Saturday, 18 July 2026

जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है, ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदपाठ है ---

 जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है, ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदपाठ है ---

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मैं वही लिख रहा हूँ जो मुझे पूरी तरह ठीक से समझ में आ रहा है। किसी को कुछ भी समझाने की चेष्टा नहीं करूंगा। आज पुरुषोत्तम मास के पहले दिन भगवान से मैं उनकी "अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति" और "वैराग्य" माँग रहा हूँ। यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। और कुछ भी नहीं चाहिए।
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भगवान कहते हैं कि यह संसाररूप वृक्ष ऊर्ध्वमूल वाला है। काल की अपेक्षा भी सूक्ष्म, सब का कारण, नित्य और महान् होने के कारण अव्यक्त मायाशक्तियुक्त "ब्रह्म" ही इसका मूल है। धर्म-अधर्म रूपी शाखाओं पर सुख-दुःख रूपी फूल इसमें लगे हुए हैं। इसके मूल को जो जान लेता है, वह वेद को जानने वाला है।
इसका अर्थ यही हुआ कि जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है। ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदाध्ययन यानि वेदपाठ है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जुलाई २०२३

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