Friday, 26 June 2026

जो सर्वात्म-भाव में हैं, वे ईश्वर के साथ एक हैं ---

 अब तक आप के हृदय में ईश्वर के प्रति एक परमप्रेम जागृत हो गया होगा, जिसमें आप उनके सौन्दर्य, माधुर्य और परमप्रेम में डूब गये होंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ है तो यह एक अति गंभीर चिंता का विषय है। आप प्रयासपूर्वक निरंतर उनके प्रेमसिंधु में डूबे रहें, यही उनकी बड़ी से बड़ी उपासना है। आपके और उनके बीच में केवल प्रेम का रस रहना चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं। उस प्रेमरस में पूरी तरह डूब जाएँ, कहीं कोई भेद न रहे। गीता में भगवान कहते हैं --

"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
अर्थात् -- बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि यह सब वासुदेव है ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है।
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भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं, न तो कोई उनका प्रिय है और न अप्रिय। लेकिन जो उनको प्रेम से भजते हैं, भगवान उनमें हैं, और वे भी भगवान में हैं --
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥९:२९॥"
अर्थात् - मैं समस्त भूतों में सम हूँ, न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय, परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ॥
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"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है, और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
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"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४:११॥"
अर्थात् - जो मुझे जैसे भजते हैं, मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ; हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं॥
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हम सर्वात्मभाव में भगवान के साथ एक है। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ मई २०२६

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