Friday, 26 June 2026

एक बार अपने गंतव्य पर पहुँच जाने के पश्चात किसी मार्गदर्शिका की आवश्यकता नहीं पड़ती।

 एक बार अपने गंतव्य पर पहुँच जाने के पश्चात किसी मार्गदर्शिका की आवश्यकता नहीं पड़ती। भगवान जब स्वयं ही हमारे समक्ष हैं तो किसी मार्गदर्शक सिद्धांत की अब और आवश्यकता नहीं है। उनके अमृतसिंधु में डूबकर स्वयं अमृतमय हो जाएँ।

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यह समस्त अनंत सृष्टि हमारा ही विस्तार है। परनिंदा व आत्म-प्रशंसा --- दोनों ही नर्क के द्वार हैं। स्वयं को निमित्त मात्र बनाकर, नित्य प्रातः और सायं दो-दो घंटे, भगवान का ध्यान भगवान को ही कर्ता बना कर कीजिये। यह सब से बड़ी सेवा है जो हम अपने राष्ट्र, धर्म, और समष्टि की कर सकते हैं। हमारे चारों ओर छाया असत्य का अंधकार दूर होगा। सत्य के प्रकाश से सम्पूर्ण अस्तित्व आलोकित होगा। परमात्मा ही एकमात्र सत्य हैं, जिन की प्रत्यक्ष उपस्थिती हमारे चैतन्य में निरंतर बनी रहे। कुछ राक्षसी/आसुरी शक्तियाँ जो हमें भटकाने का पूरा प्रयास करती हैं, अब हमारा कुछ भी अहित नहीं कर सकेंगी।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ शिव !!
कृपा शंकर
१० जून २०२६

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