Friday, 26 June 2026

जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम। घर हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम॥

 जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम। घर हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम॥

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मनुस्मृति में और श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने चार वर्ण ही बताए हैं। लेकिन भारत का विधान सैंकड़ों जातियाँ बताता है। संविधान का अर्थ होता है -- समान विधान। लेकिन यहाँ तो संविधान नहीं, बहुविधान है। अगड़ा, पिछड़ा, अति-पिछड़ा, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, विशेष पिछड़ी जाति, अल्प-संख्यक, बहू-संख्यक आदि अनेक जातियाँ हैं। हिंदुओं में भी सैंकड़ों जातियाँ हैं और मुसलमानों में भी सैकड़ों जातियाँ हैं। जातिगत आरक्षण बंद हो जाये और सरकारी कागचों में जाति का उल्लेख बंद हो जाये तो जातिवाद स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन जातिवाद को कोई समाप्त नहीं करना चाहता। यहाँ तो विधर्मी भी कोट पर जनेऊ पहिनते हैं, और स्वयं को उस गौत्र का ब्राह्मण बताते हैं जिस का कोई अस्तित्व ही नहीं है। उनका एकमात्र उद्देश्य भारत को तोड़कर यहाँ शासन करना, और देश को लूटना है।
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सारी सृष्टि ब्रह्ममय है, अतः हमारी एक ही जाति है, और हमारे माता-पिता भी राम ही हैं। सृष्टि का अनंत विस्तार ही महाशून्य है जो हमारा घर है। हमारी साधना भी मूल रूप से एक ही है जिसे अनाहद नाद का श्रवण कहते हैं। लोग हिमालय में क्यों जाते हैं ? सिर्फ इसीलिए जाते हैं कि वहाँ विस्तार की अनुभूति होती है और अनाहत नाद की ध्वनि स्वतः ही हर समय सुनाई देती है। मैं स्वयं अनेक बार अल्मोड़ा जिले के रानीखेत क्षेत्र में दूनागिरी पर्वत की ओर साधना के उद्देश्य से गया हूँ। वहाँ परमात्मा का ध्यान भी स्वतः ही हो जाता है, और ध्यान लगते ही प्रणव की ध्वनि भी अंतर में स्वतः ही गूंजने लगती है। कृपा शंकर २ जून २०२६

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