मैं जला तो सही, पर अंधेरे को उजाला न दे सका ---
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इस लौकिक जीवन में अनेक बहुत बड़ी बड़ी भूलें मुझसे हुई हैं, जिनके दुष्परिणाम अब देखने में आ रहे हैं। लगता है यह सांसारिक जीवन एक गफ़लत और दुःस्वप्न ही था। अपनी गफ़लत को छिपाने के लिए हजारों बहाने ढूँढ़ता रहा, लेकिन मिला कुछ भी नहीं। इतना जीवन काल व्यतीत हो गया, कुछ पता ही नहीं चला। हरेक पुरानी स्मृति -- कल की सी बात लगती है।
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अब बात दूसरी है। भगवान के प्रेमसागर में मेरी हिमालय से भी बड़ी बड़ी भूलें, छोटे-मोटे कंकर-पत्थरों से अधिक नहीं हैं। वे कंकर-पत्थर वहाँ भी शोभा दे रहे हैं। इस लौकिक जीवन के संध्याकाल में भगवान ने कुछ विवेक की झलक सी दी है। उस विवेक के प्रकाश में जीवन की सारी भूलें, सारा अवशिष्ट जीवन, और अपना सम्पूर्ण अस्तित्व, परमशिव को समर्पित है। सम्पूर्ण अस्तित्व ही परमशिव है। परमशिव से पृथक अन्य कुछ भी नहीं है। हर समय स्वयं अनंत सर्वव्यापी परमशिव ही स्वयं में स्वयं का ध्यान कर रहे हैं।
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ अगस्त २०२३
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