Tuesday, 28 July 2026

"कोई भी कामना हमारी अभिलाषा का विषय न हो" >>>

 जब मैं स्वयं के व्यक्तित्व का अवलोकन करता हूँ तब स्वयं में अपूर्णता ही अपूर्णता पाता हूँ। पूर्णता सिर्फ परमात्मा में है। उस पूर्णता को पाने के लिए ही हमें परमात्मा की आवश्यकता है। अपूर्णता बड़ी दुःखदायी है। इसे दूर करने का जो उपाय भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के छठे अध्याय में बताया है वह देखने में तो बड़ा कठिन है, लेकिन उसका कोई विकल्प नहीं है। भगवान हमें सब कामनाओं से निःस्पृह होकर अपने ही स्वरूप में स्थित होने को कहते हैं --

"यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥६:१८॥"
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हमें बाह्य चिन्तन को छोड़कर केवल आत्मा में ही स्थित रहने का आदेश भगवान देते हैं। आत्मा में स्थित होने की पात्रता तभी आती है जब हम सब भोगों की लालसा से निःस्पृह यानि निष्काम हों। तृष्णाओं के नष्ट होने पर ही चित्त निष्काम होकर आत्मा में स्थिर होता है। फिर कोई विक्षेप नहीं आता। भगवान "सर्वकामेभ्यो निःस्पृहः" होने को कहते हैं, अर्थात् कोई भी कामना हमारी अभिलाषा का विषय न हो।
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भगवान आगे कहते हैं --
"यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥६:१९॥"
इसका भावार्थ होगा कि जैसे वायुरहित स्थान में रखे हुये दीपक की लौ विचलित नहीं होती, वैसी ही हमारे चित्त की गति हो।
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हे प्रभु, आपकी जय हो। मैं कभी तत्व से विचलित न होऊँ, सदा निरंतर आप में स्थित रहूँ, और विषय-वासनाओं का चिंतन भूल से भी न हो।
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"नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये,
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा |
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे,
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ||"
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
२८ जुलाई २०२३

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