"सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः"
(सत्य की विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य के द्वारा ही देवयान मार्ग (मोक्ष का मार्ग) प्रशस्त होता है। (मुंडकोपनिषद ३.१.६.)
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केवल १२ मंत्रों का यह अथर्ववेदीय उपनिषद सबसे छोटा उपनिषद है लेकिन ज्ञान का भंडार है। यह मुख्य उपनिषदों में आता है। इसमें अंगिरा ऋषि द्वारा शौनक ऋषि को दिया गया ब्रह्मविद्या का उपदेश है। इसी को आधार बनाकर आचार्य गौड़पाद ने "मांडूक्यकारिका" नामक ग्रंथ की रचना की, जो अद्वैत वेदान्त दर्शन का सर्वोच्च प्रामाणिक ग्रंथ है। आचार्य शंकर ने सबसे पहिला भाष्य ही मुंडकोपनिषद पर लिखा था।
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मुंडकोपनिषद -- ज्ञान और आध्यात्मिकता का वह स्वर्ण-भंडार है जो सांसारिक मोह-माया से मन का 'मुंडन' कर सत्य का दर्शन कराता है। इसकी साधना से सत्य का बोध होता है। दो पक्षियों का दृष्टांत मुंडकोपनिषद (मंत्र 3.1.1) में एक प्रसिद्ध रूपक के रूप में दिया गया है, जो जीव और ईश्वर के संबंधों को समझाता है। एक ही वृक्ष (देह) पर दो पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) साथ-साथ बैठे हैं। इनमें से एक पक्षी (जीव) उस पेड़ के फल (संसार के सुख-दुःख) खाता है और मोहित रहता है, जबकि दूसरा पक्षी (परमात्मा) बिना फल खाए बस शांत भाव से देखता और साक्षी बना रहता है। जब जीव मोह त्याग कर उस दूसरे साक्षी पक्षी को देखता है, तब वह सभी शोकों से मुक्त हो जाता है।
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मुंडकोपनिषद का मुख्य सार -- "ब्रह्म ही सत्य" है। जैसे जलती हुई अग्नि से हज़ारों चिंगारियां निकलती हैं, वैसे ही इस परम ब्रह्म से ही सम्पूर्ण जीव, जगत और तत्व निकलते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं। जिस प्रकार नदियाँ अपना नाम और रूप त्याग कर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष नाम और रूप से मुक्त होकर परमब्रह्म में एकाकार हो जाते हैं। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
२६ मई २०२६
पुनश्च: --जो मुमुक्षु इसी जीवन में परमात्मा का बोध करना चाहते हैं, उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता के साथ साथ मुंडकोपनिषद का स्वाध्याय भी करना चाहिए।
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