भगवत्पाद आद्यगुरु आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) के २५३३ वें जयंती महामहोत्सव (२१ अप्रेल २०२६) की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएं, बधाई और अभिनंदन ---
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आज वैशाख शुक्ल पंचमी (२१ अप्रेल २०२६) को आचार्य शंकर की २५३३ वीं जयंती है। उनका जन्म जीसस क्राइस्ट से ५०८ वर्ष पूर्व वैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था। इसी तरह उनका देहावसान जीसस क्राइस्ट से ४७४ वर्ष पूर्व हुआ था। दुर्भावना से पश्चिमी विद्वान् उनका जन्म ईसा के ७८८ वर्ष बाद होना बताते हैं, जो गलत है। शंकराचार्य मठों से उपलब्ध प्राचीनतम पांडुलिपियों, अन्य ग्रंथों में दिए विवरणों और ग्रहों की तत्कालीन स्थितियों के आधार पर उनकी सही जन्म तिथि की गणना भारतीय विद्वानों द्वारा दुबारा की गई थी।
उनकी जयंती पर उन को नमन एवं सभी सनातन धर्मावलम्बियों का अभिनन्दन॥
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एक महानतम परम विलक्षण प्रतिभा जिसने कभी इस पृथ्वी पर विचरण कर सनातन धर्म का पुनरोद्धार किया था, के बारे में लिखने का मेरा यह प्रयास सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। आज वैशाख शुक्ल पञ्चमी को उनका जन्म मेरे जैसे उनकी परंपरा के सभी अनुयायियों के ह्रदय में हुआ है, अतः शिव स्वरुप भगवान भाष्यकार शङ्करभगवद्पादाचार्य को नमन, जिनकी परम ज्योति हमारे कूटस्थ (अविनाशी आत्म-चैतन्य) में निरंतर प्रज्ज्वलित है।
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आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को मालाबार प्रान्त (केरल) के कालड़ी गाँव में तैत्तिरीय शाखा के एक यजुर्वेदी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे माता-पिता की एकमात्र सन्तान थे। बचपन में ही उनके पिता का देहान्त हो गया था। उस समय सारे भारत में नास्तिकता का बोलबाला था। उस नास्तिकता के प्रभाव को दूरकर उन्होंने वेदान्त और भक्ति की ज्योति से सारे देश को आलोकित कर दिया। सनातन धर्म की रक्षा हेतु उन्होंने भारत में चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की तथा शंकराचार्य पद की स्थापना करके उस पर अपने चारों शिष्यों को आसीन किया।
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आदि शंकराचार्य के बारे में सामान्य जन में यही धारणा है कि उन्होंने सिर्फ अद्वैतवाद या अद्वैत वेदांत को प्रतिपादित किया। पर यह सही नहीं है। अद्वैतवादी से अधिक वे एक भक्त थे, और उन्होंने भक्ति को अधिक महत्व दिया। अद्वैतवाद के प्रतिपादक तो उनके परम गुरु ऋषि गौड़पाद थे, जिन्होनें 'माण्डुक्यकारिका' ग्रन्थ की रचना की। आचार्य गौड़पाद ने माण्डुक्योपनिषद पर आधारित अपने ग्रन्थ मांडूक्यकारिका में जिन तत्वों का निरूपण किया उन्हीं का शंकराचार्य ने विस्तृत रूप दिया। अपने परम गुरु को श्रद्धा निवेदन करने हेतु शंकराचार्य ने सबसे पहिले माण्डुक्यकारिका पर भाष्य लिखा।
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शंकराचार्य के गुरु योगीन्द्र गोविन्दपाद थे जिन्होंने पिचासी श्लोकों के ग्रन्थ 'अद्वैतानुभूति' की रचना की। उनकी और भगवान पातंजलि की गुफाएँ पास पास ओंकारेश्वर के निकट नर्मदा तट पर घने वन में हैं। वहाँ आसपास और भी गुफाएँ हैं जहाँ अनेक सिद्ध संत तपस्यारत हैं। पूरा क्षेत्र तपोभूमि है। राजाधिराज मान्धाता ने यहीं पर शिवजी के लिए इतनी घनघोर तपस्या की थी कि शिवजी को ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होना पड़ा जो ओंकारेश्वर कहलाता है।
अपने 'विवेक चूडामणि' ग्रन्थ में शंकराचार्य कहते हैं ---
"भक्ति प्रसिद्धा भव मोक्षनाय नात्र ततो साधनमस्ति किंचित्।"
-- "साधना का आरम्भ भी भक्ति से होता है और उसका चरम उत्कर्ष भी भक्ति में ही होता है|"
भक्ति और ज्ञान दोनों एक ही हैं। उन्होंने संस्कृत भाषा में इतने सुन्दर भक्ति पदों की रचनाएँ की हैं जो अति दिव्य और अनुपम हैं। उनमे भक्ति की पराकाष्ठा है। इतना ही नहीं परम ज्ञानी के रूप में उन्होंने ब्रह्म सूत्रों, उपनिषदों और गीता पर भाष्य लिखे हैं जो अनुपम हैं।
