Sunday, 22 March 2026

नित्य नियमित ध्यान साधना -- अनिवार्य है। इसका कोई विकल्प नहीं है।

 नित्य नियमित ध्यान साधना -- अनिवार्य है। इसका कोई विकल्प नहीं है।

यह गुरु महाराज का स्पष्ट आदेश है। यदि परमात्मा की चेतना में मृत्यु भी हो जाये तो वह इस नारकीय सांसारिक जीवन को जीने से तो अधिक श्रेष्ठ है।
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जैसी हमारी श्रद्धा होती है, वैसे ही हम हो जाते हैं। यह अकाट्य सत्य है। हमारी श्रद्धा भी सात्विक, राजसिक और तामसिक होती हैं। श्रद्धा के अनुसार ही हमारी वासनाएं होती हैं। हमारे समस्त विचार, भावनाएं, और कर्म, हमारी श्रद्धा के अनुरूप ही होते हैं। जब हम स्वयं को यह देह मानते हैं तो हमारा अहंकार भी उतना ही अधिक प्रबल होगा। इसलिए नित्य नियमित ध्यान-साधना परम आवश्यक है, क्योंकि ध्यान हम परमात्मा की विराट असीम अनंत सर्वव्यापकता का करते हैं। विराटता का ध्यान करते हमारी चेतना भी विराट, अनंत और सर्वव्यापक हो जाती है।
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साधना में सबसे पहली सफलता वीतरागता है। बिना वीतराग हुए हम सफल नहीं हो सकते। "वीतरागविषयं वा चित्तम्" (योगसूत्र 1.37)। वीतराग महापुरुष के ध्यान या चिंतन से हमारा चित्त भी वीतराग हो जाता है। रामचरितमानस में भरत जी का चरित्र वीतरागता का सर्वोच्च उदाहरण है। भगवान श्रीराम का चरित्र भी परम वीतराग है। नित्य नियमित ध्यान द्वारा ही हम दम्भ, अहंकार, कामुकता और राग-द्वेष से मुक्ति पा सकते हैं। वीतरागता ही हमारे साधुत्व की परिचायक है। बिना नित्य-नियमित ध्यान साधना के हम वीतराग नहीं बन सकते। ध्यान साधना में किसी भी तरह की आकांक्षा न हो तो हमारी निष्काम साधना सात्विक होती है। निष्काम साधना ही सर्वश्रेष्ठ है जो हमें तुरंत ईश्वर से जोड़ देती है। इसके लिए नियमितता चाहिए। अतः नित्य नियमित और गहन ध्यान साधना अनिवार्य है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ मार्च २०२६

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