Saturday, 27 June 2026

अब कुछ दिन तक और कुछ भी नहीं लिखेंगे। धर्म व राष्ट्र की रक्षा हेतु उपासना तो कर ही सकते हैं।

 अब कुछ दिन तक और कुछ भी नहीं लिखेंगे। धर्म व राष्ट्र की रक्षा हेतु उपासना तो कर ही सकते हैं।

.
मेरा सारा चिंतन अद्वैत वेदान्त का है लेकिन सारी उपासना परमात्मा के साकार रूप की ही होती है। मेरे लिए साकार का अर्थ है -- सारे आकार जिसके हों, वह साकार है। जो भी सृष्ट हुआ है उसका आकार तो है ही। सृष्टि में कुछ भी बिना आकार के नहीं है।
.
कुछ प्रत्यक्ष शक्तियाँ हैं जिन्हें कोई नहीं नकार सकता। कोई चाहे या न चाहे, उन की उपासना हुए बिना नहीं रहती। एक तो शक्ति है श्रीहनुमान जी की। और दूसरी शक्ति है भगवान श्रीकृष्ण की। मैं अपने विचार किसी पर थोपना नहीं चाहता, लेकिन जो अनुभूत सत्य है वह तो कभी बदल नहीं सकता।
साधना के मापदंड बदलते रहते हैं। एक परम शिवभक्त थे जिन्होंने जीवन भर नियमित रूप से शिव की आराधना की, लेकिन अपनी वृद्धावस्था में वे श्रीराधा-कृष्ण के भक्त हो गये। श्रीराधा-कृष्ण का ध्यान करते करते ही उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। ऐसे ही अनेक अद्वैत-वेदांती हैं, जो वृद्धावस्था में हनुमान जी की उपासना करने लगते हैं। उनका कथन है की वे जो कुछ भी हैं, वह वे अपने अनुभवों से हैं।
.
मेरे सबसे यही प्रार्थना है कि लकीर के फकीर नहीं बनें। साधना के क्षेत्र में अपने अनुभव लो, और जो कुछ भी करो वह अपने निजी अनुभवों से प्रेरणा लेकर करो। किसी अन्य की नकल कर के कुछ भी मत करो। मैं कुछ दिन एक अद्वैत वेदांतियों के आश्रम में रहा था। वहाँ दिन का आरंभ सामूहिक रूप से आचार्य शंकर के "निर्वाण-षटकम", श्रीमद्भगवद्गीता के क्रमशः एक अध्याय, और रामचरितमानस के सुंदर कांड के क्रमशः पाँच दोहों और उनके मध्य की सभी चौपाइयों के पाठ से होता था। ऐसा तो मैंने कोई भी आश्रम आज तक नहीं देखा जहां शिवपूजा नहीं होती हो। कुछ बातें और अनुभव गोपनीय होते हैं, उन्हे गोपनीय रखो, लेकिन जो कुछ भी अंतिम रूप से सीखना है वह अपने अनुभवों से सीखो। अपने विचार किसी पर मत थोपो, और अपने ऊपर किसी दूसरे को भी उसके विचार मत थोपने दो। अपने अनुकूल जो भी साधना सर्वश्रेष्ठ है वह साधना करो। परमात्मा को निरंतर अपनी स्मृति में रखो।
.
ॐ तत् सत् !! कृपा शंकर
१२ मई २०२६

No comments:

Post a Comment