परमात्मा से प्रेम मेरा स्वभाव है, कोई आत्म-मुग्धता या अहंकार नहीं ---
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स्वभाववश मैं परमात्मा की महिमा का बखान करता रहता हूँ, जो अनंत है। मैं अपना जीवन परमात्मा में जी रहा हूँ, और परमात्मा ही मेरा यह जीवन जी रहे हैं। मैं जहाँ भी हूँ, वहीं परमात्मा हैं। मैं यह भौतिक शरीर नहीं, परमात्मा की अनंतता हूँ। पूर्व जन्मों के व इस जन्म के गुरु भी मुझ में ही समाहित हो गए हैं। अतः स्वयं भगवान ही यह जीवन जी रहे हैं। सभी का कल्याण हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ जुलाई २०२४
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