ईश्वर से ईश्वर के अतिरिक्त हमें कुछ अन्य चाहिए ही नहीं ---
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जिस समय हम परमात्मा का चिंतन करते हैं, उस समय हमारा कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता। जहाँ कोई अन्य है ही नहीं, वहाँ कैसा एकांत? जब तक स्वयं का पृथक अस्तित्व है, तब तक वहाँ ईश्वर नहीं है। भगवान हमें अनन्य भाव से भक्ति करने को कहते हैं। जहाँ कोई अन्य नहीं है, वहीं अनन्य भक्ति है। यह अनन्य भाव ही कैवल्य है। स्वयं की पृथकता के बोध को भी मिटाना पड़ता है, ईश्वर से पृथक किसी भी अन्य कामना को गीता में भगवान ने "व्यभिचार" की संज्ञा दी है। वे हमसे अव्यभिचारिणी भक्ति मांगते हैं।
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जब तक हम स्वयं को यह भौतिक शरीर यानि देह मानते हैं,और इसी के सुख के लिए सब कुछ करते हैं, तब तक हम भगवान से दूर हैं। यह शरीर एक साधन मात्र है, और कुछ भी नहीं।
ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
२२ जून २०२६
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