कुंडलिनी-जागरण, कूटस्थ-चैतन्य और ब्राह्मी-स्थिति ---
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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने लगभग तीन बार "कूटस्थ" शब्द का प्रयोग किया है। यह बड़ा ही पवित्र शब्द है, मेरे विचार से इसका एकमात्र अर्थ जो सरलतम भाषा में हो सकता है, वह है --"अविनाशी आत्म चैतन्य"। इसका कोई दूसरा अर्थ नहीं है। गीता के दूसरे अध्याय के अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने "ब्राह्मी-स्थिति" की चर्चा की है। इस "ब्राह्मी-स्थिति" और "कूटस्थ-चैतन्य" का अर्थ एक ही है। ये दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं, इनमें कोई भेद नहीं है। बौद्धिक रूप से "अविनाशी आत्म-चैतन्य" को समझना असंभव है। इसे केवल परमात्मा की परम कृपा द्वारा ही समझा जा सकता है। यानि जिस पर परमात्मा की कृपा हो, वही इसे समझ सकता है।
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मैं ईश्वर की प्रेरणा से ही निम्न पंक्तियाँ लिख पा रहा हूँ। बिना उनकी कृपा के एक शब्द भी नहीं लिख सकता। उनकी कृपा से ही श्रीमद्भगवद्गीता के "पुरुषोत्तम-योग" को समझ पाया हूँ, जिसे बिना उनकी कृपा के कोई नहीं समझ सकता। यह गीता का सार है जो गीता के पंद्रहवें अध्याय के आरंभिक चार मंत्रों में समाहित है। श्रीमद्भगवद्गीता मेरा प्राण है, उसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। यहाँ मैं गीता पर चर्चा कर रहा हूँ, यह भगवान के परमप्रेम की ही अभिव्यक्ति है। व्यक्तिगत रूप से मैं इसकी चर्चा भविष्य में किसी से भी कभी भी नहीं करूंगा। यह मेरा व्यक्तिगत विषय है।
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यहाँ मैं कुंडलिनी जागरण के ऊपर लिख रहा हूँ। इस विषय पर बहुत अधिक झूठ परोसा गया है। कुंडलिनी-जागरण कोई जादू-मंत्र नहीं है। यह हमारे सूक्ष्म देह के मेरुदण्ड में होने वाली एक अनुभूति है जो ईश्वर की परमकृपा से सभी भक्तों को होती है। उनके भक्त इसकी चर्चा नहीं करते। कुंडलिनी-जागरण का एकमात्र लाभ यह है कि इससे हमारे सारे बौद्धिक संशय दूर हो जाते हैं। परमात्मा की अवधारणा अधिक अच्छी तरह समझ में आ सकती है। इससे होने वाली हानि यही है कि इस में यदि ब्रह्मचर्य का पालन न किया जाये, यानि आचार-विचार में शुद्धि न हो तो मस्तिष्क की एक स्थायी गंभीर विकृति उत्पन्न हो सकती है जिसे इस जन्म में दूर नहीं किया जा सकता। एक दूसरा ही जन्म उसके लिए लेना पड़ता है। जिनकी आस्था ईश्वर में नहीं है, वे इस विषय से दूर रहें। यह उनका विषय नहीं है। नहीं तो आप पागल हो जाएँगे।
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ॐ नमः शिवाय !! मैं शिव, विष्णु और उनके अवतारों में पूर्ण आस्था रखता हूँ। शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। दोनों ही परमब्रह्म परमात्मा की दो पृथक पृथक अभिव्यक्तियाँ हैं। आप सब का जीवन कृतकृत्य और कृतार्थ हो।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ अप्रेल २०२६
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