(उत्तर) : (१) जहां भी मेरा अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) स्वतः ही कूटस्थ में रमण करने लगे, वहीं सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। (२) अपने मन को सब विषय-वासनाओं से बाहर खींचकर निरंतर कूटस्थ में ही लगाये रखें। (३) कूटस्थ में स्वयं को विलीन कर कूटस्थ की ही उपासना करें। (४) मनुष्य जीवन की सार्थकता कूटस्थ-चैतन्य यानि ब्राह्मी स्थिति है। (५) "कालव्यापी अविनाशी आत्म-तत्व को ही 'कूटस्थ' कहते है।"
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श्रीमद्भगवद्गीता में "कूटस्थ", भगवान श्रीकृष्ण द्वारा प्रयुक्त शब्द है। अमरकोष के अनुसार कूटस्थ का अर्थ है -- "कालव्यापी स कूटस्थ:" अर्थात जो काल को व्याप्त किए हुए है, वह त्रिकालकर्ता -- भूत, भविष्य, और वर्तमान का नियंत्रक "कूटस्थ" है। समष्टि में व्याप्त चैतन्य सत्ता ही "कूटस्थ" है। मुझे जो समझ में आया है, उसके अनुसार कूटस्थ शब्द का अर्थ -- "कालव्यापी अविनाशी आत्म तत्व" है, जिसकी अनुभूति तो सर्वत्र होती है, लेकिन कहीं भी दिखाई नहीं देता। कूटस्थ यानि आत्म-तत्व का कभी नाश नहीं हो सकता। "अविनाशी आत्म-तत्व ही कूटस्थ है।"
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(प्रश्न) : मुझे कूटस्थ शब्द का अर्थ कैसे समझ में आया?
(उत्तर) : एक दिन ध्यान करते करते विद्युत की आभा के समान एक ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होकर समस्त ब्रह्मांड में फैल गयी। उस ज्योति की आभा सर्वत्र थी, सब कुछ यानि सारा अस्तित्व उस ज्योति में था। उससे परे कुछ भी नहीं था। अपना दर्शन देकर वह ज्योति धीरे धीरे कुछ समय पश्चात लुप्त हो गयी। लेकिन ध्यान-साधना में अब उसके दर्शन नित्य होते हैं। धीरे धीरे उस ज्योति के साथ साथ प्रणव नाद का भी श्रवण होने लगा। उस ज्योति के दर्शन, और नादानुसंधान -- कूटस्थ में नित्य होने लगे हैं। उनके बिना हृदय तड़प उठता है। इससे कूटस्थ शब्द का अर्थ ठीक से समझ में आया।
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जब तक पूर्ण तृप्ति और संतुष्टि न मिले, तब तक भगवान का खूब ध्यान करें। उन्हें अपनी स्मृति में हर समय रखें। जब भी समय मिले भगवान का स्मरण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करें।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! महादेव महादेव महादेव !!
कृपा शंकर
२२ अप्रेल २०२६
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