यह प्रश्न ही असंगत यानी गलत है। संबंध वहीं होता है जहां कोई भेद होता है। यहाँ तो कोई भेद ही नहीं है, अतः संबंध होने या न होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। परमात्मा ही हमारा एकमात्र अस्तित्व है। यह बात मैं नहीं कह रहा, बल्कि श्रुति भगवती स्वयं सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद (६.२.३) में कह रही है --
"तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत। तत्तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेति तदपोऽसृजत। तस्माद्यत्र क्वच शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते ॥६.२.३॥"
परमात्मा के मन में एक संकल्प उत्पन्न हुआ कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ -- "एकोऽहं बहु स्याम्"; उसी संकल्प का परिणाम यह सृष्टि है। एक ही परमात्मा सभी जीवों और संसार में व्याप्त है। वह स्वयं ही यह सृष्टि बन गया है।
(यह बात विष्णुसहस्त्र्नाम के आरंभ में भी कही गयी है -- "ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः। भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥ पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः। अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च॥)
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सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद का उपरोक्त श्लोक उद्दालक ऋषि द्वारा अपने पुत्र श्वेतकेतु को प्रदान की गई शिक्षा का भाग है। संपूर्ण सृष्टि एक ही मूल कारण से उत्पन्न हुई है। ब्रह्मांड की पहली अभिव्यक्ति 'तेज' (ऊष्मा) के रूप में हुई और उससे 'जल' (अपः) की उत्पत्ति हुई।
इसी उपनिषद में ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार द्वारा अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को दी गयी "भूमा विद्या" का भी उल्लेख सूत्र रूप में है। ब्रह्मज्ञान को ही वैदिक युग में भूमाविद्या कहते थे।
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अब वापस अपनी मूल बात पर आता हूँ। जब हम स्वयं ही परमात्मा के मन की कल्पना हैं, तो यह बात असंगत है कि हमारा परमात्मा से क्या संबंध है। परमात्मा स्वयं ही यह सृष्टि बन गया है। अब एक बात स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि अब अपने शरीर की इस वृद्धावस्था में -
(१) मैंने परमात्मा के अतिरिक्त अन्य सब विषयों पर सोचना ही बंद कर दिया है।
(२) मैं उसी व्यक्ति से मिलता हूँ जिसके हृदय में परमात्मा के प्रति कूट कूट कर प्रेम भरा पड़ा है। अन्य किसी से मिलने पर बड़ी पीड़ा होती है।
(३) पता नहीं कौन सा क्षण अंतिम हो, अतः कूटस्थ (कालव्यापी परम आत्म-चैतन्य) में परमात्मा को ही स्थापित कर रखा है। कूटस्थ-चैतन्य का ही साथ शाश्वत है, अन्य सब गौण है।
हरिः ॐ तत् सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२७ मई २०२६
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