Saturday, 27 June 2026

"ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥"

 "ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥"

कर्ता भाव से मुक्त होकर निरंतर आत्मा में रमण करें। आत्माराम का कोई कर्तव्य नहीं है। भगवान कहते हैं ---
"जो मनुष्य आत्मा में ही रमने वाला, आत्मा में ही तृप्त, तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट है, उसके लिये इस कोई संसार में कोई कर्तव्य नहीं रहता॥३:१७॥"
"इस जगत् में उस पुरुष का कृत और अकृत से कोई प्रयोजन नहीं है और न वह किसी वस्तु के लिये भूतमात्र पर आश्रित होता है॥३"१८॥""
"इसलिए, तुम अनासक्त होकर सदैव कर्तव्य कर्म का सम्यक् आचरण करो; क्योकि, अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ परमात्मा को प्राप्त होता है॥३:१९॥"
"जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है॥१८:१७॥"
"यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥३:१७॥"
"नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥३:१८॥"
"तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥३:१९॥"
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१८:१७॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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सभी में परमात्मा को नमन !! ॐ तत् सत्।
कृपा शंकर
२४ अप्रेल २०२६

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