्ति "hell is other people" यानि Other person is the hell बार बार दिमाग में आती रही। ध्यान में इसका अर्थ यही समझ में आया कि -- उपासना में एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी भी सत्ता का चिंतन "नर्क" है। मुझे लगा कि यह विचार मेरे अवचेतन मन से आया है। लेकिन गहराई में जाने से बोध हुआ कि मेरे लिए यह परमात्मा का एक संदेश है।
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मेरे जीवन की एक कुंठा है, जिससे मुझे भगवान ही मुक्त कर सकते हैं, और वे कर भी रहे है। मैं जीवन में विरक्त होना चाहता था, लेकिन इसके लिए कभी साहस नहीं जुटा पाया। इससे व्यक्तित्व कुंठित हो गया। लेकिन अब ईश्वर से अन्य कोई विचार मन में आता ही नहीं है, अतः वह कुंठा भी समाप्त हो रही है। इस संसार को ईश्वर की प्रकृति अपने नियमानुसार चला रही है। नियमों को न जानना हमारी भूल है। हमारा समर्पण सिर्फ परमात्मा के प्रति हो। गीता में भी भगवान यही कहते हैं --
"सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६:२४॥"
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६:२५॥"
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
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भगवान ही सर्वस्व है। वे सर्वदा सर्वत्र हैं। मेरा कोई पृथक अस्तित्व न रहे। मैं उनके साथ एक हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ जुलाई २०२४

परमात्मा से प्रेम मेरा स्वभाव है, कोई आत्म-मुग्धता या अहंकार नहीं ---

 परमात्मा से प्रेम मेरा स्वभाव है, कोई आत्म-मुग्धता या अहंकार नहीं ---

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स्वभाववश मैं परमात्मा की महिमा का बखान करता रहता हूँ, जो अनंत है। मैं अपना जीवन परमात्मा में जी रहा हूँ, और परमात्मा ही मेरा यह जीवन जी रहे हैं। मैं जहाँ भी हूँ, वहीं परमात्मा हैं। मैं यह भौतिक शरीर नहीं, परमात्मा की अनंतता हूँ। पूर्व जन्मों के व इस जन्म के गुरु भी मुझ में ही समाहित हो गए हैं। अतः स्वयं भगवान ही यह जीवन जी रहे हैं। सभी का कल्याण हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ जुलाई २०२४

जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है, ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदपाठ है ---

 जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है, ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदपाठ है ---

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मैं वही लिख रहा हूँ जो मुझे पूरी तरह ठीक से समझ में आ रहा है। किसी को कुछ भी समझाने की चेष्टा नहीं करूंगा। आज पुरुषोत्तम मास के पहले दिन भगवान से मैं उनकी "अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति" और "वैराग्य" माँग रहा हूँ। यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। और कुछ भी नहीं चाहिए।
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भगवान कहते हैं कि यह संसाररूप वृक्ष ऊर्ध्वमूल वाला है। काल की अपेक्षा भी सूक्ष्म, सब का कारण, नित्य और महान् होने के कारण अव्यक्त मायाशक्तियुक्त "ब्रह्म" ही इसका मूल है। धर्म-अधर्म रूपी शाखाओं पर सुख-दुःख रूपी फूल इसमें लगे हुए हैं। इसके मूल को जो जान लेता है, वह वेद को जानने वाला है।
इसका अर्थ यही हुआ कि जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है। ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदाध्ययन यानि वेदपाठ है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जुलाई २०२३