Saturday, 27 June 2026

अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए परमात्मा की भक्ति एक व्यापार है ----

 जिसके हृदय में परमात्मा को उपलब्ध होने की भूख-प्यास और तड़प है, व अपनी सारी वेदनाओं के पश्चात भी जिसे परमात्मा से परमप्रेम है, वही वास्तविक भक्त है; अन्य सब लाभार्थी व्यापारी हैं, जिनके लिए अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए परमात्मा की भक्ति एक व्यापार है।

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कुछ भी पाने की आकांक्षा एक सूक्ष्म अहंकार है। आध्यात्म में महत्व कुछ होने का है, न कि कुछ पाने का। परमात्मा को अपने समर्पण की पूर्णता पर ही ध्यान दें। किसी भी तरह की कोई अपेक्षा या कामना न रखें। जो कुछ भी पाया जाता है, वह खोया भी जाता है। पाने को अब कुछ भी नहीं होना चाहिये। अनेक जन्मों से संचित पुण्यकर्मफलों का जब उदय होता है तब भगवान की भक्ति जागृत होती है। धन्य हैं वे सब लोग जिनमें भगवान की भक्ति जागृत है।
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हमारे में एक चुम्बकत्व (आकर्षण) है, वह चुम्बकत्व ही हमारे सारे कार्य करेगा। हम सिर्फ अपने समर्पण की पूर्णता पर ही ध्यान दें। हमारे विचारों में स्पष्टता और दृढ़ता हो, व किसी भी तरह का कोई संशय नहीं हो। किसी से कोई अपेक्षा मत रखो। ईश्वर से संवाद हेतु शब्दों की नहीं, भावों की आवश्यकता है। कौन किसके प्रति समर्पित हो? कौन किसको याद करे? कोई अन्य है ही नहीं। हमारा अस्तित्व परमात्मा को समर्पित है। परमात्मा की इस समग्रता को नमन !!
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जिसको भूख लगी है, वही भोजन करेगा, जिसको प्यास लगी है, वही पानी पीयेगा, जिसके हृदय में परमात्मा के लिये घोर अभीप्सा (अतृप्त असीम प्यास) है, वही भक्ति करेगा। अदम्य भयहीन साहस व निरंतर अध्यवसाय के बिना कोई आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती। संसार की उपलब्धियों के लिए जितने साहस और संघर्ष की आवश्यकता है, उस से कहीं बहुत अधिक संघर्ष और साहस आध्यात्मिक जीवन के लिए करना पड़ता है।
आप सब को नमन। आपका जीवन कृतकृत्य व कृतार्थ हो। ॐ शिव !!
कृपा शंकर
३ अप्रेल २०२६

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