Monday, 17 August 2026

अब और अधिक समय मिलेगा भगवान की उपासना (भक्ति) के लिए ---

 अब और अधिक समय मिलेगा भगवान की उपासना (भक्ति) के लिए ---

माना कि चारों ओर बहुत अधिक घना अंधकार है, लेकिन मुझ निमित्त मात्र का काम तो परमात्मा को जीवन में व्यक्त कर उनका प्रकाश फैलाना ही है, और कुछ भी नहीं।
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आज शाम को कुछ देरी से मेरा लैपटॉप कामचलाऊ मरम्मत के बाद बापस आया है। सब ने एक नया डेस्कटॉप खरीदने, और इस लैपटॉप को रद्दी में डाल देने की सलाह दी है। अधिक से अधिक कुछ दिन और यह चल सकता है। इस लैपटॉप ने १३ वर्षों तक बहुत अच्छी सेवा दी है। जब तक चल रहा है, तब तक इसे ही ठोक-पीट कर चलाऊँगा। यह कैसे चल रहा है, यह देखकर तो मुझे भी आश्चर्य हो रहा है। ईश्वर की कृपा ही थी कि यह काम करना बंद हो गया। थोड़ा बहुत चल जाता है। मेरा मोबाइल एंड्रॉइड फोन भी अपना उपयोगी जीवन लगभग पूर्ण कर चुका है। इन दोनों का उपयोग कम कर दूंगा।
इससे लाभ यह होगा कि अब और अधिक समय मिलेगा भगवान की उपासना के लिए। अनावश्यक लेख नहीं लिखने पड़ेंगे। अनावश्यक संपर्क नहीं होंगे। परमात्मा के चैतन्य (ब्रह्मभाव) में स्थित रहने का निरंतर प्रयास ही मेरे लिए "उपासना" है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ अगस्त २०२२

मैं जला तो सही, पर अंधेरे को उजाला न दे सका ---

 मैं जला तो सही, पर अंधेरे को उजाला न दे सका ---

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इस लौकिक जीवन में अनेक बहुत बड़ी बड़ी भूलें मुझसे हुई हैं, जिनके दुष्परिणाम अब देखने में आ रहे हैं। लगता है यह सांसारिक जीवन एक गफ़लत और दुःस्वप्न ही था। अपनी गफ़लत को छिपाने के लिए हजारों बहाने ढूँढ़ता रहा, लेकिन मिला कुछ भी नहीं। इतना जीवन काल व्यतीत हो गया, कुछ पता ही नहीं चला। हरेक पुरानी स्मृति -- कल की सी बात लगती है।
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अब बात दूसरी है। भगवान के प्रेमसागर में मेरी हिमालय से भी बड़ी बड़ी भूलें, छोटे-मोटे कंकर-पत्थरों से अधिक नहीं हैं। वे कंकर-पत्थर वहाँ भी शोभा दे रहे हैं। इस लौकिक जीवन के संध्याकाल में भगवान ने कुछ विवेक की झलक सी दी है। उस विवेक के प्रकाश में जीवन की सारी भूलें, सारा अवशिष्ट जीवन, और अपना सम्पूर्ण अस्तित्व, परमशिव को समर्पित है। सम्पूर्ण अस्तित्व ही परमशिव है। परमशिव से पृथक अन्य कुछ भी नहीं है। हर समय स्वयं अनंत सर्वव्यापी परमशिव ही स्वयं में स्वयं का ध्यान कर रहे हैं।
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ अगस्त २०२३

सारे देवी-देवता परमात्मा की ही निरंतर उपासना करते हैं। उनकी शक्ति परमात्मा का ही अनुग्रह है। उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। फिर हम परमात्मा को छोड़कर, उनकी आराधना क्यों करते हैं?

 सारे देवी-देवता परमात्मा की ही निरंतर उपासना करते हैं। उनकी शक्ति परमात्मा का ही अनुग्रह है। उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। फिर हम परमात्मा को छोड़कर, उनकी आराधना क्यों करते हैं?

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श्रुतियों में, श्रीमद्भगवद्गीता में, और अनेक आगम ग्रन्थों में सारा मार्गदर्शन है। हमारा लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है, उससे कम कुछ भी नहीं। दिन-रात निरंतर परमात्मा का ही ध्यान करो। हम जहाँ भी हैं, परमात्मा वहीं हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, सारे संत-महात्मा भी वहीं है। हमारा अस्तित्व परमात्मा की उपस्थिती है। सदा यह भाव रखो कि मैं परमात्मा का एक उपकरण मात्र हूँ, मेरे माध्यम से परमात्मा ही स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं। मेरा कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। एकमात्र अस्तित्व परमात्मा का ही है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ अगस्त २०२३

सत्य-सनातन-धर्म की पुनःप्रतिष्ठा और वैश्वीकरण कब होगा?

  सत्य-सनातन-धर्म की पुनःप्रतिष्ठा और वैश्वीकरण कब होगा?

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(उत्तर) : जिस दिन निर्विवाद रूप से पूरा विश्व --
(१) कर्मफलों के सिद्धान्त, (२) पुनर्जन्म, और (३) आत्मा की शाश्वतता को स्वीकार कर लेगा, उस दिन से विश्व में सिर्फ सनातन-धर्म ही रहेगा। फिर ईश्वर के अवतारों पर भी सभी की आस्था होने लगेगी।
सनातन-धर्म के वर्तमान समय में तीन सबसे बड़े शत्रु हैं --
(१) पश्चिम यानि ईसाईयत का प्रभाव, (२) मार्क्सवाद और उसके प्रभाव से नास्तिकता, (३) इस्लामी जिहाद॥
इन से कैसे बचाव हो? इस विषय पर मनीषी विचार करें।
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सबसे पहिले हमें पुनर्जन्म को सत्य सिद्ध करना होगा, फिर कर्मफलों के सिद्धान्त को। आत्मा की शाश्वतता अपने आप ही लोगों के समझ में आ जाएगी।
संसार में इस समय तमोगुण सबसे अधिक व्याप्त है। उसी के कारण असत्य और अंधकार की शक्तियाँ छाई हुई हैं। जब तक तमोगुण की प्रधानता है तब तक आसुरी और पैशाचिक शक्तियों का वर्चस्व रहेगा। तमोगुण का प्रभाव कम होने पर ही मनुष्यों में विवेक जागृत होगा।
इस से अधिक लिखने का कोई लाभ नहीं है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ अगस्त २०२३