Tuesday, 28 July 2026

भगवान के बिना भी हमारा काम चल रहा है। हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है? .

 भगवान के बिना भी हमारा काम चल रहा है। हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है?

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उपरोक्त विषय पर मैं आप के विचार जानना चाहता हूँ। विश्व के घोर नास्तिक मार्क्सवादियों के विचार मैंने पढ़े हैं।
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भारत में कुछ वर्ष पहिले तक हिन्दी भाषा में "सरिता" नामक एक पाक्षिक पत्रिका निकलती थी जिसके सम्पादकीय और मुख्य लेख सनातन हिन्दू धर्म के घोर विरोध में लिखे जाते थे। उस पत्रिका को खोलते ही मुख्य लेख वेदों की निंदा, रामचरितमानस की निंदा, और सारे सनातनी हिन्दू रीति-रिवाजों की निंदा से भरे होते थे। कुछ रोचक कहानियाँ, और अन्य रोचक सामग्री भी होती थी। आश्चर्य की बात यह है की उस पत्रिका के पाठक भी सब हिन्दू ही होते थे। उस पत्रिका ने हिन्दू धर्म की बहुत अधिक हानि की। बहुत बड़ी संख्या में असंख्य हिन्दू उसे पढ़कर नास्तिक और धर्मद्रोही हो गए थे।
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जब मार्क्सवाद अपने चरम शिखर पर था, उस काल में और उसके बाद में भी मैंने कई मार्क्सवादी देशों का भ्रमण किया है, जहाँ ईश्वर की आराधना की सजा मृत्युदंड थी। वहाँ के लोगों का खोखला जीवन भी देखा है। अनेक मुस्लिम और ईसाई देशों का भ्रमण भी मैंने किया है और उनका खोखला जीवन भी देखा है।
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इन सब अनुभवों के पश्चात मेरे निजी व्यक्तिगत जीवन का केन्द्रबिन्दु तो भगवान हो गए हैं। सोशियल मीडिया पर मैं भगवान के बारे में कुछ लिख देता हूँ, और बहुत सीमित संख्या में बहुत कम ऐसे मित्र हैं जिन से आध्यात्मिक विषयों पर कुछ चर्चा हो जाती है। लेकिन भारत में ही आम आदमी से भगवान की चर्चा करना बड़ा खतरनाक है। किसी से भगवान की बात कर लो तो वह व्यक्ति बड़ा आक्रामक हो जाता है, और खाने को आता है।
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कहने को तो भारत एक धर्म-प्रधान देश है लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से ऐसा कुछ नहीं है। वर्तमान शिक्षा पद्धति के कारण ईसाई मूल्यों का प्रभाव बहुत अधिक है। भगवान के साथ व्यापार अधिक है और भक्ति बहुत कम है। धन्य हैं अनेक हिन्दू धर्म-प्रचारक जो हर तरह के असहयोग के पश्चात भी अपने धर्म पर अडिग हैं।
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कृपया अपने विचार बताने की कृपा करें की हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है? क्या भगवान के बिना हमारा काम नहीं चल सकता?
धन्यवाद और मंगलमय शुभ कामनाएँ।
२८ जुलाई २०२३

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