रूस-उकराइन युद्ध अब दिन-प्रतिदिन बड़ा भयंकर और विकट होता जा रहा है, जो महाविनाश का रूप ले सकता है। जब तक अमेरिका की अर्थव्यवस्था सशक्त है, तब तक यह युद्ध चलता रहेगा। यह युद्ध अमेरिका द्वारा रूस पर थोपा गया है। जब अमेरिका आर्थिक रूप से कमजोर होगा तभी यह युद्ध रुकेगा। यूरोप के देश और NATO -- अमेरिका के दम पर ही उछल-कूद कर रहे हैं। उनमें से किसी में भी दम नहीं है कि रूस से युद्ध कर सके।
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कहने को तो क्रीमिया, दोनेत्स्क और लुहान्स्क पर उकराइन का अधिकार कराने के लिए के लिए अमेरिका उकराइन को भड़का कर यह युद्ध करवा रहा है; लेकिन असली उद्देश्य है रूस को पराजित कर उसकी आर्थिक लूट। अगला नंबर चीन और भारत का होगा। अमेरिका की हथियार लॉबी, ड्रग लॉबी और कुछ गुप्त संस्थाएं बहुत मज़बूत है, जो पूरे विश्व को अपने आधीन करना चाहती हैं। डॉलर की अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता और बढ़ी हुई दर के कारण ही अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था इतनी मजबूत है। यदि विश्व के देश डॉलर में लेन-देन बंद कर दें तो अमेरिका की दादागिरी समाप्त हो जायेगी।
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नवीं शताब्दी तक तो उकराइन का कोई अस्तित्व ही नहीं था। कीव रूस के ही आधीन और उसका ही एक भाग था। १९वीं सदी में ऑस्ट्रिया और रूस के बीच में यूक्रेन की स्थिति एक ग्रामीण क्षेत्र जैसी थी। यहाँ के बारे में बहुत लिख चुका हूँ। अब और लिखने का धैर्य नहीं है। सोवियत संघ के समय स्टालिन द्वारा किए गए क्रूर अत्याचारों के उपरांत भी उकराइन ने बहुत उल्लेखनीय प्रगति की। सोवियत संघ की सेना में बहुत बड़ी संख्या में उच्चाधिकारी और सैनिक उकराइन के थे। सबसे अधिक उद्योग-धंधे और पढ़ाई-लिखाई भी उकराइन में थी। वहाँ की भूमि बहुत उपजाऊ है जो पूरे सोवियत संघ को अन्न खिलाती थी। रूस और उकराइन की हजारों युवतियों और युवकों के वैवाहिक संबंध थे।
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अमेरिका ने ही वहाँ विघटन की स्थिति उत्पन्न की और सोवियत संघ का विघटन करवा दिया। उकराइन एक पृथक गणराज्य बना। अमेरिका ने वहाँ तुर्की के माध्यम से अफीम की बहुत अधिक उपलब्धता करवाई जिससे लाखों लोग नशे के अभ्यस्त और भ्रष्ट हो गए। अमेरिका द्वारा वहाँ की चुनी हुई सरकार को सत्ता से बेदखल करवा कर झेलेंस्की नाम के एक नशेड़ी विदूषक को वहाँ का राष्ट्रपति बनवा दिया गया। यह झेलेंस्की एक तानाशाह है जो चुनाव नहीं करवाता है, और बड़ी क्रूरता से शासन कर रहा है। उसने अपने देश को बर्बाद कर दिया है।
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जब निकिता सेर्गेईविच ख्रूश्चेव सोवियत संघ के राष्ट्रपति थे, उन्होने क्रीमिया को उक्रेन का भाग बना दिया; अन्यथा क्रीमिया रूस का ही भाग था। निकिता खूश्चेव का जन्म उकराइन की सीमा पर स्थित एक रूसी गाँव में हुआ, लेकिन वे उकराइन में ही बस गए, और स्वयं को उकराइनी मानते थे। उन्होने अपनी जवानी में आजीविका के लिए उकराइन की रेलवे में मजदूरी की थी। क्रीमिया पर रूसी अधिकार ऐतिहासिक है। दोनेत्स्क और लुहान्स्क में रूसी भाषी लोग अधिक हैं। उकराइन की अजोव बटालियन ने रूसी भाषी लोगों का जनसंहार आरंभ कर दिया। अबोध बच्चों तक की हत्या बड़ी क्रूरता से की जाने लगी। रूस में शरणार्थियों की बाढ़ सी आ गई। तब रूस को बाध्य होकर यह युद्ध आरंभ करना पड़ा। रूस को यह युद्ध आठ महीनों पहिले ही आरंभ कर देना चाहिए था।
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रूस पराजय को तो स्वीकार नहीं करेगा। यदि उसे लगेगा की वह हार रहा है तो पूरे अमेरिका को राख़ के ढेर में बदलने में देरी नहीं करेगा। इतनी क्षमता तो वह रखता है। विश्व में शांति स्थापित हो, यही मेरी प्रार्थना है। किसी समय दोनों ही देशों में मेरे खूब मित्र थे। उकराइन के ओडेसा नगर में अनेक ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहर थीं, जो अब नष्ट हो गई हैं।
कृपा शंकर
२४ जुलाई २०२३
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