Saturday, 27 June 2026

सबसे अधिक आनंद का विषय

सबसे अधिक आनंद का विषय 

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आजकल गर्मी पड़ रही है, सर्दी बिल्कुल भी नहीं है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में जल्दी उठिए (लगभग तीन-साढ़े तीन बजे) और शौचादि से निवृत होकर खुले में घर की छत पर या अन्य किसी खुले स्थान पर एक कंबल बिछा कर बैठ जाइए। नितंबों के नीचे एक पतली गद्दी लगा लीजिये ताकि कमर सीधी रहे। ठुड्डी भूमि के समानांतर। कुछ देर हठयोग के कुछ प्राणायाम कीजिए। उनके साथ यदि हो सके तो तीन-चार बार उज्जयी प्राणायाम भी कीजिए। बहुत लाभदायी सिद्ध होगा।

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अब आँखों की पुतलियों को भ्रूमध्य की ओर स्थिर कर, परमात्मा की अनंतता का ध्यान कीजिए। एक कल्पना कीजिए कि आपके भ्रूमध्य से एक ज्योति निकलकर सारे ब्रह्मांड में विस्तृत हो गई है। वह ज्योति सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है, और सारी सृष्टि उस ज्योति में समाहित है। वह ज्योति आप स्वयं हैं, यह नश्वर देह नहीं। यह ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान है जिसे अजपा-जप कहते हैं। इसका वैदिक नाम "हंसवती ऋक" है। इसे हंसःयोग भी कहते हैं। एक बार सारी सांस बाहर फेंक दो। जितनी देर बिना सांस के रह सको उतनी देर तक तक रहो। अब सांस को अपने आप चलने दो। जब सांस भीतर जाए तब "सोsssss" और जब सांस बाहर जाए तब "हंsssss" का जप मानसिक रूप से कीजिए। किसी भी तरह की ध्वनि मुंह से न निकले। सोहं के स्थान पर "हंसः" मंत्र का जप भी कर सकते हैं, इससे अजपा-गायत्री का ध्यान भी हो जाता है। इस साधना को पूर्ण खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में किया जाये तो बहुत अधिक लाभदायक है। जब कुंभक लग जाये यानि सांस अस्थायी रूप से रुक जाये उस समय में आप प्रणव मंत्र का मानसिक जप कीजिये। महावाक्य "तत्वमसी" (तत् त्वं असि) का ही विस्तार है "सोहं", जिसका आप ध्यान कर रहे हैं। लगभग एक घंटे तक यह ध्यान कीजिये तत्पश्चात दो तीन बार शिव-संहिता में बताई हुई महामुद्रा का अभ्यास कर इसका समापन कर सकते हैं। हठयोग के केवल तीन ही मौलिक ग्रंथ हैं -- "घेरण्ड-संहिता", "हठयोग-प्रदीपिका" और "शिव-संहिता" जो बाजार में पुस्तकों की हर बड़ी दुकान पर उपलब्ध हैं। हठयोग की किसी अन्य पुस्तक की आवश्यकता नहीं है। मुख्य आवश्यकता परमात्मा से परमप्रेम (भक्ति) की है, जिसके बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते।
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आप परमात्मा को समर्पित होकर ध्यान साधना कीजिए। आप आनंद से भर जाओगे। पूरे दिन परमात्मा के तारक मंत्र "राम" का मानसिक जप कीजिये। अजपा-जप की विधि अनेक महात्माओं ने समझाई हैं, जिनकी अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं। लेकिन सर्वाधिक विस्तार से इसका वर्णन मैंने "तपोभूमि नर्मदा" नामक पुस्तक के पांचवें खंड के मध्य में देखा है। अनेक महात्माओं के सत्संगों में इस विषय को बड़े ध्यान से सुना है।
परमात्मा के रूप आप सब को मेरा नमन। मैं उपलब्ध नहीं हूँ। किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकूँगा। ॐ तत् सत्॥
कृपा शंकर
८ मई २०२६

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