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यदि भगवान भाष्यकार आदि शंकराचार्य तत्कालीन विकृत हो चुके नास्तिक बौद्ध मत का खंडन करके सनातन धर्म की पुनःस्थापना नहीं करते तो आज भारत, भारत नहीं होता, बल्कि एक पूर्णरूपेण इस्लामिक देश होता। इस्लाम का प्रतिरोध भारत इसी लिए कर पाया क्योंकि यहाँ सनातन धर्म पुनः स्थापित हो चुका था। बौद्धों ने अपना सिर कटा लिया या धर्मान्तरित हो गए पर इस्लाम की धार का प्रतिरोध नहीं कर पाये। तुर्की सहित पूरा मध्य एशिया (उज्बेकिस्तान, कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान) और अफगानिस्तान बौद्ध मतानुयायी हो गया था। वहाँ के मुसलमान पहिले हिन्दू थे, फिर बौद्ध बने। बौद्ध मत में अनेक विकृतियाँ आ गयीं और उसके अनुयायी अत्यधिक अहिंसक और बलहीन हो गये। वे इस्लाम की धार का सामना नहीं कर पाये और मुसलमान बनने को बाध्य हो गए।
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जब इस्लाम का जन्म हुआ तब इस्लाम की आक्रामक धार इतनी तीक्ष्ण थी कि १०० वर्ष के भीतर भीतर पूरा अरब (जो हिन्दू था), बेबीलोन (वर्तमान इराक, कुवैत), पश्चिम एशिया -- यमन से लेबनान तक, उत्तरी अफ्रीका (सोमालिया, इथियोपिया, जिबूती, सूडान, मिश्र, लीबिया, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया और मोरक्को), मध्य एशिया के सारे देश (ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, अज़र्बेजान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान आदि), रूस के तातारिस्तान, देगिस्तान व चेचेनिया आदि प्रदेश और पूरा फारस (वर्त्तमान ईरान) इस्लाम की पताका के अंतर्गत आ गये।
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लेकिन इस्लाम की आंधी लगभग एक सहस्त्र वर्ष राज्य कर के भी भारत को नष्ट नहीं कर पाई, क्योंकि यहाँ सनातन धर्म के अनुयायियों द्वारा भक्ति आन्दोलन द्वारा हर प्रकार के विदेशी आक्रमण का प्रतिरोध हुआ। मौलाना हाली ने दुःख प्रकट करते हुए लिखा था ---
"वो दीने हिजाजी का बेबाक बेड़ा
निशां जिसका अक्साए आलम में पहुंचा
मज़ाहम हुआ कोई खतरा न जिसका
न अम्मां में ठटका, न कुलज़म में झिझका
किए पै सिपर जिसने सातों समंदर
वो डुबा दहाने में गंगा के आकर॥"
यानी इस्लाम का जहाज़ी बेड़ा जो सातों समुद्र बेरोक-टोक पार करता गया और अजेय रहा, वह जब हिंदुस्थान पहुंचा और उसका सामना यहां की संस्कृति से हुआ तो वह गंगा की धारा में सदा के लिए डूब गया॥
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मेरी दृष्टी में भगवान भाष्यकार शङ्कर भगवद्पादाचार्य महानतम और दिव्यतम प्रतिभा थे जिन्होंने ढ़ाई हजार वर्षों पूर्व इस धरा पर विचरण किया। सनातन धर्म की रक्षा ऐसे ही महापुरुषों से हुई है। धन्य है यह भारतभूमि जिसने ऐसी महान आत्माओं को जन्म दिया।
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सिंध पर पहला सफल इस्लामी आक्रमण सन ७१२ ईस्वी में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुआ था। इस अभियान में राजा दाहिर को हराकर सिंध पर विजय प्राप्त की गयी जो भारत में इस्लामी शासन का आरंभ था। अतः अंग्रेज़ इतिहासकारों द्वारा आदि शंकराचार्य का जन्म सन ७८८ ई में बताना तो और भी हास्यास्पद है।
सत्य तो यह भी है कि गुरु गोरखनाथ का जन्म आचार्य शंकर से भी बहुत पहिले हुआ था जिसे अंग्रेज़ इतिहासकार ११वीं सदी में बताते हैं। योग और तंत्र शास्त्र कालखंड में लुप्त हो गये थे जिन्हें नाथ संप्रदाय के योगियों ने ढूंढ निकाला। आचार्य शंकर श्रीविद्या यानि भगवती श्रीललितामहात्रिपुरसुंदरी की आराधना करते थे। उन्हें श्रीविद्या के तंत्र में दीक्षा गुरु गोरखनाथ ने दी थी। यह बात मुझे एक सिद्ध दण्डी सन्यासी ने बताई थी।
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ अप्रेल २०२६
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