"भक्ति" के बिना ये चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) मेरे लिए तो बेकार हैं क्योंकि ये मुझे अपने प्रियतम से नहीं मिला सकते|
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भक्ति भी वही जिसे भक्ति-सूत्रों में नारद जी, और गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताई है| हमें तो अपने प्रियतम से अभी और इसी समय मिलना है, व किसी भी तरह का विलंब स्वीकार्य नहीं है|
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गीता के अलावा अन्य कोई भी उपदेश अब अच्छे नहीं लगते| समझाने वाले प्रियतम भी सामने ही खड़े हैं पर उन कुहुक-शिरोमणि ने एक पतला धुएं का सा आवरण खड़ा कर रखा है| यह आवरण ही पीड़ा है| इस आवरण को भी निश्चित रूप से वे स्वयं ही कभी तो ध्वस्त करेंगे|
२५ जुलाई २०२०
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