Saturday, 27 June 2026

सब तरह के कर्मफलों, पाप-पुण्य, व सांसारिकता से मुक्ति का एकमात्र उपाय -- "निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन" --

 सब तरह के कर्मफलों, पाप-पुण्य, व सांसारिकता से मुक्ति का एकमात्र उपाय -- "निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन" --

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जब तक हमारे विचारों व भावों में तमोगुण की प्रधानता है, तब तक ईश्वर के मार्ग पर हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। कितने भी पूजा-पाठ, जप-तप, यज्ञ-अनुष्ठान, और दान-पुण्य करने का दिखावा कर लें; लेकिन जब तक राग-द्वेष, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, लोभ व अहंकार है, तब तक हमारे पुण्य कुछ भी काम नहीं आयेंगे। इंद्रीय सुखों के प्रति आकर्षण, और सांसारिक सम्बन्धों के प्रति मिथ्या कर्तव्य बोध बड़े भ्रामक हैं। प्रमाद को तो भगवान सनत्कुुमार ने साक्षात मृत्यु बताया है। दीर्घसूत्रता है— शुभ कार्य को आगे टालने की प्रवृत्ति।
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने मुक्त होने का उपाय बताया है और वह है --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
अर्थात् -- "हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत? निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो॥"
"The Vedic Scriptures tell of the three constituents of life - the Qualities. Rise above all of them, O Arjuna, above all the pairs of opposing sensations; be steady in truth, free from worldly anxieties and centered in the Self."
भगवान हमें निस्त्रैगुण्य यानि त्रिगुणातीत होने को कहते हैं। इसके लिए --
संसार की कामनाओं का त्याग करते हुए हमें --
(१) निर्द्वन्द्व: --- सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय जैसे विपरीत परिस्थितियों (द्वंद्वों) से निर्लिप्त हो जाओ।
(२) नित्यसत्त्वस्थ -- सदा नित्य-निरंतर रहने वाले परमात्मा में स्थित रहो, यानी ज्ञान और शुद्धता (सत्त्वगुण) में स्थित रहो।
(३) निर्योगक्षेम --- न अप्राप्त वस्तु की इच्छा करो (योग) और न ही प्राप्त की रक्षा की चिंता (क्षेम) करो, क्योंकि भगवान् के शरणागत होने पर वे स्वयं योगक्षेम का वहन करते हैं।
(४) आत्मवान --- अपनी आत्मा में स्थित रहो, या परमात्मा के परायण हो जाओ, प्रमादरहित हो जाओ।
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ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
७ अप्रेल २०२६

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