जाने-अनजाने में कभी किसी जन्म में कोई पुण्य किया होगा जो अब फलीभूत हो रहा है। प्रातःकाल मैं सोकर नहीं उठता। स्वयं परमात्मा ही सोकर उठते हैं। निरंतर उन्हीं की चेतना बनी रहती है। अब जीवन का हरेक क्षण वे ही जी रहे हैं। भगवान ने मुझे सब कर्तव्यों से मुक्त कर दिया है। मेरा इस जीवन अब कोई कर्तव्य अवशिष्ट नहीं है। मेरा एकमात्र कर्तव्य निज जीवन में उन्हें निरंतर व्यक्त करना है, अन्य कोई कर्तव्य नहीं है। उनकी चेतना समष्टि में व्याप्त हो। किसी अन्य का कोई अस्तित्व नहीं है। अब पीछे मुड़कर देखने का अवकाश नहीं है। सामने भगवान स्वयं बिराजमान हैं। अब जीवन परमात्ममय है। उनके सिवाय कुछ भी अन्य नहीं है। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ जून २०२६
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