स्वयं के साथ मौन का अवलोकन कीजिये, यह सबसे बड़ी साधना है ---
.
सारे शब्द सीमित हैं। मौन -- शाश्वत सत्य और विस्तार है। असत्य के लाखों शब्द हैं, लेकिन मौन का एक ही शब्द है। इसलिए शोर के झंझावात से बाहर निकल कर मौन का अवलोकन कीजिये। सूर्य, चन्द्र, आकाश और यह धरा सब मौन है। सारा ज्ञान, और सारे प्रश्नों के उत्तर मौन हैं। सारी शक्ति, सारी भक्ति, ध्यान, विरक्ति, प्रेम, करुणा, और सारे तत्व -- मौन हैं।
.
इसलिए मौन रहते हुए हर आती-जाती सांस का अवलोकन कीजिये, और हर सांस के साथ यह भाव करें कि --- यह सारी सृष्टि, सारा विश्व और सारा अनंत विस्तार "मैं" हूँ, यह नश्वर देह नहीं।
उस मौन में से एक प्रणव की ध्वनि निःसृत हो रही है। उस ध्वनि को सुनते हुये उसका मानसिक जप भी करते रहें, और उसी में अपने स्वयं का विलय कर दें। वह मौन की ध्वनि और उस का अनंत विस्तार ही परमात्मा है। उस के साथ स्वयं को एक कर लीजिये। हम धन्य हो जाएँगे, हमारा जन्म सार्थक हो जाएगा। यह सबसे बड़ी सेवा और साधना है जो हम कर सकते हैं।
.
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ जुलाई २०२३
No comments:
Post a Comment