सारे देवी-देवता परमात्मा की ही निरंतर उपासना करते हैं। उनकी शक्ति परमात्मा का ही अनुग्रह है। उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। फिर हम परमात्मा को छोड़कर, उनकी आराधना क्यों करते हैं?
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श्रुतियों में, श्रीमद्भगवद्गीता में, और अनेक आगम ग्रन्थों में सारा मार्गदर्शन है। हमारा लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है, उससे कम कुछ भी नहीं। दिन-रात निरंतर परमात्मा का ही ध्यान करो। हम जहाँ भी हैं, परमात्मा वहीं हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, सारे संत-महात्मा भी वहीं है। हमारा अस्तित्व परमात्मा की उपस्थिती है। सदा यह भाव रखो कि मैं परमात्मा का एक उपकरण मात्र हूँ, मेरे माध्यम से परमात्मा ही स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं। मेरा कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। एकमात्र अस्तित्व परमात्मा का ही है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ अगस्त २०२३
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